‘मुझे गद्दे पर सुलाया स्वयं खटेरे तखत पर सोये’

(शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ का पत्र डॉ. रामविलास शर्मा के नाम)गनेश कॉलोनी, नया बाज़ार

लश्कर, ग्वालियर

24 जुलाई, 45

प्रिय रामविलास,

गर्मी की छुट्टियों में जो पत्र तुम्हारा आया था उसका अभी तक जवाब नहीं दे पाया, सम्भवतः तुम बहुत रुष्ट होगे, और विशेषकर जब हमारा-तुम्हारा निश्चय हो चुका था निराला जी के यहां साथ-साथ जाने का, पहली जुलाई के लगभग. मैं यदि एक ही सांस में कह दूं कि मैंने आवश्यकता नहीं समझी तो तुम और भी तन जाओगे. पर बात यही है. मैं समझता हूं तुमने यह कहीं न कहीं से सुन ही लिया होगा कि मैं 26 जून को निराला जी के पास गया था. एक दिन वहां रुक कर फिर मैं अपने चचेरे भाई की बारात में चला गया. बारात से लौटकर पुनः उनके साथ दो दिन रहा, साथ ही खाया-पिया भी, और मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि तुम्हें इस समय बुलाना व्यर्थ है. इसीलिए तुम्हें कष्ट नहीं दिया. सोच रखा था कि फ़ैजाबाद से तुम्हें ब्यौरेवार पत्र लिखूंगा. पर वहां जाकर देखा कि अरुण सा. 104°, 105° डिग्री में गहरा विश्राम ले रहे हैं. उन्हें उसी दशा में लेकर ग्वालियर के लिए रवाना हो गया. रास्ते की यात्रा आदि से यहां पहुंचने तक उनकी दशा और चिंताजनक हो गयी. एक सप्ताह की तीमारदारी के बाद अब कुछ सुस्थिर हो सका हूं. इलाहाबाद से तो मैं बनारस चला गया था, पर बनारस से फ़ैजाबाद लौटने के पश्चात की यह सब कहानी है. ग्वालियर आते समय मैं एक दिन लखनऊ भी ठहरा था. वहां नकवी ने जोशी का सर्कुलर पढ़ने को दिया तथा युद्धकाल की प्रगतिशील हिंदी कविताओं का संकलन करके भेजने को कहा था. साथ ही इस सम्बंध में उन्होंने तुम्हारा भी नाम लिया था कि रामविलास  से भी यह कार्य करने को लिख दिया गया है और तार द्वारा भी बुलाया गया है. मैं इस समय परेशानी में भी था और मैं समझता हूं, इस विषय में तुम्हारा संकलन ही standard होगा. अतएव नकवी को मैं अपनी विवशता लिख दे रहा हूं.

निराला जी के यहां जब मैं पहुंचा तो वे बैठे चौका लगा रहे थे. घर में अंधकार छाया हुआ था, ऊपर के एक कमरे के कोने में मिट्ठी का छोटा-सा दीपक अवश्य टिमटिमा रहा था. केश और दाड़ी-मूंछ बढ़े हुए, अस्तव्यस्त, जैसे अभी-अभी रोग शय्या से उठे हों. मुझे बिजली की करेंट का धक्का-सा लगा, दिल दहल उठा, पर चुपचाप उनकी ओर ताकता खड़ा रह गया. वे थोड़ी ही देर पहले शाम का भोजन पकाकर उठे थे. मुझे देखकर बहुत ही खुश हुए. बिना कुशल समाचार पूछे ही बोल पड़े, आज खाना ज़्यादा बना लिया था, सोच ही रहा था कि इतना खाना कौन खायेगा? पर तुम अच्छे आ गये, अब खाना खाकर ही जाना. फिर घी की और दूध की ताऱीफ के पुल बांध दिये. आज बहुत ही बढ़िया घी लाया हूं, ऐसा तो बैसवारे के गांवों में भी मिलना दुर्लभ है, आजकल. बहरहाल मुझे ज़बरदस्ती बिठाकर खिलाया. और सच पूछो तो खुद भूखे रह गये. मुश्किल से दो या तीन रोटियां खायी होंगी. तीन चौथाई दूध भी रोटी मीस कर मेरे सामने रख गये. बहुत मना करने पर भी नहीं माने. कहने लगे कि तुम आदमी हो कि क्या हो. मैं बेवक़ूफ हूं जो तुम्हारे लिए भूखा रह जाऊंगा. मुझे चारपाई पर गद्दा बिछाकर सुलाया स्वयं खटेरे तखत पर सोये. तुम्हारे कुशल समाचार पूछे. तुम्हारी वाली पुस्तक का तो उन्हें पहले ही पता लग चुका था, पता नहीं कैसे, शायद तुम्हारे ही द्वारा. खाने के पहले एक पोटली में बंधा हुआ आटा अंदर से लाये और मटकी में भरने लगे. मैंने कहा लाइए मैं भर दूंगा आप नहाने जाइए, तो बिगड़ पड़े. फिर जब स्नान करने जाने लगे तो उसी कपड़े को जिसमें आटा बंधा हुआ था, झाड़कर पहनने के लिए ले गये. सब कपड़े मैले हो गये थे. धुलवाने की कौन ]िफकर करे? घर तो तुमने देखा ही है. कच्चा, खपरैल की छत और सीलन.

सोते समय मैंने ग्वालियर चलने की बात की तो स़ाफ नाहीं कर गये. मैंने बड़ी चिरौरी  मिन्नत की पर वे अपने निश्चय से न डिगे. डॉ. महावीर सिंह की ओर से संदेश भी दिया,  तुम्हारा भी नाम लिया पर वे टस से मस न हुए. फिर पंत जी के विषय में बड़ी व्यग्रता से पूछते रहे. प्रातःकाल भी मुझे रोक लिया. कलिया बनाकर खिलायी अपने हाथ से. मेरे सोकर उठने के पहले ही बाज़ार से जलेबी लाकर रख दी थी. रात को उनके मना करने पर भी लगभग एक घंटे मैंने हाथ-पैर और शरीर दबाया था, पहले तो मना किया पर बाद में चुपचाप दबवाते रहे. बारह बजे मुझे ज़बरदस्ती सुला दिया. दिन में फिर मैंने ग्वालियर चलने पर ज़ोर दिया तो कहने लगे कि पुस्तकें आधी छप चुकी हैं, मेरे पास उनके प्ऱूफ भी आने लगे हैं, मैं बिना पुस्तकें पूरी किये कहीं आ जा नहीं सकता. कुछ किताबों के मुझे प्ऱूफ भी दिखाये. खासकर उसके जो महादेवी जी के संसद की ओर से छप रही है. फिर कहने लगे, अभी ‘चोटी की पकड़’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक पूरी करना है और बिना उसे पूरी किये मैं कहीं आ जा नहीं सकता. तुम्हें यह लिख देने को कहा कि पुस्तकें पूरी हो जाने पर- लगभग दो महीने बाद- एक सप्ताह के लिए, केवल एक सप्ताह के लिए आगरे आऊंगा और फिर वहां से शायद ग्वालियर भी एक सप्ताह के लिए चला जाऊं पर ग्वालियर के बारे में अभी कुछ निश्चय नहीं कह सकता. मेरी सारी मनुहारें व्यर्थ हो गयीं, दिल इतना गिरा-गिरा रहा कि तुम्हें क्या लिखूं, कुछ समझ में ही न आया. हो सकता है उन्हें ग्वालियर लाने के लिए ज़िद करने में मुझसे कुछ मनोवैज्ञानिक भूलें हो गयी हों, जो शायद तुम होते तो न होतीं, यह मैं अब अनुभव कर रहा हूं. आजकल गज़लें भी अच्छी लिख रहे हैं. अभी नयी छह गज़लें लिखी हैं. मुझे पढ़ने को दी थीं. जब सो गये तो उन्हें मैंने एक कागज़ पर उतार लिया. उपयोग करने की इच्छा है. कुछ क़ाफी सुंदर बन पड़ी हैं. नमूने के तौर पर एक-एक दो-दो पंक्तियां भेज रहा हूं-

लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो हरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा

उन्हीं बीजों के नये पर लगे, उन्हीं पौधों से नया रस झिरा

उन्हीं खेतों पर नये हल चले, उन्हीं माथों पर नये बल पड़े

उन्हीं पेड़ों पर नये फल फले, जवानी फिरी जो पानी फिरा

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बदलीं जो उनकी आंखें, इरादा बदल गया

गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया

यह टहनी से हवा की छेड़छाड़ थी मगर

खिलकर सुगंध से किसी का दिल बदल गया

खामोश फ़तह पाने को रोका नहीं रुका

मुश्किल तमाम ज़िंदगी का जब सहल गया

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संकोच को विस्तार दिये जा रहा हूं मैं

क्या छंद को निस्तार दिये जा रहा हूं मैं

उपवन में शायरी के मेरे शब्द यों आये

जैसे गुलों को खम दिये जा रहा हूं मैं

ज़रा इन पंक्तियों पर ख्याल करो-

तुलसी की सूर की किताबों में जो आ गयी

उस युवती को सिंगार दिये जा रहा हूं मैं

यह उन गज़लों की कुछ पंक्तियां मात्र ही हैं, चाहो तो पूरी गज़लें भेज दूं.

संक्षेप में यही उनके हालचाल हैं, वैसे तुम जैसा कहो वैसा करूं. अपना आक्रोश स्पष्ट लिखना. डॉ. महावीर सिंह तुम्हें कई बार याद कर चुके, हो सके तो एक-दो दिन के लिए उनसे मिल जाओ.

‘प्रलय-सृजन’ प्रकाशित हो चुका, बाज़ार में आ गया. अभी तक तुम्हारे पास पहुंचा या नहीं, मैंने प्रकाशकों को लिख दिया था. साहित्य संदेश में कुछ लिख देना. आज ही निराला-परिषद की योजना का सूचना पत्र लोकयुद्ध में पढ़ा. उसके कार्यक्रम के विषय में मुझे विस्तार से सूचित करो.

यहां के भी कुछ लोग सम्मिलित होने को उत्सुक हैं.

भाभी को प्रणाम, बच्चों को प्यार. शांति का नमस्ते और उषा, अरुण का प्रणाम स्वीकार करो.

साथी.

सुमन

(नकवी-शफीक नकवी, यू.पी. के कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव)

(जनवरी 2016)

 

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