डाक बाबू

– अनिल अत्रि

 

रोज़ रोज़ मैं राह तुम्हारी देखा करता
जाने कब तुम खत मेरा लेकर आओगे
नाम पुकारोगे मेरा चश्मा सीधा कर
मेरे दरवाज़े की कुंडी खटकाओगे
पर जब ड्योढ़ी लांघ मेरी आगे जाते हो
कसम राम की संग जिया भी ले जाते हो
कितना अच्छा होता मेरे यार डाकिये
झूठ-मूठ ही अगर मुझे तुम यह कह जाते
आया था, पर किसी और को दे आया हूं
जाने कैसे भूल बड़ी यह कर आया हूं

रहता नहीं गिला मुझको खत न आने का

यह अहसास बहुत था मेरे जी जाने का
झूठ तुम्हारा सच मेरा सपना कर जाता
मैं भी फिर इठला कर यह कह पाता
लिखा गया है खत मेरे भी नाम से
भरा हुआ है प्रेम के पैगाम से

क्या हुआ अगर जो नहीं छुआ मेरे हाथों ने

याद किया हर हर्फ सुनो मेरी सांसों ने
मैं धुरी, वह मेरे जीवन का घेरा है

है और किसी के पास, मगर खत तो मेरा है.

                                   (जनवरी 2016)

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