खुशी कैसे पायें

बोधकथा

आश्रम में एक छात्र ने पूछा, ‘गुरुवर क्या आसानी से खुशी पायी जा सकती है?’

गुरुजी ने मुस्करा कर कहा, ‘तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं कल सुबह सभी विद्यार्थियों के समक्ष दूंगा.’

दूसरे दिन सभी छात्र जब आ गये तो गुरुजी ने कहा, ‘आज हम एक खेल खेलेंगे. बायीं तरफ स्थित कक्ष में कुछ पतंगें रखी हैं. उन पर आपके नाम लिखे हैं आपको उस कक्ष में जाकर अपने नाम की पतंग लानी है और इस प्रांगण में आकर उड़ाना है.’

सभी छात्र कमरे में अपने नाम की पतंग को तलाशने में जुट गये. अफरातफरी में कोई भी अपनी पतंग को साबित नहीं पा पाया. छीना-झपटी में पतंगें फट गयीं.

गुरुजी ने कहा, ‘सभी अपनी नाकामी को भूलकर दायीं ओर स्थित कक्ष में जायें वहां भी आपके नाम लिखी पतंगें हैं. आपको  किसीकी भी पतंग लाकर उड़ानी है.’ सभी कुछ ही क्षणों में पतंगें लेकर प्रांगण में आ गये और खुशी से पतंग उड़ाने लगे.

तब गुरुजी ने उस शिष्य को कहा, ‘वत्स हम खुशी की तलाश इधर-उधर करते हैं जबकि हमारी खुशी दूसरों की खुशी में होती है.’            

– श्रीकांत कुलश्रेष्ठ

(जनवरी 2016)

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