यह जो वसंत है! – पूरन सरमा

आवरण-कथा

प्रकृति का शृंगार और मनुष्य का उल्लास है वसंत. माघ शुक्ल पंचमी से मौसम जैसे करवट लेता हो. हवा भले चुभती हो लेकिन धूप चटकने लगती है और देह को रास आने वाला मलयानिल सनन-सनन की आवाज़ में इधर से उधर दौड़-धूप करता लगता है. यही नहीं, उस समय वसंत आंखों को दिखाई देता है और मन उसे छूना भी चाहता है. खुले आकाश, पेड़-पत्तों तथा नदियों-खेतों के चौरस दालानों में वसंत खिल-खिलाता है. सरसों की तो बस पूछो ही मत. पूरी तरह से गदराई मतवाली होकर झूम उठती हैं. पीताम्बरी बन जाती है धरती. बूढ़ा पीपल और नीम भी बतियाने लगते हैं. उनकी बातों का सिलसिला जैसे खत्म ही नहीं होता. अमराई में बौराने लगता है कोई एक बौर. जीव-जगत पर छाया वसंत एक उन्माद-सा बनकर अपने पाश में समेटने को आतुर लगता है.

फूलों की यह खास ऋतु होती है. फूल तो जैसे खिल जाने को बेताब हों. इतने खिलते हैं, इतने खिलते हैं कि बिखर ही जाते हैं. भीतर का उल्लास और उत्साह. वसंत के स्वागत को लदे-फदे वृक्ष चुप नहीं रहते. पक्षियों का शांत मन कलरव कर उठता है. वहां घरों से भी कहीं ज़्यादा गहमागहमी हो गयी है. छोटी-छोटी चिड़ियाओं की ज़बान लंबी हो गयी है. कोयल तो जैसे इन सबकी प्रधान बनकर अपनी एक ही टेर से सब पर साम्राज्य जमा लेना चाहती है. कहीं से उड़ता आता परिंदा परदेसी के लौटने जैसी बेला का स्मरण दिलाता है. विरहणियां छिन्नमस्ता होकर पाहुन वसंत को हृदय में स्वीकार कर मनुहार करने को आतुर लगती हैं.

रात में चांदनी के हल्के प्रकाश में कोचर बोलता है तो वह डराता नहीं, अपितु उसकी कर्कश आवाज़ भी जैसे अपनेपन में बदल जाती है. दूधिया प्रकाश में नहायी चम्पे की कली और रजनीगंधा के सफेद फूल एक दूसरे से लजाने लगते हैं. पलाश फूटने को तत्पर तथा मौलश्री में नव पल्लवन प्रारम्भ हो जाता है. वसंत का जैसे अंत होगा ही नहीं, वह बागों में आसन जमाये ऐसे जा बैठा है कि वनिता विभोर होकर मस्ती में प्रकृति का राग अलाप रही है. खेतों के मेड़ों पर तथा पनघट के पारे पर खड़ा वसंत अतृप्त चाहत में उलझा अपने हृदय की टीस को व्यक्त तो करता है लेकिन मौन संन्यासी-सा दिखाई देता है. फगुनौटी ने जैसे उसे बेसुध कर दिया हो. उसके होंठ बुदबुदाते हैं, लेकिन लगता ऐसे ही है जैसे परेशान होकर वह बड़बड़ा रहा हो.

वसंतोत्सव और मदनोत्सव की इस प्रियतम बेला में धरती की शृंगारप्रियता चरम पर है और ग्रामीण बालाएं वसंत को साथी बनाकर ढोरों के साथ जंगल में बहुत दूर और देर तक पठारों में बैठी अकेली ही खुद से बातें करती हैं. उनके सवालों का उत्तर देता है वसंत. जीवन के अनसुलझे रहस्य आप खुलने लगते हैं तथा लौटते समय लाज की ललाई उसके कपोलों पर बिखरने लगी है. पीली सरसों के रंग उसकी हथेली में आने लगते हैं और वह सकुचाई-सी अपना चेहरा खुद ही ताल के पानी में देखकर ढक लेती है. वसंत ने उसके भीतर तक एक हलचल जगा दी है और सुध-बुध खोकर बकरी के मेमने को गोद में उठाकर उसकी देह पर हाथ फेरती है. उसके भीतर भावों का समुद्र उमड़ पड़ता है और वह भावातिरेक-सी लहलहाते खेतों में बेतहाशा दौड़ती है और हांफकर रेत के टीले पर पसर जाती है.

वसंत का पता निगोड़े कागा को भी चल गया है. वह किसी मुंडेर पर जाकर कांव कांव का बेसुरा राग अलापता है. लेकिन यह राग तो विरहणियों के भीतर सोयी निराशा को आशा में बदलने का राग है. इसीलिए वे उन्हें घी-बूरे से सने ग्रास खिलाने की कामना में मनोकामना पूर्ण होने की अभिलाषा जतलाती हैं. तभी वह फुर्र से उड़ जाता है. उसे लगता है कि परदेस से लौटने वाला अब पल दो पल के बाद लौट ही आयेगा. पूरा वसंत बीत जाये भले इसी आंखमिचौली में- लेकिन उसका कर्कश राग विरहणी के पोर-पोर को वसंत में भिगो जाता है. फगुनौटी तीर की तरह चुभती है और देह में हो रहे परिवर्तन उसे सम्पूर्ण चेतना के साथ वसंत पर केंद्रित रखते हैं. कहीं रात में कोई छैला अलगोजे पर जब कजरी की टेर लगाता है तो हृदय विदीर्ण होकर आंखों की नींद उड़ा देता है. पूरी रात करवटों में बीत जाती है.

वसंत को कौन नहीं पहचानेगा. वह शिशुओं की भोली मुसकानों तथा तुतलाती बोली में चलना सीखता है. वह मां की ममता और पिता के वात्सल्य में भी अठखेलियां करता है. सब ठौर व्याप्त यह वसंत कहीं कालिदास बन जाता है तो कहीं वह निराला-सा फक्कड़ और कहीं वह मधुशाला में डूबा जीवन का सही राग पाने की कोशिश में होता है. मनुष्य के भीतर कविता जनमती है और पशु-पक्षियों की भाषा अपना स्वर पा जाती है.

वसंत को ऋतुओं का राजा ही इसलिए माना गया है कि वह हर किसी को आभास दे जाता है कि वह आ गया है. जीव जगत भरमाया, चौकन्ना और प्रसन्नता से भरा, दिग्भ्रमित-सा, अपने में ही खो जाता है. वनों के वनवीर इधर से उधर, उधर से इधर बस भागादौड़ी में अनायास ही लग जाते हैं. हिरणों के झुण्ड पानी के पोखर के पास खड़े प्रकृति को निहारते हैं. शेर मांदों के बाहर हल्की धूप का आनंद लेकर दहाड़ने लगते हैं तो हाथियों को मदमस्त चिंघाड़ से वन जैसे शोभित हो जाता है. जीवन का संगीत जैसे वनों की सम्पूर्ण धरा पर छा जाता है. मोर नाचते हैं, सोनचिरैया तो जैसे फुदकने के अलावा कुछ जानती ही नहीं. इतनी व्यस्त हो गयी है वह कि पूरा जंगल पल भर में नाप लेती है. जैसे वसंत का आमंत्रण देती फिर रही हो.

वसंत को जो जान गया, वह मान गया कि इसका नशा कितना गहरा और सुखकारी है. बस वह इसमें डूबना चाहता है. वसंत की किलकारी से पहाड़ों का वैभव भी अछूता नहीं रहा है. वे भव्य परिधान से सजे तलहटी में बंदनवार सजाये वनदेवी से स्वागत के लिए नगाड़े बजा रहे है. सूरज सबसे पहले छूता है उनके शिखर को. भीतर की कंदराओं तक में कुहरे का धुंआ इस वसंत की दस्तक से दौड़ कर बाहर आ गया है तथा पहाड़ का पूरा सौष्ठव सीना ताने वसंत के आगमन से उल्फुल्ल है. इन पत्थर दिल पहाड़ों में भी जान डाल दी है, इस लाल टहनी पर झूलते एक फूल ने.

पेड़ों-पत्तों-फूलों और फलों में वसंत ने जो प्राण फूंका है- उससे धरती उसकी ऋणी हो गयी है. वह वसंत का आभार प्रकट करती दिखलाई देती है. प्रकृति के इस मनोहारी और अनुपम सौंदर्य ने हर किसी को मोह लिया है. प्रकृति के इस असीम वैभव को समेटने के लिए अरबों जोड़े हाथ भी जैसे कम पड़ गये हैं. इस सम्पदा को लूटने के लिए खड़े लोग निर्णय नहीं कर पाते कि किस दिशा से लूटें. वैभव का इंद्रधनुष हर तरफ, दसों दिशाओं में वितान ताने खड़ा है. चप्पे-चप्पे पर वसंत का राज है. इस अलबेले मदमस्त अघोरी संत से निपटने का ढंग सब अपनी-अपनी ढब से बैठा रहे हैं. यह वसंत जो है.

फरवरी 2016

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