Dr._Dharamvir_Bharati

 डॉ. धर्मवीर भारती
(1926 – 1997)

 कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना, अनुवाद, रिपोर्ताज… क्या नहीं लिखा
डा. भारती ने ! अनुप्रिया, सूरज का सातवां घोड़ा, अंधा युग, गुनाहों का देवता जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता, ‘धर्मयुग’ के यशस्वी सम्पादक.

 

आपने चैत बैसाख में नीम को फूलते देखा है ? हमारे उस कीचड़-भरी गलियोंवाले मुहल्ले में आम नहीं था, कड़ुआ नीम था. मगर चैत में जब फूलता था और कड़वाहट बसी एक ताज़ी सुगंध उन फूलों की मुहल्ले की हवा में बस जाती थी, तब जो एक नशा छा जाता है, मुहल्ले के डिप्टी लाला पर, गोरी मुदियाइन पर, खूंटी चोर और उसकी पतली छरहरी औरत छटंकी पर, और सुबह-सुबह किशन उस्ताद के घर में बजनेवाली सारंगी के सुरों पर और मटकी, गुलकी और मुन्ना पर, उस नशे की व्याख्या न तो मैं मार्क्स या स्टालिन की भाषा में कर सकता हूं, न सार्त्र या सोल्ज़ेनित्सिन की भाषा में. मैं तो इतना जानता हूं कि उसी गली में एक लड़का रहता था, भले घर का लेकिन बहुत गरीब, जो बहुत सुबह उठकर इम्तिहान की तैयारी करता था, रामचंद्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, सूर और जायसी, केशवदास और वेदांत से जूझता था, लेकिन रह-रहकर उसका ध्यान अपनी किताबों से उचट जाता था. और मुंह-अंधेरे बड़े भोर महकनेवाले नीम के फूलों की महक उसे बहा ले जाती थी किसी और दुनिया में जहां डिप्टी लाला थे, गोरी मुदियाइन थीं, खूंटी चोर था, छटंकी कहारिन थी, मटकी मिरवा थे, गिलकी थी, अपर्णा दीदी थीं, और खिड़की के पीछे लेटी हुई पार्क की ओर सूनी निगाह से देखती हुई बीमार सावित्री थी, किशन उस्ताद के घर में बजती सारंगी थी और सारंगी सुनते अपने छप्पर के नीचे लेटे बिरजा और मुंशी जी थे. उस लड़के को, जिसका घर का नाम बच्चन और स्कूली नाम धर्मवीर था, कभी सपने में भी अंदाज़ न था कि वह कभी लेखक होगा, कहानियां लिखेगा. उसे तो सिर्फ इतना मालूम था कि अब ये फूल झरेंगे, हरी निबौलियां नीम में लगेंगी, फिर अषाढ़ आयेगा, निबौलियां पकेंगी और तब मटकी, मिरवा और गुलकी के साथ वह नीमवाले चबूतरे पर बैठकर खेल-खेल में निबौलियों की दुकान लगायेगा और सरकंडे की तराज़ू बनाकर झूठ-मूठ में निबौलियां बेचेगा. मटका, मिरवी और मुन्ना खरीदेंगे और बदले में पैसे की जगह गोल-गोल मिट्टी के ढेले देंगे और कोई आज 35 साल बाद भी धर्मवीर के मन से पूछे, निबौलियां बेचकर कमाये गये उन मिट्टी के ढेलों की जो दौलत थी क्या दुनिया का कोईऊऊं भी लाल तानाशाह उनका अवमूल्यन कर सकता है ? या कोई पीला करोड़पति उन ढेलों की कीमत चुका सकता है ?

पर कहानी लिखने की शुरूआत ज़रा एक-दूसरे ढंग से हुई. वह लड़की- जिसे यह भले घर का लेकिन बहुत गरीब लड़का मन-ही-मन बड़ा सुकोमल, बड़ा इंद्रधनुषी प्यार करने लगा था और उस प्यार को कभी ज़बान पर भी नहीं लाता था, बिल्कुल नीम के चैती फूलों की तरह थी, ताज़ी, क्वांरी, पवित्र, उजली लेकिन काफी कड़वी. और वह लड़का धरती पर रहकर आकाश के सपने देखने लगा था. पर आकाश भी उसका कितना ? बस अपने मुहल्ले जितना. खुसरो की वह पहेली है न-एक थाल मोतियन भरा, सबके सर पर औंधा धरा ! चैत, बैसाख बीत चले थे. जेठ लग गया, दिन-भर लू. शाम को भी छत पर पानी छिड़को तो छत और दीवार से भभकती हुई आग निकले. जैसे-तैसे छत पर खरहरी खाट डालकर लेटो और तारे देखते रहो. ज़िंदगी का पहला प्यार कोई आसान बात नहीं होता. ऐसे ही एक गरमी की रात. नींद नहीं आयी तो नहीं आयी और कागज़—पेंसिल हाथ में आयी तो सुबह ही एक कहानी लिखने बैठ गया- ‘तारा और किरन’. प्रसाद की भाषा का जादू उस समय सिर पर सवार था और ऑस्कर वाइल्ड थे उस समय उसके प्रिय लेखक. सो उस कहानी की भाषा क्या सिंगार सजावटवाली थी और कल्पना कैसी झिलमिल सतरंगी थी ! हे प्यारे भाइयो, आप सब अनुभवी हैं; दोष उस कच्ची उमर और उस पहले सुकुमार पवित्र प्यार का और जयशंकर प्रसाद का और ऑस्कर वाइल्ड का था. उस बेचारे का क्या कसूर ! उसी तरह की और कहानियां वह लिखता गया- ‘स्वर्ग और पृथ्वी’, ‘पूजा,’ ‘शिंजिनी,’ ‘स्वप्न श्री’ और ‘श्री रेखा’ वगैरह-वगैरह. जैसे-तैसे हिम्मत करके उसने ‘परिमल’ की एक गोष्ठी में ‘पूजा’ कहानी पढ़ दी. उस दिन प्रमुख अतिथि थे उसके गुरु, विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. अमरनाथ झा. जब उन्होंने अपने भाषण में कहा कि आज की कहानी को सुनकर उन्हें विश्वास हो चला है, हिंदी कहानी अब उस पथ पर है जहां वह विश्व-कथासाहित्य के स्तर को छू लेगी, तो उसके मन को कैसा-कैसा लगने लगा. बेहद खुशी भी और बेहद डर भी. बहरहाल पागल की तरह साइकिल भगाता हुआ घर आया. साइकिल फेंककर मन हुआ जाकर उसे बताये जिसकी चम्पई छवि को सोच-सोचकर यह कहानी लिखी है, लेकिन छिः मुहल्ले का जीवन बड़ी मर्यादा का जीवन है. ऐसी बातें कहीं ज़बान पर लायी जाती हैं ! लेकिन दूसरे दिन जब लीडर अखबार में भी ‘परिमल’ की रिपोर्ट के साथ झा साहब का यह वाक्य छप गया तब तो उसे इतनी शरम आयी कि वह यूनिवर्सिटी भी नहीं गया. साइकिल लेकर गऊघाट से मिंटो पार्क तक निंबहरा की सड़क पर जमुना किनारे भटकता रहा…

  

कहानी 

तारा और किरण

वह विस्मित होकर रुक गया. नील जलपटल की पारदर्शक दीवारों से निर्मित शयन-कक्ष-द्वार पर झूलती हुई फुहारों की झालरें और उन पर रंगीन इंद्रधनुष की धारियां. सीपी की रंग-बिरंगी आभावाली कोमल शय्या और उस पर आसीन मुक्ता-सी स्वच्छ और प्रकाशमयी वरुणबालिका. उसका गीत सहसा रुक गया और वह असीम विस्मय से निर्निमेष पलकों से देखने लगा, सौंदर्य की वह नवनीत ज्योति….

वरुणा ने अपनी अलसायी पलकें उठायीं. आगंतुक की ओर एक कुतूहल की दृष्टि डालकर वह सजग हो गयी. बिजली की कोरवाले सुरमई बादल के आंचल को उसने लापरवाही से कंधों पर डाल लिया और जूड़े से गिरे हुए जलफूलों पर वह कोहनी टेककर बैठ गयी.

“उर्मि, क्या यही तुम्हारी नवीन खोज है ?” आगंतुक की ओर इंगित करते हुए वरुणा बोली.

“हां रानी” उसके साथ की मत्स्यबाला लहरें-सी लहराकर बोली.

“कल संध्या को अंतिम किरणें बटोरने हम लोग स्थल तट पर गयी थीं, रानी ? किंतु सहसा जल-बीचियों के नृत्य के साथ पवन के झकोरों में कुछ स्वर-लहरियां नृत्य कर उठीं- उनमें कुछ अभिनव आकर्षण था. कुछ विचित्र टीस थी. हम लोग किरणें बटोरना भूल गयीं और उन्हीं स्वरों में बंधकर खिंची चली गयीं एक सैकतराशि के पास जहां यह वंशी बजा रहा था और निर्निमेष पलकों से देख रहा अस्तप्राय सूर्य की ओर-हम लोग मंत्रमुग्ध-सी खड़ी रहीं. स्तम्भित, मौन, निश्चल-हमारी चेतनाएं जैसे इसके स्वरों के साथ बिखरती जा रही थीं पवन के झकोरों में- इसने हमको बांध लिया था अपने स्वरों में… वंशी का स्वर गूंजता रहा- गूंजता रहा-गूंजता रहा- जब हमें चेतना हुई तो देखा गायक अचेत था. हमें वह बंदी बना चुका था. और हम उसे बंदी बना लायीं. रानी की सखियों पर भ्रम और संज्ञाहीनता का आवरण डालने के अपराध में इसे दंड मिलना चाहिए.”

“अच्छा तुम जाओ. मैं बाद में इसका निर्णय करूंगी.”

आगंतुक मौन था. उसे यह सभी कार्य मायाजाल प्रतीत हो रहा था. दिवस के घनघोर श्रम के बाद बैठा था सागर तट पर अपनी वंशी लेकर अपने थके मन से विषाद का भार हलका करने और पहली ही फूंक के बाद उसने देखीं चारों ओर नाचती हुई मत्स्य-बालिकाएं. उनके शरीर से सौरभ की इतनी तीखी लहरें उड़ रही थीं कि वह उनकी मादकता में बेसुध हो गया. और नयन खुलने पर अपने को पाया एक विचित्र प्रासाद में जो नील जलपटल से बना था. जिसके अंदर परियां संगीत-भरी गति से घूम रही थीं- उसके पश्चात ही अपने को पाया रानी के सम्मुख. विस्मय ने उसके शब्दों की शक्ति हर ली थी और वह अथक आश्चर्य से देख रहा था ये जादू के खेल.

“लो इस पर आसीन हो अतिथि!” माया देश की रानी ने स्वयं उठकर कोमल मृणाल-तंतुओं से बुना हुआ एक आसन डाल दिया- वह उस पर बैठ गया.

“अतिथि !” पंचम स्वर में वरुणा बोली- “सुनती हूं इन नील लहरों के वितान के पार कोई दूसरा लोक है. जहां उन्मुक्त आकाश है, जहां स्वच्छंद पवन के झकोरे कलियों को अनजाने में चूम लेते हैं. जहां सूर्य की किरणें बादलों को सजल रंगों में रंग जाती हैं. तुम तो उसी लोक से आये हो न !”

“हां, रानी !” शांत स्वर में आगंतुक ने उत्तर दिया.

“अतिथि! मेरी कितनी इच्छा होती है कि मैं भी अपनी सखियों के साथ उस विशाल सिकताराशि पर किरणें बुनने जाऊं. किंतु मुझ पर रानीत्व का अभिशाप है न. चिरकाल से इन जलप्राचीरों में सीमित रहने से अब मैं लहरों की तीव्रता सहने में असमर्थ हूं, अतिथि ! फिर भी तुम्हें देख कर ही उस लोक के वैभव का अनुमान करूंगी. तुम मुझे वहां की कथाएं सुनाओगे न ?”

“अवश्य, पर रानी ! तुम वहां की कथाओं को समझ न पाओगी. वहां की परम्पराएं, वहां का वातावरण, वहां के निवासी यहां से भिन्न हैं.”

“तुम यहां भी उस वातावरण का निर्माण करो, अतिथि!- मेरी उत्कृष्ट इच्छा है उसे समझने की. मैं यहां की नित्यता से अब ऊब चुकी हूं. मुझे कुछ नवीन चाहिए- कुछ जिसमें परिवर्तन की गति मिल सके- जिसकी ओट से जीवन का स्पंदन झांककर विहंस पड़े- तुम इसमें मुझे सहयोग दो, अतिथि ! यह वरुण लोक की रानी की आज्ञा नहीं प्रार्थना है.”

“मुझे स्वीकार है, रानी !”

रानी के उदास नेत्रों में बिजली चमक उठी. और वह दोनों करों से जल-पराग उड़ाती हुई चल पड़ी सखियों को परिवर्तन का नवीन संदेश सुनाने- अतिथि ने अपनी वंशी उठायी और उसके गंभीर उच्छ्वासों से वातावरण भर गया.

वरुण-लोक में चंचल लहरों पर परिवर्तन लहराने लगा था. संध्या होते ही जब सागर-तल की श्यामता में तम का प्रगाढ़ आवरण छा जाता था और दीपित पंखेंवाली मत्स्य-बालाएं जलप्रवाह में प्रकाश बिखेरने लगती थीं उसी समय सांझ की उदासी चीरकर गूंज उठता था आगंतुक की वंशी का जादूभरा-स्वर. लहरें निश्चेष्ट और निस्पंद हो जाती थीं. जल-फूल नयन मूंदकर डूब जाते थे आनंद में और चारों ओर छा जाती थी एक रहस्यमयी तन्मयता-वरुण रानी बेसुध होकर वंशी के स्वरों पर नाच उठती थी. कल्पना का साम्राज्य छा जाता था और उसमें बुन जाता था रेशमी तानों का स्वर्ण वितान.

एक दिन जब नीलोत्पल अलसाकर अपनी पलकें मूंद रहे थे तब मृणालों में एक गंभीर बंकिमता सिहर उठी थी. और जब जल-तितलियां फ़ीकी मुस्कानों से मुंदते फूलों से विदा मांग रही थीं तो अतिथि का मन न जाने कैसी उदासी से छा उठा. उसने अपनी वंशी एक ओर रख दी और करुण स्वर में गुनगुना उठा एक अपना देश-गीत. करुण स्वर नील जलप्राचीरों से टकराकर टूटने लगे. धीरे—धीरे सारा वातावरण एक अज्ञात वेदना से सिसकने लगा.

व्याकुल रानी बोल उठी- रुंधे कंठ में भर्राये स्वर में- “बस बंद करो, आगंतुक. तुम्हारा यह गीत जैसे एक विचित्र घुटते हुए वातावरण की सृष्टि कर रहा है- मुझसे यह सहा नहीं जाता.”

आगंतुक धीमे से एक उदास हंसी हंसकर बोला, “यह हमारे देश की कृषक बालाएं गाती हैं, रानी. जब बरसात की पहली घटाएं नन्ही बौछारों से उनके तन-मन को लहरा जाती हैं. और उस सिहरन को अनुभव करनेवाली उनके प्रिय की विशाल भुजाएं उनसे दूर होती हैं तब उनके हृदय का प्रेम अवरुद्ध झरनों की भांति कठोर शिलाओं से टकराकर करुण स्वरों में आर्तनाद कर उठता है— और तब हरे-भरे कुंजों में —पनघटों पर और लहराते खेतों में गूंज उठते हैं ये सिसकते गीत.”

“ठहरो अतिथि ! तुम्हारे शब्द कभी-कभी बहुत गूढ़ हो जाते हैं. बरसात की घटाएं उमड़ती हैं, कृषक-बालाएं गाती हैं; ठीक ! पर उनके मन का प्रेम उमड़ता है- प्रेम क्या, आगंतुक?” नितांत भोलेपन से वरुण बालिका ने प्रश्न किया.

आगंतुक के मस्तक पर चिंता की उलझन की दो-चार रेखाएं खिंच गयीं— “प्रेम
क्या ? बड़ा गूढ़ प्रश्न है रानी ! इसका उत्तर देना असम्भव है.”

“तब क्या मेरी जिज्ञासा अतृप्त ही रहेगी ?” कुतूहल और नैराश्य भरे स्वरों में रानी ने पूछा.

“अच्छा रानी, क्या तुमने भी किसी उदासी भरी वेला में अनुभव किया है अपने हृदय में गूंजता हुआ कोई दर्दीला स्वर-क्या तुम्हारे हृदय में कभी अनजाने अकारण ही कोई पीड़ा कसक उठी है और तुमने सुना है अपने मौन हृदय के खंडहरों में किसी अव्यक्त अभिलाषा का करुण वंशी-रव?”

“अतिथि ! तुम बड़ी रहस्यमयी बातें बता रहे हो— मैं कुछ नहीं समझ पा रही हूं.”

“हूं ! तुम समझ भी नहीं सकतीं रानी ! हम मानवों में ही इस प्रेम की अभिलाषा का अनुभव करने के लिए जीवित स्पंदित हृदय होता है, रानी- यह प्रेम अलौकिक होते हुए भी वास करता है हम लौकिक नश्वर प्राणियों के ही हृदय में. यह तुम्हारे मायालोक से अपरिचित है.”

“तो क्या मैं प्रेम से अपरिचित ही रहूंगी ? मैं कितनी भाग्यहीन हूं. इस असीम जलराशि में रहकर भी मैं अतृप्त तृष्णा से जलती ही रहूंगी- मैं कितनी दुःखी हूं. अतिथि! मेरा रानीत्व मेरे नारीत्व के स्वच्छंद विकास को चूर-चूर कर रहा है- यह असीम वैभव, यह अनंत यौवन क्या यों ही..” रानी का गला भर आया और उसके सीपी के समान नेत्र में नाच उठे दो बड़े-बड़े मोती-

अतिथि उद्विग्न हो उठा- उसने अनजाने रानी को व्यथित कर दिया था- उसने रानी की ओर क्षमाप्रार्थी की दृष्टि से देखा. रानी करुणा और याचना भरे स्वरों में बोली, “तुम मुझे प्रेम न सिखलाओगे, अतिथि ? मैं मानवी नहीं हूं पर न जाने क्यों यह शब्द मुझे कुछ विस्मृत युगों का स्मरण दिला रहा है. प्रतीत होता है जैसे जन्म-जन्मांतर की विस्मृति को चीरकर कोई अव्यक्त शब्दों में मुझे सुना रहा हो प्रेम के उदास गीत, क्यों मेरे ही हृदय के रहस्यों से मुझे अपरिचित रखोगे, अतिथि…” और टपटप दो आंसू चू पड़े रानी के आंचल पर.

अतिथि ने जैसे प्रायश्चित का मार्ग ढ़ूंढ़ लिया. एक विचित्र मादकता से रानी के नयनों में नयन डालकर वह मृदुल-दुलार भरे शब्दों में बोला, “मैं प्यार सिखाऊंगा, मेरी रानी !”

रानी के उदासी के बादल फट गये और उनमें से झांक पड़ी दो-चार उज्ज्वल हास की रेखा-किरणें.

पथिक प्रासाद के झरोखे से देख रहा था- चारों ओर फैली हुई असीम जलराशि चुपके से लहरों को लहरें चूमती थीं और झिझककर पीछे हट जाती थी. एक विचित्र आशंका से त्रस्त-सी होकर, बेसुध पथिक को पता नहीं था कब रानी उसके पार्श्व में आकर खड़ी हो गयी- रानी के चंचल करों ने चुने कुछ जल-पटल और उन्हें राशि-राशि बिखेर दिया अतिथि-भावमग्न अतिथि पर. अतिथि ने चौंककर मुड़कर देखा- वरुण-लोक की रानी उसके हृदय-लोक की रानी- उसने वे कोमल जल-पटल उठाये और उन्हें मस्तक से लगा लिया.

“किंतु इनमें सौरभ तो है ही नहीं, रानी.”

“पर इनमें अनंत यौवन तो है, अबाध विकास तो है, अमर सौंदर्य तो है- क्या तुम्हारे लोक में फूलों में सौरभ भी होता है, अतिथि ? विचित्र है तुम्हारा लोक-सौंदर्य तो रूप का गुण है-पर सौरभ तो नहीं- फिर तुम्हारे लोक में फूलों में भी सौरभ होता है.”

“हां ! हमारे फूलों में सौरभ होता है, रानी ! हमारे लोक की पार्थिवता में ऐसे ही अलौकिक गुण रहते हैं, रानी. रूपवान फूलों में सौरभ, कठोर लौह-तारों में मधुर स्वर और मादक यौवन में अलौकिक प्रेम,”

“तो प्रेम यौवन-सुमन का सौरभ है— लेकिन अतिथि ! मत्स्यबालाओं से सुनती हूं कि इन्हें कभी-कभी तटों पर बहकर एकत्र हुए राशि-राशि फूल मिलते हैं जो निरंतर जल में रहने से गल जाते हैं. उनका रंग उड़ जाता है और उनसे निकलने लगती है कड़ी दुर्गंध. कभी-कभी श्मशान घाटों पर भस्म के ढेरों में दबी मिलती है फूल-मालाएं, जो जलकर शुष्क हो जाती हैं और जो हल्के स्पर्श से चूर-चूर होकर बिखर जाती हैं. कैसा दर्द भरा वर्णन है, अतिथि ! क्या इन्हीं फूलों की भांति तुम्हारे देश का यौवन भी अस्थिर है ? क्या वहां का प्रेम भी इतना नश्वर है-बोलो.”

“हां रानी ! यौवन के आश्रित रहनेवाला प्रेम भी इतना ही नश्वर है.”

“अतिथि !” रानी चीख पड़ी. “प्रेम नश्वर है, यौवन अस्थिर है. नहीं-नहीं अतिथि ! ऐसा मत कहो.”

“किंतु— रानी !”

“किंतु— परंतु नहीं, अतिथि ! प्रेम नश्वर है, यौवन अस्थिर है. आहा ! मेरे हृदय में जैसे ज्वालामुखी तप रहा है- मेरी चेतना में जैसे तूफ़ान गरज रहे हैं. मेरे मस्तिष्क में जैसे भूचाल आ रहे हैं, अतिथि. प्रेम नश्वर है.”

रानी अर्ध-विक्षिप्त-सी अपने शयन-कक्ष की ओर लड़खड़ाते पांवों से भागी-अतिथि स्तम्भित था— चकित था-वह सांत्वना देने के लिए पहुंचा रानी के पास, पर शयन-कक्ष के पट बंद थे. सांझ हुई, वे पलक मूंदकर सो गये. सात बार कमल फूले और मुरझाये पर रानी के पट पूर्ववत् बंद थे.

अतिथि अधीर हो गया. रानी का अभाव उसे व्याकुल किये दे रहा था. वह पहुंचा और फुहारों की झालरें हटाकर उसने झांका कक्ष के अभ्यंतर में— शय्या पर अधलेटी रानी सिसक रही थी. वह अपने पर नियंत्रण न कर सका.

“रानी.” आकुल स्वरों में उसने पुकारा.

रानी सिसकते हुए बोली, “आओ, अतिथि.”

अतिथि भीतर गया.

रानी के आंसू थमे और वह संयत स्वरों में बोली—“अतिथि ! मैं युग—युगों से प्रेम की प्रतीक्षा में जीवित थी. मेरी जन्म-जन्मांतर की साधनाओं का उद्देश्य प्रेम था- मैं अपने अनंत यौवन का साफल्य प्रेम में पाना चाहती थी. तुमने प्रेम की नश्वरता का चित्र खींचकर मेरी गति का आधार मुझसे छीन लिया. अतिथि ! तुमने मेरी अंतिम आशा को कठोर प्रहार से धूल में मिला दिया है- तुमने मेरे अंतिम प्रदीप को एक निर्मम झोंके से बुझा दिया है और मुझे छोड़ दिया है घोर तिमिर में भटकने के लिए एकाकी- यह किस जन्म के कृत्यें का बदला तुम मुझसे ले रहे हो आगंतुक ? बोलो, इसका उत्तर दो.”

पथिक आश्चर्यचकित था. उसने कुछ कहना चाहा पर उसके शब्द ओठों पर ही घुटकर रह गये. उद्विग्न, व्याकुल और अधीर होकर उसने कांपते करों से थाम ली रानी की मृणाल भुजाएं और उन पर चू पड़े दो तप्त आंसू.

रानी चोट खायी हुई नागिन की भांति बल खाकर उठ बैठी— “यह क्या किया अतिथि ? ” उसने आग्नेय नेत्रों से पथिक की ओर देखा, “यह तुम्हारा प्रथम स्पर्श जैसे मुझे भस्म कर रहा है- मेरे तन का कण जैसे जल उठा है- शायद तुमने प्रेम के करें से मुझे स्पर्श कर लिया है और तुम्हारे नश्वर मृत्युलोक की प्रेम की छाया मेरे अनंत यौवन पर भी पड़ गयी- आह ! मेरे हिम से अंग गल रहे हैं इसमें…अतिथि…”

अतिथि प्रयत्न कर रुंधे गले से बोला- “रानी ! हम मनुष्यों का प्रेम मनुष्य ही समझ सकते हैं- यौवन का आश्रित प्रेम नश्वर होता है—पर प्रेम का आश्रित प्रेम अमर-हम नश्वर जानते हुए भी पलकें मूंदकर प्रेम करते हैं- क्योंकि हमारा प्रेम आत्मदाह होता है—याचना नहीं. तुमने प्रेम को यौवन की तुला पर तौलना चाहा, रानी ! और प्रेम के भीषण ताप में गल रही हो. तुम्हारी वासनाएं और तुम्हारा नश्वर यौवन-और मैं. तुम अनंत शून्य में झांककर देखना, रानी ! मैं प्रेम की जलन में जलकर भी तुमसे प्रेम करूंगा. प्रेम की जलन मेरे हृदय में तुम्हारी कांचन-प्रतिमा को और भी चमका देगी, रानी. मेरा प्रेम मलिन न होगा- बिदा.”

पर इस कथन के पूर्व ही रानी का हिम-तन गल चुका था. रह गयी थीं कुछ जल की लहरें जो प्रवाल के फ़र्श पर चूर-चूर होकर बिखर गयीं.

सुदूर क्षितिज में जहां आकाश और समुद्र मिलकर एक रहस्यमय देश का सृजन करते हैं- वहां सांझ होते ही आता है एक चमकीला तारा-लहरें उसे चूमने का व्यर्थ प्रयास करती हैं. दो-चार बादल आकर दुलारते हैं और वह अपना मुंह छिपाकर उनके विशाल वक्ष पर रो लेता है.

प्रातःवेला में सूर्य की दो किरणें किसी विशाल भुजाओं की भांति आगे बढ़ती हैं उसे आलिंगन में भरने के लिए, पर उनके समीप आने के पहले ही वह अरुणिमा में मुंह छिपाकर लौट जाता है अपने निराशा के देश को. व्याकुल किरणें निराशा से चूर-चूर होकर बिखर पड़ती हैं सिकताराशि पर.

मत्स्यबालाएं आती हैं. उन स्वर्ण किरणों को बीनकर ले जाती हैं वरुण-लोक. उनका कहना है कि यह है उनकी अदृश्य रानी का प्रेम जो तारे के रूप में चमकते अतिथि के पास जाता है पर उसके ताप से निस्तेज होकर बिखर जाता है पृथ्वी पर और वे उसे बीन लाती हैं अपनी रानी की स्मृति में.

वरुण लोक में अब प्रेम करना मना है.

(जुलाई 2007)

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