जर्मन विज्ञानः पतन और पुनरुत्थान


एक समय था, जब जर्मनी वैज्ञानिकों का मक्का या मदीना था. विज्ञान की दुनिया में आज जो स्थिति अमरीका की है, वही स्थिति आज से तीस साल पहले जर्मनी की थी. जर्मनी ने संसार को आइन्स्टाइन, प्लैंक, रोंटजेन, ओट्टो हान, मैक्स बार्न, वान लावे इत्यादि महान वैज्ञानिक प्रदान किये हैं.

    यही नहीं, इस सदी के प्रमुख वैज्ञानिकों में से अनेक ने जर्मनी में ही शिक्षा प्राप्त की है. इनमें मुख्य हैं, परमाणु-बम के जनक ओपनहाइमर एवं राकेट-विशेषज्ञ वान ब्राउन. यह भी सर्वविदित है कि द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् रूस और अमरीका की वैज्ञानिक प्रगति जो इतनी तीव्रता से हो पायी, उसमें जर्मन वैज्ञानिकों का काफी हाथ था.

    मगर आज वैज्ञानिक जगत् में जर्मनी का स्थान क्या है?

    जर्मनी की जो गौरवपूर्ण और महान वैज्ञानिक परंपरा पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में विकसित हुई थी, पिछले तीस वर्षों में उसका ह्रास हुआ है. स्वस्थ वैज्ञानिक परंपराएं एक दिन में ही नहीं बनतीं. उनका निर्माण सुदीर्घ, अथक और अनवरत परिश्रम का फल होता है. परंतु परंपराओं को तोड़ने और पतन की राह खोलने में न देर लगती है, न मेहनत. जर्मन विज्ञान इस सत्य का साक्षी है.

    अनेक महान वैज्ञानिकों की डेढ़ सदी की तपोमय साधना, लगन और परिश्रम के फलस्वरूप पनपी उच्च परंपराओं को सन 1933 में सत्तारूढ़ हुए नाजीवाद ने भारी क्षति पहुंचायी और विश्व का वैज्ञानिक नेतृत्व जर्मनी के हाथ से निकल गया.

    इसे एक स्थूल उदाहरण से समझा जा सकता है. अब तक 48 जर्मनों ने विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किये हैं. इनमें से 31 को नाजियों के सत्तारोहरण के पूर्व ही यह पुरस्कार मिल गया था. शेष में से भी अधिकांश को नोबेल पुरस्कार ऐसे अनुसंधान-कार्यों पर मिला है, जो उन्होंने 1933 से पहले ही किये थे.  

    इस पतन का मुख्य कारण था नाजियों की यहूदी-विरोधी नीतियां, जिनके कारण आइन्स्टाइन, मेइट्नर और फ्रिश इत्यादि लगभग 2,000 वैज्ञानिकों को जर्मनी छोड़ना पड़ा. इस प्रकार जर्मनी अपने एक तिहाई विज्ञानकर्मियों को गंवा बैठा. बची कसर नाजियों की गलत व्यावसायिक नीतियों, आर्थिक दुव्यवस्था और विज्ञानिकों के कार्य-स्वतंत्र्य के हनन एवं सरकारी हस्तक्षेप ने पूरी कर दी.

    प्रसन्नता की बात इतनी ही है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के साथ-साथ नाजी कालरात्रि समाप्त हो गयी और कैजर विल्हेल्म सोसायटी, जिसने जर्मन विज्ञान को मेरु-शिखर पर पहुंचाया था, ‘मैक्स प्लैंक सोसायटी’ के रूप में पुनः संघटित होकर विज्ञान-सेवा कर रही है.

    कैजर विल्हेल्म सोसायटी की स्थापना 1810 में हुई थी. कार्ल विल्हेल्म ने इसकी स्थापना का  मुख्य उद्देश्य यह बताया था कि प्रशिया (उस समय जर्मनी का संघटन नहीं हुआ था) में ऐसा वैज्ञानिक अनुसंधान-केंद्र होना चाहिये, जिसमें बाहरी और सरकारी हस्तक्षेप के बिना वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा सके. हालांकि सोसायटी को जर्मनी की केंद्रीय और राज्य सरकारों के खजानों से आर्थिक अनुदान मिलता था, परंतु नीति निर्धारण और कार्य-संचालन में वह पूर्णतया स्वतंत्र थी.

    यह परंपरा इतनी सुदृढ़ थी कि जब नाजियों ने विश्वविख्यात यहूदी महिला वैज्ञानिक मेइट्नर को जर्मनी छोड़ने का आदेश दिया तो उस आज्ञा को रद्द करवाने के लिए सोसायटी के अध्यक्ष मैक्स प्लैंक हिटलर से मिले, और जब आदेश रद्द नहीं किया गया, तो उन्होंने सरकारी हस्तक्षेप के विरोध में अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया.

    आरंभ से ही कैजर विल्हेल्म सोसायटी की नीति यह रही कि वह विज्ञान के केवल उन्हीं क्षेत्रों में कार्य कराये, जिनमें विश्वविद्यालय कार्य न कर रहे हों (जैसे प्लाज्मा भौतिकी आदि), या जिनके लिए ऐसे महंगे उपकरणों की आवश्यकता पड़ती हो, जिन्हें विश्वविद्यालय नहीं खरीद सकते. सोसायटी की सेनेट को अपने विवेक के अनुसार धन व्यय करने का पूर्ण अधिकार था.

    सोसायटी के अंतर्गत अनेक संस्थाएं थीं, जो विज्ञान की विशेष शाखाओं में काम करती थीं. ये संस्थाएं किसी वरिष्ठ विज्ञानी को, प्रायः किसी नोबेल पुरस्कार विजेता को, केंद्र बनाकर खड़ी की जाती थीं और उस क्षेत्र में कार्य करने वाले विशिष्ट प्रतिभावान विज्ञानियों को वहां कार्य करने के लिए आमंत्रित किया जाता था. सुविधानुसार संस्था के विभाग-उपविभाग बना दिये जाते थे, जो लगभग पूर्णतया स्वतंत्र होते थे. विकेंद्रीकरण की इस दूरदर्शी नीति के कारण ही जर्मन विज्ञान का विकास बड़े व्यवस्थित और अबाधित रूप से हो पाया.

    बर्लिन में कैजर विल्हेल्म सोसायटी के दो प्रमुख संस्थान थे- एक भौतिकशास्त्र का, दूसरा रसायनशास्त्र का. जब मैक्स प्लैंक ने 1937 में सोसायटी के अध्यक्ष-पद से त्यागपत्र दे दिया, प्रो. डीबाय उसके अध्यक्ष बनाये गये. वे मूलतः हालैंडवासी थे, परंतु दीर्घ काल तक जर्मनी में शोधकार्य कर चुके थे. 1939 में नाजी सरकार ने उन्हें नाजीवाद को विज्ञान-सम्मत सिद्ध करने के लिए एक पुस्तक लिखने का आदेश दिया. प्रो. डीबाय ने न केवल पुस्तक लिखने से इन्कार किया, बल्कि जर्मनी भी छोड़ दी.

    जब सी.एफ. वान वेजेकर ने डीबाय का रिक्त किया हुआ अध्यक्ष-पद संभाला, तो जर्मन वैज्ञानिकों ने उनकी कटु आलोचना की. आज भी बहुतों ने उन्हें क्षमा नहीं किया है. परंतु वेजेकर का कहना है कि उन्होंने नाजियों को रिझाने के लिए नहीं, बल्कि जर्मन विज्ञान को बचाने के लिए यह पद स्वीकार किया था. इसमें संदेह नहीं कि उन्हीं के कारण सोसायटी के अधीन विभिन्न संस्थाओं में शोधकार्य होता रहा.

         द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में ओट्टो हान, वान लावे, वेजेकर इत्यादि नौ प्रमुख जर्मन वैज्ञानिक युद्धबंदी बनाकर इंग्लैंड ले जाये गये.

    युद्ध की समाप्ति पर जर्मन वैज्ञानिकों ने अपने देश में विज्ञान के पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया और कैजर विल्हेल्म सोसायटी को नया जीवन देना चाहा. मित्रराष्ट्रों को ‘कैजर विल्हेल्म’ नाम पर एतराज था. इस लिए 1947 में इस संघटन का नाम ‘मैक्स प्लैंक सोसायटी’ कर दिया गया.

    क्वांटम,  सिद्धांत के प्रवर्तक मैक्स प्लैंड (1858-1947) को 1918 में नोबेल पुरस्कार मिला था. 1930 से 1937 तक वे कैजर विल्हेल्म सोसायटी के अध्यक्ष रहे थे और नाजी हस्तक्षेप के विरोध में उस पद से त्यागपत्र देकर उन्होंने निर्भीकता और मनस्विता कर प्रमाण दिया था.

    ओट्टो हान के अध्यक्ष-काल में मैक्स प्लैंड सोसायटी ने अपना सारा समय जर्मन विज्ञान को पुनः संघटित करने में लगा दिया. बीस वर्ष के प्रयत्न के उपरांत आज सोसायटी के निर्देशन में जर्मनी विज्ञान में अपनी खोयी हुई महत्ता को पुनः प्राप्त कर रहा है,विशेषतः जीव-रसायन के क्षेत्र में.

    मैक्स प्लैंड सोसायटी ने पहले की सब स्वस्थ परंपराओं को फिर से अपनाया है. आजकल उसके अंतर्गत 52 संस्थाएं हैं, जिनमें लगभग 1,700 शोधकर्ता कार्यरत हैं. 1967 में उसका बजट 60 करोड़ रुपये का था, जिसका मुख्य भाग जर्मनी के संघीय और राज्य प्रशासनों से प्राप्त हुआ था.

    जहां तक संभव हो, सोसायटी के प्रमुख संस्थानों का अध्यक्ष कोई नोबेल पुरस्कार विजेता ही रहता है. म्यूनिख में जीवरसायन संस्था के प्रमुख डॉ. ब्यूटेंड हैं, जिन्हें 1939 में यौन-हारमोनों के कार्य पर नोबेल पुरस्कार मिला था. बर्लिन में डॉ. वारबर्ग शरीर क्रिया-विज्ञान की संस्था के निदेशक हैं. गोटिंजन में डॉ. मेनफ्रेड आईजिन भौतिक-रसायन संस्था के अध्यक्ष हैं. उन्हें सेकेंड के दस लाखवें भाग में होने वाली रासायनिक अभिक्रियों के मापन-कार्य में मार्गदर्शन के लिए 1967 में नोबेल पुरस्कार मिला था.

    वसा वाले (फैटी) अम्लों के जीवसंश्लेषण के कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले डॉ. फ्रिओडर लियन म्यूनिख में कोशिका-रसायनशास्त्र की संस्था के संचालक हैं. म्यूनिख में ही आणविक आनुवंशिकी, प्रयोगात्मक औषध विज्ञान, प्रोटीन जीव-विज्ञान तथा प्रतिरक्षक जीव-विज्ञान की संस्थाएं भी है. कई संस्थाओं के कुछ उप-विभाग पूर्णतया स्वतंत्र हैं.

    संस्थाओं के कोई बंधे-बधाये कार्यक्षेत्र नहीं है. जीव-विज्ञान से संबंधित संस्थाओं में कई काम एक से अधिक स्थानों पर होता है, हालांकि उनमें सूक्ष्म अंतर भी रहता है.

    सोसायटी की सेनेट भी संस्थाओं के कार्य-कलाप में कम ही हस्तक्षेप करती है. प्रत्येक संस्था का अध्यक्ष स्वयं निश्चय करता है कि किन विषयों पर अनुसंधान किया जाये और किस कार्य पर कितना धन व्यय किया जाये. उसे केवल वार्षिक विवरण भेजना होता है.

    संस्था के कार्य के मूल्यांकन का अवसर तभी आता है, जब वर्तमान अध्यक्ष निवृत्त हो जाये, त्यागपत्र दे दे, या उसका देहावसान हो जाये. तब मैक्स प्लैंक सोसायटी संस्था के शोधकार्य का पूर्णतया मूल्यांकन करके, आवश्य हो तो उसके शोधकार्य को नयी दिशा देती है. कभी-कभी सहायता भी बंद कर दी जाती है.

    प्रारंभ में 83 संस्थाएं सोसायटी के अधीन थीं, आज केवल 52 संस्थाएं हैं. 31 संस्थाओं की सहायता समाप्त कर दी गयी और उनमें से कुछ विश्वविद्यालयों अथवा सरकारी संघटनों के सुपुर्द कर दिया गया.

    प्रायः संस्थाओं के संचालक अधिक वृद्ध नहीं हैं. बहुदा युवास्था में भी संचालक पद दे दिया जाता है. डॅ. ईगन 39 वर्ष की उम्र में संचालक बना दिये गये थे, अब वे 41 वर्ष के हैं. सोसायटी के अध्यक्ष ब्यूटेंड इस समय 68 वर्ष के हैं. केवल 33 वर्ष की आयु में ही वे जीव-रसायन संस्था के अध्यक्ष बना दिये गये थे. क्वांटम-यांत्रिकी के प्रवर्तक तथा सोसायटी के उपाध्याक्ष वर्नर कार्ल हैजनबर्ग इस समय 68 वर्ष के हैं. उन्होंने     नोबेल पुरस्कार 31 वर्ष की आयु में ही प्राप्त किया था.  

    निःसंदेह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और व्यापक काम जीवन-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में हो रहा है, मगर अन्य विज्ञानों की भी उपेक्षा नहीं हो रही है. सोसायटी के माध्यम से जर्मनी पुनः खगोल-विज्ञान पर ध्यान दे रहा है. दो वर्ष इस क्षेत्र में सोसायटी की कोई संस्था न थी, परंतु अब दो संस्थाएं काम कर रही हैं. विश्व की सबसे बड़ी और पूर्ण रूप से स्वयंचलित रेडियो-दूरबीन का निर्माण बोन के निकट रेडियो-खगोल संस्थान कर रहा है. खगोल-विज्ञान की संस्था दो वेधशालाओं का निर्माण करेगी, इनमें से एक विषुवत् रेखा के क्षेत्र में होगी, दूसरी दक्षिणी गोलार्ध के आकाश को देखने के लिए संभवतः दक्षिणी अफ्रीका में.

    सेटर्न-5 के जन्मदाता वान ब्राउन जर्मनी से ही द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका गये थे. अब उनकी जन्मभूमि भी अंतरिक्ष-अनुसंधान में कदम उठा रही है. म्यूनिख के निकट भौतिक तथाज्योतिर्भैतिकी की संस्था के प्रधान डॉ. हैजनबर्ग हैं.

    डॉ. हैजनबर्ग के नियंत्रण में 46 वर्षीय डॉ. रीमर लस्ट द्वारा संचालित स्वतंत्र संस्था पारभौमिक भौतिकशास्त्र संस्थान ने गोधूलि के समय आकाश में 120 मील की ऊंचाई पर बेरियम गैस के बादल छोड़ने वाले कई राकेट छोड़े है. सौर वायु उस गैस को आयनित करती है, जिसके कारण ध्रुवीय कांति (आरोरा बोरियेलिस) जैसी सुरम्य आभा फैल जाती है. यह बेरियम गैस पृथ्वी की चुंबकत्व-रेखा की दिशा में आकार ग्रहण करती है. इसके द्वारा पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का प्रकाशीय अध्ययन होता है.

    पिछले वर्ष एक विशेष विभाग ट्यूबिंजिन में स्थापित किया गया. इसका काम है, अत्यधिक बुद्धि-शक्ति से संपन्न युवा वैज्ञानिकों को विकास का यथासंभव अवसर तथा प्रशिक्षण देना.

    अभी तक सोसायटी के वैज्ञानिकों को विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य करने की छूट नहीं थी, परंतु अब वह बंधन हटा दिया गया है. शर्त सिर्फ यह है कि इससे उनके मुख्य शोधकार्य में बाधा नहीं पड़नी चाहिये. विज्ञान-कर्मियों की आने वाली पीढ़ी के साथ बुजुर्ग वैज्ञानिकों का संपर्क बनाये रखने के लिए यह सुधार आवश्यक समझा गया है।

–    सुधा माथुर

(जनवरी 1971)

 

 

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