गज़ल

♦   विजय ‘अरुण’   >

कभी है अमृत, कभी ज़हर है, बदल बदल के मैं पी रहा हूं
मैं अपनी मर्ज़ी से जी रहा हूं या तेरी मर्ज़ी से जी रहा हूं.

दुखी रहा हूं, सुखी रहा हूं, कभी धरा पर कभी गगन पर
यह कैसा जीवन मुझे मिला है, यह कैसा जीवन मैं जी रहा हूं.

कभी जो दिन चैन से है बीता तो रात की नींद उड़ गयी है
कभी जो रात को नींद आयी, तो दिन में हर पल दुखी रहाहूं.

कभी जो फूलों की राह देखी तो चल पड़ा उस पै गीत गाता
मगर थे फूलों के साथ कांटे, मैं अब भी ज़ख्मों को सी रहा हूं.

‘अरुण’ मगर यह भी सोचता हूं कि चार दिन की जो ज़िंदगी है
चलो अधिक न सही तो चार दिन में मैं एक दिन तो सुखी रहा हूं.

(फ़रवरी, 2014)

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