आम में बौर आ गये –  विद्यानिवास मिश्र

शब्दसम्पदा

फागुन चढ़ा नहीं और फगुनहट (होली) हहकारने लगी. फागुन के साथ आम का बड़ा पुराना रिश्ता है. फागुन में ही सेमल में ढेंढ़ी (फूल) लगती है, पलाश (छिउला) जंगल में आग दहका देता है, महुए में कूंचे लगते हैं, मौलिश्री में झुमके और पीपल में ठुस्से, और नीम पतहरने (झड़ने) लगता है, कंवल-दह विहंसने लगता है, पान पकने लगता है. आम वसंत का अपना सगा है, क्योंकि उसके बौर की पराग-धूलि से वसंत की कोकिला का कविकंठ कषायित होकर और मादक हो जाता है. आम की बौर, नये पल्लव और नये कर्ले और अंखुए कामदेव के बाण बन जाते हैं.

तो आम में फिर बौर गहगहा गये. बड़ा बेहया- फ़सलें सूखीं, पर आम के इक्के-दुक्के पेड़, भले ही अमोले (नये पौधे) और कलम खड़े सूख गये या कुछ पुराने पेड़ भी नमी की कमी से उकठ गये, कुछ पाले से झुलस भी गये, लेकिन अधिकांश फिर जोम पर आ गये- और नौरसने लगे. जिन पेड़ों के फलने की बारी इस साल नहीं है, उनमें नयी कोपल (किसलय) निकलने लगी; पुराने पीले पर्ण तुड़-तुड़ कर सारी अमियारी (आमों की वाटिका) में सड़ने लगे, ये किसलय ही पल्लव बनेंगे और तब बनेंगे पत्ते. इनसे पेड़ झपस जायेगा. नया पेड़ पहली बार बौरा होगा तो उसकी मोंजर (बौर) मींज दी जायेगी, नहीं तो पेड़ की बढ़ती रुक जायेगी. बौरों पर पच्चीस आ़फतें हैं, पुरुवा ने झकझोरा तो ये लसिया कर गिर जायेंगे, आंधी ओले से बचे तो सरसई (सरसों के बराबर फल) के गुच्छों से पुलुई (सिरा) तक टहनी-टहनी लद जायेगी और डालें भार से लचने लगेंगी. अड़ार (टूटने वाली) डालें तो टूट ही जायेंगी. सरसई सब नहीं बचती. कुछ मर जाती है, कुछ कुम्हला जाती है. तब टिकोरे लगते हैं, गौध के गौध और लड़कों की ढेलेबाजी शुरू हो जाती है. टिकोरों की कच्ची गंध कच्ची उम्र की लड़कियों को बहुत भाती है और चोरी-चोरी उन्हें कुतरने में बड़ा मज़ा आता है, फरुही (अधपकी) इमली और टिकोरों का अमलोन स्वाद इस उम्र को इतना प्रिय है कि अपभ्रंश काव्य में इस उम्र के प्यार को ही अम्बण लगाना कहा गया. टिकोरे बड़े हुए तो अमिया बने और घरनियों का अचार का धंधा जागा. इनके छिलके सुतुहियों (बीच में कटी हुई सीपियों) से उतारे जाने लगे, ढेंपी पहले बड़ी स़फाई से काटकर अलग की गयी और चूंकि अभी इनमें गुठली या अंठली (अस्थि) नहीं पड़ी है, बड़ी आसानी से इनकी फांक हो जाती है.

आम के फल वैशाख में गुरम्हाने (गुठली भरने) लगते हैं.  किसी-किसी फल के ऊपर ओले पड़े तो वह कोइलासी (एक ओर काला) हो जाता है. वह बहुत मीठा होता है. कोई-कोई आम कच्चे भी खट्टे नहीं होते हैं. ऐसे चौरार आम पकने के लिए बच नहीं पाते, कुछ ऐसे होते हैं जो सुग्गों से नहीं बचने पाते और ऐसे गुग्गाकटारी आम पकने के लिए बचें तो स्पृहणीय हो जाते हैं. जेठ में रोहिन नक्षत्र चढ़ते-चढ़ते रोहिनिया आम तैयार हो जाते हैं, वैसे ढेंसर (अधपके) तो दूसरे भी होने लगते हैं, पर अगला (पहले आने वाले) तो एकदम भदरा जाते हैं. जो लोग पाल डालना चाहते हैं, डालकर पका और टपका पर भरोसा नहीं करना चाहते, वे जाल लगाकर उसमें लोक कर या लकुची (लग्गी) लगाकर या हाथ से तुड़वाकर (ताकि नीचे गिरकर फल धूसने न पाये) आम के तैयार फल भूसे के भीतर रख देते हैं या फिर सूखी ज़मीन पर टाट के नीचे रख देते हैं. ज्यों-ज्यों पकता जाता है, त्यों-त्यों ढेंपी पियराने लगती है. डाल के आम वर्षा पाते ही भदभदा उठते हैं और टपकना (चूना) शुरू हो जाता है. कुछ डाल पर ही किड़ा जाते हैं, कुछ भीतर से झांखर हो जाते हैं.

पके आम खाने की भी विधि होती है, उसकी ढेंपी में चोप होता है, वह लग जाये तो होंठ पक जाते हैं इसलिए चोप निकाल देना होता है. कलमी आम की गुठली छोटी होती है और गूदा ही गूदा होता है, रेशे या खुज्जे नहीं होते, खाने में बड़ी आसानी है, पर बीजू आम ही रस के लिए असली आम है, उसको खाइए, जी नहीं भरता.

पेड़ झंखाड़ हो तो तना मोटा और उसकी छाल पपड़ीदार होती है, चढ़ जाइए, पर झरका (पतली डाल) पर न जाइए, माटा (लाल चीटों) की झोंझों से बचिए. हां, यदि पेड़ सरगपाताली हुआ तो फिर लग्गी का उपयोग करें. लोग बेरहमी से डालें छिनगा देते हैं, छंटते-छंटते सिर्फ ऊपर जाने वाली डाल बचती है. कभी-कभी पेड़ बांझी (चमड़ा सिझाने वाली परोपजीवी वनस्पति) लगने से बंझिया जाता है और कुछ ही बरसों में उखड़ जाता है. तभी आम के पेड़ पर छेव (कुल्हाड़ी की चोट) लगायी जाती है. आम का पेड़ काटना पाप समझा जाता है.

(हिंदी की शब्द-सम्पदा, राजकमल प्रकाशन, से साभार)

मार्च 2016

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