शरणम् (धारावाहिक उपन्यास – 3) नरेंद्र कोहली

गीता एक धर्म-ग्रंथ है और जीवन-ग्रंथ भी. जीवन के न जाने कितने रहस्यों की परतें खोलने वाला ग्रंथ बताया गया है इसे. पर गीता का कथ्य किसी उपन्यास का कथ्य भी बन सकता है, यह कल्पना ही चौंकाती है. वरिष्ठ-चर्चित रचनाकार नरेंद्र कोहली ने इस कल्पना को साकार कर दिखाया है. वे इसे ‘शुद्ध उपन्यास’ मानते हैं, पर गीता के दर्शन को समझने-समझाने का यह सराहनीय प्रयास है.

दासी ने आकर प्रणाम किया और बोली- ‘महाराज, महारानी पूछ रही हैं कि यदि आपकी इच्छा हो तो आपके लिए कुछ स्वादिष्ट फल भिजवा दें. संजय जी का भी अभी तक कोई सत्कार नहीं किया गया है.’

‘हां. संजय के लिए रसीले और स्वादिष्ट फल भिजवा दो.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘किंतु मुझे फल नहीं चाहिए.’

‘तो क्या लेना आपको रुचिकर होगा?’ दासी ने पूछा.

‘मेरे लिए कोमल मांस की कुछ भुनी हुई बोटियां, जो दांतों में न फंसें और अच्छी तरह चबायी जा सकें.’

दासी चली गयी.

संजय पुनः अपने मन में संरक्षित चित्रों में खो गया. धृतराष्ट्र पितामह को युद्ध के लिए कोस रहा था; किंतु अर्जुन भी लड़ने को कम उत्सुक नहीं था. अपनी उत्सुकता में ही उसने मान लिया था कि इस युद्ध में जो भी योद्धा उसके विरोध में खड़ा है, आज वह उसे मार ही डालेगा. आज वह महाकाल के हाथ का उपकरण बनेगा. इसी आतुरता में उसने कहा- ‘मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य स्थापित कर दें अच्युत! युद्धाभिलाषी इन योद्धाओं को एक बार उनके जीवित रूप में देख लूं. देखूं तो इस महासंग्राम में मुझसे संघर्ष कर, दुर्योधन की जय की इच्छा करने वाले ये कौन-कौन दुर्बुद्धि अधर्मी मरने के लिए आये हैं.’

‘बोलो संजय.’ धृतराष्ट्र ने मानो उसे उसकी निद्रा से जगाया.

किंतु संजय कुछ बोले नहीं. उनकी स्मृति सचित्र हो गयी थी. वे देख रहे थे… श्रीकृष्ण अर्जुन की ओर देख कर मुस्कुराए- ‘तुम गुडाकोश हो…’

‘निद्रा को जीतने वाला?’ अर्जुन के स्वर में प्रश्न था.

‘वह कौन-सी बड़ी बात है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘निद्रा को ही नहीं. तमोगुण को जीतने के कारण गुडाकेश हो तुम.’

संजय जानते थे कि यदि उन्होंने धृतराष्ट्र को यह संवाद सुना दिया होता तो वह कहता- ‘हां! दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा न करें, तो मैत्री कैसे निभे.’

धृतराष्ट्र के मन की कटुता से परिचित थे संजय. उसके मन में विष ही विष भरा था. बहुत विषाक्त था मन उसका. सिवाय अपने पुत्रों के और किसी की प्रशंसा सुन ही नहीं सकता था.

इस बार कई दासियां आयीं. उन्होंने उन दोनों के हाथ धुलाये. हाथ पोंछने को श्वेत वस्त्र दिये. दोनों के सम्मुख चौकियां रख कर, उनपर सुंदर चित्रों वाले आवरण-वस्त्र बिछा दिये और फिर उनके पीछे, दूसरी पंक्ति में खड़ी दासियों ने संजय के सम्मुख फल और धृतराष्ट्र के सम्मुख भुना हुआ मांस परोस दिया.

धृतराष्ट्र कुछ देर तक मौन और निक्रिय बैठा रहा. दासियों के जाने की पदचाप निःशब्द हो गयी तो उसने पूछा- ‘दासियां गयीं?’

‘गयीं महाराज.’

धृतराष्ट्र ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और संजय से कहा- ‘खाओ. देखो तुम्हारी रुचि के फल हैं न.’

संजय ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया और एक प्रकार के मुग्ध भाव से बोला- ‘श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को लाकर दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया, जहां से दोनों सेनाओं के प्रमुख भागों का निरीक्षण किया जा सके.’

‘कुछ कहा नहीं?’ धृतराष्ट्र ने पूछा.

‘कहा.’

‘क्या कहा?’

‘उन्होंने कहा- तुमने ठीक ही उन्हें दुर्बुद्धि कहा है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘देखो, भीष्म, द्रोण तथा संसार के अन्य सारे राजाओं को देखो. इन सबको कौरव मानो. दुर्योधन के मित्र और शुभचिंतक. कोई पूछे पितामह से कि वे किस धर्म के लिए युद्ध करने आये हैं. क्षत्रियों का धर्म पापियों की रक्षा करना नहीं होता और वे दुर्योधन के लिए दीवार बने खड़े हैं. प्रजा में दुश्चरित्रता यहीं से आरम्भ ही नहीं होती, गौरवान्वित भी होती है. धर्मात्मा भीष्म, पितामह भीष्म, इस वृद्धावस्था में भी अधर्म की रक्षा के लिए सशस्त्र खड़े हैं. कोई पूछे उनसे कि वे कैसे क्षत्रिय हैं जो असहायों को क्षत से बचाने के लिए नहीं, धर्म को क्षत देने के लिए तत्पर खड़े हैं. असहाय लोगों को क्षत से त्राण कभी भी नहीं दिया उन्होंने.’ श्रीकृष्ण रुके, ‘मुझे लगता है कि भीष्म हों या द्रोण- ये दोनों ही केवल द्रुपद से अपनी शत्रुता निभाने आये हैं. अन्यथा कोई कारण नहीं है कि वे पांडवों के शत्रुओं के मित्र बन, उनकी रक्षा करने के लिए इस भयंकर युद्ध की रचना करें.’

‘पार्थ ने दोनों सेनाओं को दृष्टि भर कर देखा.’ संजय ने धृतराष्ट्र से कहा.

श्रीकृष्ण, अर्जुन की ओर देख रहे थे. अर्जुन अपने सामने खड़ी सेनाओं को देख ही नहीं रहा था, कुछ सोच भी रहा था. उसकी मुद्रा गम्भीर थी. उसमें युद्ध के समय पाया जाने वाला वीरोचित भाव नहीं था. वह उस समय युद्ध में खड़ा क्षत्रिय नहीं, मानव जीवन की नश्वरता को पहचानता हुआ कोई संन्यासी लग रहा था.

…कौन था दोनों सेनाओं में? पक्ष में, विपक्ष में?… अर्जुन देख रहा था और सोच रहा था… मित्र के रूप में और शत्रु के रूप में? पितृ-तुल्य, काका-ताऊ, मातुल और श्वसुर थे. पितामह थे, आचार्य थे. भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र तथा सुहृद थे. ये सब युद्ध करने को खड़े थे. मरने-मारने को तैयार. अपने प्राण देने और दूसरों के प्राण लेने को तत्पर. यह कोई शोभा-यात्रा नहीं थी, युद्ध था. किसी के भी प्राण जा सकते थे. एक प्रकार से महाप्रलय ही था. जाने इनमें से कोई जीवित बचकर अपने परिवार में लौट कर जा भी पायेगा या नहीं… विराटनगर में उसने अकेले इन सारे प्रमुख कौरव योद्धाओं से युद्ध किया था; किंतु वहां उसने किसी का वध नहीं किया था. यहां उसे पितामह का वध करना होगा. आचार्य को मारना होगा. और अकेला वही तो नहीं है मारने वाला. शत्रु पक्ष के योद्धा भी तो मारेंगे. एक ओर महाराज युधिष्ठिर खड़े हैं, दूसरी ओर अभिमन्यु खड़ा है. वे दोनों भी तो मारे जा सकते हैं. उसके सारे भाई, सारे पुत्र, सारे मित्र, कोई भी मारा जा सकता है. वे सब यमराज का मार्ग रोके, उनके सामने खड़े हैं. वह देख रहा था, उन सबके कंठ में अदृश्य यम-पाश पड़ा था… शायद वे कभी अपने परिवार में जीवित न लौटें… मनुष्य के लिए युद्ध आवश्यक था क्या? ‘हे प्रभु, मनुष्य युद्ध क्यों करता है? तुमने क्षात्र धर्म बनाया ही क्यों?’

‘तुम फिर मौन हो गये.’ धृतराष्ट्र ने संजय को टोका- ‘बहुत थके हुए हो? नींद आ रही है क्या? यहीं पर्यंक लगवा दूं तुम्हारे लिए.’

‘नहीं महाराज. ऐसा कुछ नहीं है.’

‘तो बोलते क्यों नहीं?’

‘बता तो रहा हूं महाराज.’ वह रुका, ‘मैं मृत्यु के उस महोत्सव को देखकर सम्मोहित हो गया था.’

‘अपनी नहीं, अर्जुन की बात कहो.’

‘जी. दोनों सेनाओं को देखकर, अर्जुन ने ऐसे अवसाद का अनुभव किया, जिससे उसका इससे पहले कभी परिचय नहीं हुआ था. करुणा की आंच में हृदय पिघला जा रहा था. अंतड़ियां थीं कि ऐंठ-ऐंठ कर पीड़ा से चीत्कार कर रही थीं…’

‘तुम उसकी अंतड़ियों की दशा कैसे देख पाये?’ धृतराष्ट्र ने वक्रता से पूछा- ‘मुझे लगता है कि वे अर्जुन की नहीं, तुम्हारी ही अंतड़ियां रही होंगी. तुम भी तो शांति के बहुत बड़े समर्थक हो. युद्ध की ऐसी तैयारी देखकर तुम्हारी अंतड़ियां भी अवश्य ऐंठी होंगी.’

‘मेरी अंतड़ियां भी ऐंठी थीं; किंतु अर्जुन को देखकर कोई भी उसकी दशा समझ सकता था. चेहरा हृदय के भाव प्रकट कर देता है महाराज.’ संजय ने कहा- ‘श्रीकृष्ण देख रहे थे; अर्जुन का वर्ण इतना श्वेत और रक्तहीन क्यों होता जा रहा था? वह उन्हें भयभीत-सा क्यों लग रहा था?’

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‘कृष्ण!…’

श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा.

‘मेरा शरीर शिथिल हो रहा है. मेरा मुख सूखा जा रहा है.’ उसने अपने सूखे होंठों को गीला करने के लिए उन पर जिह्वा फिरायी.

‘देख रहा हूं.’ कृष्ण ने कहा- ‘किंतु क्यों सूख रहा है तुम्हारा मुख?’

‘ये जो युद्ध के लिए सामने खड़े हैं, ये सब हमारे स्वजन ही हैं. इन्हें मारना है मुझे.’ अर्जुन एक प्रकार से हकला गया था. अटकते-अटकते स्वर में बोला- ‘मेरा शरीर कांप रहा है, रोमांच के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. त्वचा जल रही है और मेरी पकड़ इतनी शिथिल हो रही है कि मेरे हाथ से गांडीव खिसकता जा रहा है.’

उसने एकदम असहाय दृष्टि श्रीकृष्ण पर डाली- ‘और तो और, खड़ा रहना भी मेरे लिए कठिन हो रहा है. मुझे कहीं और ले चलो कृष्ण.’

अर्जुन का यह रूप देख श्रीकृष्ण चकित रह गये- ‘तुमने स्वयं ही तो दोनों सेनाओं के योद्धाओं को देखने की इच्छा प्रकट की थी.’

‘की तो थी; किंतु जाने मुझे क्या हो गया है. मेरा मन भ्रमित हो रहा है.’

‘भ्रमित है या मोहित है? वैसे क्या भ्रम है?’

‘कुछ समझ में नहीं आ रहा सब ओर अशुभ लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जैसे सब कुछ समाप्त हो जाने को है. मुझ पर अवसाद का आक्रमण हुआ है, जैसे खेतों पर टिड्डी दल उतर आता है. दौरा पड़ा है मुझ पर, अवसाद का. लगता है, कोई भी नहीं बचेगा. हमने अब तक जो कुछ बनाया था, बचाया था जो कुछ सोचा-समझा था, चिंतन-मंथन किया था, मनुष्य ने आज तक जो ज्ञान अर्जित किया था, वह सब कुछ समाप्त हो जायेगा. यह महाप्रलय जैसा है. अगली पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं बचेगा, या शायद अगली पीढ़ियां ही नहीं बचेंगी…’

‘तुम अगली पीढ़ियों के लिए इतने चिंतित क्यों हो? वह तुम्हारा दायित्व नहीं है. वे अपने लिए स्वयं निर्माण कर सकती हैं.’

‘किंतु मनुष्य इसलिए तो निर्माण नहीं करता कि एक युद्ध हो और वह सब कुछ समाप्त हो जाये. मुझे अपना ही नहीं, मानव मात्र का भविष्य पूर्णतः अंधकारमय दिखाई दे रहा है. मैं गिर पडूंगा सखे, मुझे संभाल लो.’

‘यह योद्धाओं का योद्धा अर्जुन कह रहा है.’ श्रीकृष्ण तनिक भी चिंतित दिखाई नहीं दे रहे थे, वरन् वे तो हंस रहे थे, ‘तुम्हारा तो नाम ही अर्जुन है; जो अर्जन करता है; युद्ध में विजय का अर्जन.’

‘आप हंस रहे हैं कृष्ण!’ अर्जुन के स्वर में पीड़ा थी, ‘मैं विजय अर्जित करने ही आया था; किंतु अपने स्वजनों के शव बिछा देना तो विजय नहीं है. मैं शत्रुओं को मारने आया था, अपने परिजनों को नहीं.’

‘शत्रु आकाश से नहीं टपकता. युद्ध में जो व्यक्ति विरोधी पक्ष के साथ खड़ा हो जाये, वही शत्रु हो जाता है अर्जुन. जो अधर्म के पक्ष में खड़ा हो जाये, वही धर्म का शत्रु है.’ कृष्ण बोले- ‘क्षत्रिय अपने रक्त-सम्बंध को नहीं देखता. वह स्वजन-निष्ठुर होता है. योद्धा का धर्म है कि अपने मार्ग में आये, अधर्मी व्यक्ति को मार गिराये, न कि उससे अपने सम्बंधों को स्मरण करता रहे; और उसे बचाता रहे. अधर्म पर विजय ही तुम्हारा धर्म है.’

‘विजय किसलिए? राज्य-सुख के लिए?’

‘तुम्हें राज्य-सुख नहीं चाहिए?’

‘इस मूल्य पर नहीं.’

‘विजय भी नहीं चाहिए?’

‘इस समय न मुझे विजय की आकांक्षा है और न ही राज्य-सुख की.’ अर्जुन का कंठ अवरुद्ध होता जा रहा था- ‘गोविंद! राज्य और राज्य के सुख की तो क्या, लगता है, इस समय मुझे जीवन की भी इच्छा नहीं है. यदि यही जीवन है तो मुझे जीने की भी आकांक्षा नहीं है.’

‘क्यों? अकस्मात् ही ऐसा क्या हो गया?’ कृष्ण ने अपने मित्र को वक्र दृष्टि से देखा- ‘क्या तुम नहीं जानते थे कि भीष्म और द्रोण तुम्हारे विरुद्ध लड़ने को खड़े हैं. उन्हीं लोगों के बल पर दुर्योधन ने तुम लोगों को आज तक वंचित नहीं रखा? तुम लोगों के साथ हुए अन्याय के लिए दुर्योधन से अधिक दोषी तो ये ही लोग हैं. दुर्योधन की तो आकांक्षा मात्र थी, कर्म तो इन्हीं लोगों का था… और अभी-अभी
तो तुम यह देखना चाहते थे कि युद्ध में तुमसे लड़कर कौन-कौन अपने प्राण देने आया है.’

‘हां! किंतु जिनके लिए मुझे राज्य की आकांक्षा थी, वे युद्ध में अपने प्राण त्यागने यहां सामने खड़े हैं…’

‘अपने भाइयों तथा पुत्रों की मृत्यु से आशांकित हो?’

‘यही समझ लीजिए. जब सारे ही लोग मारे जाएंगे तो धर्मराज क्या श्मशान की भस्म पर राज्य करेंगे?’

‘कोई भी कभी मरता नहीं अर्जुन. इस प्रकृति में कुछ भी नष्ट नहीं होता. यहां केवल रूप बदल जाते हैं.’

‘यह कैसी बात कह रहे हैं कृष्ण?’

‘शरीर के अस्तित्व और अनस्तित्व में कोई विशेष अंतर नहीं है; क्योंकि दोनों ही नश्वर हैं.’

‘वह ठीक है किंतु यह बताइए कि जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है या धर्म?’

‘तुमने अपने मोह के कारण मेरी बात सुनी ही नहीं.’ कृष्ण बोले- ‘वैसे यदि जीवन और धर्म में से किसी एक को चुनना हो तो धर्म को चुनो क्योंकि वह शाश्वत है.’ कृष्ण बोले- ‘और वैसे भी युद्ध का नियम है कि तुम शत्रु को नहीं मारोगे तो शत्रु तुम्हें मार डालेगा.’

‘मार डालें.’ अर्जुन भन्ना कर बोला- ‘ये लोग शस्त्र लेकर मुझ निःशस्त्र को मार डालें, तो भी मैं इनके वध का इच्छुक नहीं हूं. मैं भूल नहीं सकता कि ये मेरे स्वजन हैं.’

‘तुम ही क्यों, कोई भी स्वजनों को मारना नहीं चाहता. किंतु पर-जनों को भी क्यों मारा जाये?’ श्रीकृष्ण का स्वर कुछ नम्र हुआ, ‘तुम ठीक कहते हो अर्जुन! हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनके साथ जीना चाहते हैं, जिनके लिए जीना चाहते हैं, यदि वे हमारा जीवन नहीं चाहते तो हमें ही इस जीवन का क्या करना है.’ श्रीकृष्ण रुके, ‘किंतु कोई महत्त्वपूर्ण निश्चय करने से पहले विचार करो, ‘स्व-जन कौन है?’ हमने क्या यह शरीर अपने रक्त सम्बंधियों की सुख-सुविधाओं के लिए धारण किया है? उनकी रक्षा के लिए अधर्म को गले लगाने का प्रण किया है?’

‘न सही उनके लिए.’ अर्जुन बोला- ‘अपने लिए ही सही. किंतु मैं यह समझ नहीं पा रहा कि इस पृथ्वी के लिए ही क्या, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी, धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध कर, हमारा क्या भला होगा.’

‘इतना प्रेम है तुम्हें इन पापी अनाचारी, दुराचारी धृतराष्ट्र-पुत्रों से, उन आतताइयों से?’ श्रीकृष्ण के चेहरे की प्रफुल्लता तनिक भी मलिन नहीं हुई, ‘जब तुम मेरे पास, युद्ध के लिए सहायता मांगने द्वारका आये थे, तब क्या तुम नहीं जानते थे कि युद्ध में इन्हीं धृतराष्ट्र पुत्रों को मारना है. जब मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे रथ का सारथ्य करूं तो क्या, वह सारथि इस युद्ध के लिए नहीं, प्रभास की यात्रा का आनंद लेने के लिए चाहिए था तुम्हें?’

‘जाने तब मैंने यह सब क्यों नहीं सोचा.’ और सहसा अर्जुन के स्वर में एक दुर्बल-सा चीत्कार जन्मा- ‘अपने बंधु धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध करना और अपने पक्ष के इन वीर बंधुओं को मरवा डालना… यह हमारे योग्य कर्म नहीं है. माधव! स्वजनों का वध कर हमें क्या सुख मिलेगा. ये आतताई सही किंतु इनकी हत्या से हमें पाप ही लगेगा.’

‘तुम भी तो उनके स्वजन हो. वे तुम्हारी हत्या से क्यों संकोच नहीं करते? तुम्हें मार, उन्हें पाप नहीं लगेगा?’ श्रीकृष्ण बोले- ‘तुम उन्हें नहीं मारोगे तो वे तुम्हारा वध कर ही देंगे.’

श्रीकृष्ण मुस्करा रहे थे.

‘वे लोभ-दंशित चेतना वाले लोग हैं.’ अर्जुन का चेहरा क्षोभ से लाल हो रहा था.

‘और हम?’

‘वे अपने कुल के नाश के दोष और मित्रों से शत्रुता करने के पाप को नहीं देख रहे हैं. मोह का पर्दा पड़ा है उन मूर्खों
की आंखों पर. उससे होने वाली अपनी क्षति वे नहीं देख पा रहे हैं.’ अर्जुन बोला- ‘किंतु…’

‘किंतु?’ कृष्ण ने उसकी ओर देखा.

‘हम तो कुलक्षय के दोषों को जानते हैं. हम लोभ के दंश से मूढ़ नहीं हुए हैं.’ अर्जुन अपने आत्म-गौरव को प्रकट करना चाह रहा था- ‘हम ही कुछ समझदारी क्यों नहीं दिखाते. उस पाप से निवृत्त होने के लिए हम क्यों विचार नहीं करते?’

‘वे लोभ-दंशित चेतना वाले हैं.’ श्रीकृष्ण हंसे- ‘और तुम्हारी चेतना मोह द्वारा दंशित है. लोभ और मोह में कोई बहुत अंतर नहीं होता.’

अर्जुन श्रीकृष्ण की ओर देखता रह गया- उनकी दृष्टि में उसमें और कौरवों में कोई विशेष अंतर नहीं था?

‘अरे अर्जुन नहीं लड़ना चाहता तो न लड़े. उसका विवेक जागा है. वह शांति चाहता है, तो यह कृष्ण क्यों उसे भड़का रहा है. यह कोई लड़कों का खेल है?’ धृतराष्ट्र के स्वर में वितृष्णा थी- ‘कृष्ण क्यों पड़ा है मेरे पुत्रों के पीछे. द्वारका से यहां आकर भाइयों से भाइयों को लड़ने को बाध्य कर रहा है. न राज्य उसका, न सेना उसकी. फिर भी अनामंत्रित अतिथि के समान हस्तक्षेप किये जा रहा है.’

संजय समझ रहा था कि धृतराष्ट्र के मन में क्या चल रहा है. यदि अर्जुन अपनी इस दुर्बलता के कारण युद्ध से हट जाता है तो दुर्योधन की विजय निश्चित है. इससे अधिक धृतराष्ट्र ईश्वर से भी क्या मांग सकता था.

‘अर्जुन बिना किसी और के दबाव के, स्वेच्छा से दुर्योधन को विजय का उपहार दे रहा है.’ धृतराष्ट्र ने सोचा- ‘…पर यह कृष्ण. यह क्यों मानेगा? यह तो संसार का विनाश करा कर ही रहेगा. उसका तो जन्म ही विनाश के लिए हुआ है. पहले अपने छह भाई कटवाए, अपने मामा को मारा, यादवों में फूट डलवायी और अब…’

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‘भाभी, यह अर्जुन को क्या हो गया है.’ पारंसवी ने कहा- ‘निश्चित रूप से आपने उसे ऐसे क्षात्र धर्म विरोधी
संस्कार तो नहीं दिये होंगे. इतना बड़ा योद्धा और किसी रुदनशील बालक के समान ऐसा दीन हो रहा है. किसी ने उसे कोई अनिष्टकारी पदार्थ खिला-पिला तो नहीं दिया?’

‘नहीं. ये मेरे संस्कार नहीं हैं. यह उसके किसी पूर्वजन्म का कोई पाप है, जो इस समय उदित होकर उसे मोह में डाल रहा है. वह शरीर के धरातल पर जी रहा है, इसलिए मोहग्रस्त हो गया है.’ कुंती ने कहा- ‘किंतु अच्छी बात यह है कि वह कृष्ण के साथ है. अब ज्ञान तो कृष्ण ही देगा, वह ही उसके इस मोह को दूर कर सकता है. नहीं तो दुर्योधन की विजय निश्चित है.’

‘नहीं भाभी. श्रीकृष्ण के होते हुए, दुर्योधन कभी विजयी नहीं हो सकता. सूर्य के सम्मुख अंधकार कभी ठहर नहीं सकता.’ विदुर ने कहा- ‘यह तो आरम्भिक सूचना है. उसके पश्चात् युद्ध तो हो ही रहा है न, और अर्जुन युद्ध कर भी रहा है. अर्जुन शिखंडी को अपने बाणों का कवच न देता तो पितामह शर-शैया पर कैसे लेट जाते.’

‘हां. देवर ठीक कह रहे हैं. युद्ध तो हो ही रहा है और अर्जुन उसमें भाग भी ले रहा है. ये सूचनाएं तो युद्ध आरम्भ होने से पहले की हैं.’ कुंती जैसे स्वयं अपने-आप को समझा रही थीं.

‘लगता है, तुमने विचार कर लिया है.’ कृष्ण मुस्करा रहे थे.

‘हां, मैंने विचार किया है.’ अर्जुन बोला- ‘कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट होता है; और धर्म के नष्ट होने से कुल को अधर्म ग्रस लेता है.’

‘बहुत कुछ सोच लिया तुमने.’ कृष्ण तनिक भी विचलित नहीं थे, ‘किंतु एक बार पुनः सोचो.’

‘क्या?’

‘तुम दुर्योधन को मारोगे तो कुलधर्म नष्ट होगा. किंतु दुर्योधन धर्मराज अथवा अभिमन्यु का वध करेगा तो कुलधर्म नष्ट नहीं होगा?’

‘मैंने यह तो नहीं कहा.’ अर्जुन तड़प कर बोला- ‘मैंने कहा कि वह लोभ-दंशित है; उसे भी विवेक से काम लेना चाहिए.’

‘अच्छा, तुमने यह नहीं कहा.’ कृष्ण बोले- ‘तुमने कहा कि कुल के नष्ट होने से कुल-धर्म नष्ट होता है. जब कुल ही नहीं बचा तो कुल-धर्म का अस्तित्व ही कहां होगा?’ कृष्ण बोले- ‘कहा या नहीं कहा?’

‘कहा’

‘सोचना यह है कि धर्म नाश से कुल नष्ट होता है या कुल के नाश से धर्म नष्ट होता है? समाज के पापों से धर्म भ्रष्ट
होता है या धर्म के दोषों से समाज भ्रष्ट होता है?’

‘क्या?’

‘कौरवों ने स्वयं को तुमसे पृथक् मान कर, अपने कुल को दो फाड़ किया. भीम को विष दिया. तुम पांचों भाइयों को तुम्हारी माता के साथ वारणावत में जलाया, अधर्मपूर्वक तुम्हारा राज्य छीना, उससे कुल नष्ट होने को है अथवा कुल नष्ट हो चुका, इसलिए धर्म नष्ट होने को है?’

अर्जुन की आंखों के सामने वे सारे दृश्य घूम गये किंतु वह चकित था कि उसके मन में प्रतिशोध का भाव नहीं जागा.

‘मैंने कभी नहीं सोचा कि हम भी दुर्योधन या दुःशासन को विष दे दें या महाराज धृतराष्ट्र अथवा महारानी गांधारी को वारणावत जैसी अग्नि में जला दें. क्योंकि मैं जानता हूं कि कुल के नाश से धर्म नष्ट होता है.’

‘तुम्हारा मन ही भ्रमित नहीं है, तुम्हारा ज्ञान भी भ्रमित है. आज सारा कौरव वंश नाश के कगार पर खड़ा है. नष्ट नहीं हुआ है. क्यों?’ कृष्ण ने पूछा- ‘पहले उनका धर्म नष्ट हुआ है या वंश?’

अर्जुन मौन बैठा रहा.

कृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा- ‘कुल अभी नष्ट नहीं हुआ है. किंतु धर्म का नाश तो हो चुका है. पहले दुर्योधन नष्ट नहीं हुआ. पहले उसका धर्म नष्ट हुआ. बुद्धि भ्रष्ट हुई है. एक बात जानते हो?’

‘क्या?’

‘वायुमंडल में कोई स्थान कभी वायु-शून्य नहीं रहता. यदि किसी स्थान से वायु उष्ण होकर ऊपर उठ जाती है तो दूसरे स्थान की शीतल वायु आकर उस रिक्त स्थान को भर देती है.’

‘जानता हूं.’

‘धर्म के साथ भी ऐसा ही होता है. धर्म नष्ट होता है तो उसके रिक्त स्थान को अधर्म आकर भर देता है.’ कृष्ण बोले- ‘यदि अधर्म का नाश कर दिया जाये तो धर्म स्वतः आकर स्वयं को स्थापित करता है.’

‘जानता हूं.’

‘किंतु यह नहीं जानते कि दुर्योधन का धर्म नष्ट हो चुका है, इसलिए उसे अधर्म ने ग्रस लिया है. और अब उसका वही अधर्म उसकी मृत्यु बनेगा.’

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‘तो कृष्ण ने दुर्योधन की मृत्यु की घोषणा कर दी है?’ धृतराष्ट्र तड़प कर बोला और उठ कर व्याकुल-सा टहलने लगा.

‘कृष्ण ने नहीं, दुर्योधन के अधर्म ने उसकी मृत्यु की घोषणा की है.’ संजय ने धृतराष्ट्र की तड़प को अनदेखा कर, बलपूर्वक कहा.

उसके मन में अनेक कठोर शब्द थे. किंतु उन्होंने कहा नहीं. जानते थे कि यह अधर्मी, हठी, अहंकारी बूढ़ा किसी भी प्रकार अपनी भूल को स्वीकार नहीं करेगा. वह कभी नहीं मानागा कि यदि उसके मन में सत्ता का पापयुक्त मोह नहीं होता, यदि उसने अपने पुत्रों को पाप के मार्ग पर बढ़ने से रोका होता, तो न इस युद्ध की स्थिति  आती और न उसके पुत्रों के मरने की सम्भावना उत्पन्न होती.

‘अधर्म की यह घोषणा तुमने सुनी है या कृष्ण ने? अधर्म आया था क्या कृष्ण से यह सब कहने; या कृष्ण अधर्म के घर गया था?’ धृतराष्ट्र संजय की ओर मुख कर कड़क कर बोला- ‘तुम यमराज के घर से होकर आये हो, या कृष्ण उनका आतिथ्य ग्रहण कर के आया है? मैंने तो नहीं सुनी मृत्यु की यह घोषणा. वैसे यह घोषणा कब हुई थी? पृथ्वी पर हुई, या गगन-मंडल में हुई? कुरुक्षेत्र में हुई थी, द्वारका में हुई थी अथवा हस्तिनापुर में?’

‘जिस दिन आपने युधिष्ठिर को युवराज पद से हटाकर वारणावत भेजा था, उस दिन हुई यह घोषणा तीनों लोकों ने सुनी थी.’ संजय ने निर्भय होकर, स्थिर स्वर में कहा- ‘आपने तब ही सुन ही ली होती, तो अधर्म मरता, दुर्योधन नहीं. किंतु आप मोह और लोभ के मारे बधिर बने बैठे रहे.’

धृतराष्ट्र को लगा कि संजय के स्वर में जैसे महाकाल की ध्वनि सम्मिलित हो गयी थी.

दासियों की हलचल से आभास हुआ कि गांधारी इधर आ रही थी.

धृतराष्ट्र ने मौन साध लिया… ‘यह बुढ़िया जाने क्यों टिक कर अपने कक्ष में नहीं बैठ सकती. जब देखो, यहां-वहां डोलती फिरती है…’ वह सोच रहा था.

‘आपकी धर्म-चर्चा समाप्त हुई या नहीं?’

संजय ने कोई उत्तर नहीं दिया. वे जानते थे कि उनका उत्तर कुछ भी हो, गांधारी उनसे रुष्ट ही होगी. वैसे भी प्रश्न उनसे नहीं पूछा गया था. वे अनावश्यक हस्तक्षेप क्यों करें? उनके प्रति गांधारी कभी भी सदाशय नहीं रही. उसके मन में जो कुछ घुमड़ रहा था, उसे वह कह नहीं पा रही थी. संजय स्वयं ही उठकर यहां से चले जाएं तो गांधारी को उसका मनोवांछित मिल जायेगा.

‘धर्म-चर्चा संक्षेप में कभी हुई है कि आज होगी.’ धृतराष्ट्र ने कुछ हल्के ढंग से कहा- ‘अभी तो मैं ही बैठा हूं, यदि कहीं मेरे स्थान पर पितामह भीष्म होते तो धर्म-चर्चा प्रलय तक चलती.’

गांधारी न हंसी न मुस्कायी. उसका चेहरा कुछ और विकृत हो गया- ‘धर्म की चर्चा हो तो संक्षेप में हो जाती है. किंतु अधर्म की चर्चा हो तो रुकने पर ही नहीं आती.’ उसने अपनी दासियों को सम्बोधित किया- ‘चलो मुझे वाटिका में ले चलो.’

गांधारी चली गयी तो धृतराष्ट्र के कंठ से स्वर फूटा.

‘यह मेरी चौकसी करने के लिए, मेरे आस-पास चक्कर काट रही है. पता नहीं क्या सुनना चाहती है. या इसको संदेह है कि मैं तुम्हारे सामने इसकी निंदा तो नहीं कर रहा. यह नहीं सोचती कि निंदा करने और सुनने के लिए इसकी पुत्रवधुएं ही पर्याप्त हैं.’ वह रुका- ‘चलो छोड़ो इसको. जिस दिन उनका पैंतरा चल गया, इसको तो इसकी बहुएं ही सीधा कर देंगी. बड़ी महारानी बनी फिरती है बुढ़िया. …हां, तो अर्जुन ने क्या कहा?’

अर्जुन असमंजस में था. उसके पास श्रीकृष्ण के प्रश्नों के उत्तर नहीं थे. वह श्रीकृष्ण से कभी भी तर्क में जीत नहीं पाया था तो आज ही क्या कर लेता, जबकि उसका अपना मन इतना घबराया हुआ था. उसका मन कुछ सोचने-समझने के योग्य रह ही नहीं गया था. …किंतु यदि आज तर्क नहीं कर सका तो उसे युद्ध करना होगा और उसके कुल का नाश होगा. …या तो तर्क ही कर ले या फिर युद्ध ही कर ले.

क्या करे वह? …श्रीकृष्ण को रथ में छोड़कर वह उतर जाए और जो भी दिशा सामने पड़े, उसकी ओर चल पड़े. …किंतु ऐसी स्थिति में भी उसे यह चेतना थी कि युद्ध की घोषणा हो चुकी है. शस्त्रास्त्र चल रहे हैं. वह जिस भी दिशा में जायेगा, सैकड़ों बाण उसका पीछा करेंगे. …तो क्या हो जायेगा? उसकी मृत्यु ही तो हो जायेगी. उसे तो वैसे भी अब जीने की कोई इच्छा नहीं थी…

अर्जुन ने कहा- ‘चाहे किसी भी कारण से हो, किंतु अधर्म की व्याप्ति से हे कृष्ण! कुलस्त्रियों की प्रवृत्ति दूषण की ओर अग्रसर हो जाती है…’

अर्जुन की आंखों के सामने नये से नये दृश्य उभर रहे थे और वे एक से बढ़कर एक, भयानक थे… अपरिचित पुरुषों की सशस्त्र भीड़ हस्तिनापुर के राजमहलों में घुसती चली जा रही थी. उनको रोकने वाला वहां कोई नहीं था. परिवार में कोई योद्धा बचा ही नहीं था… अर्जुन ने दुर्योधन और उसके भाइयों को मार दिया था. वहां महल की सुरक्षा के लिए नियत सैनिक भी नहीं थे. कैसे रहते? जब उनके स्वामी ही मारे गये तो वे कैसे टिक पाते. किसके भरोसे टिकते… और ऐसी स्थिति में तो वे सैनिक भी दस्यु हो जाते हैं. वे आततायी पुरुष अंतःपुर में भी प्रवेश कर रहे थे. उन्होंने धृतराष्ट्र के प्रासाद को आग लगा दी थी. चारों ओर प्रचंड अग्नि थी और स्त्रियों और बच्चों का चीत्कार था. एक पुरुष तो एक छटपटाती स्त्राr को बलात अपने कंधे पर उठाये राक्षसी हंसी हंसता हुआ, भागा जा रहा था… अर्जुन ने अपने कुल की स्त्रियों का सामूहिक चीत्कार और उन पुरुषों का अट्टहास सुना… अर्जुन को लगा वहां असंख्य पांचालियां थीं और वे सब दुःशासनों के हाथों में विवश तड़प रही थीं… उन्हें बचाना होगा… वनवास के समय धर्मराज ने अर्जुन को गंधर्वों के अधिकार में पड़ गयी कुरु स्त्रियों को बचाने का आदेश दिया था. गंधर्व उनके मित्र थे तो क्या. उन्हें कुरुवंश की स्त्रियों का अपमान करने की अनुमति नहीं दी जा सकती थी. अर्जुन ने दुर्योधन जैसे शत्रु को मुक्त कराया था गंधर्वों से. वह तो छोटा-सा युद्ध था. अब इस विराट युद्ध के पश्चात कुरु स्त्रियों की रक्षा कौन करेगा?…

‘स्त्रियां प्रतिरोध न करें तो पुरुष तो अधर्मपूर्वक दूषण को तत्पर रहता ही है. स्त्रियों की इच्छा न भी हो तो भी अधर्मी पुरुष उसे अपने भोग के लिए बाध्य करता है. अत्याचार करता है. इससे हे वार्ष्णेय! परिणामस्वरूप दुष्ट पिताओं की दूषित संतानें उत्पन्न होती हैं… माताओं की अच्छा के विरुद्ध. उनके संस्कारों की विरोधी.’

‘कुछ विचार कर बोलो अर्जुन!’ श्रीकृष्ण जैसे कोई उत्सव मना रहे थे- ‘तुम कह रहे हो अधर्म की व्याप्ति से कुलस्त्रियां दूषित हो जाती हैं.’

‘नहीं होतीं क्या?’

‘अधर्म की व्याप्ति से केवल स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी दूषित हो जाते हैं. अधर्म व्याप्त होता है तो स्त्राr और पुरुष का भेद नहीं करता. पहले पुरुष को अधर्म ग्रसता है और तब पुरुष स्त्राr के साथ अत्याचार करता है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘सोचने की बात यह है कि अधर्म व्याप्त ही कब होता है?’

‘सत्य है कि अधर्म स्त्राr और पुरुष का भेद नहीं करता; किंतु महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि उससे कुल का नाश होता है.’

अर्जुन अपने निष्कर्ष पर पहुंच चुका था, वह संवाद अथवा विवाद की मानसिकता में नहीं था.

‘कुलक्षय?’ श्रीकृष्ण अब भी मुस्करा रहे थे- ‘विचार ही करना है तो विचार करो कि कुलक्षय किसके दोष से होता है. दुःस्वप्न मत देखो. कुलक्षय तुम्हारी इच्छा से तो नहीं होता.’

‘किसी की इच्छा से होता हो. मैं तो इतना ही जानता हूं कि कुलक्षय से कुलधर्म का नाश होता है; और कुलधर्म के नाश से कुल को अधर्म ग्रस लेता है.’

‘विपरीत दिशा से सोच रहे हो.’ श्रीकृष्ण अब भी प्रसन्न मुख दिखाई दे रहे थे- ‘कुल का नाश होने से, अधर्म कुल को नहीं ग्रसता.’

‘तो?’

‘जब कोई व्यक्ति या कुल, धर्म का त्याग करता है, तो अधर्म उसे ग्रस लेता है.’ श्रीकृष्ण ने कहा- ‘पृथ्वी के घूमने के कारण उसके जो क्षेत्र सूर्य के प्रकाश से वंचित हो जाते हैं, वहां अपने आप अंधकार आ जाता है. जैसे प्रकाश का नाश नहीं होता, वैसे ही धर्म का नाश नहीं होता. मनुष्य ही उसे त्याग देता है, उससे विमुख हो जाता है. अतः वह स्वयं अधर्म को आमंत्रित करता है, उसके लिए अपने जीवन में स्थान बनाता है. और जब अधर्म कुल को ग्रस लेता है, तब कुल का नाश होता है.’

‘यह कैसी बात कह रहे हैं आप कृष्ण?’ अर्जुन अकबकाया-सा बैठा था.

‘उन्हें देखो, जो तुम्हारे सामने खड़े हैं.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘उन्होंने धर्म का त्याग किया है. अतः उन्हें अधर्म ने ग्रस लिया है, इसलिए उनके कुल का नाश अवश्यम्भावी हो गया है. इसमें तुम्हारी इच्छा-अनिच्छा क्या करेगी. तुम लड़ो या न लड़ो, इनका नाश तो होना ही है. अधर्म किसी की रक्षा नहीं करता. वह तो विनाश का अग्रदूत है. रोकना हो तो युद्ध को नहीं, अधर्म को रोको.’

‘किसी की इच्छा से हो. युद्ध में पति मारे जाएंगे, पत्नियों को तो जीवित रहना होगा.’ अर्जुन अपना ही राग अलापे जा रहा था- ‘अन्य पुरुषों, अश्रेष्ठ पुरुषों, पतित पुरुषों का उन कुल-स्त्रियों से सम्बंध होगा… इच्छा से हो, अनिच्छा से हो. स्त्रियां दूषित होंगी. दूषित स्त्राr-पुरुषों से कैसी संतानें उत्पन्न होंगी? मिश्रित और अश्रेष्ठ स्वभाव वाली, संस्कारों से हीन वर्णसंकर संतानें. सारी श्रेष्ठ परम्पराएं नष्ट हो जाएंगी…’

‘सामने शत्रु-सेना सज्जित है और तुम युद्ध-शास्त्र की चर्चा न कर, समाजशास्त्राrय चिंतन कर रहे हो.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘ऐसे ही घातक और नपुंसक चिंतन के कारण लोग युद्ध से भयभीत हो जाते हैं. युद्ध को टालते हैं. युद्ध से बचने का प्रयत्न करते हैं; और शत्रु का साहस बढ़ाते हैं. कंस से उग्रसेन नहीं लड़े, इसीलिए तो कारागार में बंद हुए. मेरे पिता वसुदेव आरम्भ में ही कंस से नहीं भिड़े; अतः उन्होंने अपने छह पुत्रों को कटते हुए देखा…’

‘तो दोष मातुल वसुदेव का था?’

‘दोष अधर्म से न लड़ने वालों का है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘जो देश, राष्ट्र और समाज अधर्मियों से लड़ने और मरने से घबराते हैं; उनसे समझौते करते हैं, वे ही अपमानजनक और पतित जीवन व्यतीत करते हैं. दास बनकर जी लेते हैं; किंतु अपने सम्मान के लिए लड़ कर मर नहीं सकते. वस्तुतः तुम युद्ध से बचने के बहाने ढूंढ़ रहे हो.’ श्रीकृष्ण मुस्कराए- ‘जानते हो क्यों?’

‘क्यों?’

l l l

संजय मन ही मन मुस्कराए.

‘संजय क्या बात है? चुप क्यों हो गये?’

‘मुझे स्मरण हो आया महाराज कि ऐसी बीहड़ स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक कथा सुना डाली.’

‘कैसी कथा?’

‘उन्होंने बताया कि एक राजा जब न्याय करने बैठता था तो बहुत कठोर होता था. हत्या का कोई अपराधी सामने आते ही वह निस्संकोच उसे मृत्युदंड दे देता था.’

‘ठीक ही तो करता था.’ धृतराष्ट्र ने कहा.

‘हां, करता तो वह ठीक ही था; किंतु एक दिन एक हत्या की घटना उसके सामने लायी गयी और हत्यारे के रूप में उसका अपना पुत्र उसके सामने खड़ा था. अकस्मात ही राजा के मस्तिष्क में पुत्र-प्रेम की ज्वाला जल उठी. वह उसके प्रकाश में नहीं, उसके ताप में सोचने लगा. उसका विवेक नहीं, मोह जागा. वह बहुत संवेदनशील और मानवीय हो उठा. कहने लगा कि हत्या कर राजकुमार ने तो मूर्खता की ही है. किसी पागलपन में की होगी हत्या. किंतु हम तो मूर्ख अथवा पागल नहीं हैं न. हमें क्या अधिकार है कि हम एक जीवित मनुष्य के प्राण ले लें. जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो हमें किसी के प्राण लेने का क्या अधिकार है. हमें तो कुछ समझदारी से काम करना चाहिए.’ संजय ने रुककर धृतराष्ट्र की ओर देखा- ‘देखा आपने, मोह ने उसे समझदार बना दिया था. श्रीकृष्ण भी अर्जुन से यही कहना चाहते थे कि वह धर्म-बुद्धि से नहीं, मोह-बुद्धि से युद्ध का विरोध कर रहा है.

‘तो अर्जुन मान गया क्या?’

‘नहीं. कहां माना वह. बोला, आप नहीं जानते कि कुलघातियों को नरक की प्राप्ति होती है.’

अर्जुन जैसे किसी शुक के समान कंठस्थ पाठ दोहरा रहा था. श्रीकृष्ण की  बात वह सुन ही नहीं रहा था- ‘नरक की यातनाएं कितनी भयंकर होती हैं.’

‘होती होंगी’; श्रीकृष्ण बोले- ‘किंतु धर्म-युद्ध से भागने वाले क्षत्रियों को भी स्वर्ग नहीं मिलता. उन्हें धरती पर ही नरक की ज्वाला में जलना पड़ता है.’

‘वर्णसंकरों की वृद्धि से सारी परम्पराएं नष्ट हो जाती हैं.’ अर्जुन बोला- ‘पितरों को पिंड और जल देने की क्रिया भी लुप्त हो जाती है. वे उस लोक में भी अन्न-जल को तरस जाते हैं.’

‘दुष्ट-दलन न करने से, पितरों को छोड़ो, जीवित प्रजा को भी अन्न और जल नहीं मिलता.’ श्रीकृष्ण ने तीखे स्वर में कहा- ‘पुरानी परम्पराएं नष्ट होंगी तो नयी परम्पराओं का उद्भव होगा. सृष्टि तो अपने मार्ग पर चलती ही रहेगी. धर्म स्वयं को पुनः स्थापित करेगा.’

‘कृष्ण! ऐसे पितरों का भी पतन हो जाता है.’ अर्जुन का स्वर रुदन के बहुत निकट हो चला था.

‘पतन अपने कर्मों से होता है धनंजय.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘सत्य से आंखें मत चुराओ.’

‘मुझे तो शाश्वत धर्म भी नष्ट होता दिखाई पड़ रहा है.’ अर्जुन बोला- ‘कृष्ण, धर्म की रक्षा करो.’

‘धर्म कभी नष्ट नहीं होता. उसका त्याग करने वाले नष्ट हो जाते हैं.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘और सुनो, उस शाश्वत धर्म की स्थापना के लिए अधर्मियों का वध करना पड़ता है. पापियों का रक्त पीकर धरती पवित्र होती है.’

श्रीकृष्ण की तर्जनी कौरवों की सेना की ओर उठी हुई थी.

‘जनार्दन! मैंने परम्परा से सुना है कि कुलधर्म का नाश करने वाले लोगों का अनंत काल तक नरक में वास होता है.’

श्रीकृष्ण देख रहे थे कि मोह के कारण अर्जुन की बुद्धि जड़ हो गयी थी. वह कोई भी तर्क न सुन रहा था, न स्वीकार कर पा रहा था. उसके मोह का नाश आवश्यक था, अन्यथा वह द्वंद्व में फंसा, कुतर्क ही करता रहेगा. रोग मस्तिष्क में था तो मस्तिष्क का ही उपचार
करना होगा. उसे जीवन और मृत्यु का वास्तविक रूप समझाना होगा. जीवन क्या है, मृत्यु क्या है; कौन जीता है, कौन मरता है.

‘हाय! हम लोग राज्यसुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने जैसा बड़ा पाप करने के लिए यहां उद्यत हुए हैं.’ अर्जुन जैसे विलाप कर रहा था.

‘तुम स्वजनों को मारने के लिए नहीं, अधर्म से लड़ने के लिए धर्मक्षेत्र में खड़े हो. आत्मरक्षा के लिए खड़े हो. यदि तुम शस्त्र नहीं उठाओगे, तो वे अपने शस्त्राsं से तुम्हारी हत्या कर देंगे.’ श्रीकृष्ण के स्वर में एक अलौकिक बोध था.

‘यदि मुझ निहत्थे और अप्रतिरोधी को धृतराष्ट्र-पुत्र अपने शस्त्राsं से मार डालें तो भी मेरा कल्याण ही होगा. इस पाप से तो बच जाऊंगा मैं.’

श्रीकृष्ण पुनः हंसे, ‘तुम उनसे नहीं भी लड़ोगे तो वे तुम्हें ही नहीं, तुम्हारे भाइयों, तुम्हारे पुत्रों और सम्बंधियों को मार डालेंगे. तुम्हारे वंश की स्त्रियां तब भी सुरक्षित नहीं रहेंगी. द्रौपदी के साथ हुए दुर्व्यवहार को कैसे भूल गये तुम? तुम उस पाप को दुहराए-तिहराए जाने का अवसर देना चाहते हो?’

अर्जुन ने जैसे कुछ नहीं सुना. वह अपना धनुष-बाण छोड़कर उदास मन से युद्धक्षेत्र में खड़े अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया.

(क्रमशः)

(यह उपन्यास वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है.)

अप्रैल 2016

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