धुंध के पार

♦  संतोष श्रीवास्तव   > 

बांस का गट्ठर ज़मीन पर पटक बापू खटिया पर बैठ पसीना पोंछने लगे. रेवली पानी का लोटा भर लायी. अंदर से माई ने हांक लगायी “रोटी तैयार है… खा लो तो चूल्हा समेटूं… ढेर काम करने हैं मुझे.”

बापू मुस्कुराए, “ढेर काम तो होंगे सासूजी के. बेटी की कल गुलपान (सगाई) की रस्म है. नया दामाद ऐसे ही थोड़ी मिल जाता है.”

चांगोना के दिल में टीस उठी… कैसी उल्टी गंगा बह रही है. घर भर खुशी में झूम रहा है… कोई चांगोना की आंसू नहीं देखता… कोई उसकी मर्ज़ी नहीं पूछता कि वह इस शादी के लिए तैयार है कि नहीं. कई बार हिम्मत करी यह बता देने की कि वह दिलखट से प्रेम करती है, उसी से शादी करना चाहती है. पर हर बार हिम्मत जवाब दे गयी. जानती है बापू, माई कभी तैयार नहीं होंगे क्योंकि उनकी दिलावर के बापू से अनबन है… बैलों के चोरी हो जाने की घटना को लेकर दोनों परिवारों में खूब झगड़ा हुआ था, नौबत मार पीट तक आ गयी थी. चांगोना जानती है वह बहुत जोखिम भरी राह चल रही है पर दिल पर उसका बस नहीं… दिलावर के बिना उसका जीवन बोझ है. जैसे वह अपने माई-बापू के लिए बोझ है… वह और उसकी दोनों छोटी बहनें रेवली और सुगना. लड़की बनकर जो जनम लिया है तीनों ने. जब वह माई की कोख में थी तो बेटे की कामना लेकर माई माहूरगढ़ गयी थी कुलदेवी माता के मंदिर   में और कांच के दीपक में कपूर की ज्योति जलाकर सवा किलो मिठाई चढ़ाने की मन्नत भी मांगी थी उसने. पर हुआ उल्टा. जचकी घर से जब दाई ने बेटी होने की खबर सुनायी तो बाहर बैठे परिवार के मर्दों ने आह भर कर बापू से कहा था- “लो आ गयी दूसरे के घर की धरोहर, पालो पोसो, दहेज का खर्चा उठाओ… हो गये न असमय बूढ़े.”

बापू भी हताश थे. जानते थे उनकी माई ने उन्हें कैसे पाल पोस कर बड़ा किया है. बापू की माई यानी चांगोना की दादी…  चांगोना ने उन्हें देखा तो नहीं पर माई बताती है कि दादी बेहद खूबसूरत थी. वह अंग्रेज़ों का ज़माना था और ज़मींदारों ठाकुरों, मालगुज़ारों के हरम में खूबसूरत, जवान बनजारिनें अपने पति, ससुर, पिता के द्वारा भेजी जाती थीं. उन पर ज़मींदार, ठाकुर, मालगुज़ार खूब धन लुटाते थे. उनकी संतानों को जन्म देने में भी बनजारिनें अपने पतियों के द्वारा प्रताड़ित नहीं की जाती थीं क्योंकि उन्हें ताउम्र बैठकर मज़े से खाने, ऐश करने के लिए धन मिलता था… यहां तक कि परिवार की एक लड़की अवश्य किसी न किसी मालदार की रखैल होने के लिए बिनब्याही रखी जाती थी. चांगोना की दादी भी बिन ब्याही बिठाल दी गयी थी. दादी को जब तेरहवां साल लगा तो जिस गांव के बाहर उनका घास-फूस का, चूना, मिट्टी से बना घर था, उस गांव के जमींदार के बुलावे पर दादी ज़मींदार की गगज्योढ़ी पर पेश की गयी. बाकायदा ‘सिर ढंकना’ हुआ और ज़मींदार की रखैल घोषित कर दी गयीं थीं वे. अब ज़िंदगी भर के लिए वे अपने पालनहार की गुलाम हो गयी थीं. न उन्होंने बचपन देखा, न जवानी के ख्वाब. न पत्नी होने के अधिकार पाये, न सुहागिन कह- लायीं. जब बापू पैदा हुए तो जचकी घर से ज़मींदार के पास खबर भेज दी गयी, बेटा हुआ है. खबर लाने वाली दायीं को जमींदारिन ने रुपिए, मिठाई और कपड़े दिये जमींदारनी को दादी से डरने की तो कोई बात ही नहीं थी, उल्टे वह खुश ही हुई… कई बार वह तीज, त्योहार मुंडन, कनछेदन पर दादी को अपनी ड्योढ़ी पर नचा चुकी थी. बनजारिनों का शुभ कामों में नांचना अच्छा शगुन माना जाता था. मर्द के मनोरंजन के लिए बनजारिनों को उनके शयन कक्ष में खुद पत्नियां नचवाती थीं कि इससे उनकी सात पीढ़ी तर जाती हैं. बनजारिनों को नचाने या पति की रखैल होने देने में जमींदारिनों, सेठानियां को कोई खतरा नहीं था क्योंकि उनकी तरफ से अधिकारों की बात कभी उठती ही नहीं थी.

दादी के भी बापू समेत चार संतानें हुईं- लेकिन चौथी बार लड़की के पैदा होने से पहले ही जमींदार की मृत्यु हो गयी. दादी बेघरबार की हो गयी. ज़मीनदारिन ने थोड़ा रुपिया देकर उसे चलता किया. दादी ने कैसे खिलौने बना-बनाकर, जंगल से बांस काटकर छील कर, टोकनी, सूप, चटाईयां बनाकर अपने बच्चों को पाला पोसा है यह बापू जानते हैं. इसीलिए औरत के जन्म लेते ही डर जाते हैं कि कहीं फिर से अतीत न दोहराना पड़े. परम्परा तो यह है कि बेटी के पैदा होने पर दाई को कोई शगुन न दिया जाए पर जब उन्होंने बेटों के जन्म पर दाई को पांच जोड़ी कपड़े, फल, मिठाई आदि देकर बैलगाड़ी में बैठाकर उसके घर भिजवाया था तो बेटी के जन्म पर न सही नये, पुराने कपड़े तो दे ही सकते हैं. पुराने कपड़ों से संतुष्ट हो दाई असीसें देती पैदल ही घर चली गयी.

वो तो माई ने पहले ही दो बेटों को जन्म दे दिया था वरना बड़ी दुर्गति होती उनकी. परिवार में होने वाले हर उत्सव पर वह दुत्कारी जाती. बिना बेटे के वंश कैसे चलेगा, मां बाप का तर्पण कौन करेगा… बांझ होने और लड़की की मां होने में कोई अंतर नहीं है. दोनों ही परिस्थितियों में औरत धिक्कार के काबिल है. चांगोना ने बहुत गहराई से यह महसूस किया है इसीलिए दिलावर को पाने के जुनून में उठे अपने कदमों को उसने वापिस लौटा लिया है. वह अपने माई-बापू को दुखी नहीं देख सकती.

गुलपान की रस्म शुरू हो चुकी है. बाल्टी के पानी में दूध डालकर मेहमानों के चरण पखारे जा रहे थे. बड़े बड़े गद्देदार आसनों पर सब बैठ चुके थे. चांगोना पीले रंग के कांच जड़े लहंगे में, चांदी के ज़ेवर छनकाती लाकर पीढ़े पर बैठा दी गयी… जैसे कठपुतली हो… चांगोना के दिल ने अपने लिए धड़कना बंद कर दिया था. जब वह परायी होने जा रही है तो परायों के लिए ही सांस लेगी. दिलावर की चांगोना मर चुकी है. बापू की चांगोना को उसका होने वाला ससुर गुड़ खिलाकर बेहद खुश हो रहा था. चांद-सी सुंदर दुल्हन बेटे के लिए पाकर वह गद्गद् था. देर रात तक भोज चला. शादी के लिए महीने भर बाद की तारीख तय हुई.

चांगोना ने शादी के दिन गिनने शुरू कर दिये… जैसे फांसी के लिए कालकोठरी में दिन गिन रही कैदी हो. दिलावर के बिना एक-एक पल भारी लग रहा था. माई उसे खोई-खोई गमगीन देख कर समझाती- “एक बात गांठ बांध ले छोरी… औरत तो औरत ही होती है… चाहे ड्योढ़ी की हो चाहे कबीले की… उसे अपनी मर्ज़ी से जीने का हक नहीं होता, वह तो मर्द के लिए पैदा होती है और मर्द के लिए मरती है.”

चांगोना सिर से पांव तक सुलग उठी थी. ज़माना कहां से कहां पहुंच रहा है… अब शोभा बहनजी को ही देख लो. तांडे के सामने वाले गांव की समाज सेविका हैं वे… कैसे मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं. फर्राटेदार हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी सब भाषाएं बोलती हैं. दिलावर भी उनके साथ अपने खाली वक्त में उनके काम में हाथ बंटाता है. वही उसे उनसे मिलाने ले गया था. शोभा बहनजी ने कैसे उसे गले से लगाकर कहा था- “तुम जैसी नवयुवतियों को संगठित करके ही मुझे त्री मुक्ति मोर्चा तैयार करना है.” और समझाती रही थीं कि “औरतें अपने दम पर सब कुछ कर सकती है… वह मर्दों से किसी भी बात में कम नहीं है.”

लेकिन माई की सोच क्यों नहीं बदली? क्यों उसके समाज में औरत की ऐसी दुर्गति है. औरत मर्दों के लिए मरती, खटती, मर्दों के द्वारा सतायी, दुतकारी जाती है और मर्द! वो तो पैदा ही होते हैं दुनिया का भोग करने के लिए. अलमस्त, बेफिक्र… चांगोना बचपन से देखती आ रही है. दिन भर बापू और उसके भाईयों के संग हर काम में हाथ बंटाती माई शाम होते ही सारा साज़ो- सामान समेट कर घर लौटते ही गृहस्थी के कामों में खपने लगती जबकि बापू खटिया पर आराम से बैठकर चुरुट पीते और फिर महुए की शराब में डूब जाते. भाई भी बापू से छिपकर बीड़ी और शराब पीते. चांगोना और उसकी बहनें यह बात बापू माई से बताने दौड़तीं कि भाई रास्ते में ही छेक लेते और धमकाते कि “ब्याह होने के बाद तुझे लिवाने नहीं आयेंगे हम.”

मुश्किल से चार पांच घंटों की नींद ले मुंह अंधेरे ही उठ जाती है माई… गांव मोड़ पर आटा चक्की है, पर बापू को हाथचक्की में पीसे गये ताज़े आटे की ही रोटियां चाहिए. माई सुबह-सुबह हाथचक्की में आटा पीसती और धीमे-धीमे गुनगुनाती. गीत की लय और चक्की की आवाज़ सुन चांगोना जाग जाती. कुछ पल उस मिली जुली आवाज़ की मधुरता उसे रोमांचित करती रहती. फिर वह भी उठ जाती. आटा पीसकर माई परात में सकेला लेती और चार दिन पहले थापे गये उपलों को दबा दबा कर देखती कि सूख गये हैं या नहीं. बापू उस वक्त गहरी नींद में होते. चूल्हा सुलगते ही जैसे रात भर छाया कोहरा छंटने लगता.

फ़र्क देखा है चांगोना ने. लड़की-लड़के में फ़र्क देखा है… औरत को हर हाल में मर्द के आगे झुकते देखा है. एक दबी-दबी सी चिनगारी उसके मन में सुलगती रहती है पर वह उसे आंच नहीं बनने देती… उसमें साहस नहीं है इतना. साहस होता तो क्या दिलावर यूं बिछड़ता?

महीने भर मे ंघुट-छुटकर उसने रूप खो दिया अपना. चेहरा डूबते चांद-सा श्रीहीन हो गया. शरीर पर से मोहक गुदगुदापन सूखकर घड़ी-सा हो गया. लेकिन शादी तो होनी थी, सो हुई और वह बैल पर बैठकर सजी धजी पोटली सी अपने ससुराल वालों के साथ मीलों दूर उनकी बस्ती में चली गयी. ससुराल वाले मूंछों पर कुछ इस तरह ताव दे रहे थे जैसे लड़ाई में जीतकर जा रहे हों. घूंघट की ओट से उसने देखा दिलाकर महुए के पेड़ के नीचे लुटा-हारा सा खड़ा था. आज उसके हाथों में बांसुरी भी नहीं थी. वह चुप-चाप तब तक आंसू  बहाती रही जब तक ससुराल नहीं आ गया.

चांगोना का वर भैरों बहुत अक्खड, गुस्सैल और बिगड़े मिजाज का था. सास ने पहली रात ही जता दिया था- “पति का दिल जीतना है तो चीं- चपड़ मत करना, जो वो कहे चुपचाप मान लेना.”

माई और उसकी भौजाईयां भी तो ऐसा ही करती थीं. उन्हें डर था कि कहीं उनका पति दूसरी औरत की तरफ़ न आकर्षित हो जाए. मालदार बनजारे तो डंके की चोट पर सिर पर सौतन ला बिठालते थे. पर चांगोना की इसकी परवाह नहीं थी. वह तो चाहती थी कि भैरों दूसरी औरत की तरफ़ आकर्षित हो जाए ताकि उसे छुटकारा मिले. उसे तो दिलावर के साथ रहकर शोभा बहनजी जैसी बनना है. ढेर सारी किताबें पढ़ कर मास्टरनी बनना है और पाठशाला में पढ़ाना है. शोभा बहनजी जैसी सूती साड़ी पहनकर, एक चोटी गूंथकर, कलाई में घड़ी बांधकर वह अपने दिलावर के साथ तांडा में नहीं बल्कि गांव में बड़े से पक्के मकान में रहना चाहती है जिसकी दीवारें उसके बनाए चित्रों से सजी रहें. शोभा बहनजी कहती हैं… वह बड़ी चित्रकार बन सकती है. उसका हाथ सधा हुआ है. कितनी खुश हुई थीं वे जब उनके घर की दीवार पर चांगोना ने एक झील बनाकर उसके चारों और सघन वृक्ष उकेरे थे और डालियों में चांद अटकाया था- “अरे वाह… तुम तो चित्रकार हो. कहां से सीखा?”

“हमें कौन सिखाएगा बहनजी… ये सब इसी गांव में तो है. रोज़ ही देखते हैं.”

वह शोभा बहनजी की बड़ी-बड़ी झील सी आंखों को हंसता देखती. रही थी. कितनी  सुंदर हैं वे. जितनी सुंदर हैं उतना ही सुंदर उनका स्वभाव है. उन्होंने ही चांगोना को अक्षर ज्ञान करा के उसे पढ़ना सिखाया. धीरे-धीरे वह अक्षरों को पहचानने लगी और हिज्जे करके पढ़ने भी लगी. जब माई बापू के संग खिलौने बनाने में जुटी रहती हैं और उसकी दोनों बहने रावल और सुगना कंडे थाप रही होती हैं वह जल्दी जल्दी अनाज बीनने का काम निपटाकर शोभा बहनजी के पास भाग आती थी और किताबें पढ़ने, चित्र बनाने, शोभा बहनजी के लिए चाय बनाने और ढेर सारी बातें करने में शाम गुज़ार देती थी. दिलावर साथ होता… अंधेरा घिरते ही वह चुनरी से मुंह अच्छी तरह ढांककर दिलावर के संग गांव के बाहर वाली सड़क तक आती थी. सामने ही तांडा था और अंतिम छोर पर दिलावर का घर. दिलावर के गली में खोते ही वह चुपचाप किवाड़ खोलकर आ जाती. यह रुटीन काफी लम्बे समय से चलता चला आ रहा था. एक दिन माई ने उसे दबे पांव, घर में घुसते देख लिया. वे चूल्हे पर रोटी सेंक रही थीं. उन्होंने चिमटा उठाया और चांगोना की पिटाई कर डाली- “खबरदार जो दुबारा वहां गयी… घर में रहकर घर गृहस्थी की बातें सीख… मुझे सुगना ने सब बता दिया है तेरी उस बहनजी के बारे में. जादू टोना जानती हैं ऐसी औरतें… दूर रह उनसे. सीधी राह चल… ये उल्टे काम तुझे नहीं सोहते.”

उल्टे काम? अगर किताबें पढ़ना उल्टे काम हैं तो वह उल्टे काम ही करेगी. अगर मास्टरनी बनना उल्टी राह चलना है तो वह उल्टी राह ही चलेगी. कई बार वह दिलावर के संग अपने इस सपने की कल्पना कर चुकी है. उसने अपनी इस कल्पना को अपने ससुराल की गोबर लिपी दीवारों पर चूने और गेरू की सहायता से रेखाओं में उकेरा… चांगोना का यह पहला कदम था अपने कबीले की परम्पराओं के खिलाफ़.

जवारा बोने का त्योहार आ गया. चांगोना को माई बापू की याद सताने लगी. सुगना और रेवली बांस से बनी टोकरी में खाद मिट्टी डालकर गेहूं बो रही होंगी… वह नहीं बो सकती क्योंकि उसका ब्याह हो गया है. हर साल सबसे हरे भरे ज़वारे उसके ही उगते थे. वह हर दिन नहा धोकर उन जवारों की पूजा करती थी और गीत गाती थी. नौवें दिन नदी की लहरों में जवारा विसर्जित करते हुए दूर खड़ा दिलावर उसे टकटकी बांधे देखा करता था. कितनी जल्दी उसके हाथ से सब कुछ फिसल गया. क्या अपराध था उसका जो ऐसा गुस्सैल पति मिला. क्यों नहीं उसे पलकों पर बिठाने वाला दिलावर मिला? औरत का नसीब ऐसा क्यों कि जो अच्छा लगता है वह ही उससे छिनता जाता है और वह अपनी नापसंदगी को ढोती ज़िंदगी गुजार देती है. रात दिन अपने पति और उसके परिवार के लिए मंगल कामना के गीत गाती खुद को भरमाती रहती है.

जन्माष्टमी के दिन उसके पति और देवरों ने मिलकर आंगन के बीचों बीच गड्ढा खोदकर चूल्हा बनाया और कुएं से पानी लाकर घर के सारे मर्द प्रसाद बनाने बैठ गये. इस दिन औरतें न तो प्रसाद बनाती हैं और न जगदम्बा माता की पूजा में शामिल होती हैं. प्रसाद में हलवा, चूरमा, रोठ, पूड़ी बन रही थी. चांगोना की यह पहली जन्माष्टमी भी जब उसे मास का प्रसाद मिलोए. मामके में तोकुंवारी लड़कियों के लिए यह पूजा वर्जित है. चांगोना ने सोलह शृंगार किया और आंचल फैलाकर प्रसाद लिया. फिर भी उसका मन उदास था. उसे लगता वह ससुराल में बिल्कुल अलग-थलग है… ऊपरी मन से वह हर काम करती पर मन लगा रहता, पढ़े… खूब पढ़े… लेकिन… वह जिस समाज में पैदा हुई है वहां पढ़ाई के क्या मायने? वहां तो ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव में बस औरत है और उसकी देह… देह से बढ़कर औरत का कोई वजूद नहीं. उसका पति भैरों भी तो सिर्फ़ उसकी देह चाहता है. उसे इससे मतलब नहीं कि चांगोना खुश है या दुखी… पराए घर में उसका मन लगा या नहीं.

एक रात भैरो ने ऐलान किया- “बस, बहुत आराम कर चुकी तू… कल से मेरे साथ बांस काटने जंगल चलेगी.”

उसका दम भी घर में घुट सा रहा था. रात दिन आंसू बहाती थक चुकी थी वह… बाहर की खुली हवा में सांस लेना चाहती थी. वह खुशी खुशी राजी हो गयी. भैरों ने इसे अपने रुआब का असर समझा.

मुंह अंधेरे उठ उसने कलेवा बांध लिया और पति के साथ जंगल की ओर चल पड़ी. वह हरी हरी घास पर हिरनी जैसी कुलांचे भरना चाहती थी पर पहली बार भैरों के साथ निकली थी सो उसके पीछे-पीछे चलती रही. बांसों के झुरमुट, के पास भैरों रुक गया और अपने निशान वाली जगह ढूंढ़ने लगा. सबके अलग-अलग निशान जंगल ऑफीसर ने अपने कारिंदों से कल ही लगवाये थे. सुना है इस बार जो जंगल ऑफीसर आया है… एकदम अंग्रेज़ों की तरह गोरा चिट्टा और दिलफेक आदमी है. गेस्ट हाउस में रोज़ ही मुर्गे कटते हैं, अंग्रेज़ी शराब की बोतलें खुलती हैं.

बांस काट रहे भैरों के पास एक कारिंदा आकर रुका… चांगोना सिर झुकार काटे हुए बांसों को छील रही थी. कारिंदे ने उसे घूरकर देखा– घर वाली है तेरी?”

“जी साब…”

“अभी अभी ब्याह हुआ लगता है.”

“जी… छः महीने हुए.”

कारिंदा चांगोना को बुरी तरह घूरता हुआ चला गया. चांगोना का मन खिन्न हो गया. उसके पति के रहते उसे ऐसी हालत से गुज़रना पड़े यह तो बड़े शर्म की बात है. दिलावर होता तो किसी की मज़ाल नहीं थी उसकी ओर आंख उठाकर देखने की. माई ठीक कहती है… हम औरतों को मर्द देह से हटकर आंकते ही नहीं.

दिन भर की थकी वह घर लौटकर चूल्हे चौके में खप गयी… सबके खा पी चुकने पर जब वह सोने के लिए बिस्तर पर आयी भैरों ने उसे खटिया पर बुलाया- “आ न इधर.”

“नींद आ रही है, तू भी सो जा.” चांदोना ने मुंह तक चादर ओढ़ ली.

“बड़े नखरे करती है? चल, आ इधर. अब जंगल तो तुझे रोज चलना पड़ेगा तो क्या रोज़ नींद आने का नाटक करेगी? घरवाली है तू मेरी… हक बनता है मेरा.” चांगोना फिर भी नहीं उठी तो भैरों ने चादर खींचकर उसे जबरदस्ती खटिया पर घसीट लिया. चांगोना का मन रो पड़ा… ये कैसा प्यार है… प्यार कहां… भैरों तो हक की बात करता है… जैसे वह हाट से खरीदी बकरी हो जो अपने मालिक के सारे जुल्म सहती है. कितना फ़र्क है दिलावर और भैरों में… काश, उसमें इतनी हिम्मत होती कि वह दिलावर को सरेआम अपना सकती.

जंगल जाते हुए आज चौथा दिन था. बांस कट चुके थे और चांगोना भैरों के साथ कलेवा करने बैठी ही थी कि कारिंदे ने दूर बरगद की छांव में भैरों को बुलाया. दोनों में जाने क्या खुसर पुसर होती रही. कारिंदे के जाते ही भैरों ने आकर कहा- “चल घर… आज और बांस नहीं काटेंगे.”

“अरे, क्यों? अभी तो दिन भी नहीं ढला.”

भैरों बिना कुछ कहे बांस का गट्टर उठाकर चलने लगा. वह भी बोझा उठाए पीछे-पीछे चल पड़ी. घर आते ही भैरों ने बोझा एक किनारे पटका और बोला- “आज जल्दी खाना पका ले और वो काला लाल घाघरा पहन कर अच्छे से तैयार हो जा, चलना है.”

“कहां?” वह चकित थी… ब्याह के इतने महीनों बाद भैरों उसे घुमाने ले जाने की बात कर रहा है. आज तो साप्ताहिक हाट का दिन भी नहीं है. शोभा बहनजी कहती हैं कि मर्द की नीयत का कोई भरोसा नहीं… कब क्या कर जाए… पर हम औरतों को साहस से काम लेना चाहिए… चाहे ज़ितना भी दबाव हो… जो काम मन को अच्छा न लगे नहीं करना चाहिए. लेकिन इस वक्त चांगोना खुश थी. क्या पता भैरों उसे गांव की टॉकीज़ में सिनेमा दिखाने ले जा रहा हो. बड़े जतन से तैयार हुई वह. भैरों ने उसे नज़र देखा. अपनी खूबसूरत लुगाई के लिए उसका सीना गर्व से फूल उठा.

जंगल का वही रास्ता… जाना पहचाना… बांस के झुरमुट पर चांद अपनी चांदनी लुटा रहा था. पूरे चांद की खुशनुमा रात थी. जंगली फूल महक रहे थे. कहीं-कहीं गोंदड़ सियार की आवाज़ से चौंक कर पंछी पंख फड़फड़ा रहे थे. उनकी चहचहाहट के बिना ाकेवल परों की आवाज़ जंगल को डरावना बना रही थी. जंगल ऑफिसर के गेस्ट हाउस के सामने पल भर रुक कर भैरों ने चांगोना को समझाया- “जा… खुश कर दे मालिक को और ओढ़नी भर रुपिया बटोर ला… ऐश करेंगे हम दोनों. बांस छील छीलकर तू भी थक जाती है न?”

‘क्या ।़।़।़’ चांगोना की खुशी पल भर में काफूर हो गयी. “तू मुझे धोखे से लाया, बताया भी नहीं.”

“इसमें बताना क्या… थोड़ी देर का तो काम है, जा निपटा आ… मैं साहब की रसोई में तब तक इंतज़ार करूंगा तेरा.”

कहता हुआ भैरों उसका हाथ पकड़कर उसे साहब के कमरे की चौखट पर छोड़ खुद रसोई में चला गया. रसोईया मुर्गा पका रहा था.

“अच्छा आया तू भैरों… ले भून ज़रा… मैं तब तक साहब को शराब देकर आता हूं.”

मुर्गा भूनते हुए भैरों रंगीन कल्पनाओं में खो गया. अभी दस मिनट भी नहीं गुज़रे होगे कि चांगोना दौड़ती हुई उसकी ओर आयी- “मुझसे नहीं होगा यह पाप है.”

भैरों गुस्से से थर्रा उठा- “बड़ी-बड़ी बातें मत कर… हम बनजारे सदियों से यही करते आ रहे हैं. चलन है ऐसा?” जानती है चांगोना. जमींदारों, मालगुज़ारों का ज़माना गया. अब उनकी जगह जंगल ऑफीसर उन पर अपना हक जताते हैं. औरत यही सहती आ रही है. पर चांगोना को इंकार है इस चलन से.

“नहीं जाऊंगी, चल घर… जल्दी कर, अभी साहब नहा रहा है.”

“जाएगी कैसे नहीं…” भैरों ने उसकी पीठ पर कई घूंसे मारे, लेकिन चांगोना लगातार इंकार करती रही. गुस्से से पागल हुए भैरों को गुस्से बढ़ता गया. चांगोना ‘माई  रे… कहती हुई ज़मीन पर लोट गयी. तभी रसोईया आ गया. सारा नज़ारा देख वह चुपचाप मुर्गा भूनने लगा. भैरों गुस्से में तमतमाता हुआ बाहर निकला कि तभी चांगोना शेरनी सी उसकी ओर झपटी– “जाता कहां है… सुन ले, आज से तेरा मेरा कोई रिश्ता नहीं. तू मर्द नहीं पिशाच है, नामर्दा है…”

और वह दौड़ने लगी, भागने लगी… जंगल के घने पेड़ों के साये भयावने लग रहे थे जबकि चांदनी का शुभ्र विस्तार उसके कदमों को रास्ता सुझा रहा था. घंटों वह दौड़ती ही रही… जंगल का विस्तार खत्म होते ही कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी की आवाज़ सुनते हुए उसने देखा पूर्व का आंसमान सिंदूरी हो उठा है. मानो दिलावर हाथ में सिंदूर लिए उसकी मांग भरने को आतुर हैं…

हांफ़ते हांफ़ते जब उसके हाथ शोभा बहनजी के घर की सांकल खटखटा रहे थे… सूरज निकल आया था.

(मार्च 2014)

1 comment for “धुंध के पार

  1. Sumit Mittal
    January 13, 2016 at 11:17 am

    बहुत ही अच्छी कहानी है। इस कहानी पर बहुत अच्छा नाटक भी हो सकता है। लेखक को बधाइयाँ

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