गिरगिट

♦  इंद्रकुमार शर्मा    

      आनन-फानन में अपना राजनीतिक रंग बदल लेने वाले इंसानी गिरगिट इस लेख का विषय नहीं हैं. हम तो उस सच्चे-सादे जीव गिरगिट की चर्चा कर रहे हैं, जिसे इंसान ने अकारण बदनाम कर रखा है. और बदनामी भी कितने तरह की.

    कांटेदार काया, उत्तेजना के समय फूली हुई गर्दन व भड़कीले रंग देखकर गिरगिट को जहरीला समझ लिया गया है.

    रंग बदलने की आदत के कारण गिरगिट को स्वार्थी और धोखेबाज मान लिया गया है- ‘गिरगिट की तरह रंग बदलना’ कहावत ही बन गयी है.

    मुसलमानों को एक और शिकायत है गिरगिट से- गिरगिट के सिर हिलाने से.

    कहते हैं, एक बार हजरत हुसैन साहब शत्रुओं से घिर जाने पर झाड़ियों में छिपकर बैठ गये. शत्रु उन्हें खोजते फिर रहे थे कि उन्हें एक गिरगिट दिखाई दिया, जो सिर हिला-हिलाकर कुछ इशारा-सा कर रहा था. शत्रुओं ने इशारा समझा और गिरगिट के संकेत के अनुसार झाड़ियों के पीछे जाकर हुसैन साहब को पकड़ लिया. तब से मुसलमान गिरगिट के शत्रु हो गये और जहां देखा, मारने लगे.

    लेकिन ये सभी आरोप गलत हैं गिरगिट एक निर्विष जीव है. वह रंग इसलिए नहीं बदलता कि वह मतलबी या धोखेबाज है. वह सिर भी इसलिए नहीं हिलाता कि चुगलखोर या इस्लाम-विरोधी है. भय, क्रोध या काम की उत्तेजना में होने पर ही गिरगिट रंग बंदलता और सिर हिलाता है.

    वास्तव में गिरगिट बहुत सीधा-सादा हानिरहित और शांत प्रकृति का उपयोगी जीव है. उपयोगी इसलिए कि वह फस्लों और बगीचों को हानि पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़े को खाकर किसानों को नुक्सान से बचाता है.

    खेत, जंगल और बाग-बगीचे में जहां पुराने खर-पात सड़ने से कीट-पतंग खूब पैदा हो गये हों, वहां अक्सर गिरगिट पाया जाता है. जहां मिले काना, वहां दौलत-खाना- यह इसका सिद्धांत है. छोटे-छोटे कीड़े-पतंगे इसके प्रिय खाद्य हैं. उन्हें सामने पाकर यह पहले तो ध्यान से देखता रहता है, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और पास पहुंचने पर लपककर पकड़ लेता हैं. कीड़ा छोटा हुआ तो सीधा अंदर, कुछ बड़ा हुआ तो दो-तीन बार चबाने के बाद निगल गये. कीड़ों का अकाल ही पड़ जाये, तो ये महाशय सड़ी-पत्तियां खाकर भी पेट भरते देखे गये हैं.

    सभी प्राकृतिक जीवों की तरह गिरगिट की भी कुछ खास आदतें हैं, एक नियमित दिनचर्या है. रात को गिरगिट किसी पेड़ पर सोता है. सवेरा होते ही वह नीचे उतर आता है और शिकार शुरू कर देता है. और लगभग 10 बजे तक पेट भरने के धंधे में लगा रहता है. हरी-भरी अनुकूल जगह में 15 मीटर के दायरे में घूम-फिरकर ही पेट भर जाता है, रेगिस्तानी जगह हुई तो 300 मीटर तक के दायरे में भी भटकना पड़ सकता है. एक बात अच्छी है कि गिरगिट मिलनसार स्वभाव के होते हैं. एक के क्षेत्र में दुसरा गिरगिट आ जाये, तो कुत्तों की तरह आपस में लड़ते नहीं.

    हां, यदि गिरगिट-गिरगिटाइन का प्रणय-प्रसंग चल रहा हो, तो नर दूसरे गरगिट को पास भी नहीं फटकने देगा. उस समय गिरगिट और ही रंग में होता है. वास्तव में गिरगिट के बदलते हुए रंगों की छटा देखी ही तब जाती है, जब उसमें कामोत्तेजना भरी हुई हो.

    गिरगिटों का ऋतुकाल जून से अगस्त तक होता है. इस काल में मादा को निकट पाते ही नर गिरगिट उत्तेजित हो उठता है, उसका रंग बदलने लगता है. फिर वह बड़ी अदा से सिर ऊंचा-नीचा करके प्रणय-निवेदन करता हुआ मादा की ओर बढ़ता है और पास पहुंचने पर लपककर पकड़ लेता है.

    उत्तेजना का आवेग शुरू होने पर कुछ ही क्षणों में गिरगिट के मुंह का निचला हिस्सा, कंठ, कंधे और पीठ रंग बदलने लगते हैं. कंठ पर काली पट्टी उभरती आती है और अन्य अंगों पर गुलाबी रंग छा जाता है. उत्तेजना बढ़ने के साथ रंग गहरे हो जाते हैं. यों तो भय और क्रोध की उत्तेजना में भी गिरगिट के रंग बदलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा रंग कामोत्तेजना में ही उभरते हैं. उत्तेजना शांत होने के लगभग आधे मिनिट बाद ही रंग लुप्त होने लगता है- हां गुलाबीपन कई मिनिटों तक बना रहता है.

    रंगों का चटकीला उभार गर्मी और बरसात के मौसम में ज्यादा दिखाई देता है- सदिर्यों में तो पूरा शरीर मटमैला, भूरा होकर रह जाता है. रंग-परिवर्तन की यह प्रवृत्ति युवा गिरगिटों में अधिक देखी जाती है.

    इस रंग-परिवर्तन की वैज्ञानिक व्याख्या है. जिन अंगों का रंग बदलता है, उनकी त्वचा में रंग-कोश होते है. जब तक रंग-तत्त्व कोश के केंद्र से निकल आता है, तब त्वचा का रंग बदल जाता है. उतेजना शांत होने पर जब रंग-तत्व कोश-केंद्र में वापस चला जाता है, त्त्वचा का रंग फिर सामान्य हो जाता है.

    ऊपर बात चल रही थी गिरगिट की दिनचर्या की. शयन-वृक्ष से सुबह होते ही उतरकर गिरगिट प्रायः10 बजे तक पेटपूजा करता है और 10 बजे से शाम के 4 बजे तक विश्राम. आरामगाह होती है कोई गीली और छायादार जगह. बीच में भूख लग जाये तो और बात है, वर्ना आम तौर पर 4 बजे के बाद ही गिरगिट की पेट-पूजा फिर शुरू होती है और सूर्यास्त तक बड़े मजे से चलती रहती है.

    सूर्यास्त के पंद्रह-बीस मिनिट बाद गिरगिट धीरे-धीरे चलता और बीच में रुकता हुआ अपने शयन-वृक्ष पर चढ़ता है. वृक्ष की काफी ऊंची और धरती के समानांतर निकली हुई पतली शाखा पर वह चपटा फैल कर सोना पसंद करता है, क्योंकि वहां शत्रुओं का भय नहीं रहता.

    गोह, बड़े सांप, बाज और उल्लू गिरगिट के मुख्य शत्रु हैं. लेकिन ये गिरगिट को कम ही मारते हैं- प्रायः तभी जब और कोई अच्छा शिकार न मिले. दिन में आक्रमण हो तो गिरगिट सिर हिला-हिलाकर और गले का थैला फुलाकर शत्रुओं को डराने में भी सफल हो जाता है. रंग-परिवर्तन कभी-कभी उसकी आत्मरक्षा का अच्छा साधन बन जाता है.

    वैसे, गिरगिट स्वभावतः आलसी और शांतिप्रिय होता है. वह पतली टहनियों तथा खड़ी, चिकनी दीवार पर नहीं चल पाता. लेकिन समतल धरती और मोटी शाखाओं पर तेज दौड़ता है. दौड़ते समय पूंछ ऊपर उठ जाती है. गिरगिट आपस में नहीं लड़ते, जब तक मादा के साथ होने पर उन्हें दूसरे गिरगिट द्वारा छेड़ा न जाये.

    कहते हैं, मादा गिरगिट बड़ी कामकला-प्रवीण होती है और नर को खूब नाच नचाती है. एक बार में वह लगभग 10 अंडे देती है और उन्हें किसी झाड़ी के पास गीली मिट्टी में गड्डा खोदकर मिट्टी से ढंक देती है. सत्रह दिन बाद अंडों से बच्चे निकल आते हैं. काली छिपकली के बच्चों जैसे ये शिशु गिरगिट घास में छिपे रहकर आत्मरक्षा करते हैं और छोटे-छोटे पतंगों से अपना पेट भरते हैं. बड़े होने के साथ-साथ उनकी त्वचा का रंग फीका पड़ता जाता है.

    भारत में दो प्रकार के गिरगिट पाये जाते हैं- एक उत्तर भारत में, दूसरा दक्षिण भारत में. उत्तर भारतीय गिरगिट प्रायः 25 सेंटीमीटर (10 इंच) लंबा होता है. मादा जरा छोटी होती है. जीवशास्त्र की भाषा में यह गिरगिट-जाति ‘क्लैटोस वर्सिकलर’ कहलाती है और दक्षिणपूर्व एशिया में भी  पायी जाती है.

    भारतीय गिरगिट ‘कैमेलियन वल्गैरिस’ कहलाती है. पश्चिमी एशिया और मध्य अफ्रीका में भी यह जाति पायी जाती है. इसकी लम्बाई 40 सेंटीमीटर (15 इंच) होती है और उसकी पूंछ पीछे से मुड़ी हुई होती है, जिससे यह टहनी से लटककर झूल सकता है.

    शीतकाल में गिरगिट दीवारों या चट्टानों की दरारों में, पेड़ की खोखलों में या घास-फूस में छिपकर शीत-समाधि ले लेता है, क्योंकि वह 18 अंश शतांश से नीचे का तापमान नहीं सह पाता. 10 अंश शतांश पर वह बिलकुल निष्किय हो जाता है और 6 अंश शतांश पर अधमरा-सा. फरवरी में तापमान बढ़ने पर यह समाधि तोड़कर बाहर निकल आता है और पूर्ण स्फूर्ति अप्रैल में अनुभव करता है, जब तापमान काफी बढ़ जाता है.

    स्वभाव से भोले और नियमित जीवन के अभ्यस्त इस शांतिप्रिय और उपयोगी जीव को हमने व्यर्थ बदनाम कर रखा है.   

(मई  2071)

2 comments for “गिरगिट

  1. राघवेंद्र
    October 10, 2017 at 11:51 am

    गिरगिट एवं गोहरे में अंतर तथा पहचान बताएं।

  2. chandrakant kichak
    October 12, 2017 at 1:37 pm

    Ji ha mujhe bhi aisa hi lagta hai.Hamare gain me bbi ek Girgit dikha tha Par maine use bachaya aur ghar me bagiche me chhod diyaa.Par mujhe dar that kk kahi ye jehrila to nahi is liye Maine iske bare me internet par pata kiya aur mujhe pata chala ki ye jehrila nahi hai. Thanks for your guidance.

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