आधे रास्ते (आठवीं क़िस्त)

धीरे-धीरे मैं बदल रहा था, परंतु मेरे हृदय का एक भाग तो जैसा था वैसा ही रहा. जब मैं कॉलेज की छत पर अकेला घूमता तब सचीन में मिली बाला की कल्पना-मूर्ति मेरे आगे आ खड़ी होती और मैं विह्वल होकर रोने लगता. जब मैं उपन्यास पढ़ता तब मुझे ऐसा लगता जैसे उसके नायक-नायिका के अनुभव हमारे अपने ही हैं. मुझ कल्पनाशील के लिए यह सृष्टि यथार्थ थी.

1903 के मार्च या अप्रैल के महीने में मैं पिताजी के साथ फिर डुमस गया. उस समय मुझे चार दिन इस बालिका से मिलने का अवसर मिला. वैसे देखा जाय तो यह एक सामान्य बात थी, लेकिन मेरे जीवन के लिए यह सीमा-रेखा बन गयी. डुमस से लौटने पर यह बालिका मेरी कल्पना की स्वामिनी  बन गयी. दिन में मुझे उसका हास्य सुनाई देता और रात को उसको बराबर स्वप्न में देखा करता. उत्तेजित कल्पना के इस स्वल्प अनुभव में रंग भरे- सात वर्ष से मैं उसी की रट लगा रहा था; वह भी मेरी रट लगा रही थी. हम दोनों परिणय सूत्र में आबद्ध होने के लिए बने थे. मैं उसके बिना तड़पता था वह मेरे बिना रो-रो मरती थी.

कहानियों से मेरा मस्तिष्क भरा था. नाटकों ने मुझे अनेक पाठ पढ़ाये थे. प्रेम के गीत तो मेरी ज़बान पर ही थे. इन सब बातों के एकत्र मिलने से मैं विरह-विह्वला गोपी जैसा हो गया और दिन-भर भग्न हृदय से गाता रहता-

मुझको भूल गया है मेरा छैला प्रियतम रे।

झूठी तेरी प्रीति कन्हैया, ओ नंद के लाला,

मुझको भूल गया है मेरा छैला प्रियतम रे।

इस प्रकार वर्षों आंसू बहाकर मैंने ‘वैर का बदला’ के कितने ही प्रकरणों की सजीवता की रक्षा की.

1903 के मई महीने की पहली तारीख की रात्रि को पिताजी और माताजी अप्रैल के महीने का हिसाब करने बैठे और नियमानुसार महीने-भर के खर्च से जो कुछ बचा वह मेरी थैली में डाल दिया. उसके बाद हम सब सोये.

आधी रात के बाद पिताजी के हृदय में घोर पीड़ा होने लगी. दौड़-धूप हुई, डॉक्टर आये और उन्हें नीचे उतारा. उसके बाद सात दिन तक उनकी तबीयत सुधरती चली गयी.

आठ मई की रात थी. भारतीय दृष्टि से उस दिन सम्वत 1956 की बैसाख सुदी तेरस थी. पिताजी आरामकुरसी पर बैठे थे. मैं पास खड़ा था. मां खाना लेकर आ रही थी. पिताजी ने अचानक बेचैन होकर ‘ओ-ओ-ओ’ की पुकार लगायी. मैं उनका हाथ पकड़ने दौड़ा. मां खाना ज़मीन पर रखकर दौड़ी और चीख पड़ी.

पिताजी ने सिर कुरसी पर रख दिया. बुआ और दूसरे सब लोग दौड़े आये. रोना-पीटना शुरू हुआ. सब पिताजी को हिलाने-डुलाने लगे और ज़मीन को गोबर से लीपकर उन्हें नीचे सुलाया गया. किसी ने घड़ा लाकर उन पर उंड़ेला. ‘श्रीराम, श्रीराम’ की आवाज़ें चारों ओर सुनाई देने लगीं.

मां करुणा रुदन करती हुई अपना माथा फोड़ रही थी और मैं किंकर्तव्य-विमूढ़-सा देख रहा था.

पिताजी को भस्म करके जब हम लौटे तो मैं अकेला तीसरी मंजिल पर जाकर खूब ज़ोर से रोया.

सहसा मेरे सिर का ताज उड़ गया और पैसे तथा प्रतिष्ठा से सुरक्षित मेरा जीवन दीन और निर्जीव बन गया. दो निराश्रित भानजों को पालने का भार भी मेरे सिर पर पड़ा. मां अब अकेली थी, इसलिए उसे आश्वासन देना भी मेरा कर्तव्य था. इस ज़िम्मेदारी के कारण मैंने पढ़ना छोड़कर नौकरी करने का संकल्प किया.

सजल नयन मां लोकाचार के अनुसार कर्मकांड और तेरहवीं करने की तैयारी करती और हमें आश्वासन देती. दोपहर को जब कोई पास न होता तब हिसाब के दफ्तरों की अलमारी खोलकर उसमें कुछ उठा-धरी करती रहती और हिसाब लिखा करती.

लिखना भी एक प्रकार का ध्यान है, यह बात पहले मैंने मां से सीखी और बाद में स्वयं अनुभव की.

मैंने अपनी योजना उसे बतायी–ऐशो-शरत का सामान बेच दें, मैं कॉलेज छोड़कर नौकरी कर लूं और जैसे-तैसे दुःख के दिन काटें.

मां मुझसे चिपट गयी. उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

“कनु, घबरा मत. न बर्तन-भांडे बेचने हैं और न पढ़ना छोड़ना है. मैं बैठी हूं न?” वह अकेली ही विधि की वामता से लड़ने के लिए तैयार हो गयी थी.

माणिकलाल मुनशी की प्रतिष्ठा के अनुकूल समस्त लोकाचार हुए. मरणभोज हुआ, दान दिया गया, हिसाब हुआ और पैसा चुकाया गया. सबसे निश्चिंत होकर मां ने घर की व्यवस्था बदल डाली. हमारे पास कितना था, कितना बचा है, जो कुछ बचा है उसको कैसे खर्च किया जाय आदि बातों का जोड़-तोड़ वह मिलाने लगी. कुछ गहना बेच डाला और बीमे का रुपया लेकर उसे ब्याज पर उठा दिया. पिताजी के कपड़ों में से हमारे लिए क्या-क्या बन सकता है और खाने-पीने में कैसा फेर-फार करके किफायत हो सकती है, इसका निश्चय हुआ. रसोइये और नौकर को छुट्टी दी.

जब भाइयों में बंटवारा हुआ था तब पिताजी ने अपने घर के पुराने नौकर मुहम्मद शफी को रख लिया था. वह धार्मिक मुसलमान था, वह कुरान पढ़ता था और कभी नमाज पढ़ने के वक्त को नहीं जाने देता था. फुरसत के समय वह अल्लाह का नाम जपा करता था. जब वह हमें नाटक दिखाने ले जाता तब स्वयं बाहर बैठा रहता. वह फोटो खिंचाने के लिए कभी तैयार नहीं होता था. इस सबको वह अपने मज़हब के विरुद्ध समझता था. वह रोज़ सबेरे सात बजे टीले पर आता. बारह बजे घर खाना खाने जाता, तीन बजे लौटता और रात के नौ बजे छुट्टी पाता. वह बाहर का भी सारा काम करता था और घर का काम भी सम्भालता था. त्यौहारों के दिन इस बात का भी ध्यान रखता था कि पंडितजी पूजा कर गये हैं या नहीं. ब्याह-शादी हो या श्राद्ध-आदि, बाजार से चीज-वस्तु लाने की सभी ज़िम्मेदारी वह ले लेता था और सारी व्यवस्था भी वही करता था. दावत कहीं दूर पर होती और लड़कों को जाना होता तो साथ में वही जाता था. मेरे छोटे भानजे को गोदी में लेकर खिलाने में भी वह मदद देता था.

हम उसे सात रुपया महीना देते थे. जब तक पिताजी जीवित थे तब तक उसका रौब सरकारी चपरासी के समान था. वह हमारे विश्वासी आदमी के रूप में प्रतिष्ठा पाता था. उसे इनाम आदि भी मिलता था.

जब मां ने रसोइये और नौकर को छुट्टी दी तो उसने ग्यारह रुपये की नौकरी ढूंढ़ ली और मां के पास आया. “मां, मुझे छुट्टी दो. मैंने वीटल मिल में नौकरी ढूंढ़ ली है,” उसने झिझकते हुए कहा.

मां पान बना रही थी. उसने गम्भीरता से ऊपर देखा. मैं वहीं बैठा था. “मुहम्मद, बाद में तेरे छोटे मालिक को कौन सम्भालेगा?” मां ने पूछा.

क्षण-भर मुहम्मद ने मेरी ओर देखा. उसकी आंखों में आंसू आ गये. “बहुत अच्छा, मां”, कहकर वह चुप हो गया.

उसके बाद अधिक तनख्वाह की नौकरी के लिए उसके पास कितनी ही बार खबरें आयीं. हमारी शक्ति सात रुपया से अधिक देने की थी ही नहीं. लेकिन न तो उसने दूसरी नौकरी की और न हमसे अधिक तनख्वाह ही मांगी.

‘छोटे मालिक’ के लिए उसने दस वर्ष तक अडिग तपस्या की. गांव में ‘छोटे मालिक’ का रौब ज्यों-का-त्यों रखा. जितना हो सका उतना उसने काम किया. उसने भानजों के पालन-पोषण में बड़ी मदद की, घर सम्भाला और कर वसूल किया. न उसने पैसा चुराया न मांगा. उसने और उसकी दो बीवियों ने बीड़ी बनाकर और कपड़े सीकर अपना खर्च चलाया. बारह वर्ष में उसके धीरज में फल लगे. उसके छोटे मालिक ने जितनी उसने मांगी उससे अधिक तनख्वाह दी. उसका कर्ज चुका दिया. उसे घर खरीद दिया. उससे कई बार विनती करके एक बार फोटो खिंचाने को राजी किया.

उसके बाद पंद्रह वर्ष तक उसने ठाट-बाट देखा. उसने अपने मालिक के लिए नया बड़ा घर बनाने का काम लिया. उसने मुनशियों के नये परिवार का पालन किया. अंत तक टीले के उसी चबूतरे पर बैठकर उसने बीड़ियां बनायीं, कुरान पढ़ी और चंद्रशेखर महादेव की पूजा करायी. सारे भड़ौंच में उसने एक संस्था के समान सम्मान पाया. सत्यवादी, धर्मात्मा, दृढ़ और कर्तव्य-परायण मुहम्मद अड़तीस वर्ष की नौकरी के बाद बहिश्त चला गया. ब्राह्मण के घर की रखवाली करनेवाला यह सच्चा मुसलमान हिंदू-मुस्लिम एकता के अपूर्व संस्मरणों की विरासत दे गया.

घर में किफायत की हद न थी. 400 रु. वार्षिक आमदनी में से 94 रुपया मुहम्मद को जाते, 150 से 175 तक मेरा कॉलेज का खर्च होता और बाकी रुपयों से भड़ौंच के घर का खर्च चलता, लोक-व्यवहार के काम होते और मेरे भानजे पढ़ते. तीन या चार रुपये कहारी को चौका-बर्तन के लिए दिये जाते. बाकी सारे काम मां अपने हाथों से करती थी.

1903 में मैं प्रीवियस में पास हुआ और पी.के. बी. ए. होकर नौकरी की खोज में लगे. उसके बाद हम दोनों ने अनेक सुख-दुख सहे हैं; बहुत बार हमने साथ-साथ काम किया है; कितनी ही बातों में हमारा जीवन-कम भिन्न रहा है और है, तो भी आज उनके और उनकी पत्नी के मन में मैं सगा छोटा भाई हूं और मेरे हृदय में पी. के. का जो स्थान था वह कभी कम नहीं हुआ.

1903 में बी. ए. में पढ़ते समय आचार्य के साथ मेरी मित्रता हुई. वे अंग्रेज़ी और फारसी में कॉलेज में प्रथम आये, इस कारण वे 1904 में फेलो हुए और मैं उनके साथ नये बोर्डिंग के बीसवें कमरे में रहने के लिए गया.

आचार्य प्रचंडकाय थे. वे कच्छी, अंग्रेज़ी और फारसी के गम्भीर विद्यार्थी थे. जो बात तुम कहो उसके विरोधी बनकर तुम्हारे सिद्धांत का खंडन करने का उन्हें शौक था. पी. के. और मैं यदि पुनर्विवाह की हिमायत करते तो वे सतीत्व की दलील देकर हमें निरुत्तर कर देते. हम यदि राष्ट्र-प्रेम की बात करते तो वे प्राचीन व्यवस्था की अपूर्वता सिद्ध करते. यदि हम यह स्वीकार करने को तैयार हो जाते कि उनका कहना उचित है तो वे हमारे विरुद्ध दलीलें देने लगते. उनके साथ वाद-विवाद करने में बुद्धि और वाद-विवाद करने की शक्ति की परीक्षा हो जाती थी. इसलिए मैं प्रत्येक विषय में ज़ोर-शोर से तैयारी करता था.

आचार्य का साथ मेरे लिए बड़ा ही उत्साहवर्द्धक सिद्ध हुआ. हम साथ-साथ पढ़ने लगे. मैं उनके साथ चॉसर पढ़ता और वे मेरे साथ बर्क पढ़ते. सबेरे उठकर हम अंग्रेज़ी कविता की दस पंक्तियां रटते. सबेरे कसरत और शाम को दौड़ना भी साथ करते. प्रिंसिपल ने एक दिन आचार्य को पुराने रेकिट, बेकार गेंदें और फटा हुआ जाल दिया. आचार्य का स्वभाव बहुत ही कुश्ती-प्रेमी था, इसलिए उनके साथ बुद्धि की कुश्ती लड़नी ही पड़ती थी, और हम रात को देर तक वाद-विवाद किया करते थे.

उन दिनों बड़ौदा कॉलेज का जीवन अत्यंत सरल और सीधा था. 1906 में हम रोज़ चाय पीने लगे. उससे पहले चाय पीना बड़ी  भारी दावत समझी जाती थी. कुछ मैसों में रोज़ का बिल ढाई आने से लेकर तीन आने का होता था- महीने में साढ़े पांच रुपये! नियमानुसार मेरा एक सहपाठी मैस का मैनेजर हुआ. उस समय प्रति सप्ताह एक विद्यार्थी मैनेजर होता था. इसके कार्यकाल में रोज़ का बिल तीन आने एक पायी होने लगा. मैस में चिल्ल-पुकार मच गयी. मैनेजर के ऊपर अभियोग लगाये गये. आचार्य के पास अरजी गयी कि इस भयंकर अव्यवस्था की जांच होनी चाहिए. जैसे आडम्बर से भारत सरकार जांच-समिति नियुक्त करती है वैसे ही आडम्बर से आचार्य ने जांच-समिति नियुक्त की. मुझे भी समिति का एक सदस्य होने का सौभाग्य मिला. बारीकी से जांच करने पर मालूम हुआ कि प्रति सदस्य दो पाई रोज़ अधिक खर्च होने के दो कारण थे- एक तो रोज़ हर एक सदस्य को अलग से नमक परोसा जाता था और दूसरे मैनेजर रात का बचा-खुचा रद्दी साग लाने के बदले शाम का ताज़ा साग लाता था, जो मंहगा पड़ता था. जांच-समिति की रिपोर्ट प्रकट हुई और मैस में प्रस्ताव पास हुआ कि कोई भी सदस्य अलग से नमक न ले और मैनेजर ताज़ा साग न लावे.

इतने में धीरजलाल नानावटी, जो आई. सी. एस की तैयारी करने बड़ौदा में रहे थे, कॉलेज में आने लगे. उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज से बी.ए. पास किया था और कुछ ही दिनों में विलायत जाने वाले थे. वे मेरे मित्र बने और उनके कहने से मैंने विक्टर ह्यूगो पढ़ना शुरू किया.

तीसरे नये मित्र दाराशा थे. वे धनी पारसी युवक थे और मेडिकल कॉलेज में फेल होकर लौटे थे. वे बहादुर थे और उनके बोलने का ढंग अद्भुत था. वे मेजिनी के प्रेमी थे और सदा राष्ट्रीयता की चर्चा करते थे. उनके पास से मैंने मेजिनी की कितनी ही पुस्तकें पढ़ीं.

1904 में विश्व में और विशेषकर भारत में अद्भुत घटनाएं घटीं. वे घटनाएं मेरे विकास में सहायक हुईं. उस समय का वर्णन ‘स्वप्नद्रष्टा’ में मैंने इस प्रकार किया है-

“सन् 1603 में उन्होंने (लॉड कर्जन ने) तीन करोड़ रुपया खर्च करके सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ताजपोशी का समारोह करके भारतीयों की ‘पौर्वात्य’ कल्पना को उत्तेजित करने का प्रयत्न किया. …भारतीय प्रतिनिधि लालमोहन घोष ने मद्रास कांग्रेस के सभापति की हैसियत से उसे मरते हुए लोगों के लिए किया गया रंगीन तमाशा’ कहा. …एक दिन जापान ने अंधकार से बाहर आकर रूस को- यूरोप को- चुनौती दी. रूस-जापान युद्ध शुरू हुआ. …इस युद्ध का बड़ौदा कॉलेज पर भारी प्रभाव पड़ा. अखबार पढ़ने का शौक बढ़ गया. लायब्रेरी में जापान-विषयक पुस्तकें आयीं. यह अफवाह उड़ी कि अरविंद घोष जापानी भाषा सीखने लगे हैं.”

भारतवासियों की उस समय की विचित्र मनोदशा की कल्पना कुछ ही लोगों को है. सत्रहवीं और अठाहरवीं शताब्दी की अंधेरगर्दी की हालत के आधार पर अंग्रेज़ी शिक्षा के विशेषज्ञों ने बताया था कि भारतीय जंगली हैं, उनके कुसंस्कारों के कारण ही उनका अधःपतन हुआ है और विदेशी भाषा, रंगभेद, स्वसंस्कार के प्रति द्रोह और विदेशी संस्कारों के प्रति आस्था रखने में ही उनका कल्याण है. सुरेंद्रनाथ जैसे भी शुभेच्छापूर्ण ब्रिटिश सरकार’ की प्रशंसा करते थे. बहुत से नेता मानते थे कि अंग्रेज़ ‘ईश्वर की कौशलपूर्ण व्यवस्था’ के कारण ही इस देश पर राज्य कर रहे हैं.

ज़हर गया है, वैर गया है, गये कहर ढाने वाले।

यह उपकार समझ ईश्वर का, हर्षित हो तू हिंदुस्तान।।

यह भ्रम बना हुआ था. यह भ्रम मुझमें और भी अधिक था.

लेकिन बाद में हमें इस बात का कुछ-कुछ पता चलने लगा कि अंग्रेज़ों ने हमारे ऊपर मोहिनी डालकर यह धारणा हमारे मन में जमा दी थी. उगते हुए सूर्य की किरणें जैसे चेतना देती हैं वैसे ही यह सत्य भी हमारी चेतना को जागृत करने लगा.

‘एशिया एशियावालों के लिए’ का मंत्र हमारे हृदय में बसा और हम इसकी प्रतीक्षा करने लगे कि कब जापान रूस को हराता है.

इस युद्ध से हमारा स्वाभिमान जागृत हुआ. काले गोरों से हेय नहीं हैं, एशिया यूरोप को मज़ा चखा रहा है. भारत अंग्रेज़ों का गुलाम रहने के लिए पैदा नहीं हुआ, इस प्रकार के विचारों से हम नये उल्लास का अनुभव करने लगे.

हमारे कॉलेज के प्रोफेसर अरविंद घोष उस समय गायकवाड सरकार के प्राइवेट सेक्रेटरी थे. पहले हमें उनसे घृणा थी, क्योंकि एक बार उन्होंने कॉलेज की वाद-विवाद सभा में भाषण दिया था, जिसमें प्रजातंत्रीय शासन की अपेक्षा इंग्लैंड की ताज की सरकार के शासन को अच्छा बताया था. लेकिन जब यह पता चला कि वे अंग्रेज़ी रहन-सहन को छोड़कर योगाभ्यास करने लगे हैं तो हमें उनके प्रति श्रद्धा होने लगी.

कॉलेज की छत पर अकेले घूमते हुए मैं देश को स्वतंत्र करने की बचपन-भरी योजनाएं बनाया करता था. इस विषय में आचार्य की सहानुभूति नहीं थी. वे मज़ाक उड़ाते थे, इसलिए मैं उनसे अधिक बातें नहीं करता था.

राष्ट्र प्रेम की प्रचंड लहर देश-भर में फैल गयी. मैं भी उसमें बह गया.

राष्ट्रीय भावना से रंगने पर भी मैंने अपनी पढ़ाई में पूरा-पूरा ध्यान दिया. 1903 में मैंने जैसे वक्तृत्व-कला के विकास का प्रयत्न किया था, वैसे ही अंग्रेज़ी लिखने का व्यायाम भी शुरू किया था. 1904-05 और 06 में मैंने Belles Letters के शैली, सौंदर्य,  सरसता और वाग्वैदग्ध्य सम्बंधी विवेचन का स्वाध्याय शुरू किया. इस पुस्तक में दिये हुए नियमों के अनुसार मैंने निबंध लिखे. एक निबंध लिखता और उसके बाद यह देखता कि शब्द और वाक्य नियमानुसार हैं या नहीं. एक बार तो ‘मिल’ की  ‘Liberty’ आधे से अधिक लिख डाली. बिना किसी के पथ-प्रदर्शन के स्वयं अध्ययन करने से मैं बहुधा गलत रास्ते पर चला गया और अपने शब्दों के लोभ को संवरण न कर सका. मुझे कार्लाइल, डिकिंस और मेकॉले के शब्द सौंदर्य को अपनी रचनाओं में लाने की बुरी आदत पड़ गयी. मैं प्रतिपाद्य विषय की अपेक्षा शब्दाडम्बर पर अधिक ध्यान देने लगा और भाषा-शुद्धि की जो क्रिया मन में करनी चाहिए उसे मैं कागज़ पर काट-छांट करके
करने लगा.

इस प्रकार मुनशियों की रंगीन शब्द-चित्रों में प्रबल उमंगों को व्यक्त करने की प्रवृत्ति तथा मां की लिख-लिखकर हृदय को शांत करने की प्रवृत्ति दोनों धाराओं को अपनाकर सुंदर और प्रभावशाली रचनाएं प्रस्तुत करने के मेरे बाल-प्रयत्न आरम्भ हुए. इतने वर्षों से अभ्यास करते रहने पर भी ये प्रयत्न सफल नहीं हुए, यह मैं जानता हूं, परंतु इस साधना में मुझे जो आनंद मिला है, वही इन प्रयत्नों की सफलता है.

1904 में मैंने इन्टरमिडियेट सेकेंड डिवीजन में पास किया. दिसम्बर के अंत में बम्बई कांग्रेस के अवसर पर हम सब मित्र मिले. पी. के. अंकलेसरिया, पंड्या, आचार्य, दाराशा और मैं. यह देखकर हम बहुत प्रसन्न हुए कि कांग्रेस में नये राष्ट्रीय दल का जन्म हो रहा है.

टीले पर जहां नौकर और गवैये घूमते थे, जहां गांव के लोग मिलने आते थे, जहां मुखियागीरी होती थी और मौजें उड़ती थीं वह मुनशियों की हवेली अब सुनसान पड़ी थी.

उसके बड़े अगले भाग में बैठी मां नितांत एकाकी जीवन के खंडहरों में नयी नींव रख रही थी.

वह सबेरे उठकर बिस्तर उठाती और नीचे आकर पानी गरम करती. काम करते-करते पुराने गीत गाती जाती-

‘जागो यादव कृष्ण कन्हैया

तुम बिना गौएं कौन चरावे।’

इस परिचित पंक्ति से वह कॉलेज में पढ़नेवाले अपने लाडले का रोज़ स्मरण करती. कभी-कभी वह ध्रुवाख्यान और नलाख्यान की कड़ियां भी दुहराती. पति के परलोकवास के बाद उसने नहाते-नहाते ‘रामस्तवराज-स्तोत्र’ बोलना छोड़ दिया था. उसका स्थान अब चंद्रशेखराष्टक ने ले लिया था.

वह दोपहर बाद उस जगह बैठती जहां कि माणिकलाल मुनशी ने शरीर छोड़ा था. जहां पति अंतिम बार बैठे थे, जहां वह उनके लिए अंतिम बार खाना लायी थी वहां उसकी श्रद्धामयी आंखें पड़तीं और आंखों से गंगा-जमुना की धाराएं बह निकलतीं.

इसके बाद वह पिटारी खोलती. इस पिटारी में हिसाब की कापियां, कागज़, पेंसिल, चाकू, पढ़ने की पुस्तकें और दूसरी चीज़ें रहतीं. वह रोज़ का हिसाब लिखती, पुराने हिसाब और कागज़ात देखती, फिर पंचदशी तथा योगवशिष्ठ पढ़ती और संक्षिप्त नोट लेती. कभी पुत्र या पुत्री के लिए उपदेशात्मक वाक्य लिखती तो कभी भार्गव जाति का इतिहास लिखने का भी प्रयत्न करती. तरंग आने पर कविता लिखने का भी प्रयास करती.

उसे अपनी कविता लिखने की असामर्थ्य का ज्ञान था-

मुझमें शक्ति नहीं है किंचित नहीं लेश भी ज्ञान।

राग, रागिनी, छंद अलंकारों से हूं अनजान।।

केवल व्यक्त किया करती हूं, उर में उठी तरंग।

कवि रससिद्ध नहीं जो  जानूं भले-बुरे का ढंग।।

प्रियजन-विरह-व्यथित अंतर को इसमें देती ढाल।

बन जाता वह सत्य, शांति औ’ प्रेमपूर्ण तत्काल।।

अकेलापन उसे अखरता था, परंतु अपने ‘बालमुकुंद’ का स्मरण कर वह अपने मन को आश्वासन देती थी. उसकी सजल आंखों के आगे उसका ‘कानजी’ आता. वह उसके बचपन, उसकी बातें, उसके रूप आदि का ध्यान किया करती. वह पढ़-लिख जाएगा, कब बड़ा होगा और क्या करेगा, इन्हीं विचारों में वह लीन रहती.

पति को उसने प्रभु माना था. उसके बिना उसे संसार निर्जन लगता था. दाम्पत्य-जीवन की स्मृतियां उसके हृदय में सजीव हो उठतीं, पर वह उन्हें पवित्र समझकर हृदय-मंदिर में ही संग्रहीत करके रखती. शायद ही कभी वह उनका उल्लेख करती; उल्लेख भी करती तो तब जब वह खूब व्याकुल होती.

मां के इस प्रौढ़ हृदय-मंदिर में प्रवेश करने का- उसके दर्शन करने का- अवसर मुझे 1936 में मां के मरने के बाद मिला. इस मंदिर में मुझे जो दर्शन हुए उनके सम्बंध में प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी कहने का मुझे क्या अधिकार है? जिसे उसने अपने लिए संग्रह किया और सम्भाल कर रखा उसे दूसरों का बनाना क्या मेरा धर्म है?

मैंने बहुत बार इसका विचार किया है. अपने और दूसरों के अंतर की ‘गुह्यात गुह्यतरं’ पूंजी को जगत के सामने क्यों रखा जाय? क्या इसे जगत के आगे रखने में लेखक की धृष्टता और दुर्बलता नहीं है? सोफोक्लिस और शैली, रूसो, गेटे और गांधीजी इन सभी जीवन-चरित्र लेखकों ने इस ‘गुह्यात् गुह्यतरं’ को क्यों जगत को सौंप दिया है?

समस्त मानवता और महत्ता न तो उसमें होती है, जो कुछ मनुष्य करता है और न उसमें होती है, जो कुछ वह साधना से प्राप्त करता है. वह होती है हृदय-मंथन में- सरसता, अनुकूलता या प्रतिकूलता में. शब्द-ब्रह्म का कोई उपासक किसी भी व्यक्ति के शब्दचित्र को अंकित करते समय यदि उस व्यक्ति की जीवन-सम्बंधी घटनाओं पर परदा डालता है, उन्हें घटाता-बढ़ाता है या उन्हें बिगाड़ता है तो वह अपने कर्तव्य से च्युत होता है. यही कारण है कि संसार जब अपनी स्थिति को भूलकर दूसरे व्यक्तियों के गुण-दोषों के रजकणों की तुलना करने बैठता है तब वह अपनी घोर क्षुद्रता के प्रदर्शन के अतिरिक्त और कोई महत्त्व का कार्य नहीं करता.

यदि तापी बा मुंशी का व्यक्तित्व शब्दों द्वारा अंकित करना हो तो उसके हृदय के रहस्य और अंतर के मंथन के बिना वह निर्जीव खोलमात्र रह जायेगा.

1904 में यरवदा में जब ‘अंतिम दफ्तर’ को देखा तब दो-चार कागज़ मैंने पहली बार ही देखे. उनमें मुझे गत युग के दाम्पत्य-जीवन के कुछ आकर्षक रंगों के दर्शन हुए.

पहले कागज़ में ‘स्वप्न’ शीर्षक से पिताजी की लिखी एक कविता है. यह 1993 में देखे हुए अपने स्वप्न की पद्यकथा है. उस समय पुत्री के वैधव्य की वेदना शुरू हुई थी.

राजकुमारी यात्रा को जाती है; वहां उसको विचार आता है-

‘स्वामी सेवा करूं या कि मैं तेजमयी साध्वी बन जाऊं?’

वार रात को राजकुमार तड़पता हुआ जागता है-

अरे बता दो कहां गयी है मेरी प्यारी सजनी?

बीत गयी है स्वप्न देखते कितनी मादक रजनी!’

राजकुमार राजकुमारी की खोज में निकलता है. नगरों और बनों में भटकता है. उसे पता चलता है कि दक्षिण में एक युवती संसार त्याग कर साध्वी (तपस्विनी) बन गयी है और ‘भव-दुख-निवारणार्थ’ तपस्या कर रही है. राजकुमार विह्वल होकर ‘राजकुमारी! मुझे छोड़कर चली गयी तू’ गाता हुआ भटकता है.

अंत में तपस्विनी उसे मिलती है. वह राजकुमार को अपने साथ स्वर्ग चलने का निमंत्रण देती हैं-

‘राजन्! शीघ्र उठो, चलो, कहे कामिनी आज।

है अदृश्य होता तभी कंत सजाकर साज।।’

कविता का अंतिम बंद है-

‘चौंक उठा वह उस समय, और हो गया प्रात।

शिव, शिव, शिव यह क्यों हुई घोर प्रलय की बात।।

भयकारी सपना हुआ, पूनम आश्विन मास।

संवत् उन्नीस सौ तथा ऊपर से उनचास।।’

पचास वर्ष से सम्भाल कर रखा हुआ और पीला पड़ा हुआ यह पीला कागज़ मानव-हृदय की पवित्रता की सुगंध से ऐसा महक रहा है जैसे वह देवमूर्ति के कंठ में पड़ी हुई माला का सैकड़ों भक्तों द्वारा श्रद्धा से पूजा हुआ सूखा पत्ता हो.

‘अंतिम दफ्तर’ में एक दूसरी अधूरी और असंशोधित कविता क्षण-भर के लिए संयम के आवरण को हटाती है और विरह-व्यथा के दर्शन कराती है-

‘मैं तो देखूं मृत्यु की बाट रे,

प्रियतम कहां गया?

तू मिलेगा मुझे किस घाट रे,

प्रियतम कहां गया?

‘मुझे बुलावा भेज दो, अब विलम्ब किस हेत?

बिना जीव की देह यह, भटक रही ज्यों प्रेत।

मैं तो देखूं मृत्यु की बाट रे,

प्रियतम कहां गया?

बिछुड़ गया है संग मम, रह गया कच्चा साथ।

पागल-सी घर में फिरूं, मूक बनी हे नाथ।।

मैं तो देखूं मृत्यु की बाट रे,

प्रियतम कहां गया?’

उमंगों के वश होकर वह अतीत के स्मरण की अपेक्षा वर्तमान और भविष्य का एकाग्र चित्त से ध्यान करने लगी.

दोपहर के बाद कोई-कोई मिलने अवश्य आता था. कोई मदद लेने आता था तो कोई सलाह लेने. किसी को सास दुख देती थी, इसलिए वह अपना दुख रोने आती थी; किसी का लड़का बीमार होता था तो वह यह पूछने आती थी कि क्या किया जाय; किसी को सांसारिक व्यवहार में कुछ कठिनाई पड़ती थी तो वह रास्ता पूछने आता था; किसी से दुःख नहीं सहा जाता था वह पलभर सांत्वना पाने आता था. तापी बा ऐसे सब लोगों को आदर देती और उनके दुःख को सुनती. ध्यानपूर्वक सब बातें सुनकर गुत्थी सुलझा देती और प्रत्येक हृदय में गहराई तक पहुंच जाती.

बूआ- भयंकर रुखीबा- हवेली के पिछले हिस्से में, अपने कमरे में बैठी-बैठी, अपने कटुवचनों द्वारा कहे हुए भविष्य को सच होते देखती थीं. करसनदास मुनशी के सभी बच्चों में अकेला यही जीवित रह गया था. उन्होंने टीले का अंत होते देखा था फिर भी उनका द्वेष कम न हुआ था.

अब घर-भर में केवल दो ही प्राणी बचे थे. वह स्वयं और ‘चिमन मुनशी की लड़की’. दोनों असहाय और अकेली थीं. इतना होने पर भी रुखीबा अब तक बातचीत नहीं करती थीं. आते-जाते कुछ-न-कुछ अपमान-जनक बात कहे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता था. पांच बजते ही रुखीबा चबूतरे पर आ बैठतीं और तापीबा से मिलनेवालों को या तो भड़का देतीं या और कुछ न होता तो उनके मन का भेद लेकर उनके हृदय में तापीबा के विरुद्ध विष का बीज बो देती. तापी क्या करती है, क्या खाती है, क्या बातें करती है आदि की रूखीबा को सदैव चिंता रहती थी.

सप्ताह में एक दिन तापीबा के प्राणों पर आ बनती. लोकरीति के अनुसार हृदय पर पत्थर रखकर उसे सिर झुकाकर नाई के सामने बैठना पड़ता. उस दिन प्रतिक्षण उसका मन मरने को होता. उस दिन उसका हृदय रोता और दुखी होता. पति क्रूर हो गये थे, ईश्वर भी क्रूर था और समाज ने तो जैसे क्रूरता की हद कर दी थी. ऐसे ही किसी अवसर पर उसने आंखों से आंसू बहाते हुए ये उद्गार व्यक्त किये थे-

मैं संसार बीच मतवाली लेती तेरा नाम।

देना मुझे सहारा स्वामी बिगड़ न जाये काम।।

करना दया दीन के ऊपर अंत समय की बेला।

रमे चित्त चरणों में तेरे जीव न रहे अकेला।

यों दिन, सप्ताह और महीना बीतते और ‘भाई’ के कॉलेज से लौट आने के दिन पास आ जाते; आकाश नये रंग से रंगा हुआ दिखाई देता. ‘भाई’ का पेट था खराब, इसलिए उसे अच्छी लगनेवाली मिठाइयां बनाने की तैयारी होती, घर लीपा जाता और बैठक के बड़े शीशे पर चढ़ा हुआ गिलाफ उतरता और कई दिन तक भाई के आने की गूंज सुनाई देती.

वह आता और उसकी आंखें ठंडी होतीं. वह जैसे ही आता वैसे ही प्रेमावेश में दौड़ता हुआ घर में जाता- मानो अपने ‘पिताजी’ की छोटी तस्वीर हो. ‘भाई’ कभी किसी मित्र को भी साथ ले आता. जब मां-बेटे मिल-भेंट लेते तब कहीं मां में उत्साह और शक्ति आती. मां की भुलाई हुई भोजन बनाने की कला फिर खिल उठती. मां-बेटे आमने-सामने बैठते और बातें करते जाते- पढ़ने की, मित्रों की, प्रोफेसरों की, खेल-कूद की.

बेटा इंग्लैंड और फ्रांस का इतिहास बताता और नयी राष्ट्रीयता के दर्शन कराता. कांग्रेस, सुरेंद्रनाथ, अरविंद घोष और विपिन चंद्रपाल की बातें कहता. दूसरी भी अनेक प्रकार की अजीब-अजीब बातें उड़ाता- ईश्वर, आत्मा पुनर्जन्म, वर्णाश्रम, पुनर्विवाह आदि के विषय में. तापीबा इन सभी बातों को ध्यान से सुनती, नये सुझाव रखती और पुत्र के उत्साह से उत्साहित होती.

‘भाई’ उसके मन के लिए अद्भुत वस्तु था. उसे देखकर वह स्वयं को यशोदा माता समझ सकती थी. एक दिन सबेरे उसने अपने हृदय की इन भावनाओं को एक कविता में लिख डाला-

माता यशोदा कृष्ण जगावे, जागो नंददुलारे रे।

गृहआंगन में सूरज ऊग्यो, तिमिर गयो मेरे प्यारे रे।।

‘भाई’ दिन-भर गाने गाता रहता और आनंद में डूबा रहता. वह कभी तीसरी मंजिल पर बैठकर पढ़ता या भाषण देता रहता. शाम को मित्रों के साथ घूमने जाता. रात होते ही तापीबा अधीर हो उठती. खाना बनाने के बाद वह सड़क की ओर की जाली में बैठ जाती और उसके आने की बाट देखती हुई उसकी पगध्वनि सुनती रहती.

आठ बजे तक यदि ‘भाई’ न आता तो तापीबा की घबराहट का ठिकाना न रहता. क्यों नहीं आया? क्या हुआ? ये प्रश्न उसके मन में उथल-पुथल मचा देते.

एक दिन ‘भाई’ देर से आया. लगभग नौ बज गये और तापीबा का हृदय बैठ गया. ‘लड़का कभी देर नहीं करता था तो आज देर कैसे हो गयी?’ जाली में बैठे-बैठे उसे ऐसी बेचैनी होने लगी जैसे उसके प्राण निकल रहे हों. आंखों से अश्रुधारा बहने लगी. अंत में- अंत में ‘भाई’ के आने की आहट सुनाई दी और उसकी जान-में-जान आयी. उसने आंसू पोंछ डाले.

‘भाई, आ गया न?’

इन शब्दों में व्याप्त वेदना को ‘भाई’ ने पहचाना.

‘मां, जरा देर हो गयी. वाद-विवाद करने में समय का ध्यान न रहा.’ ‘भाई’ ने कहा.

‘चल, भाई, खाना ठंडा हुआ जाता है. खा ले.’ तापीबा ने कहा.

प्रेम के ये बोल मुझे तमाचे से भी गगज्यादा चोट करने वाले लगे.

बेटे ने मां की अधीरता का अनुभव किया और उसके बाद कभी आठ बजे के बाद न आने का व्रत लिया.

पैंतीस वर्ष हो गये. इस बीच ‘भाई’ अनेकों की सहायता करने में समर्थ हो गया, परंतु उसके आठ बजे घर न आने पर मां पूछ ही उठती है, ‘भाई, क्यों नहीं आया?’ बेटा भी आठ के बाद घर पहुंचता तो उसे भी प्राण निकलने के बराबर दुख होता.

तापीबा का सबसे बड़ा प्रयत्न यह था कि ‘भाई’ को उसी प्रकार रखा जाय जैसे कि उसके पिता रखते थे. उसे साग लेने न जाना पड़े, उसे कपड़े खरीदने न जाना पड़े, उसकी प्रतिष्ठा को कोई धक्का न लगे, गरीबी के कारण होनेवाली कठिनाइयां उसे झेलनी न पड़ें. तापीबा बेटे की सब तरह देख-भाल करती. सब काम स्वयं ही कर लेती. बेटे को तनिक भी मेहनत करने का मौका न देती. उसे सदैव यह चिंता रहती थी कि ‘भाई’ के पढ़ने में किसी प्रकार की रुकावट न हो.

‘भाई’ हमेशा बग्घी में आता-जाता. कहीं किराये की बग्घी में बैठने से वह अपने को छोटा न समझ ले इस भय से तापीबा ने हमीर से पहले ही सब-कुछ तय कर लिया था. जब ‘भाई’ आता तो हमीर उसे स्टेशन से अपनी गाड़ी में ले आता और ‘भाई’ को जाना होता तो भी हमीर की बग्घी हाज़िर रहती. वह आता और ‘भाई’ को रेलगाड़ी तक अच्छी तरह पहुंचा आता.

थोड़े ही पैसों में ‘भाई’ को बग्घी, और बग्घीवाले की सुविधा और प्रतिष्ठा मिल गयी. ‘भाई’ गांव में पच्चीस वर्ष तक हमीर के मालिक रूप में विख्यात रहा.

पुत्र के आचार-विचार देखकर भी तापीबा हर्षित होती; उसकी संस्कारिता बढ़ी ही, घटी नहीं. वह पहले से भी अधिक मां का मान रखने लगा. बचपन के प्रिय शब्द ‘मां’ को छोड़कर धेवते-धेवते तापीबा के लिए सम्मानसूचक शब्द ‘जीजी मां’ प्रयोग करने लगे थे. बेटा भी उसी शब्द का प्रयोग करने लगा.

बहुत बार बड़ी बहन-बेटी-को प्रसव अथवा अन्य कोई कार्य होता तो वह बच्चों को लेकर तापीबा के पास भड़ौंच आती. बड़ी बहन स्वभाव से स्नेही और सुकुमार थी. उसके प्रेम की सीमा न थी. भाई और बहन का स्नेह देखकर तापीबा अपना दुःख भूल जाती. सारे दिन बातें होतीं. बच्चे हंसते, बोलते और खेलते. रात को सब बैठक में इकट्ठे ही सोते और ‘भाई’ कहानियां सुनाकर सबका मनोरंजन करता.

(क्रमशः)

सितम्बर   2013 

 

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