रसों का रोमांस

वे नौ थे. सबके सब रसीले. खट्टे, मीठे, चटपटे. जी हां, वे नवरस थे. सबके गुण अलग. स्वभाव अलग. चरित्र अलग. लेकिन पक्के दोस्त. जब भी मूड में आते और साथ मिल जाते, तो साहित्य का स्तर ऊपर उठा देते.…

इन दिनों

इन दिनों बेहद ज़रूरी है बचाये रखना कुछ शब्दों को बड़े जतन से जैसे बचायी जाती है खड़ी फसल जंगली जानवरों से हांका लगाकर.   जैसे बचाये जाते हैं दाल और मसाले सीलन और घुन से चटख धूप की चादर…

जीवन रसमय बना रहे

भरत मुनि के रस-सिद्धांत अथवा मम्मट द्वारा की गयी रसों की व्यवस्था-व्याख्या को हम जीवन के लिए बोझिल मानकर भले ही नकार दें, पर रस को जीवन से निष्कासित करके जीवन को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता. रस और…

कर्मनाशा की हार

शिवप्रसाद सिंह काले सांप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल ज़हर पीने वाले की मौत रुक सकती है, किंतु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता. कर्मनाशा के बारे में…

जीवन और साहित्य में रस का स्थान

आनंद प्रकाश दीक्षित बाह्य दृश्य जगत और मनुष्य के अदृश्य अंतर्जगत में शेष सृष्टि के साथ उसके सम्बंध-असम्बंध या विरोध को लेकर किये जानेवाले कर्म-व्यापार तथा होनेवाली या की जानेवाली क्रिया-प्रतिक्रिया की समष्टि चेतना का नाम है जीवन. इस द्वंद्वमय…

महाकुम्भ में छलका अमृत!

यश मालवीय  महाकुम्भ की बेला है. गंगा यमुना के संगम में लुप्त सरस्वती उजागर हो रही है. अमृत कुम्भ छलक-छलक जाता है. प्रयाग भीग रहा है आध्यात्मिक हवाओं में. आंखों में पृष्ठ दर पृष्ठ खुलते चले जा रहे हैं. पचास…