यज्ञ शर्मा >
व्यंग्य की तीन प्रमुख किस्में हैं – राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक. राजनैतिक व्यंग्य राजनीति की विसंगतियों के खिलाफ़ लिखा जाता है. सामाजिक, समाज के अन्याय के खिलाफ़ और धार्मिक, धर्म के ढकोसले के विरोध में. व्यंग्य की एक किस्म और है – साहित्यिक. साहित्यिक व्यंग्य साहित्य में साहित्य का विरोध करता है- साहित्यिक अन्याय के खिलाफ़ ! जी हां, साहित्य ने भी बड़े अन्याय किये हैं. वे भी अपने सगों पर, खासकर शुरुआती दौर से 19वीं सदी तक.
साहित्य के अन्याय की बात सुन कर आप चौंक गये होंगे. बस थोड़ा-सा विचार करेंगे तो समझ जाएंगे कि साहित्य ने क्या अन्याय किया है, लगातार किया है, हमेशा किया है. आप जानते ही हैं, साहित्य में अभिव्यक्ति के तीन प्रकार होते हैं- अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना. क्या साहित्य ने इन सभी को समान महत्त्व दिया है ? क्या आपने देखा नहीं है कि साहित्य में हमेशा से अभिधा और लक्षणा को अधिक महत्त्व दिया गया है. व्यंजना की तो लगभग उपेक्षा ही की गयी है. अगर, कभी व्यंजना का उपयोग किया भी गया, तो दाल में नमक की तरह. जी नहीं, दाल में नमक की तरह भी नहीं ! परांठे में नमक की तरह, जो बस इतना डाला जाता है, जिसका पता भी नहीं चलता. बिल्कुल हिंदुस्तानी हिसाब है- संविधान में अधिकार दिया है, पर ज़िंदगी में नहीं मिलता. आखिर साहित्य में हमेशा व्यंजना को उतना महत्त्व क्यों नहीं मिला, जितना अभिधा या लक्षणा को मिला?
अब, व्यंजना का पुत्र व्यंग्य जागृत हो गया है. वह साहित्य के इस अन्याय के खिलाफ़ खड़ा हो गया. उसने बीड़ा उठा लिया है कि साहित्यिक अभिव्यक्ति में वह अपनी माता व्यंजना को उसका उचित स्थान दिलवा कर रहेगा. अगर, आप व्यंग्य पढ़ते हैं, तो जानते होंगे कि व्यंग्य कभी कोई गलत हथकंडे नहीं अपनाता. साहित्य के अन्याय के विरोध में भी उसने शुद्ध साहित्यिक तरीका ही अपनाया है. व्यंग्य अभिधा और लक्षणा की चापलूसी की बखिया उधेड़ता है. तमाम धीरोद्दात्त बताये जाने वाले नायकों को टंगड़ी मार कर गिराता है. शायद इसीलिए, अभिधा-लक्षणा साहित्यकार, येनकेन प्रकारेण व्यंग्य को नकारने की कोशिश करते है. व्यंग्य ऐसा कुछ नहीं करता. व्यंग्य किसी अभिव्यक्ति का कोई विरोध नहीं करता. व्यंग्य का बस एक ही साहित्यिक उद्देश्य है- सर्व अभिव्यक्ति समभाव.
व्यंग्य स्वभाव से डेमोक्रेटिक है. क्योंकि वह अपने साहित्य में बहुसंख्य लोगों को केंद्र में रखता है. अन्य साहित्य तो किसी एक नायक को केंद्र बनाकर रचनाकर्म करते हैं. समाज में एक ही नायक का होना अधिनायकवाद की उत्पत्ति करता है. ज़ाहिर है, समाज के पास एक ही नायक होगा तो समाज पर उसका वर्चस्व रहेगा. इसीलिए व्यंग्य नायकों को नकारता है. आप इतिहास उठाकर देख लीजिए, कभी भी किसी भी युग में नायक समाज में मेजोरिटी में नहीं रहे. व्यंग्य उस मेजोरिटी को केंद्र में रखता है, जो नायक नहीं है. मेजोरिटी का ध्यान रखना ही तो डेमोक्रेसी है. अभिधा-लक्षणा का साहित्य उन नायकों को महत्त्व देता है जो हमेशा माइनॉरिटी में रहे. नायकवाद साहित्य का वोट बैंक है. व्यंग्य साहित्य में किसी भी तरह के वोट बैंक के खिलाफ़ है.
व्यंग्य साहित्य में समरसता का हामी है. उसका साहित्यिक स्वभाव बड़ा मिलनसार है. उसे निबंध पसंद हैं. कविताएं अच्छी लगती हैं. कहानियों से परहेज़ नहीं करता. वह जो भी लिखता है, ईमानदारी से लिखता है. जी हां, आप व्यंग्य के कुछ बेईमानी से भरे उदाहरण पेश कर सकते हैं. लेकिन, आप ज़रा उन्हीं व्यंग्यों दोबारा पढ़ कर देखिए. आप पाएंगे कि कोई भी व्यंग्य रचना मूलतः बेईमान नहीं होती. उसका रचनाकार बेईमान हो सकता है. आजकल व्यंग्यकार भी बिकने लगे हैं. वे एक व्यक्ति की चापलूसी करने के लिए, उसके विरोधी के खिलाफ़ व्यंग्य लिखते हैं. वैसे, वह व्यंग्य भी अक्सर झूठा नहीं होता. लेकिन, उसके लेखक के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. यह एक हकीकत है, लेकिन यह व्यंग्य की हकीकत नहीं है, ज़िंदगी की हकीकत है. लेखक के मन में, जेब में, बगल में कुछ भी रखे, व्यंग्य हमेशा मुंह में छुरी और बगल में राम रखता है.
व्यंग्य के बारे में अक्सर कहा जाता है कि व्यंग्य हल्की-फुल्की चीज़ होता है. बिलकुल होता है. भारी-भरकम बेईमानों की आलोचना हल्की-फुल्की चीज़ से ही बेहतर होती है. तभी तो वे उसे पढ़कर तिलमिलाते हैं. हल्की चीज़ ही भारी महानुभावों को समझा सकती है कि उनकी औकात क्या है. अभिधा और लक्षणा के समर्थक यह भी कहते हैं कि व्यंग्य नकारात्मक लेखन है. यह बात गलत नहीं है. आप ही बताइए, नकारात्मक चरित्रों के बारे में सकारात्मक कैसे लिखा जा सकता है? अभिधा और लक्षणा लिखना चाहें तो लिखें. व्यंजना की शुभकामनाएं.
व्यंग्य आलोचना है, विरोध है, अविश्वास है. व्यंग्य किसी में आस्था नहीं रखता. क्योंकि आस्था आंख बंद करके की जाती है. आस्था को आंखें खोलने में उसे डर लगता है- कहीं अपने आराध्य के दाग न दिख जाएं. और, व्यंग्य सिर्फ दाग देखता है. इसीलिए, व्यंग्य सार्थक है. जब सारा आस्थावान संसार चापलूसी में जुटा हो, तो दाग देखने वाला भी तो कोई होना चाहिए. वरना सफाई कैसे होगी? व्यंग्य है, इसीलिए जब कोई व्यक्ति चोटी से गिरता है, तो लोगों को आश्चर्य नहीं होता. आश्चर्य होता भी है, तो यह सोचकर होता है कि इसे गिरने में इतनी देर क्यों लगी? देर इसलिए लगती है कि अभिधा और लक्षणा अक्सर गिरने वाले का साथ देती हैं.
व्यंग्य का भविष्य निश्चित हो चुका है. अब व्यंग्य हमेशा रहेगा. क्योंकि स्वार्थ हमेशा रहेगा. वैसे, कुछ व्यंग्यकारों को यह भ्रम है कि व्यंग्य सर्वशक्तिमान है. जी नहीं, स्वार्थ में व्यंग्य से गगज्यादा शक्ति है. व्यंग्य ही क्या, दुनिया की कोई भी शक्ति कितना भी ज़ोर लगा ले, दुनिया से स्वार्थ को मिटाया नहीं जा सकता. वैसे, व्यंग्य स्वार्थ से कभी हारेगा नहीं. व्यंग्यकार हार जाए तो बात अलग है. और, निकट भविष्य में ऐसा होने की साफ़ सम्भावना भी दिखती है. वैसे, व्यंग्यकारों के हारने का कारण व्यंग्य ही होगा. क्योंकि, व्यंग्य दिन पर दिन लोकप्रिय होता जा रहा है. व्यंग्यकारों की जमात बड़ी होती जा रही है. भीड़ बढ़ रही है. भीड़ के साथ भीड़ के गुण भी बढ़ते हैं. व्यंग्यकारों में भीड़ से अलग दिखने की होड़ शुरू हो रही है. जैसे किस्से अभिधा-लक्षणा साहित्य के क्षेत्र में सुने जाते हैं, जल्दी ही वैसे किस्से व्यंग्य के क्षेत्र में भी सुनाई देने लगेंगे. उठापटक होगी. खींचतान होगी. तू-तू, मैं-मैं होगी. गुटबाजी होगी. जल्दी महान बनने के लिए चापलूसी शुरू होगी. तू मुझे महान बोल, मैं तुझे बोलूंगा. ऐसे सभी हथकंडे अपनाये जाएंगे. जिन हरकतों के खिलाफ़ व्यंग्य लिखा जाता है, व्यंग्यकार वही हरकतें करेंगे. खुद व्यंग्यकारों का व्यवहार व्यंग्यास्पद बन जाएगा. एक तरह से वह व्यंग्य की चरम स्थिति होगी. क्योंकि तब व्यंग्य सही मायने में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में शामिल हो जाएगा.
यह सब पढ़कर अभिधा और लक्षणा मुंह छिपाकर हंस रही होंगी. जी हां, मुंह छिपाकर. क्योंकि मुंह खोलकर हंसना उन्हें नहीं आता. व्यंग्य को कोई श्रेष्ठ साहित्य माने या न माने, लेकिन प्राचीन काल से लेकर आज तक, साहित्य के जो भी उद्धरण हमें याद आते हैं, उनमें व्यंजना ही गगज्यादा होती है! सच है या नहीं?
(मार्च 2014)
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रंग चाहे तितली के हों या फूलों के, जीवन में विश्वास के रंग को ही गाढ़ा करते हैं. पर कितना फीका हो गया है हमारे विश्वास का रंग? पता नहीं कहां से घुल गया है यह मौसम हवा में कि दूसरों की बात तो छोड़ो अपने आप पर भी विश्वास करने में डर-सा लगने लगा है. बचपन के जाने के बाद क्यों कहीं चला जाता है वह भोला विश्वास जो किसी को भी अपना बना कर सुखी हो लेता है? बड़े होने के बाद तो जैसे उल्टी होड़ लगती है- अपनों को गैर बनाने की होड़. इस प्रक्रिया की पहली सीढ़ी है अपने को सबकुछ समझना, दूसरे को, कुछ भी नहीं. दूसरे को नकारने की यह समझ पता नहीं कहां से विकसित होती है, बचपन के जाने के बाद? उससे भी अहं सवाल है, क्यों होती है ऐसी समझ विकसित? क्यों हम अपने अपने टापुओं में बंदी हो जाना पसंद करने लगते हैं बड़े हो जाने के बाद? ये सवाल कई-कई बार, कई कई तरीकों से सामने आते हैं ज़िंदगी में.
कुलपति उवाच
नैसर्गिक क्रिया
के. एम. मुनशी
शब्द-यात्रा
जावा ने बनाया सम्भव
आनंद गहलोत
पहली सीढ़ी
नये साल पर
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
आवरण-कथा
धारावाहिक आत्मकथा
सीधी चढ़ान (बारहवीं किस्त)
कनैयालाल माणिकलाल मुनशी
श्रद्धांजलि
अंतिम प्रणाम
नारायण दत्त
बड़ों का बचपन
पिता ने अहिंसा का साक्षात पाठ पढ़ाया
महात्मा गांधी
ज़िद मैंने पिता से सीखी थी
नेल्सन मंडेला
फर्श पर बनाया था पिताजी का चित्र
आर. के. लक्ष्मण
पिता चाहते थे मैं कलेक्टर बनूं
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
नहीं मां, मैं अभी नहीं सोऊंगा
लियो टॉल्स्टॉय
मां हमें खास होने का अहसास कराती
चार्ली चैप्लिन
ऐसे पढ़ाई की थी मैंने
हेलन केलर
मानवता जन्मजात गुण नहीं है
चार्ल्स डार्विन
मुकाबला ईश्वर से था…
अमृता प्रीतम
फ़र्क अंग्रेज़ी और देसी का
कृष्णा सोबती
बचपन गाथा
गुल्ली-डंडा
प्रेमचंद
छोटा जादूगर
जयशंकर प्रसाद
आदमी का बच्चा
यशपाल
गुलेलबाज़ लड़का
भीष्म साहनी
बहादुर
अमरकांत
बिल्ली के बच्चे
शैलेश मटियानी
खूंटा बदल गया
सच्चिदानंद चतुर्वेदी
अलविदा अन्ना
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ऑड मैन आउट उर्फ़ बिरादरी बाहर
सुधा अरोड़ा
कविताएं
आठ साल का वह
इब्बार रब्बी
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सूर्यभानु गुप्त
कविताएं
नरेश सक्सेना
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