वसंत को ये क्या क्या होने लगा? – विजय किशोर मानव

आवरण-कथा

मन गाने को है, उम्र का कोई फर्क नहीं, सबके भीतर कुछ बज-सा उठता है. हवा में राग-रंग जैसे घुल से गये हों. आधुनिक शब्द-बिम्बों से लबरेज गीतों से कहीं अधिक, मस्ती में डुबोते हैं लोकगीत. लोकगीतों में मादक रंगों का उल्लास, सौंदर्य, शृंगार समाया हुआ है. सब कहीं वसंत पंचमी से ही फाग गमकने लगते हैं. भाषाएं प्रेम को खुद पर लाद लेती हैं और रात-रात भर स्वरों में ठुमकती हैं. असल में लोक ही है जो भाषा को और परम्पराओं को जीते रहने के लिए हर मूल्य पर आमादा रहता है. बदलाव के दौर में अनेक बार इसे रूढ़ि कहा जाता है. लेकिन, यह भी सच है कि वही रूढ़ि या ज़िद कह लें, या फिर संस्कार है जो धरती के किसी भी कोने में आपको अपनी जड़ों से जोड़े रखता है.

तमाम रात गमकते हैं फाग यादों के.

नब्ज थम जाती है सितारों की,

बजती खामोशियों के घेरों में

गर्म सांसों में ज्वार उठते हैं,

होंठ हैं कांपते अंधेरों में

चूड़ियां खनखना के कहती हैं

देखो हंसते हैं ख्वाब यादों के.

यह सुनकर ही लगता है कि ये दिन वसंत के हैं, समय के पांव, फागुन की दहलीज पर हैं. दशकों से वसंत ऐसे ही आता है. उत्तरायण होकर सूर्य, सर्दी से ठिठुरे जीवन को फिर से चेतना से जोड़ते हैं. मकर संक्रांति से वसंत पंचमी तक आते-आते, सूर्य का ताप भाने लगता है. बर्फ पिघलने लगती है. पतझर सारी प्रकृति से विदा लेता है और पल्लव से लेकर बौर तक सब, जीवन को और उम्मीदों को, ओढ़ने लगते हैं, जीव-जंतु, वनस्पतियां और सारे स्त्राr-पुरुष. किसी ठूंठ के गर्भ में बची ज़रा सी सरसता भी, हरियाली के रूप में छलक पड़ती है. कैसी कारीगरी हो जाती है. तन से मन तक रेशा-रेशा गमकने लगता है. क्षितिजों पर से जैसे जीवन उगने लगता है. यह उत्साह की और सृष्टि के प्रेम की ऋतु है, इसका नाम है वसंत.

हमारे देश की यह विशेषता रही है कि उसके बड़े शहरों में पीढ़ियों से भी रहते आ रहे परिवारों में लोक की परम्परा का सूत्र हल्के-फुल्के बदलाव के साथ बचा मिल जाता रहा है. हमें तो आज भी ठीक से याद है कि हमारे गांवों और छोटे मंझोले शहरों में वसंत कैसे आता था. कुछ तो वह आता था और कुछ समाज अपने आप पर लपेट लेता था. हमारे यहां तो जब वसंत आता था तो आम के दरख्तों में बौर खोजे जाते थे. कई बार तो उस दिन तक खूब बौर आ चुके होते थे लेकिन कई बार उनका झलकना बाकी होता था. तब हम बच्चे, कहीं न दिखने वाला बौर खोज कर लाते और अपनी सफलता पर फूले नहीं समाते थे. हमारे नये वस्त्र, सरसों के फूल जैसे पीले रंग में रंगे जाते. दादी-बाबा से लेकर मां-पिता, बुआ, बहन-भाई सब एक ही रंग में रंगे होते जैसे सब ने कोई यूनिफार्म पहन रखी हो. कानों में आम के बौर खोंसे जाते, सिर पर सरसों के फूल सजाये जाते. आंगन में चौक पूरी जाती, पूजा होती. सधवा स्त्रियां इस दिन शाम होने से पहले उस धोबिन के हाथों सुहाग लेतीं जिसे साल के बाकी दिनों अछूत माना जाता. खाने में भी रंग बरकरार रहता. कढ़ी भात बनता और केसरिया रंग के मीठे चावल. एक अलग उमंग, एक अलग छटा, लगता कि जीवन में, वातावरण में कुछ नया हो गया है. लेकिन आज की तरफ आयें तो पीले रंग को पहनने का चलन तो अब गांव में भी नहीं रहा. कानों में आम के बौर खोंस लेने का चलन भी गया. मेरा रंग दे वसंती चोला… भी अब फिल्मों में ही बजता है.

प्रकृति भी बहुत बदली है. फूलों से सुगंध गायब हो रही है, दरख्तों पर धूल और धुएं की मोटी पर्त चढ़ी होती है, कलरव करने वाला पक्षी-समाज छीझ गया है. बहुत प्रकार के पंछी बचे ही नहीं हैं. नदी सूख गयी है या गंदा नाला बन गयी है. कैसे रह जायेंगे जीव जंतु, परिंदे वगैरह, कैसे जियेंगे? लेकिन इससे कई गुना ज़्यादा, समाज और उसके चलन बदले हैं, खासकर अधिक सभ्य हो गये हैं. शहर हमारे उत्सवों और परम्पराओं से बाहर आये हैं. अनेक ऋतुपर्व उनके यहां बिला गये हैं जिनमें यह सब कुछ समाया रहता था.

करीब दो सदी पहले वेलेंटाइन ने अपनी प्रेयसी के साथ आंखों-आंखों में एक पुल बनाकर प्रणय की वेदी पर जो बलिदान दिया और सबको प्रेम करने का संदेश दिया, वह आज दुनिया भर में, बाज़ार के रूप में छाया हुआ है. हर उम्र और खास तौर पर हर युवा, प्रेम करता हुआ दिखता है. संदेश देने के व्यावसायिक उपकरण हैं. भेंट करने का सामान है और उसे सेलिब्रेट करने का हौसला है. कहीं छिपकर तो कहीं सबके सामने. चुपके-चुपके चोरी-चोरी वाले दिन गये. चिट्ठियां लिखने, जैसे-तैसे पहुंचाने और फिर पकड़े जाने के भी दिन गये. प्यार के अहसास-भर से जिस तरह का रोमांच होता है, उसके इज़हार में उतनी ही कठिनाई होती रही है. गालिब लिखते हैं- इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. एक दौर था, प्रेम का इज़हार करने में उम्र बीत जाती थी. ‘हम तुम बांधे मौन अधर पर, टूट गये भीतर ही भीतर’ की तर्ज पर. इशारों के बाद चिट्ठियां लिखी और चोरी-छुपे पहुंचायी जाती थीं. सिलसिला चल निकलता तो इंतज़ार में प्रेम ज़िंदा बना रहता. महीनों इंतज़ार के बाद जब चिट्ठीरसा कोई ऐसा खत लाकर देता था, प्रेमियों की बांछें खिल जातीं. ऐसे खत संभाल कर रखे जाते, बार-बार पढ़े जाते.

अब तो फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, आईपैड है. ज़्यादातर शहरी और कस्बाई लोगों के पास इंटरनेट है. मोबाइल पर एसएमएस और चैटिंग है. नेट पर चैटिंग है, फेसबुक और संदेश ले जाने वाले पुराने कबूतरों की जगह ट्विटर वाली चिड़िया है. सब कुछ वहीं हो रहा है. अनदेखे, अनजाने लोगों के प्रोफाइल और सच्ची-झूठी तस्वीरें. उम्र के कई वर्गों के लोग, दफ्तरों से लेकर अपने घरों के एकांत तक, घंटों प्रेम के मायावी संसार में गोते लगाया करते हैं.

आज समय बदल रहा है. प्रेम की किसी एक ऋतु और उससे जुड़े लोकाचार से मुक्त हो रहे हैं लोग. जब उमंग, तब वसंत को अपना प्रेरक वाक्य माने, लगे रहते हैं मुन्ना भाई. अब तो हर ऋतु प्रेमपगी बनी रहती है, फिर वसंत के तो कहने ही क्या. प्रेम ही क्यों, जीवन में कोई उल्लास हो, कोई समाज या देश नया स्वप्न देखने लगे तो भी आज उसे वसंत की, अंग्रेज़ी में कहें तो स्प्रिंग की संज्ञा दी जाने लगी है. गलाने वाली शीत से राहत देने वाले, पश्चिमी देशों के धूप सने स्प्रिंग यानी वसंत की आहट भर से वहां सब कुछ नाच उठता है. जाने कब से वसंत उल्लास का पर्याय बना हुआ है. वह सिर्फ प्रेम या आनंद की एक ऋतु भर नहीं वह एक संज्ञा, एक मुहावरा बन गया है. जो हर तरह की उम्मीद और उल्लास को, और कई बार तो संघर्ष को भी ध्वनित करता है. सदियों से तानाशाही की ज़ंजीरों में जकड़े किसी देश या समाज को, सत्ता बदलने की उम्मीद जगाते आंदोलन में भी, वसंत को देखना गलत नहीं माना जा रहा है? अरब स्प्रिंग की कल्पना भले ही साकार नहीं हो सकी लेकिन लोगों ने जागती आंखों, मनमानी करने वाली सत्ताओं से मुक्ति का, एक खुले माहौल का सपना, तो देखा ही. और हमारे देश में भी आंदोलनों में एक रौनक पिछले वर्षों में दिखी थी. देश की मुख्यधारा में नयी तरह के ऐसे ही वसंत के सपने आकार लेते देखे जाते रहे हैं.

शास्त्राsं में झांकें तो पता चलेगा कि हम अपनी किस परम्परा से दूर होते जा रहे हैं. उनके अनुसार वसंत निराकार कामदेव का समय है और वसंत ही मेधा की देवी सरस्वती का भी समय है. एक साथ काम और बुद्धि दोनों का समय. एक तरह का विरोधाभास है इन दोनों में. यही समय भगीरथ के गंगा को धरती पर लाने का है. ध्यान से देखें तो यह समय, सम्यक रूप से पूरी तरह जीने का है. काम, कर्म और मेधा तथा विवेक सब एक ही समय में उपस्थित हैं. सृजन में कैसी लीन होती है सृष्टि, वसंत और होली के बीच के पर्वों की इस शृंखला में. इसी बीच शिवरात्रि है. नटराज के तांडव से नर्तन का और डमरू की ध्वनियों से पाणिनी के व्याकरण के सूत्रों का प्रादुर्भाव, जैसे सब कुछ जनने की ऋतु हो. वह सब कुछ होता है जो मन चाहता है. हर कोई प्रेम करना चाहता है. रचना चाहता है. पूरी सृष्टि जैसे फिर से स्वयं को जनना चाहती है. प्रेम का विवेकशून्य प्रवाह और साथ ही बुद्धि की विवेकपूर्ण वर्जनाएं एक साथ शायद इसी पर्व में दिखती हैं. हमारी सारी ऋतुएं, हमारी बाहरी और भीतरी दोनों प्रकृतियों को बहा ले जाती हैं, लेकिन वसंत जैसा प्रवाह किसी में नहीं होता. शायद सृजन का आवेग और उस जैसी शक्ति भी दुर्लभ है जो वसंत में निहित है.

प्रेम खत्म नहीं होता क्योंकि सृष्टि के उद्गम में ही प्रेम है. यह वर्जनाएं नहीं मानता, इसे किसी से भय नहीं. हर एक के भीतर नयी अनुभूति के साथ उदित होता है. प्यार की आंच मंद भी पड़ जाये तो भी उसकी गरमाई बची रहती है. फिर माफिक वक्त आया, वसंत ने तन-मन छुआ और फिर सब कुछ हरा-भरा हो गया. संस्कृत व रीतिकाल के कवियों ने राधा व कृष्ण को माध्यम बनाकर प्रेम की जो फसल हमें सौंपी है, वह बेमिसाल और सदाबहार है. छंद, सवैये, गीत, रसिया, फाग, लोकगीत, न जाने कितने रूपों में और जाने कितने कवियों ने, राधा-कृष्ण के प्रेम को और इस ऋतु को अमर बनाया है. कहीं वसंत का मौसम हो तो प्रेम सीझने लगता है. और कहीं, प्रेम घना होने पर परिवेश वसंत से सराबोर हो जाता है.

प्रेम को लेकर तॉलस्ताय, मोपासां, चेखव, मार्केस, मिलान, कुंदेरा तथा हिंदी व भारतीय भाषाओं में तमाम लेखकों ने कहानियां लिखी हैं जो चित्ताकर्षक हैं. रेणु की ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’ में प्रेम की धमक का अलग ही रूप-रंग है. हमारी स्मृतियों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी- उसने कहा था, आज भी जीवित है. प्रेम के कई रूप हैं- अशरीरी प्रेम, आत्मिक या रूहानी प्रेम और शरीरी प्रेम. प्रेम का यह विस्तार पारिवारिक और रिश्ते-नातों के दायरे से लेकर मैत्रीपूर्ण सम्बंधों तक फैला है. प्रेम का हो-हल्ला आज जितना है, उतना प्रेम समाज में दीखता नहीं. मन को बहुत भाने वाली ये बातें, धीरे-धीरे अर्धसत्य हो गयी हैं. ठीक-ठीक कहें तो आधे से भी कम सच. ऐसे में हम सब क्यों नहीं वसंत को वसंत की तरह और पूरा-पूरा जियें. सचमुच प्रेम करें, सबसे प्रेम करें.

यही वसंत है. यही संदेश है वसंत का. पर दुर्भाग्य हमारा, हम न इस वसंत को देख पा रहे हैं, न समझ पा रहे हैं. इसे जीने की बात तो बहुत दूर की है. वसंत को जीने का मतलब है जीवन को उस रागात्मकता के माध्यम से समझना जो एक से दूसरे को जोड़ती भी है और उसे अर्थवान भी बताती है. यह आज हमारे जीवन में जैसे रागात्मकता की नदी सूखती जा रही है. भगीरथ बनना होगा सबको, ताकि जीवन को किसी गंगा की लहरें छुएं- उनकी छुअन की पुलकन से जीवन आह्लादित हो. तभी कहीं न दिखनेवाला बौर हाथ आयेगा

फरवरी 2016

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