बाङ्ला देशः एक सचाई

♦  वीना सचदेव    

     बारूद में आग लग चुकी थी.

    2 मार्च 1971 को पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल याह्या खां ने अलगे दिन शुरू होने वाली पाकिस्तान एसेंबली की बैठक स्थगित करने की घोषणा की और तीन मार्च को ढाका की सड़कों पर पाकिस्तानी सेना कवायद कर रही थी. कभी इस गली से और कभी उस सड़क से, रह-रहकर गोलियों की आवाज़ गूंज उठती थी. और फिर यह कभी-कभी उठने वाली आवाज़ एक लगातार शोर में बदल गयी.

    ‘यह एक षड्यंत्र है.’ शेख मुजीबुर्रहमान ने घोषणा की- ‘हम शांतिपूर्ण संवैधानिक आंदोलन चलायेंगे.’

    आंदोलन तो चला, पर वह शांतिपूर्ण नहीं रह सका. ढाका में आग लग गयी. बंगाली लोग कर्फ्यू का ाादेश मानने को तैयार नहीं थे. और दो ही दिनों में मृतकों की संख्या 100 हो गयी.

    बाङ्ला देश के लोकप्रिय नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने ‘अंतिम विजय’ के लिए ‘सत्याग्रह’ की घोषणा कर दी. इस्लामाबाद को लगा, इस घोषणा का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए. लेकिन जनरल याह्या खां ने ‘नरमी बरतते हुए’ कहा- ‘नेशनल एसेंबली की बैठक बुलायी जा सकती है, लेकिन सशस्त्र सेनाएं देश की एकता की देखभाल करेंगी.’

    यह घोषणा 6 मार्च 1971 को की गयी थी और 7 मार्च को पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का पहला दस्ता ढाका पहुंच गया. फिर ये दस्ते पहुंचते ही गये. पाकिस्तान के फौजी तानाशाह याह्या खां और बाङ्ला देश के निर्वाचित नेता मुजीबुर्रहमान में बातचीत का दौर शुरू हुआ.

    याह्या खां शेख मुजीब को समझा देना चाहते थे कि पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान का ही है और पाकिस्तान का ही रहेगा, मगर शेख मुजीब का कहना था कि- 25 साल की गुलामी कम नहीं होती, अब पूर्वी पाकिस्तान की साढ़े सात करोड़ जनता पश्चिमी पाकिस्तान के रहमोकरम पर नहीं जियेगी.

    25 मार्च को दुबारा बुलायी गयी एसेंबली की बैठक भी स्थगित कर दी गयी. पश्चिमी पाकिस्तान के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो और पूर्वी पाकिस्तान के नेता शेख मुजीबुर्रहमान का नेतृत्त्व दांव पर लगा हुआ था.

    अचानक याह्या-मुजीव वार्ता भंग हो गयी और दूसरे दिन से पूर्वी बंगाल की धरती पर सैनिक तानाशाही की क्रूरता का नंगा नाच शुरू हो गया. याह्या खां ने घोषणा की- ‘मुजीब और उसकी पार्टी, दोनों पाकिस्तान के दुश्मन हैं. इस जुर्म की सजा जरूर दी जायेगी. हम सत्ता के भूखे और गद्दार लोगों को इस मुल्क को तबाह करने और बारह करोड़ लोगों की किस्मत से खेलने की इजाजत नहीं देंगे.’

    और मुजीबुर्रहमान ने अपने लोगों का आह्वान किया- ‘तुम्हारे पास जो भी हथियार हो, उसे लेकर बाहर निकल आओ. किसी भी कीमत पर दुश्मन की फौजों का मुकाबला करो … तब तक लड़ो, जब तक दुश्मन का आखिरी सिपाही तक खत्म न हो जाये. पश्चिमी पाकिस्तान की बर्बर तानाशाही से देश की रक्षा करो.’

    और 28 मार्च को विश्व-भर के अखबारों में (पश्चिमी पाकिस्तान के अखबारों को छोड़कर) बड़ी-बड़ी सुर्खियों में छपा- ‘पूर्वी बंगाल में सेना द्वारा एक लाख व्यक्तियों की हत्या की आशंका.’ सिद्ध कर दिया कि आशंका मात्र आशंका नहीं थी.  

    ‘पूर्वी पाकिस्तान’ और ‘पूर्वी बंगाल’ के बजाय एक नया नाम सुनायी पड़ा- स्वाधीन बाङ्ला देश! और वह कविताओं का ‘आमार शोनार बाङ्ला देश’ आग की लपटों में जलने लगा. आज भी जल रहा है. सड़कों पर लाशें सड़ रही हैं.  ढाका विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापकों और छात्रों को कतार में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया गया है. अखबारों के दफ्तर जला डाले गये हैं और बुद्धिजीवियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है. पाकिस्तानी सैनिक बाङ्ला देश की जनता का कत्ले-आम कर रहे हैं और वहां की स्त्रियों को…

    ढाका, खुलना, राजशाही, चिटगांव, मितास, कोमिला… हर गली, हर चौराहा युद्ध का मैदान बना हुआ है. शेख मुजीब ने स्वाधीन बाङ्ला देश की घोषणा कर दी है और अब ‘दो देशों की सेनाएं’ आमने-सामने हैं.

    सीमा के उस पार से आने वाले समाचार पश्चिमी पाकिस्तान की जल, थल और वायुसेना के सम्मिलित आक्रमण की भयंकरता के साथ-साथ उसकी असफलता का भी संकेत कर रहे हैं. यह युद्ध कब खत्म होगा, नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना निश्चित है कि एक-दूसरे से एक हजार मील दूर स्थित दो भू-भाग अब एक देश नहीं रह सकते. प्रश्न यह नहीं है कि क्या होगा, प्रश्न यह है कि कब होगा?

    भूगोल, इतिहास, भाषा, रहन-सहन, संस्कृति और साहित्य की दृष्टि से एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न दो भू-भागों के निवासियों को मात्र धर्म के नाम पर कब तक एक रहने के लिए बाध्य किया जा सकेगा? सच तो यह है कि प्रश्न यह भी नहीं रहा. अब तो प्रश्न यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा ‘बाङ्ला देश पर किया गया आक्रमण’ कब समाप्त होगा?

    1966 में पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह अयूब खां ने धमकी दी थी- ‘देश की एकता के लिए मैं स्वायत्तता की मांग करने वालों के खिलाफ पूरी लड़ाई छेड़ दूंगा.’ और उनके उत्तराधिकारी याह्या खां ने 1971 में इस धमकी को पूरा कर दिखाया. अयूब खां की धमकी के जवाब में मुजीब ने कहा था- ‘पूर्वी पाकिस्तान की 85 प्रतिशत जनता स्वायत्तता की मांग का समर्थन करेगी.’

    लेकिन आज 85 प्रतिशत ही नहीं, सारी जनता, पूर्वी पाकिस्तान की नहीं, बाङ्ला देश की जनता, स्वायत्तता के लिए ही नहीं, पूर्ण स्वतंत्रता के लिए शेख के इशारे पर प्राणों को हथेली पर लिये लाठियों, भालों और बंदूकों के साथ पाकिस्तानी सेना के टैंकों, बमों और मशीनगनों का मुंह तोड़ रही है. और शेख मुजीब का कहना है कि ‘हम पश्चिमी पाकिस्तान की साम्राज्यवादी चालों को कभी सफल नहीं होने देंगे. मुजीब मर सकता है, पर यह लड़ाई अंतिम विजय तक जारी रहेगी.’

    यह मुजीब कौन है?

    शेख मुजीबुर्रहमान- एक व्यक्ति, जो कल तक पाकिस्तानी शासकों के अनुसार ‘षड्यंत्रकारी’ और ‘अपराधी’ था, आज बाङ्ला देश की सात करोड़ जनता के दिलों पर राज कर रहा है. जब वह बोलता है, तो लगता है, मानो शेर दहाड़ रहा हो और उसके श्रोता इतने मंत्रमुग्ध हो जाते हैं कि विदेशी पत्रकार उसे ‘राजनीति का कवि’ कह डालते हैं.

    मुजीब का जन्म 17 मार्च 1920 को फरीदपुर जिले के गोपालगंज नामक गांव में एक मध्यम श्रेणी के परिवार में हुआ था. उसने वकालत पास की, लेकिन किशोरवस्था से ही राजनीति में कूद पड़ने के कारण ‘बार’ में नहीं जा सका. छात्र-नेता के रूप में वह गांधि का अनुयायी बना, फिर मुस्लिम लीग का सदस्य, और फिर अपने बाङ्ला देश को गुलामी से बचाने के लिए उसने श्री सुहरावर्दी के नेतृत्त्व में अवामी लीग की स्थापना की.

    1966 में जब मुजीब ने अयूब-शासन से लोहा लिया तो एकाएक उसका नाम अखबारों की सुर्खियां बन गया. तभी मुजीब ने छह सूत्री कार्यक्रम के आधार पर ‘अपने बाङ्ला देश’ के लिए स्वतंत्रता की मांग की थी. उसके शब्दकोश में पूर्वी पाकिस्तान जैसा कोई शब्द नहीं है.

    और मुजीब की इस मांग को अपराध मानकर पाकिस्तानी शासकों ने उसे जेल में डाल दिया. फौजी शासन की जेलों की जितनी यातना मुजीब ने सही है, उतनी पाकिस्तान के किसी अन्य नेता ने शायद ही सही हो. नौ साल, आठ महीने.

    विचारों से मुजीब समाजवादी है- पर माओवादी हरगिज नहीं. धर्म से वह मुसलमान है, लेकिन वह ‘मनुष्य की समानता’ में विश्वास करता है. (वैसे एक अमरीकी पत्र के अनुसार तो ‘बंगाली लोग स्वयं को पहले बंगाली मानते हैं, फिर हिंदू या मुसलमान और तीसरे नंबर पर भारतीय या पाकिस्तानी!’) मुजीब ने आश्वासन में ‘धर्म और सप्रदाय के नाम पर कोई भेदभाव नहीं बरता जायेगा.’

    उग्रपंथी वह भी है, पर मौलाना भाषानी जैसा नहीं. बंगाली संस्कृति का पक्षधर मुजीब माओवाद और इस्लाम की खिचड़ी बनाने में विश्वास नहीं करता. पाकिस्तानी शासक आज उसे ‘देश का शत्रु’ कह रहे हैं, लेकिन मुजीब अपने बाङ्ला देश के लिए एक प्रेरणा है, एक शक्ति है, एक जीता-जागता इतिहास है.

    ‘मुजीब मर सकता है, पर यह लड़ाई अंतिम विजय तक जारी रहेगी.’

    यह लड़ाई शुरू कब हुई थी? उसी दिन, जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण हुआ. धर्म के नाम पर 1,000 मील दूर बसे दो भू-भागों को जब 14 अगस्त 1947 के दिन एक देश के दो हिस्सों का रूप दिया गया था, यह लड़ाई शुरू हो गयी थी. यह सच है कि पूर्वी बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग हिंदू-आधिपत्य से छुटकारा पाना चाहता था, लेकिन उसने स्वयं पर पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबियों के शासन की अपेक्षा नहीं की थी.

    मुस्लिम लीग के प्रसिद्ध लाहौर-अधिवेशन में जिस पाकिस्तान की कल्पना की गयी थी, वह स्वायत्त राज्यों का संघ ही था. लेकिन हुआ यह कि पूर्वी पाकिस्तान को स्वायत्त बनाने के बजाय बागडोर कराची ने अपने हाथ ले ली. और फिर यह हुआ कि पूर्वी पाकिस्तान ‘एक उपनिवेश’ मात्र बनकर रह गया. सात करोड़ बंगाली तीन करोड़ पंजाबियों के ‘गुलाम’ बनकर रह गये.

    प्रतिरोध स्वाभाविक था. 1948 का भाषा-आंदोलन प्रतिरोध की इस प्रक्रिया का पहला चरण था. पश्चिमी पाकिस्तान बंगालियों पर उर्दू थोपना चाहता था- यह कहकर कि बंगाली ‘गैर-मुस्लिम’ या ‘मुस्लिम-विरोधी’ भाषा है. पूर्वी बंगाल के अनेक छात्रों के बलिदान के बाद ही कराची ने अपना आदेश वापस लिया. तब से पूर्वी बंगाल का बौद्धिक वर्ग इस नये साम्राज्यवाद का विरोध करने पर आमादा हो गया और ढाका रेडियो पर रवींद्र-संगीत इस्लामाबाद के विरोध का प्रतीक बन गया.

    यह था अलगाव का प्रथम चरण. दूसरा चरण पूरा हुआ 1954 में, जब प्रांतीय विधानसभा के पहले चुनाव में पूर्वी बंगाल की जनता ने 309 में से केवल 10 सींटे मुस्लिम लीग को देकर पश्चिमी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व को चुनौती दी थी.

    लेकिन अलगाव की प्रक्रिया का तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण दौर तब शुरू हुआ, जब बंगालियों को मालूम हुआ कि उनका ‘शोनार बाङ्ला देश’ आर्थिक दृष्टि से जर्जर हो चुका है. उन्हें यह भी मालूम हुआ कि पूर्वी बंगाल के आर्थिक शोषण के बल पर ही पश्चिमी पाकिस्तान का आर्थिक विकास हो रहा है.

    अवामी लीग द्वारा हाल ही में जारी किये गये आंकड़े इस आर्थिक शोषण की कहानी अपने आप कह देते हैं-

  1. साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले पूर्वी पाकिस्तान पर राजस्व का कुल 1,500 करोड़ रुपया खर्च होता है, जब कि पश्चिमी पाकिस्तान के लिए यह राशि 5,000 करोड़ रुपये है.
  2. विकास के लिए पूर्वी पाकिस्तान पर 3,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं और पश्चिमी पाकिस्तान पर 6,000 करोड़.
  3. विदेशी सहायता का 80 प्रतिशत पश्चिमी पाकिस्तान पर खर्च होता है और केवल 20 प्रतिशत पूर्वी पाकिस्तान पर.
  4. पाकिस्तान के निर्यात का 50 प्रतिशत पूर्वी पाकिस्तान से होता है, लेकिन रुपये के अवमूल्यन और निर्यात-शुल्क की अधिकता के कारण सौदा घाटे का ही रहता है, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में आयात अधिक होता है और वहां के व्यापारी दिनों-दिन खुशहाल होते जा रहे हैं.

    भ्रम का पर्दा उठता जा रहा था. पूर्वी पाकिस्तान के नेता अब स्पष्ट देख रहे थे कि राष्ट्र की एकता के नाम पर लगातार शोषण किया जा रहा है. ढ़ाका के एक पत्र के अनुसार ‘1964 से 1969 तक केंद्र सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान को नये उद्योगों की स्थापना के लिए तनिक भी विदेशी मुद्रा नहीं दी. 1963-64 में साढ़े पांच करोड़ रुपये निर्धारित किये गये थे, पर भारत-पाक युद्ध के नाम पर वे भी वापस ले लिये गये.’

    आर्थिक शोषण के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी शोषण चल रहा था.

    लगभग सभी मुख्य राजनीतिक पदों पर पश्चिमी पाकिस्तानी थे. छोटे-छोटे पदों पर भी उनका ही बोलबाला था, उदाहरण के लिए 1969 में पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार के सभी 16 सचिव श्रेणी के अधिकारियों के 3353 पदों में से भी पूर्वी पाकिस्तान वालों को केवल 429 पद दिये गये.

    राष्ट्रपति के सचिवालय में पूर्वी पाकिस्तान के सिर्फ 3 और पश्चिमी पाकिस्तान के 72 राजपत्रित अधिकारी! पाकिस्तान के शस्त्रास्त्र-कारखानों में केवल 3 प्रतिशत मजदूर, 5 प्रतिशत क्लर्क और 2 प्रतिशत अधिकारी पूर्वी पाकिस्तान के!

    आंकड़े यहीं समाप्त नहीं होते. इस बात पर विश्वास करना कठिन है कि 1968 में पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं में पूर्वी पाकिस्तान के लोग केवल 2 प्रतिशत थे! क्या इसलिए कि उनके बागी हो जाने का डर था? या इसलिए कि पूर्वी बंगाल को अपने चंगुल में फंसाये रखने के लिए यह अनिवार्य था?

    कड़वाहट पैदा होनी ही थी. हर जगह सौतेला व्यवहार और कहने के लिए एक धर्म-एक राष्ट! राष्ट्र को धर्म की परिभाषा में बांधना भी गलत था. ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एकदम भिन्न एक भू-भाग पर शासन करने के लिए धर्म का धोखा खड़ा किया गया था, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान के नेता और जनता इस तथ्य को समझने लगे कि उनके साथ ‘निरंतर छल’ किया जा रहा है.

    मन और मस्तिष्क का अलगाव दोनों पाकिस्तानों की भौगोलिक दूरी से भी अधिक बढ़ता गया और लोगों को मुस्लिम लीग के लाहौर-अधिवेशन की याद आने लगी, जिसमें श्री जिन्ना ने अपने प्रस्ताव में दो अलग पाकिस्तानों की मांग की थी और कहा था कि पख्तूनिस्तान, बिलोचिस्तान और सिंध भी स्वायत्त राज्य होंगे. अब पूर्वी पाकिस्तान उस प्रस्ताव को मूर्त रूप देना चाहता था.

    पूर्वी पाकिस्तान के असंतोष को उभरने का एक अवसर मिला 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान. उस समय पाकिस्तान की अधिकांश सेना पश्चिमी हिस्से में थी और पूर्वी पाकिस्तान लगभग असुरक्षित था. तब राष्ट्रपति अयूब खां ने कहा था- ‘भारत चीन के डर से पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण नहीं करेगा.’

    और पूर्वी पाकिस्तान ने पूछा था- ‘यदि चीन ही हमारा रक्षक है, तो हमें रावलपिंडी के शासन की क्या आवश्यकता है?’

    शेख मुजीबुर्रहमान ने उसी समय कहा था- ‘पाकिस्तान की सरकार कश्मीर में जनमत-संग्रह की बात करती है. वह पूर्वी बंगाल में जनमत-संग्रह कराये. मेरा दावा है कि 85 प्रतिशत जनता पृथक राष्ट्र के पक्ष में मत देगी.’

    और यह जनमत-संग्रह हुआ. अवामी लीग के प्रसिद्ध छह सूत्री घोषणापत्र के आधार पर लड़े गये नेशनल एसेंबली के चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लींग को 99 प्रतिशत मत प्राप्त हुए.

    मगर 3 मार्च 1971 के दिन नेशनल एसेंबली की जगह गोली मिली और जनतंत्र की जगह नरमेध! बुद्धिजीवियों की हत्याएं, अखबारों की आजादी का अपहरण और स्वाधीनचेता बाङ्ला देश पर पाकिस्तानी बमवर्षकों द्वारा नापाम बमों की वर्षां.

    बाङ्ला देश के लाखों सपूत शहीद हो चुके हैं. सोने का देश राख बन चुका है. अब लड़ाई स्वायत्त पूर्वी पाकिस्तान के लिए नहीं, स्वाधीन बाङ्ला देश के लिए हो रही है. विश्व-राजनीति अभी भले ही इसे ‘आतंरिक मामला’ कहती रहे, लेकिन विश्व-जनमत यह स्वीकार चुका है कि स्वतंत्र बाङ्ला देश एक अनिवार्य परिणति है. और पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों को ही नहीं सारे विश्व को देर-सबेर इस तथ्य को स्वीकारना पड़ेगा.

(मई  2071)

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