नहीं मां, मैं अभी नहीं सोऊंगा

बड़ों का बचपन

  लियो टॉल्स्टॉय  >   

97i/43/huty/9230/09बचपन के सुख दिन, जो कभी नहीं लौटेंगे! क्या कभी कोई उसकी स्मृतियां भुला सकता है? उसके बारे में सोचते ही मेरा मन आज भी उल्लसित हो उठता है, आत्मा में एक नूतन ऊंचाई का अनुभव होने लगता है.

याद आता है, किस तरह दिन भर की उछल-कूद के बाद हम चाय की मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे जाते थे. काफी देर हो चुकी होती थी, दूध और मिठाई के बाद आंखें नींद में मुंदने लगती थीं, किंतु फिर भी हम अपनी कुर्सी पर बैठे बातें सुनते रहते थे. बातें सुनने का शौक दबाना असम्भव था. मां किसी से बातें कर रही होतीं और हम उनका मुधर, प्यारा स्वर सुनते रहते. नींद में डूबी आंखों से मैं उनका चेहरा देखता रहता.

मैं अपनी आरामकुर्सी पर अंगों को समेटकर बैठ जाता.

“निकोल्या, तुम्हें नींद आ रही है… जाओ, ऊपर अपने कमरे में जाकर सो जाओ.” मां कहतीं.

“नहीं, मां-मैं अभी नहीं सोऊंगा.” मैं कहता, किंतु धुंधली मोहक-सी तस्वीरें मेरी कल्पना में तिरने लगतीं. नींद से मेरी पलकें भारी हो जातीं और दूसरे ही क्षण मैं सुध-बुध खोकर सोने लगता. आधी नींद में ही मुझे लगता कि कोई अपने कोमल हाथों से मुझे छू रहा है और मैं जान जाता कि यह मां का स्पर्श है. मैं सोते हुए उनका हाथ पकड़ लेता और उसे अपने होठों पर दबाने लगता.

सब लोग जा चुके हैं. कमरे में सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही है- मां ने कहा है कि वह स्वयं मुझे जगाकर ऊपर ले जायेंगी. वह उसी कुर्सी पर बैठ गयी हैं, जिस पर मैं सो रहा हूं. वह धीरे-धीरे मेरे बालों को सहला रही हैं और अपने कानों में मुझे उनका प्रिय, परिचित स्वर सुनाई दे जाता है-

“अब उठो… अपने बिस्तर पर जाकर आराम से सो जाओ.” मैं हिलता-डुलता नहीं, लेकिन उनके हाथ को और भी अधिक मज़बूती से चूमने लगता हूं.

“मेरे लाडले… अब उठो.”

वह अपना दूसरा हाथ मेरे गले के पास रख देती हैं और उनकी अंगुलियां तेज़ी से मुझे छूने और गुदगुदाने लगती हैं. कमरे में खामोशी और अंधेरा है. मैं अचानक जाग जाता हूं. मां मेरे पास बैठी है और मुझे छू रही हैं. मैं उनकी गंध को पहचानता हूं… उनके स्वर को भी. मैं उछलकर उठ बैठता हूं, दोनों बांहें उनके गले में डाल देता हूं, अपना सिर उनकी छाती में छिपाकर हांफता हुआ कहता हूं-

“ओह, प्यारी मां… मैं तुम्हें कितना ज्यादा चाहता हैं.”

एक उदास, मोहक-सी मुस्कान उनके होठों पर सिमट आती है, वह दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ लेती हैं, मेरे माथे को चूमती हैं और मुझे अपनी गोद में खींच लेती हैं.

“अच्छा, तुम मुझे सचमुच बहुत चाहते हो?” वह एक क्षण चुप हो जाती हैं, फिर कहती हैं, “सच बताओ- मुझे हमेशा प्यार करोगे, कभी नहीं भूलोगे? जब मैं नहीं रहूंगी, तब भी नहीं भूलोगे? नहीं भूलोगे न?”

“नहीं… नहीं… यह मत कहो…” मैं रोता हुआ उनके घुटने चूमने लगता हूं.

उसके बाद ऊपर अपने कमरे में जाकर मैं संतों के चित्रों के आगे प्रार्थना करता हूं, “हे प्रभु, मां और पिताजी को हमेशा सुखी रखो!”

प्रार्थना के बाद हल्की, उल्लास-भरी और उज्ज्वल-सी भावना घिरने लगती है.  एक के बाद एक सपने आते हैं- किसके बारे में? वे सब धुंधले और छुईमुई-से जान पड़ते हैं- लेकिन उन सबमें निर्मल प्रेम और असीम सुख की आशा भरी होती है. मुझे कार्ल इवानिच याद आते और उनके दुखी उदास जीवन के बारे में सोचते हुए मेरी आंखों से आंसू बहने लगते और मैं ईश्वर से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगता कि वह उनकी मदद करे, उनके दुःखों को हल्का करे. फिर मैं तकिये के सिरहाने किसी चीनी के खिलौने- कुत्ते या खरगोश को दबाने लगता. वे खिलौने चुपचाप, आराम से लेटे हुए मेरी ओर देखने लगते. फिर मैं दुबारा ईश्वर से प्रार्थना करने लगता कि सब लोग सुखी हों और किसी को कोई कष्ट न हो और यह भी कि कल मौसम सुहावना हो ताकि हम पिकनिक पर जा सकें. फिर मैं करवट बदलता- मेरे स्वप्न और खयाल आपस में गड्डमड्ड हो जाते और धीरे-धीरे नींद मुझे अपने में घेरने लगती. जब मैं सोता, मेरे गाल आंसुओं से भीगे होते.

क्या बचपन की वह ताज़गी, बेफिक्री, प्यार की भूख और आस्था दुबारा कभी लौट सकेगी? प्रेम में उफनती वे प्रार्थनाएं कहां हैं? हमारी ज़िंदगी के सबसे सुंदर उपहार- भीगी, कोमल भावनाओं के उमड़ते आंसू क्या हमेशा के लिए खो गये?  

(जनवरी 2014)

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