दलित आत्मकथाओं की अंतर्व्यथा  –   मोहनदास नैमिशराय

परिप्रेक्ष्य

साठ के दशक में दलित आत्म-कथाओं का आना साहित्य में किसी जलजले से कम नहीं था. पहले यह तूफान महाराष्ट्र में आया फिर हिंदी साहित्य में भी इसे आना ही था. साहित्य में इसे हम परिवर्तन का क्रांतिकारी दौर भी कह सकते हैं. सामाजिक बदलाव की इस धारा का किसी ने समर्थन किया तो किसी ने विरोध. कहीं सहमति थी कहीं असहमति. दलित साहित्य में सबकुछ यथार्थ था. सुंदर ढंग से बुनाई करने का दलित साहित्यकारों को वक्त ही कहां मिला. दलित साहित्य के जीवन से रिश्ते रहे. आंदोलन उनकी ऊर्जा रही. मेरी राय में वह जीवन उनका अपना है. उसे उन्होंने अपनी मर्जी से जीने की शुरूआत की. आखिर कब तक वे हिंदू धर्म की परम्पराओं तथा प्रथाओं को ओढ़ते-बिछाते रहते, कब तक वे सामंतों, पुरोहितों के सामने याचक बने खड़े रहते? देर से ही सही उन्होंने अपने फैसले स्वयं लिये.

इस तरह दलित आत्मकथाओं में शिद्दत के साथ संघर्ष रेखांकित हुआ. उसके दुःख दर्द के साथ पीड़ा के स्वर उभरे. सच कहा जाए तो इन आत्मकथाओं ने सामाजिक चेतना जगायी.

हिंदी दलित साहित्य में 90 के दशक में पहली आत्मकथा ‘अपने-अपने पिंजरे’ आयी. हालांकि उससे पूर्व ‘मैं भंगी हूं’ भी आयी, लेकिन स्वयं भगवानदास जी इसे अपनी आत्मकथा नहीं मानते. वे इसे पूरी जाति की आत्मकथा मानते हैं. ललिता कोशल ने इसे परिवर्तन की प्रेरणा की संवाहक कहा है. बाद के दौर में ‘जूठन’, ‘तिरस्कृत’ तथा ‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथाएं प्रकाशित हुईं जो अपनी-अपनी तरह से दलित साहित्य के इतिहास में दर्ज हुईं. किसी अहिंदी भाषी दलित महिला की (कौशल्या बैसंत्री) ‘दोहरा अभिशाप’ पहली आत्मकथा थी. उसके बाद महिलाओं ने भी लिखना शुरू किया. पहल की सुशीला टाकभौरे ने मराठी में.

‘घर के नज़दीक ही एक गधी को बच्चा हुआ था, मां मुझे उसका दूध निकाल कर पिला देती थी. परंतु ऐसा हर रोज़ नहीं होता था. हमारे मुहल्ले में उसी
समय कुछ महिलाओं ने भी बच्चों को जन्म दिया था. उनसे मेरा भूख से बिलखना देखा नहीं जाता था. वे अपने बच्चे के साथ-साथ मुझे भी दूध पिलाती थीं. इस प्रकार मैं कई माताओं का दूध पीकर जीवित रह पाया.

‘गरीबी की वजह से गाय का दूध खरीदने की हैसियत भी नहीं थी. मेरा रोना-बिलखना देखकर मां मुझे छाती से लगाकर चुप कराने का प्रयास करती, तब मेरी दादी (आजी) उसको कहती- ‘तुझे दूध तो है नहीं, फिर काहे को उसे छाती से चिपकाए बैठी है? उसे अफीम देकर सुला दे, तो वह चुपचाप सोता रहेगा. तू अपने काम पर चल.’ मेरी मां मुझे थोड़ी-सी अफीम खिला देती और मैं दिन भर सोया रहता था.

‘इस प्रकार मेरे जीवन की शुरुआत ही ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करने से
हुई थी.’

‘हम अस्पृश्य लड़कों के दिन भर खिड़की से बाहर खड़े रहने पर पांव थक जाते थे. तब गुरुजी की अनुमति से कभी दरवाज़े के पास थोड़ी देर बैठ जाते, किंतु वहीं से सबका आना-जाना होने के कारण हमें बार-बार उठना पड़ता था. स्कूल से एक फर्लांग की दूरी पर सवर्ण बच्चों के लिए पानी का कुआं था, लेकिन हम अछूतों को कोलारी गांव के महारपुरे के कुएं पर जाकर पानी पीना पड़ता था. स्कूल से महारपुरा काफी दूर था.

‘ऐसा क्या उस तुलसी-रामायण में लिखा है कि वह मेरे स्पर्श से अपवित्र हो गयी? मैं बड़ा होकर उस किताब को ज़रूर पढूंगा. आगे चलकर जब मैंने तुलसी-रामायण पढ़ी, तब पता चला कि उसमें वर्णभेद, जातिभेद, अस्पृश्यता का समर्थन तथा ब्राह्मणों के लिए अत्यधिक आदर एवं श्रद्धा बनायी गयी है. अस्पृश्य जातियां एवं स्त्रियों के विषय में भरपूर अनादर व संकुचित मनोवृत्ति का प्रदर्शन करते हुए नारी को नरक का द्वार एवं मोक्ष में बाधा जैसी कटुतापूर्ण बातें लिखी हुई हैं, यह पढ़कर मुझे बड़ा दुख हुआ था.’

ये शब्द डॉ. एन. एम. निमगेड़ के हैं, जो देश में प्रथम दलित वैज्ञानिक बने. उनकी आत्मकथा ‘धूल का पंछी यादों के पंख’ नाम से 2003 में हिंदी में छपी. जबकि डॉ. एम.एस. शहारे की मूल पुस्तक हिंदी में ‘यादों के झरोखे’ नाम से 2005 में आयी. पार्थ पोलके की आत्मकथा पोतराज (मराठी से) 2012 में आयी. डॉ. शहारे लोक सेवा आयोग के चेयरमैन भी रहे.

‘मेरी पत्नी और भेड़िया’ अब तक की प्रकाशित आत्मकथाओं में सबसे अधिक पृष्ठों वाली पुस्तक है, जिस पर सबसे कम नोटिस लिया गया. इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि डॉ. धर्मवीर अपने घर के फजीते में ही उलझे रहे और जार कर्म के दर्शन को बार-बार याद दिलाते रहे. रजनी के अनुसार दलित महिलाओं की अस्मिता को भी तार-तार करते रहे. यह पहली दलित आत्मकथा है, जिस पर लगभग सभी महिलाओं ने आपत्ति जतायी. आक्रोश भी प्रकट किये. समर्थन करना तो दूर की बात रही.

उन्हीं की तरह श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ आयी. ‘मेरी पत्नी और भेड़िया’ से कुछ कम पृष्ठ थे. लेकिन अन्य आत्मकथाओं से फिर भी अधिक पृष्ठ. श्यौराजसिंह बेचैन की आत्मकथा पढ़ते हुए पाठकों को इतना तो अहसास हो ही जाता है कि आत्मकथाकार यानी श्यौराज ने बचपन में मेहनत मज़दूरी करते हुए आरम्भिक शिक्षा ग्रहण की होगी. विषम और विकट परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त कर आगे बढ़ना प्रोफेसर श्यौराजसिंह बेचैन की उपलब्धि भी कहा जा सकता है.

हिंदी में अन्य तीन आत्मकथाएं माता प्रसाद जी की ‘झोपड़ी से राजभवन’, डी. आर. जाटव की ‘मेरा सफर मेरी मंज़िल’, और श्याम लाल जेदिया की ‘एक भंगी उपकुलपति की आत्मकथा’ और फिर तुलसीदास की ‘मुर्दहिया’ आयी. ये चार आत्मकथाएं जब लिखी गयीं तब इन वरिष्ठ दलित लेखकों/शिक्षाविदों तथा चिंतकों की उम्र कम से कम पचास वर्ष तो रही होगी हालांकि इससे ज़्यादा उम्र में ही ये आत्मकथाएं लिखी गयीं. मुझे ये बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि कुछ सवर्ण समीक्षकों का यह भी कहना रहा कि दलित लेखक जवान होते ही आत्मकथा लिखना शुरू कर देते हैं.

इन चारों आत्मकथाओं में जहां हमें दलित उत्पीड़न की विभिन्न परिस्थितियां मिलती हैं वहीं संजीदगी का अहसास भी होता है.

मराठी दलित साहित्यकार दादा साहब मोरे की आत्मकथा ‘डेराडंगर’ अधिकांश आत्मकथाओं से इस अर्थ में अलग है कि इसमें नायक गौण है, और उसका परिवेश, उसकी परिस्थितियां प्रधान हैं. इसमें नायक को केंद्र में स्थापित करने के बजाय उस व्यवस्था को केंद्र में रखा गया है जिसमें नायक के सम्पूर्ण समाज के लोग अपना पीड़ित, यातनामय और नारकीय जीवन जी रहे हैं.

पंजाबी में देखें तो बलबीर माधोपुरी की आत्मकथा जीवन अनुभवों का अद्भुत साहित्यिक रूपांतर है. यहां लेखक से अधिक, स्थितियां बोलती हैं. ये स्थितियां सामाजिक हैं, साहित्यिक हैं, आर्थिक हैं और वैचारिक भी हैं. पंजाबी की पहली दलित आत्मकथा होने का गौरव तो इस कृति को प्राप्त है ही. इसमें इतनी अधिक ऊर्जा और ओजस्विता है कि आभिजात्य उत्कृष्टता, साहित्यिकता का आग्रह उसे बलि का बकरा नहीं बना सका. बात यह है कि इस कृति में समस्याएं साहित्य की शक्ल में दलित-शर्तों को पूरा करती हैं. कैनवास बड़ा है और अंदाज़े-बयां प्रभावशाली. लेखक परिवर्तनकामी विचारों या कहें बदलाव की इच्छा-शक्ति के साथ सामाजिक-राजनीतिक चिंतन की आंदोलनात्मक गतिविधियों में सक्रिय
रहा है.

चर्चित दलित लेखक रूपनारायण सोनकर ने ‘नागफनी’ शीर्षक से आत्मकथा लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है. इस आत्मकथा को पढ़ते हुए एक अजीब-सी बेचैनी होती है. आत्मकथाकार ने जातिवाद के दंश को स्वयं झेला है. यही कारण है कि लेखक समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहता है. सामंतशाही और ब्राह्मणवाद का खात्मा ही लेखक का अभीष्ट है. जब तक समाज में ऊंच-नीच, गैर बराबरी, अस्पृश्यता का भाव विद्यमान है तब तक सामाजिक समरसता, समानता और भाईचारे की चर्चा बेमानी है.

‘पहले मेरे घर के सामने चौड़ा बटोहा था. फिर चबूतरा बना देने से, वह संकरा हो गया था. बैलगाड़ी निकल जाती थी. सामने एक कोरी का मकान था. उसके बगल में एक धानुक का मकान था. उनके बच्चे धूल में सने, बटहे की माटी में खेलते रहते थे. शायद उसके एक ही लड़का था. वह मेहनत से घबराता था इसलिए उसकी पत्नी काम पर जाती थी. दो लड़कियां चार-पांच साल की और साल भर का लड़का.’

‘मेरे गांव में एक ऐसा ब्राह्मण परिवार था. वे तीन भाई व दो बहनें थीं. किसी की शादी नहीं हुई थी. बाद में एक की शादी हो गयी थी लेकिन वह भी ससुराल नहीं जाती थी. दो लड़कियां चार-पांच साल की, और साल भर का लड़का. वे दोनों बड़ी बातूनी थी मेरे मुहल्ले में छोटे-बड़े सभी उन्हें बुआ कहते थे.

‘जब निकलती, कुछ न कुछ कहती ही जाती. जैसे- बटहे में किसी का पानी छलक गया है या उसका नन्हा बच्चा रास्ते में खेल रहा है तो उन्हें अस्पृश्य होने का भय रहता था. यदि रास्ते में गिरे, किसी अछूत की बाल्टी के पानी पर, उनका पैर पड़ गया या किसी बच्चे से छू गयी तो उन्हें नहाना पड़ता था. यह क्रिया उन्हें बार-बार करनी पड़ती थी.’

वरिष्ठ लेखक और शिक्षाविद डॉ. एम. एल. शहारे की यह आत्मकथा बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के अनुयायियों को गफलत से उबारने के लिए काफी है. इसलिए कि ‘यादों के झरोखे’ नाम से यह रचना केवल उनकी अपनी आत्मकथा नहीं है बल्कि दो शताब्दियों का ऐसा महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है, जिसमें पाठकों के सामने बाबा साहेब के द्वारा समता और सम्मान के लिए आरम्भ किये गये आंदोलन के पृष्ठ-दर-पृष्ठ खुलते जाते हैं.

‘यादों के झरोखे’ का फलक विस्तृत है. अनगिनत लोग, अनगिनत समस्याएं और उनसे आमना-सामना करते हुए बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर कैसे दलितों को उनके खोये हुए अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष करते हैं.

बकौल पार्थ पोलके ‘मेरा बाप पोतराज था. पोतराज कमर में रंग-बिरंगे टुकड़ों के चीथड़े पहनते थे. पोतराज की उस पोशाक को आभरान कहते हैं. आभरान पहनकर अपने बदन को कोड़ों से फटकारता हुआ मेरा बाप-आबा हमारे
लिए घर-घर, गली-गली, बस्ती-बस्ती, भीख मांगता रहा. उनका जीवन खानाबदोश जैसा था.’

‘दो लाठियों पर बोरे डालकर बनाया गया तिरपाल यानी उनका घर था. तिरपाल के सामने तीन पत्थर लाकर रखना, खेत से लकड़ियां-उपलियां ढूंढ़कर लाना और उन्हें उन तीन पत्थर के बनाये चूल्हे में डालकर सुलगाना-वही उनका चूल्हा होता था. फिर ऊपर एकाध फूटी पतीली रखते, उसमें थोड़ा-सा पानी तथा गुड़ डालते. चाय-पत्ती कभी होती ही नहीं थी. किसी के पास हो तो ठीक न हो तो कहीं से अमरूद के पेड़ के पत्ते तोड़कर लाना और पतीली में डालना. थोड़ी देर आग जलाना कि हो गयी चाय. फिर बड़े गर्व से दूसरों को बुलाते- ‘अरे… ओ रामा… चाय पीने आ…’

मराठी में दलित आत्मकथाओं की संख्या दो सौ के लगभग बतायी जाती है. हिंदी तथा अन्य भाषाओं में भी तेज़ी के साथ आत्मकथाएं लिखी जा रही हैं. आत्मकथा दलित सहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा है. दलित आत्मकथा पढ़ते हुए मज़े लेना नहीं बल्कि गम्भीरता से दलितों के विषमतापूर्ण जीवन और उनकी त्रासदियों में डूब उतरना है. आत्मकथाएं लिखते हुए दलित लेखकों को गर्म सलाखें छूने जैसा अनुभव होता है क्योंकि आत्मकथाओं में इतिहास के साथ उनकी स्मृतियां भी उतरती हैं. पीड़ा और आक्रोश उभरता है. और उतरती हैं उनके तल्ख जीवन की सच्चाइयां, जिनमें उनके लिए स़िर्फ बेचैनी का सबब होता है. वैसा जीवन क्या आज भी दलित जी रहे हैं? मेरा जवाब हां में होगा. जीवन के हर मोड़ पर दलित को अभी भी उसकी अपनी जाति के सवालों से रू-ब-रू होना पड़ता है और कुछ को स्वाभिमान से जवाब देने के जुर्म में उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
अप्रैल 2016

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