हमारी अंतर्राष्ट्रीयता उनकी विरासत है

 ♦    सुनील कुमार नाग     

भारत के नवजागरण के जनक राजा-राममोहन राय पलाशी की लड़ाई के पंद्रह साल बाद 1772 में जनमें थे. इस प्रकार, नये भारत का अरुणोदय देश के पूरी तरह विदेशियों द्वारा जीत लिये जाने के बहुत पूर्व ही हो चुका था.

     राममोहन राय मानव की गरिमा के प्रतीक थे, वे समस्त राष्ट्रों के भातृत्व पर आधारित विश्व राज्य की कल्पना करने वाले आदि स्वप्नद्रष्टाओं में से थे.

     स्वदेश में उन्होंने जो क्रांतिकारी कार्य किये वे सुविदित हैं, मगर विदेशों में उन्होंने जो काम किये, उनकी उतनी चर्चा नहीं हुई है, जब कि उनका अंत-र्राष्ट्रीय महत्त्व काफी है.

     राममोहन राय का 27 सितंबर 1833 को थोड़े दिनों की बीमारी के बाद देहांत हो गया. इस प्रकार उनकी विश्व-बिरादरी की धारणाएं अंकुरावस्था में ही काल-कवलित हो गयीं. और चूंकि वे एक पराधीन राष्ट्र के नागरिक थे, इसलिए भी अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उनके विचारों का मान और मूल्यांकन ठीक से नहीं हो पाया.

     उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक में ही राममोहन राय इस बात को समझ गये थे कि सब राष्ट्र परस्पराश्रित हैं और एशियाई राष्ट्रों की स्वतंत्रता पश्चिमी राष्ट्रों की सच्ची स्वतंत्रता पर काफी हद तक निर्भर है.

     इसलिए स्पेन में जनता की सरकार स्थापित होने के समाचार से उन्हें इतनी खुशी हुई थी कि कलकत्ता के टाउन हाल में उन्होंने इस उपलक्ष्य में शहर के गण्यमान्य सज्जनों को भोज दिया था.

     इस समारोह में उन्होंने कहा था- ‘मेरे भाई चाहे कहीं के भी वासी हों, उनके स्वार्थ और उनके धर्म और उनकी भाषाएं कुछ भी हों, क्या मैं उनकी वेदनाओं के प्रति संवेदनशून्य हो सकूंगा?’

     उन्हें इस बात की बड़ी प्रसन्नता थी कि दक्षिण अमरीका के लोग यूरोपीय शोषकों से अपनी आजादी वसूल करने के लिए तैयार हो रहे हैं.

     जब मेटर्निच की एकाधिकारवादी कूटनीति के कारण नेपल्स की जनतांत्रिक सरकार का तख्ता उलट गया, तो राममोहन ने लिखा था-       ‘नेपल्सवासियों के मामले को मैं अपना मामला मानता हूं, और उनके शत्रु हमारे शत्रु हैं. स्वाधीनता के शत्रु और निरंकुश शासन के मित्र अंततः न कभी सफल हुए हैं, न कभी होंगे.’

     दीर्घकाल से राममोहन राय की यह कामना थी कि पश्चिम जायें और जनता अपने अधिकारों के लिए कैसे लड़ती और अड़ती है, यह अपनी आंखों से देखें. इसका अवसर 1830 में उन्हें मिला, जबकि सतीप्रथा को बंद कराने के विलियम बेंटिक के प्रयत्नों को बल देने के लिए कुछ करना आवश्यक हो गया.

     तभी भारत के नाममात्र के मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने ‘राजा’ की उपाधि देकर उन्हें अपना राजदूत नियुक्त किया, ताकि वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के संचालकों के समक्ष उसके मामले की पैरवी करें.

     राममोहन राय ने 19 नवंबर 1830 को इंग्लैंड की जलयात्रा आरंभ की. जब उनका जहाज ‘आल्बियन’ केपटाउन पहुंचा, उन्हें फ्रांस की 1830 की क्रांति का समाचार मिला. जनसामान्य ने पहली ही बार अधिकार अपने हाथ में लिये थे और सर्वाधिकार-संपन्न प्रजा द्वारा निर्वाचित होकर लुई-फिलिप फ्रांस का राजा बना था.

     इस समाचार से राममोहन को इतना हार्दिक हर्ष हुआ कि जब उन्हें पता चला कि फ्रांसीसी तिरंगा झंडा फहराते हुए दो जहाज केपटाउन की बंदगाह में खड़े हैं, तो अपनी बीमारी की परवाह न करते हुए वे उनमें से एक जहाज पर गये, ताकि क्रांतिकारी फ्रांस के झंडे को नमस्कार कर सकें.

     ‘आल्बियन’ जहाज 8 अप्रैल 1831 को लिवरपूल पहुंचा. राममोहन का सोत्साह स्वागत हुआ. प्रकांड विद्वान, साहसी, समाज-सुधारक व शिक्षा-प्रसारक के रूप में उनकी ख्याति जनसामान्य तक पहुंच चुकी थी.

     उनके आगमन की खबर पाकर प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम रोस्को ने, जो उस समय 77 वर्ष के थे, उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की. ‘लारेंजो द मेदिची का जीवन-चरित्र’ के लेखक के रूप में पाश्चात्य जगत में रोस्को की ख्याति थी. मगर राममोहन उनका विशेष सम्मान करते थे उनकी पुस्तक ‘रांग्स ऑफ आफ्रिका’ के कारण, जिसमें उन्होंने गुलाबी-व्यापार का तीव्र खंडन किया था. विनम्र राममोहन वृद्ध इतिहासकार के दर्शन करने स्वयं उनके घर पर गये.

     लिवरपूल से राममोहन मैंचेस्टर होते हुए लंदन की ओर चले. इस यात्रा में सदरलैंड उनके साथ थे. उन्होंने राममोहन राय के मैंचेस्ट की मिलें देखने जाने का यह वर्णन 1835 के ‘इंडिया गजट’ में दिया था.

     ‘जब राममोहन वहां पहुंचे, तो वहां के विशाल कारखानों के सब श्रमिकों ने काम बंद कर दिया और पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों की भीड़ ‘भारत के राजा’ को देखने उमड़ पड़ी.’

     लंदन पहुंचने पर राममोहन राय का पहला कार्य था प्रसिद्ध राज शास्त्री जर्मी वेन्थैम से मुलाकात. इंग्लैंड में उनके मिलने वलों का तांता लगा रहता था. उन्होंने अनेक विद्वद्-गोष्ठियों और सभाओं में भाषण दिये.

     ब्रिटिश सरकार ने उनकी ‘राजा’ उपाधि को मान्यता दी और राजा विलियम चतुर्थ के राजतिलक पर उन्हें निमंत्रण देकर भारत के राजदूत के रूप में उनका समुचित सम्मान किया. ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी 6 जुलाई 1831 को उनके सम्मान में भोज दिया. इंग्लैंड में उन्होंने 11 पुस्तकें और पुस्तिकाएं भी लिखीं.

     उन दिनों इंग्लैंड में रिफार्म बिल (शासन सुधार विधेयक) के कारण जनता में बहुत हलचल मची हुई थी. मंत्रिमंडल के पतन और हाउस लार्ड्स के जबर्दस्त विरोध के बावजूद जब अंत में विधेयक पास हो गया, तो राममोहन राय ने अपने मित्र विलियम रैथबोन को लिखा- ‘मुझे इस बात की खुशी है कि अभिजातवर्ग के उग्र विरोध और राजनैतिक सिद्धांत-हीनता के बावजूद, सुधार विधेयक पूरी तरह सफल हो गया है.’

     फ्रांस के विचारकों और विशेषतः वहां के स्वातंत्र्य-प्रेमी जनसाधारण की राजनीतिक और दार्शनिक देन का राजा राममोहन राय बहुत मान करते थे. उन्होंने चार महीने (सितंबर-दिसंबर 1832) फ्रांस में बिताये.

     राजा लुई-फिलिप ने उनका हार्दिक सत्कार किया. राममोहन राय ने फ्रांसीसी विदेश-मंत्री को जो पत्र लिखा था, उससे दुनिया के सम्बंध में उनके विचारों का पता चलता है- ‘यह बात अब सामान्यतः स्वीकार की जाने लगी है कि केवल धर्म ही नहीं, बल्कि पक्षपातहीन सहज बुद्धि और वैज्ञानिक शोध की सुनिश्चित निष्पत्तियां भी यह सिद्ध करती हैं कि समस्त मानव जाति एक विशाल परिवार है और विभिन्न राष्ट्र एवं कबीले उसकी शाखाएं मात्र हैं. इसलिए प्रबुद्ध चेतना वाले व्यक्तियों में यह कामना होनी चाहिए कि वे मानवीय सम्पर्क को सब प्रकार से बढ़ावा दें और उसके मार्ग में आनेवाली अड़चनों को दूर करें, ताकि समस्त मानव-जाति का पारस्परिक लाभ व आनंद बढ़े.’

     ‘किन्हीं भी दो देशों में राजनीतिक मतभेद होने पर यदि दोनों देशों की संसदों से समान संख्या में सदस्य लेकर एक समिति बनाकर उसे विवादग्रस्त मामला सौंप दिया जाये, तो संवैधानिक शासन का ध्येय अधिक अच्छी तरह पूरा होगा.’

     यह कहना अनावश्यक है कि विश्वराज्य की उनकी कल्पना उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गयी. उस समय के दिग्ज अंग्रेज़ और फ्रांसीसी विचारकों ने भी यह स्वीकार किया था कि यूराप के मानदंड से भी राममोहन राय अपने युग से बहुत आगे थे.

     मगर महान विचार कभी विनष्ट नहीं होते. राममोहन राय की मृत्यु के पचासी वर्ष बाद पश्चिम के महान विचारकों को उसी विचार को फिर अपनाना पड़ा और लीग आफ नेशन्स की स्थापना हुई. फिर विश्वराज्य की स्थापना की दिशा में दूसरा और अधिक सच्चा कदम राष्ट्रसंघ की स्थापना के द्वारा उठाया गया.

     यह सुनिश्चित दिखता है कि आज नहीं तो कल समस्त मानव-जाति को एक शासन के अधीन आना ही होगा, यदि वह जीवित रहना चाहती है. और तभी राममोहन राय की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी.

(मार्च 1971)

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