सीधी चढ़ान (पहली क़िस्त)

अपनी प्रति वर्ष की डायरी के आरम्भ में मैं दो सूत्र लिखा करता था-

मरण तो निश्चित ही है,
फिर बैठे क्या रहना-
लम्बे जीवन के अंधकारमय दिनों में-
बिना काम, बिना नियम और बिना नाम के?
जीवन ईश्वर का दिया हुआ भार है,
इसे देख ले, उठा ले,
स्वस्थ रहकर एकनिष्ठा से निभा ले,
शोक में पड़कर हार न जाना,
पाप से डरकर डगमगा न जाना,
और स्थिर पैरों से आगे बढ़.
आगे और ऊपर-
जब तक ध्येय सिद्ध न हो, तब तक!

सन् 1907 ई. के मार्च की एक संध्या को इन दो सूत्रों की पूंजी लेकर मैं कुम्भार टुकड़े में अकेला घर खोजता हुआ खड़ा था.

वह घर था कृष्णलाल काका का. वे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते थे. दो वर्ष पहले ही वे स्मॉल-कॉज कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त हुए थे. उस समय उन्होंने दीवान बहादुर का पद प्राप्त नहीं किया था. मेरे कुटुम्ब के साथ उनका पीढ़ियों से सम्बंध था.

मैं देर से आने पर भी उनकी सिफारिश से एल.एल.बी. में भरती होने के लिए आया था. अंधेरी सीढ़ियां चढ़कर मैं ऊपर पहुंचा. कृष्णलाल काका से मिला, और जीवन के एक प्रगाढ़ और उदात्त सम्बंध की मैंने नींव डाली.

उन्होंने लॉ-कालेज के प्रिंसिपल दिनशा मुल्ला को सिफारिश का पत्र लिखकर मुझे दिया. मैं उसे लेकर दिनशा मुल्ला के पास गया. उन्होंने कृष्णलाल काका को सलाम कहलाया और खेद प्रकट किया कि इस प्रकार भरती नहीं हो सकती.

खाली हाथों मैं भड़ौंच वापिस आया और  बड़ौदा कालेज बोर्डिंग में दाखिल हो गया.

1907 के मार्च की 10 तारीख थी.

बड़ौदा कॉलेज के लॉन पर उत्साह से, हाथों में मशालें लेकर हम लोगों ने ‘महाराजा साहब’ की प्रदक्षिणा करना शुरू कर दिया.

सयाजीराव महाराज के राज्याधिकार के रौप्य-महोत्सव की पूर्णाहुति हो रही थी. हमारे हृदय में उनका स्थान स्वतंत्र इटली के पहले राजा विक्टर इमेन्युअल के समान था. जब स्वाधीन इटली की राजधानी में उन्होंने प्रवेश किया था, तब मशालधारी विद्यार्थियों का जुलूस निकाला गया था. उसी का अनुकरण करते हुए हम कॉलेज के विद्यार्थी यह जुलूस निकाल रहे थे.

मैं सयाजीराव महाराज का भक्त था. जापान की उज्ज्वल कीर्ति से हमारा आत्मविश्वास दृढ़ हुआ था और हम अरविंद बाबू की भावपूर्ण राष्ट्रीयता में तल्लीन थे. बंगभंग के आंदोलन से हम पागल-से हो गये थे. परंतु बड़ौदा कॉलेज के विद्यार्थियों की सारी देशभक्ति महाराजा साहब के रवैये के आस-पास उछला करती थी. वे हमारी राष्ट्र-स्वतंत्रता की आशा-मूर्ति थे.

जब सभी देशी राजा स्वच्छंद हो विषय-सुख में मस्त थे, तब सयाजीराव ने राज्य में नियम और व्यवस्था का प्रसार किया. भारत में प्रजा के जीवन-विकास के प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने पहला कदम उठाया. यूरोप या अमेरिका में प्रवास के समय रोगशय्या पर पड़े रहने पर भी लोकोपयोगी कार्य आरम्भ करने की उनकी लगन अटूट रही. यूरोप के प्रवास के समय प्रजा की भलाई के लिए आवश्यक कोई भी वस्तु बड़ौदा ले आने के लिए वे उतावले हो उठते. अनेक वायसराय और उनके महंगे सलाहकार भारत को जो चीज़ नहीं दे सके वह महाराजा अकेले ही बड़ौदा को देते रहे.

अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध वे सिर उठाते हैं. रेसिडेन्सी बीच में पड़े, यह उन्हें नहीं जचता.

1903 में कर्जन हुक्म देता है- “दिल्ली दरबार में ‘अपनी’ ताजपोशी के जुलूस में देशी राजा भेंट लेकर आयें और अपने चोबदारों जैसे कपड़े न पहनें.”

इस भेंट देने के कलंकित करने वाले हुक्म के विरुद्ध महाराजा लड़ते हैं और हार जाते हैं.

कर्ज़न जब भारतीय सेना के खर्च के लिए देशी नरेशों से सहायता मांगता है, तब महाराज कठोर उत्तर देते हैं-

“रक्षा-खर्च के लिए ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ को कभी से प्रदेश दे दिये गये हैं, यदि देशी नरेशों की सेना का उपयोग करना हो, तो उन पर विश्वास रखना चाहिए और भारतीय अधिकारियों को भी अंग्रेज़ी सैनिक-शिक्षणालयों में प्रविष्ट होने देना चाहिए.”

कर्ज़न बिस्मार्क की नीति का अनुसरण करके देशी नरेशों को साम्राज्य-तंत्र का अंग बनाना चाहता है. महाराजा साहब अपनी शर्तें लिख भेजते हैं-

“आप देशी राज्यों को साम्राज्य के विषय में निर्णय करने का अधिकार दें, मध्यवर्ती सरकार और देशी राज्यों के बीच प्रश्नों के निराकरण में हिस्सा दें और आंतरिक व्यवस्था में उत्तरदायी शासन की व्यवस्था करें. देशी राज्यों को केवल साम्राज्य का बोझ उठाने में ही नहीं, अपितु अधिकारों और कानूनों में भी समानता दें, तभी सैनिक-खर्च में विवेक-पूर्ण हिस्सा देने को उनका जी चाहेगा.”

यह थी दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की वाणी. दामाजीराव की स्वाधीनता चली गयी, परंतु आज की निःसत्व पराधीनता की अपेक्षा, फेडरेशन और आंतरिक व्यवस्था में उत्तरदायी शासन ही मुक्ति है. 1904 में जब कांग्रेस केवल भाषण करती थी और जनता गहरी निद्रा में पड़ी थी, तब महाराजा साहब घोषित करते हैं-

“सब से उत्तम राजतंत्र वही है, जो जनता द्वारा चलाया जा रहा हो. जनता को अपने हितों की ओर अधिक ध्यान देने वाली बनाना चाहिए. लोगों को ज़िम्मेदारी की आदतें डालने वाली शिक्षा मिलनी चाहिए.”

हमारे बाल-हृदयों में इन उदार शब्दों की प्रतिध्वनि गूंज उठती है.

प्रत्येक विषय में कर्ज़न के दंभपूर्ण दौर से महाराजा टक्कर लेते हैं. 1904 के पश्चात राष्ट्रीयता का चैतन्य रूप प्रकट होता है, उसका केंद्र भी वे ही बनते हैं.

अरविंद घोष उनके निजी कार्य वाहक थे, यह सत्य सर्वदा हमारे सम्मुख चमका करता था. आर्यसमाज के नेता स्वामी नित्यानंद सरस्वती उनके सलाहकार थे, यह भी हम कभी नहीं भूल सकते थे.

महाराजा साहब ब्रिटिश-भारत में सम्मेलनों के प्रमुख स्थान पर आसीन होते हैं. वे एक देशी राज्य के नरेश ही नहीं रहते, भारत के नेता भी बनते हैं. इलाहाबाद में अपार जन-समूह के बीच वे मानपत्र स्वीकार करते हैं.

महाराजा साहब राष्ट्रीयता का मंत्र उच्चारण करते हैं-

“भारत को महान राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकता है, जिससे प्रत्येक मनुष्य अपने लिए नहीं, अपनी जाति के लिए नहीं, वरन अपने राष्ट्र के लिए कार्य करे. रूढ़ि और अंधविश्वास का अपना पुराना ज़माना हमें जीतना चाहिए, स्वतंत्रता से, समानता से, भ्रातृ-भाव से, आचरण की स्वतंत्रता से, विकास-क्षेत्र की समानता से, महान राष्ट्रभावना के भ्रातृत्व से, तभी हम भारत को फिर से राष्ट्र बना हुआ देखेंगे- राष्ट्रीय कला-साहित्य से और समृद्ध-व्यापार से सुशोभित! तभी हम राष्ट्रीय राजतंत्र के अधिकारी बनेंगे, इससे पहले नहीं.”

यह साहसी राजनीतिज्ञ और समर्थ नरेश, अपने भूतकाल का गर्वप्रद अवशेष, अपनी अर्वाचीन स्वतंत्रता की आकांक्षा को मूर्तिमान बना देता है.

उस रात को महाराजा की प्रदक्षिणा करके, हम अपनी राष्ट्र-भावना का पूजन कर रहे थे. हाथ में मशाल लेकर हम उनकी गाड़ी के चारों ओर उछल रहे थे. कोठी के आगे घोड़ों को हटा कर हम स्वयं गाड़ी को खींच कर राजमहल में ले गये. हमारे इस समारोह में केवल शिष्टाचार ही नहीं था. हमारी यह प्रवृत्ति चापलूसी से प्रेरित नहीं थी. इसमें किसी प्रकार के लाभ का लोभ नहीं था. हम नौसिखिए राष्ट्र-भक्त महाराजा साहब को स्वतंत्रता-संग्राम का सेनापति मान रहे थे. हम उत्साह से पागल-से हो रहे थे, पर वह उत्साह था देशभक्ति का. अरविंद की हमें पिलायी हुई देशभक्ति इसकी प्रेरणा-शक्ति थी.

अपने प्रति हमारा यह भाव देखकर वे नम्रता से बोले-

“मेरे जीवन का यह अपूर्व अनुभव है. ज्योतिर्धर के समारोह के समान इस मान के योग्य मैं नहीं हूं. मैंने अपनी प्रजा के लिए जो कुछ किया है, वह तो मेरा कर्तव्य ही है. मैंने भूलें अवश्य की होंगी, परंतु जान बूझकर मैंने कोई भूल नहीं होने दी. मैं भी आपकी तरह मनुष्य हूं. मनुष्य-मात्र भूल का पात्र है. मुझसे भूलें हुई हों, तो उन्हें क्षमा करेंगे. आपके हितों के लिए मैं हर तरह से, जी-जान से प्रयत्न करूंगा, इसका विश्वास दिलाता हूं.”

उन दिनों उनका जीवन उच्च से उच्च शिखर पर था.

भारत में चारों ओर अंग्रेज़ों के प्रति द्वेष फैल गया. नाशिक में जैक्सन का खून हुआ, टीनीवेली में कलक्टर का खून हुआ, लंदन में कर्ज़न वाइली का खून हुआ, मुज़फ्फरपुर में दो अंग्रेज़ त्रियों के खून हुए. 1909 में बंगाल में पब्लिक प्रासिक्युटर मारा गया. अंग्रेज़ों ने भारत में और इंग्लैंड में यह खबर फैलायी कि महाराजा साहब अंग्रेज़ों के विरुद्ध द्रोह भड़का रहे हैं.

1909 में महेसाना में ‘शिक्षक प्रेस’ ने अरविंद घोष के भाषण प्रकाशित किये. ब्रिटिश पुलिस ने तलाशी ली और नोट किया कि बड़ौदा पुलिस ने इसमें जरा भी मदद नहीं की.

महाराजा साहब किसी की परवाह न करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहे. अंग्रेज़ सरकार की आंखों में चुभने वाले आर्य-समाज के सम्मेलन (1911) के अधिवेशन का उन्होंने सभापति-पद स्वीकार किया और उसमें अंग्रेज़ों को फटकारा.

दिल्ली में उन्हें गिराने का निर्णय हो गया. 1911 के दिल्ली दरबार में महाराजा साहब ने सम्राट जार्ज को पीठ दिखाने का भयंकर राजद्रोह किया! उसी अवसर पर उन पर विलायत के न्यायालय में व्यक्तिगत आक्षेप किया गया. अंग्रेज़ी पत्र ‘टाइम्स’ भी उनसे द्वेष करने लगा.

देश की इस विचित्र परिस्थिति में, महाराजा साहब दयनीय अवस्था में अकेले ही थे. श्री गोखले तक ने भी शरण में जाने की सलाह दी. इससे उनके स्वाभिमानी हृदय को आघात पहुंचा. “एक भी व्यक्ति मेरे साथ खड़ा हो तो मैं मुकाबला कर सकता हूं, चाहे परिणाम कुछ भी हो. मैंने किया ही क्या है? लेकिन मुझे सभी ने छोड़ दिया है.” इस प्रकार के उनके कटु वचन एक निकट के अधिकारी ने सुने थे.

भारत के नेतृत्वपद से उन्होंने संन्यास ले लिया. उस वीर आत्मा का गर्व टूट गया. उन्होंने राजा से पीठ दिखाने के लिए क्षमा मांगी और संकट से बचने का मार्ग अपनाया. जब उनका क्षमा-पत्र प्रकट हुआ, तब मैंने सिर कटने के समान घोर अपमान का अनुभव किया.

अच्छे से अच्छे अंग्रेज़ की उनके लिए क्या कल्पना थी, इस विषय में एक मनोरंजक उदाहरण का मुझे स्मरण होता है–

1905 में महाराजा साहब भारत-मंत्री जॉन मॉर्ले से मिलने गये. उस विषय में मॉर्ले लिखता है-

“मालूम नहीं किस अज्ञात कारण से गायकवाड़ ने जाते-जाते अंतिम बार मुझसे इंडिया आफ़िस के बदले मेरे घर पर मिलने की इच्छा प्रकट की. कर्ज़न वाइली इसके कुछ विरुद्ध था. वह मानता था कि ज़रूरत के मौके पर इंडिया ऑफिस के लाल कालीनों में जादू-का-सा चमत्कार है. चाहे आप इसे तुच्छ मानें, पर मेरा सिद्धांत तो यह है कि जितनी कम गड़बड़ी हो, उतना ही अच्छा. ‘एनी थिंग फार ए क्वाइट लाइफ’. अतः विंबल्डन में मेरे ‘टस्कन विला’ में यह राजा आया.

“मैंने उसे समझाया कि मुझे अफसोस है कि मेरे पास इक्कीस तोपें नहीं हैं, मेरे पास तो मुहल्ले के चोरों के लिए छह बोर की रिवाल्वर मात्र है. मुझे विचार आया कि मेरी पुस्तकों के अंबार पर जो संत और ज्ञानी बैठे हों, वे सब इस पौर्वात्य को उनके मध्य पांच बजे की चाय पीते देखेंगे, तो क्या सोचेंगे? परंतु आतिथ्य के समय भी मैं अपने मंत्रि-पद को भूला नहीं और राज्य से लम्बे समय तक अनुपस्थित  रहने के विरुद्ध मैंने उसे वात्सल्य-भाव से समझाया.”

सचेत और लोकप्रिय राजनीतिज्ञ तथा विश्व-यात्रा कर के दूरदर्शी बने हुए अग्रगण्य इस भारतीय के लिए स्वतंत्रता-प्रेम का आडम्बर रचने वाले मार्ले के तिरस्कार की क्या गिनती थी! असहाय भारत ने ऐसे कितने ही अपमान के कड़वे घूंट पिये थे, और यह तो उस समय का बहुत ही उदार माना जाने वाला अंग्रेज़ था!

बाद में महाराजा साहब के साथ मेरा परिचय कुछ बढ़ा. 1935 में उनके हीरक-महोत्सव के अवसर पर बड़ौदा कॉलेज के भूतपूर्व ग्रेजुएटों ने उन्हें प्रीतिभोज के लिए बुलाया. उस समय उसका स्वागत करते हुए मैंने अपने हृदय के भाव इस तरह व्यक्त कियेः

जब हम कॉलेज में आये थे, तब रूस-जापान युद्ध नहीं छिड़ा था, बंग-भंग नहीं हुआ था, राष्ट्रीयता ने प्रचण्ड स्वरूप धारण नहीं किया था. उस समय हमने महाराजा में भारतीयता, बुद्धि, चारित्र्य और राजनीतिज्ञता की विजय देखी थी और आज तीस वर्षों की कठिन कसौटी के बाद भी हम इनमें इनका जीता-जागता उदाहरण देख सकते हैं कि भारतीय राज्य-कला-कौशल किस सीमा तक जा सकता है…”

ऐसे अवसरों पर भी मुझसे विनोद भरी चुटकी लिये बिना नहीं रहा जाता. इससे कभी-कभी गलत-फहमी भी हो जाती है और उस समय मुझे इसका ठीक-ठीक अनुभव हुआ. मैंने भाषण के बीच में कहा-

“मैं आज जिनका स्वागत कर रहा हूं, वे केवल एक राजा ही नहीं हैं, अपितु अर्वाचीन भारत के बड़े से बड़े कुशल शासक भी हैं. पूत के पांव पालने में ही नज़र आते हैं. विटिंग्टन के लिए कहा जाता था कि जिस कला से उसने बचपन में बिल्ली पाली, उसी कला द्वारा उसने लंदन का विकास किया. महाराजा साहब के लिए भी वृद्धजन कहते हैं कि जिस अपूर्व कला से इन्होंने ‘कावलाण’ में गौएं चराई थीं, उसी कला ने इन्हें राज्य संचालकों में अग्रगण्य बनाया… दैव ने इन्हें आवश्यक स्वस्थ शरीर नहीं दिया… आठ हजार मील दूर रहकर भी इन्होंने राजतंत्र चलाने की कला में निपुणता हासिल की.”

परंतु 1935 में ज़माना बदल गया था. बड़ौदा में भी गुजरातियों और मराठों में वैमनस्य उत्पन्न हो गया था. परिणाम-स्वरूप विनोदपूर्ण भाषणों से अपरिचित, भोज में आये हुए लोगों को मेरा महाराजा के विषय में इस प्रकार स्वतंत्रता से बोलना अच्छा न लगा. मराठी पत्रों ने मुझे आड़े हाथों लिया- “मैंने महाराजा साहब के प्रति गुजरातियों का द्वेष व्यक्त किया है. मैंने  उन्हें उनकी गरीबी का स्मरण कराया है. विदेश में रहकर वे राज्य की ओर ध्यान नहीं देते, ऐसा आक्षेप करके मैंने उनका अपमान किया है. मैं कलियुगी हूं.”

हंसें या रोयें?

अर्वाचीन भारत के यह महारथी हमारे महाराजा, मेरे हृदय के कीर्ति-मंदिर में प्रतिष्ठित हैं, इसका उन्हें क्या पता?

जून 1907 के आरम्भ में जब मैं एल. एल. बी. का अध्ययन करने बम्बई आया, तब से बम्बई का ही बन गया.

सबेरे के समय चर्नी रोड पर उतर कर, मज़दूर के सिर पर बक्सा लादकर, मैं पैदल चलता हुआ अपने सौतेले छोटे मामाओं के घर पहुंचा.

मेरे ये तीन मामा पीपलवाड़ी में एक दोहरे कमरे में रहते थे. बड़े मामा और मामी रसोई घर में सोते और बाकी हम सब अगले हिस्से में या छत पर सोते थे.

अब मुझे बम्बई के जीवन का असली अनुभव होने लगा था. पीपलवाड़ी में उस समय दो-तीन ‘चालें’ थीं. उनमें लगभग दो सौ परिवार रहते थे. नल पर हमेशा त्रियों की भीड़ लगी रहती थी और रोज के झगड़े चलते रहते थे.

अधिकतर, लोग पैसे लेकर बिना परिवार वाले मेहमानों को रोटी खिलाते और चाल में सुलाया करते थे. बिस्तरे के रूप में उनके पास एक चटाई, एक गद्दी और एक कम्बल होता था. अधिकतर वहां सोने वाले धोती बिछाकर बिस्तर सजाते और बीड़ी पीते-पीते बड़ी रात तक गप्पें हांका करते थे.

चारों तरफ गंदगी, रसोई में, और कटहरे में. दोपहर में बहुत-सी त्रियां नीचे जूठन फेंकती थीं. जगह-जगह कूड़े के ढेर पड़े रहते थे. कमरों में पसीने की बदबू फैली रहती थी. सारे मकान में रसोई घर और पाखाने की मिश्रित दुर्गंध से दम घुटता रहता था. चाल में आने के लिए एक गली थी. वहां गटर का पानी खुले रूप से बहता था और बीच-बीच में रखी हुई ईटों पर पैर रखकर गली पार करनी पड़ती थी.

मैं बीमारी से उठा था. मैं हवा और रोशनी से भरपूर हवेली में पला हुआ- तापी बहन का लाड़ला था, इसलिए मामी-मामाओं ने मेरे लिए जो कुछ हो सकता था, किया. अपने लड़कों से भी अधिक सुविधाएं दीं, जो लज्जावश मुझे स्वयं अस्वीकार करनी पड़ीं.

थोड़े दिनों बाद एल. एल. बी. में पढ़ने वाले दो मित्रों के साथ मिलकर मैंने निश्चय किया कि हम तीनों कमरा लेकर इकट्ठे रहें. हम तीनों कमरा तलाश करने के लिए निकले. जहां जाते, वहीं प्रश्न होता था- “त्री है क्या?” “खटला हाय का?” और हमारे ‘नहीं’ कहते ही हमें कोरा जवाब मिल जाता था. “हम अच्छे आदमी हैं”- हमारे इस प्रमाणपत्र की उनके लिए कोई कीमत नहीं थी. मेरे पुराने मास्टर की बात सच थी- “त्री-हीन पुरुष विश्वसनीय कैसे हो सकता है?”

अंत में कांदावाड़ी में ‘कानजी खेतसी’ की चाल में ‘भैया’ (चौकीदार) की मनाही की अवहेलना करके हम ट्रस्टी के पास पहुंचे, जो वहीं बैठे हुए थे. ट्रस्टी ने मेरा नाम सुनकर पूछा- “डाकोर में जो अधुमाई मुन्शी थे, उनके तुम कोई सम्बंधी होते हो?”

“हां, मैं उनका भतीजा हूं,” मैंने कहा.

“भैयाजी,” ट्रस्टी ने आज्ञा दी, “इनको अच्छी खोली (कमरा) दो.”

उन्हीं चालों का एक दिन मैं ट्रस्टी बनूंगा, इसकी कल्पना मैंने उस समय स्वप्न में भी नहीं की थी.

हमने जो कमरा लिया, उसके पास गरीब वर्ग के मारवाड़ी रहते थे. सुबह आठ बजे से लेकर रात तक पुरुष लोग काम पर जाते और चाल के हमारी ओर के हिस्से पर मारवाड़िनें राज्य करती थीं. इससे शाम को चार बजे तक हम लोगों को कमरे में ही बैठे रहना पड़ता था. इस प्रकार हमारी स्थिति बड़ी दयनीय हो गयी.

हमारा कमरा नल-पाखाने के सामने था.  सुबह से नल पर त्रियां नहाना शुरू करतीं और नहाते समय दो त्रियां उनकी चौकीदारी करतीं, इससे हमें तो कमरे में ही घुसे  रहना पड़ता था. दोपहर में वे सब चाल में बैठकर बाल संवारतीं. उस समय भी हमें दरवाज़े बंद ही रखने पड़ते थे. वे आपस में लड़तीं-भिड़तीं, बेहद शोर मचातीं, पर दरवाजा खोल कर हम त्रिया-राज्य का तूफान देखने का आनंद भी नहीं ले सकते थे.

इस भीड़-भाड़, इस दुर्गंध, इस दुखी और असह्य जीवन से मुझ में विचित्र-सा असंतोष और रोष उत्पन्न हुआ. मुझे लगातार ऐसा भास होता रहा मानो बम्बई राक्षसों का स्थान है और मैं यह विचार करने लगा कि इन्हें किस प्रकार वश में किया जाय.

हम तीन मित्र साथ रहने को तैयार हुए थे, पर पहले दिन से ही हममें आपस में मेल न हो सका. हम घर का सामान जुटाने लगे. चौकी-बेलना, पत्तल-दोने, दातून और शाक खरीदने पर हम तीनों में इस विषय में विवाद छिड़ गया कि कौन अच्छी-से-अच्छी वस्तु उठा कर घर ले चलेगा. मेरा मन खट्टा हो गया और मैं इन मित्रों के साथ अंग सिकोड़े हुए कछुए की तरह रहने लगा.

हम सबेरे उठकर थोड़ा पढ़ते और दस बजे खा-पी कर सो जाते. दो बजे मैं कांदावाड़ी से निकलता. फणसवाड़ी में ‘दीडकी ची सिंगल’ (एक पैसे की चाय) और ‘दीडकी ची लीमजी’ (एक पैसे की लीमजी) खाकर पैदल चलते हुए पेटिट लायब्रेरी में पहुंचता था. वहां दो-तीन घंटे पढ़ कर पौने छह बजे तक ‘लॉ कालेज’ में हाज़िरी देता और सात बजे पैदल ही घर वापस आता था.

हम तीनों सहपाठियों का साथ-साथ खाने का कोई नियम नहीं था. बड़ी कठिनाई से मिला हुआ रसोइये का लड़का, गगज्यादातर खुद खाकर जो कुछ हमारे लिए ढककर रख जाता था, उसी को मैं खा लिया करता था.

रात को हम तीनों मित्र कदाचित ही कभी बातचीत करते. बिस्तर के नाम पर मेरे पास एक चटाई थी. उसे बिछाकर उस पर लेटे-लेटे मैं थोड़ा पढ़ता और फिर सो जाया करता.

उस समय पेटिट लायब्रेरी मेरा प्रेरणा-स्थान था. जहां तक याद है, दलपतराम के परिचय से लायब्रेरी के ऑफिस के किसी आदमी से परिचय हुआ और अन्य सुविधाओं वाले इस विशाल पुस्तकालय में मैं पहली ही बार संसार के साहित्य सम्राटों का सम्पर्क खोजने लगा.

कुछ समय मैंने इतिहास लेकर एम. ए. करने का विचार किया, परंतु शरीर की अशक्ति देखकर यह विचार स्थगित कर दिया और सिविल सर्विस की परीक्षा के लिए साहित्य, इतिहास आदि विषयों का अध्ययन करने लगा.

मेरे मित्रों में दलपतराम थे. हम प्रतिदिन कहीं न कहीं ज़रूर मिल लिया करते थे. अधिकतर हम साथ-साथ चलकर आया करते थे. उस समय वे अपने चार मित्रों के साथ पांच-छह रुपये महीने किराये की कोठरी में रहा करते थे और कालबादेवी के एक होटल में पांच रुपये महीना देकर खाया करते थे. वहां प्रत्येक खाने वाले को अपना घी दूध ले जाना पड़ता था. अनेक बार ‘भैया’ की दूकान पर खड़े-खड़े हम लोग कुल्हड़ में दूध पीते और भोजनालय में खाना खाने जाया करते थे. दलपतराम की घी की शीशी मेरे कारण जल्दी खाली होती. अनेक बार रात को मैं अपने कमरे में जाने के बदले उनके कमरे में ही सो जाया करता. रात को भोजन के बाद अनेक बार हम चौपाटी पर घूमने जाते और दो-चार पैसों की गंडेरियां लेकर चूसते-चूसते बारह बजे तक बातें करते. मैं दलपतराम को अपनी पागलपन से भरी बातें सुनाता. उस समय मुझे मेरी अल्पज्ञता अग्नि की तरह जलाती.

मेरे लिए बड़ा प्रश्न खर्च का था. उसका मैंने हल निकाला. बड़ौदा कॉलेज में मुझे एल. एल. बी. की पहली परीक्षा में प्रथम आने के कारण अम्बालाल साकरलाल पारितोषिक और बी. ए. में प्रथम आने के कारण ‘इलियट’ पारितोषिक मिले थे. दोनों पारितोषिक पुस्तकों के रूप में मिलने वाले  थे. दलपतराम किसी पुस्तक बेचने वाले के साथ सौदा कर आये. मैंने पुस्तकें देखीं, उनकी सूची बनायी. पसंद न आने वाली पुस्तकें वापिस करने की शर्त करा ली. सूची कॉलेज में भेजकर रुपये मंगाये. उन पुस्तकों में से अधिकांश पुस्तकें उस दूकानदार को वापिस कर दीं और इस प्रकार मैं सौ के लगभग रुपये सामान्य खर्च के लिए प्राप्त कर सका.

हमने निश्चय किया कि दलपतराम की तरह मैं भी लड़कों को पढ़ा कर पैसे कमाऊं. दलपतराम एक दिन खबर लेकर आये कि भड़ौंच जिले के एक व्यापारी के यहां शिक्षक की आवश्यकता है. एक दिन शाम को दलपतराम के साथ मैं वहां गया. दलपतराम ने मेरा परिचय कराया और साथ-साथ यह भी कह दिया कि माणिकलाल मुन्शी डिप्टी कलक्टर थे, उन्हीं का मैं पुत्र हूं.

“अच्छा, वही जो अकाल के समय डिप्टी कलक्टर थे? मैं उनसे अच्छी तरह परिचित था. जब भड़ौंच जाता, तब मिला करते थे. बड़े अच्छे, आदमी थे. आप का क्या हाल है? खुश तो हैं न? आपकी माताजी कैसी हैं?” सेठ ने कहा.

मेरे माथे पर पसीना छूट पड़ा. ट्यूशन की बात करने का मुझ में साहस न रहा.  इधर-उधर की बातें कीं, कभी-कभी मिलते रहने का आग्रह किया.

उस दिन से लड़कों को पढ़ा कर पैसे कमाने की मेरी आकांक्षा लोप हो गयी. इसके पश्चात दलपतराम मुझे ‘इंद्रप्रकाश’ पत्र के ऑफिस में ले गये और वहां मुझे अंग्रेज़ी ‘प्रूफ’ देखने का काम मिल गया.

दो तीन महीनों में ही मेरे पेट में दर्द शुरू हुआ. एपेन्डिसाइटिस उस समय जानी हुई बीमारी नहीं थी. इसलिए जब दर्द उठता था, तब बदहजमी समझकर मैं राई का प्लास्टर रख लेता, जुलाब ले लेता और मुंह में रूपाल रख कर-

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेयशीतोष्णसुखदुःखदाः।

आगमापायिनो।़नित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।

का जाप करके, उस वेदना को सह लेता था.

एक दिन मैं किसी विदेशी थियोसोफिस्ट महिला का भाषण सुनने गेइटी थियेटर में गया. वहीं मुझे पेट में दर्द शुरू हो गया. मुख में रूमाल दबाकर मैंने जैसे-तैसे भाषण  सुना और वहां से अकेला रास्ते में बैठता हुआ, थोड़ी-थोड़ी देर में उल्टी करता हुआ बड़ी देर बाद घर पहुंचा. उस समय मेरे मित्र सो रहे थे. इस दर्द को सहते-सहते मैं सारी रात तड़पता रहा.

मैं जिस प्रकार का जीवन बिता रहा था, वह एकदम निस्सार नहीं था, इसका विश्वास दिलाते हुए मेरी डायरी में एक जगह लिखा है-

“कुछ महीनों से मेरे मन में बड़े ही उदात्त विचार उठ रहे हैं, परंतु मेरा भविष्य बिल्कुल अनिश्चित है. साधन न होने से सिविल सर्विस रह गयी, आत्म-विश्वास न होने से सालिसिटर बनना स्थगित कर दिया. अब बाकी रह गया है एल. एल. बी. एडवोकेट होना. वकालत के काम में मुझे यश मिलेगा? अभी तो कुछ भी नहीं कह सकता. यह काम बहुत ही अनिश्चित और कठिन है. इस पेशे में भीड़ भी बहुत है. मुझमें और कौन-सी बड़ी शक्ति है? चाहे जिस प्रकार भी हो, मुझे लगन और परिश्रम से जुटना पड़ेगा.”

1907 के दिसम्बर मास में जब सूरत में कांग्रेस हुई, तब हम सब दाराशा के घर ठहरे. हम लाल-बाल-पाल के कैम्प में स्वयंसेवक बने. उस प्रसंग का सारा वर्णन मैंने ‘स्वप्नद्रष्टा’ में किया है.

प्राणलाल भाई ने बी. ए. पास किया और 1908 में हम दोनों एक तीसरे मित्र के साथ गिरगाम बैक रोड पर कमरे लेकर साथ-साथ रहने लगे.

लगभग प्रत्येक बुधवार या शनिवार को सुबह या दोपहर में मैं नाटक की बात चलाता. उसका विरोध करते हुए प्राणलाल भाई कहते- “बाप के पैसे खराब होते हैं.” फिर गाना-बजाना शुरू होता. रात को नाटक में चला जाय या नहीं, इस पर विवाद छिड़ता और महीने बाद हिसाब लगाया जाता कि नाटक में कितने पैसे खराब किये.

1905 से 1912 तक बम्बई की रंगभूमि एक प्रकार से अद्भुत थी. बिजली-बत्तियों की जगमग, कीमती दृश्य-सामग्री की चमक-दमक, छप्पर उड़ा देने वाले बंदूक के धड़ाके, चिल्लाहट और पाउडर थोपना, चने-मुरमुरे फांकने के साधन, सरलता से किये जाने वाले खून, प्रत्येक पुरुष-पात्र के सिर पर अंग्रेज़ी स्टुअर्ट राजाओं जैसे नकली लम्बे बाल, जो न अंग्रेज़ी, न तुर्की और न भारतीय- होते थे- ऐसे वेश में आने वाले इंद्रादि देव, क्रूरता और पापाचार का अस्वाभाविक और अमर्यादित प्रदर्शन, ये सब बेजोड़ तत्व वहां होते थे. वास्तव में देखा जाय तो आज की हमारी रंग-भूमि पर दीखने वाली वस्तुएं पचास वर्ष पहले बालीवाला की स्थापित किये हुए रंगभूमि-संसार के प्राण-हीन अस्थि-पिंजर हैं. आज इन अस्थि-पिंजरों को देखकर मेरी रस-वृत्ति मूर्छित हो जाती है. बालीवाला, काउ, खटाउ, महम्मद अली, अमृत केशव नाथक, उसका भाई वल्लभ और मास्टर मोहन– ये सब केवल नट ही नहीं, वरन् ग्रांटरोड की रंगभूमि के विश्व-कर्मा थे. उस अस्वाभाविक सृष्टि में भी प्राण डालने की उनमें कला थी. बालीवाला के ‘हरिश्चंद्र’, काउखटाउ के ‘हेमलेट’ (खूने नाहक) महम्मद अली के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ (उर्दू नाम याद नहीं) अमृत के ‘जहरीला सांप’ (झेरी सांप) मोहन के ‘फांकड़ों फितूरी’ (बांका फितूरी) आदि में अपार आकर्षण था. किंतु इन सब नटों के अभिनय में अपार कृत्रिमता थी. भंगी हरिश्चंद्र बना हुआ बालीवाला हाथ में डंडा पकड़कर ‘प्यारी तारा’ कह कर आवाज़ें लगाता; वृद्ध काउखटाउ नौजवान हेमलेट बनकर अन्य पात्रों के मुसलमानी वेश धारण करने पर भी स्वयं यूरोपीय वेश में सज्जित होता, मोटी फटी हुई आवाज़ में बोलता और छलांगें मारता हुआ चलता. परंतु फिर भी वे अपने व्यक्तित्व से सब को मुग्ध करते थे. अमृत केशव नायक नटों में श्रेष्ठ था. वह प्रत्येक रूप धारण करता और सभी वेशों में लोगों मन हरण करता था. रंगभूमि के नाटकों का कथानक भयंकर और वार्तालाप बड़ा लम्बा होता था.

इन सबमें भी उसकी नाटय़-कला शोभित होती थी. बीड़ी के धुएं से घिरे हुए आठ आने वाले दर्जे में बैठकर मैंने देखा पंद्रह-सोलह वर्षीय नाज़िर नाम का लड़का, लड़की का पार्ट करता था. उसकी आवाज़ जैसी माधुर्य-पूर्ण और हृदय-वेधक थी, वैसी मैंने फिर एक ही बार और सुनी थी और वह भी रोम के ऑपेरा में एक नटी की आवाज़.

इस नाटक में गौहर अभिनय करती थी. उसपर हम सब लट्टू थे. उसके गाने ‘देखूंगी प्यारे अब्बा का मुखड़ा’ को गा-गाकर तो हमारे दिन बीता करते थे.

यह रंगभूमि सर्कस या जादू के खेल की तरह आकर्षक थी. मुझपर उसका कोई गहरा असर नहीं हुआ. उसमें कुछ भी वास्तविक नहीं था, और उसी नाटय़-प्रणाली पर खेले जाने वाले गुजराती नाटकों में मुझे आज भी कोई दिलचस्पी नहीं.

गेइटी थियेटर के संस्मरण बिल्कुल धुंधले हैं. उस समय वहां ‘सौभाग्य सुंदरी’ का ही बोलबाला था. सोलह-सत्रह वर्ष की अपूर्व ‘सुंदरी’ (जय-शंकर) गुजरातियों की आंखों की पुतली के समान थी. जब वह रंगमंच पर आती, तब वहां सोने के कड़ों और अंगूठियों की वर्षा होने लगती थी. उसकी चाल और नखरे देख-देखकर गुजराती गृहिणियां अपने घरों में पतियों को वश में करने के तरीके सीखा करती थीं. उसके स्वप्न देखकर वृद्धों में फिर से यौवन आ जाता था.

जबकि आज भी-

‘मारा तन मां मन मां भर्यो छे, ठर्यो छे, भय, जावं गज जोती!’ गाता हूं, तब ‘सुंदरी’ मेरी दृष्टि के सामने खड़ी हो जाती है; लावण्यमयी, नखरेवाली गुजरातिन के आदर्श के समान, जिस आदर्श को आज भी कदाचित ही कोई गुजरातिन साध्य कर सकी है. ‘कामलता’ नाटक के अनेक गीत तो काव्य ही हैं, और वे मेरी भाव-समृद्धि में गुंथ गये हैः

‘जेवी मने दीधी त्यजी, तेम बीजी ने तजशो नहि,

कोई प्रीतिवश अबला बिचारी भोली ने ठगशो नहि.”

इन पंक्तियों को मैं जब भी सुनता या गाता, मेरी आंखों में पानी भर आता और मुझे ऐसा भास होता जैसे ‘देवी’ इन पंक्तियों को गाते-गाते मरने लगी है. इन पंक्तियों से प्रेरित कल्पना-चित्रों से ही ‘वेरनी वसूलात’ में तनमन की मृत्यु का दृश्य निर्मित हुआ हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं.

(क्रमशः)

नवंबर  2013 

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