सीधी चढ़ान (पंद्रहवीं क़िस्त)

अपनी दूसरी भूमिका में मैं किसी समय अनुभव की हुई मनोदशा को सम्भाले रखकर, उसके

सहारे पात्र और वस्तु की रचना करने का प्रयत्न करता था. इस प्रकार का पहला उपन्यास था ‘पाटन का प्रभुत्व’ और दूसरा उससे भी बड़ा ‘गुजरात के नाथ’. 1918 से व्यवस्था में मेरा हाथ जमने लगा. अपनी शक्ति और भविष्य दोनों के प्रति आत्म विश्वास का विकास होने लगा. इसके परिणाम स्वरूप यदि बम्बई को वश में करने की अभिलाषा रखने वाले प्रभावेच्छुक की स्वानुभूत मनोदशा से काक उत्पन्न हुआ हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है. मंजरी का सृजन कैसे हुआ, यह एक पहेली है. (‘गुजरात के नाथ’ का नायक काक और नायिका मंजरी.) तन-मन का हलकापन इसमें नहीं है. यह समझ में आता है कि शरीर-सौंदर्य देखने की और देखकर प्रसन्न होने की मेरी वृत्ति से उसके रूप का उद्भव हुआ है. कौन जाने मेरी विकसित होती शक्तियों के प्रत्याघात के रूप में कल्पना ने स्त्री का सृजन करके रण-निमंत्रण दिया हो!

1918 में मेरी आर्थिक उलझनें दूर होने लगीं. जगदीश के जन्म पर जीजी मां के आनंद की सीमा नहीं रही. व्यवसाय के और राजनीति क्षेत्र के चढ़ान सरल होते जान पड़े.

उस समय मैं, यूरोपीय संस्कृति को जीवन की पराकाष्ठा माननेवाले मित्रों के सम्पर्क में आ रहा था. भूलाभाई के बहुत ही निकट परिचय के फलस्वरूप उनके अनेक दृष्टि-बिंदुओं को मैंने, जाने या अनजाने, स्वीकार किया. वे एकदम अर्वाचीन थे. उनका ऐच्छिक विषय पर्शियन होने के कारण हमारी प्राचीन संस्कृति के साथ उनका परिचय बहुत कम और परोक्ष था. विजय से पूर्ण उनके प्रवृत्तिमय जीवन में अंतर-मंथनों के लिए समय नहीं था. इस प्रकार हमारे स्वभाव और संस्कार भिन्न होने पर भी मैंने उनकी अनेक मान्यताएं और विशेषताएं उसी प्रकार ग्रहण कीं, जिस प्रकार कौआ मोर-पंख पहनकर घूमता है.

एक दिन मनुकाका ने टोका- ‘कनुभई, तुम तो भूलाभाई की तरह चल रहे हो!’

मुझे बुरा लग गया. मैंने यह मानने का प्रयत्न किया कि मनुकाका की मेरी निंदा करने की आदत से ही इस टीका का जन्म हुआ था. परंतु इससे चुभन हुई और मैं आंतरिक-मंथन में डूब गया. जिनके गुणों पर मैं मुग्ध था, उनकी अनेक बाह्य रीतियों का अनुकरण मैं अनजाने में करने लगा था, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ.

किसी वस्तु को यदि हम निरंतर अपनी कल्पना में रखें और उसके साथ तादात्म्य की भावना बनायें, तो उसके गुण की प्राप्ति हो जाती है. इस विश्वनियम को अपने पर घटते देखकर मैं स्तब्ध रह गया.

1918 में जब मैं अकेला महाबलेश्वर गया, तब मैंने अपने विकास का निरीक्षण आरम्भ किया. निरीक्षण करते हुए मुझे यह भान हुआ कि मेरे पैरों के आगे ज्वालामुखी फट पड़ा है. 1907 से ही मैं प्राणायाम करता, गीता के अनेक चरणों और सूत्रों का जप करता और वैराग्य प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा था. मुझे प्रतीति हुई कि दसों वर्षों में मैं अपने इस प्रयोग में असफल हुआ था. यह सत्य है कि इस प्रयोग से मेरे अंतर की व्यथा कम हुई थी, और मेरा आचरण शुद्ध बना रहा था. परंतु यह प्रयोग स्वाभाविक नहीं था, बल्कि पराये दबाव की तरह कृत्रिम और हानिकारक था. इस अभ्यास से संयम साध्य किया था, परंतु वह उल्हासहीन था. जिस प्रकार साधु कड़वा घूंट पीकर, त्रस्त भाव से पंचाग्नि में बैठता या बाणशैया पर सोता है, उसी प्रकार मैं यह सब करता था. ॐ का ध्यान, शक्ति या आनंद देने के बदले, डंडा उठाकर घबराहट में डालने वाले जेलर की कमी पूरी करता था.

‘कर्मेन्द्रियाणि’ को सीधा रखने में मैं सफल हुआ था, परंतु इंद्रियार्थों ने विचित्र रूप से मेरे हृदय पर अधिकार जमा लिया था. रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द को वश में करने के लिए मैंने अपने पास की ग्रीक शिल्पाकृति की जो तस्वीरें थीं, उन्हें फेंक दिया, परंतु जब भी कोई सुडौल अंगों वाली स्त्री या पुरुष दृष्टिगोचर होता था, तब मेरी कल्पना में उसका चित्र खड़ा हो जाता था, कि उसकी शारीरिक अपूर्वता कैसी होगी! रस को वश में करने के लिए मैंने सादा और फीका भोजन करना आरम्भ किया. परंतु तेल-मिर्च-हीन भोजन में भी मैं रस की सूक्ष्मता परख लेता और वह अधिक सूक्ष्म कैसे हो सकती है, इसके प्रयोग मेरी कल्पना में आ जाते. तब कोई आग्रह-पूर्वक देता, तो दो चमचे शराब भी मैं पी लेता था, परंतु शैम्पेन या आस्टिस्पामांटी की कुछ बूंदों में समाया हुआ रस अधिक सूक्ष्म कैसे लग सकता है, इसका विचार आ जाता था. मादक कविता पढ़ना मैंने छोड़ दिया था, परंतु मेरी स्मरणशक्ति पियर लूई के ‘सॉन्ग ऑ़फ बाइलटस’, बाइबिल के ‘सॉन्ग ऑ़फ सोलोमन’, जयदेव के ‘गीतगोविंद’ या मीरा की किसी विलासी पंक्ति के आस-पास अनायास ही सरस सृष्टि खड़ी कर देती थी.

मैंने भूमि पर सोना नहीं छोड़ा था. कोमल वस्तु को यथाशक्ति वर्जित समझा था. परंतु मेरी कल्पना, कहानी द्वारा या कहानी में आलेखित घटना द्वारा अपनी स्पर्शेंद्रिय में मानव अंगों के मार्दव के संवाद-पूर्ण नर्तन की इच्छा रखती थी. वस्तुस्थिति यह थी कि गीता के शब्दों में विमूढ़ात्मा बनकर मैं मिथ्याचार का उपभोग कर रहा था. ध्यान या जप मुझे नये रूप में नहीं ढाल रहे थे, वरन मेरे स्वभाव की वृत्तियों को आचार में दबाकर कल्पना में प्रबल और सूक्ष्म बना रहे थे- उसी प्रकार, जिस प्रकार पानी एक ओर दबाने से दूसरी ओर ऊपर उठ आता है.

जब मुझे इसका भान हुआ, तब मैं आत्म-तिरस्कार से विंध कर बड़ा व्याकुल हुआ. मेरा दस वर्ष का परिश्रम निष्फल हो गया था.

मुझे यह याद है कि महाबलेश्वर की वृक्षावलियों के बीच अकेले घूमते हुए मैंने अपना दम घुटने से रोका था. मेरे सामने यह कठिनाई आ खड़ी हुई थी कि अपने विकास के टूटे हुए शिखरों को मैं किस प्रकार फिर से निर्मित करूं?

योगसूत्र में अभ्यास की जो व्याख्या दी हुई थी, उसका एक सूत्र मैं चूक गया था. ‘सतु दीर्घकाल नैरंतर्य सत्कारात् सेवितो दृढ़ भूमिः’, सत्कार से मैं इस क्रम को नहीं चला रहा था.

मेरा वैराग्य का आचारात्मक अभ्यास व्यर्थ था. उसमें सत्कार का लक्षण नहीं था. इस कारण पूर्णतया शक्ति, शांति या आनंद प्राप्त नहीं हो रहे थे.

मुझे यही प्रतीति हुई कि अंतर और कल्पना के सत्कार के बिना अभ्यास करना व्यर्थ है.

जब मैं कोई अच्छा भाषण देने के लिए बड़ी तैयारी करता था, तब मेरा भाषण खराब होता था. इसका कारण अब मेरी समझ में आया. मैं निश्चयपूर्वक अपना भाषण देने का प्रयत्न करता था, परंतु अपनी तैयारी होने पर भी मैं तैयारी के बिना खराब बोलूंगा, ऐसी कल्पना उत्पन्न होती थी.

जब मुझे नींद न आती, तब मैं सोने के प्रयत्न करता. मेड़े गिनता, ॐ के मंत्र का जप करता, परंतु सब व्यर्थ जाता. इच्छाशक्ति सोना चाहती थी, परंतु कल्पना-चित्र यह था, कि ‘मुझे नींद नहीं आती.’

मैं अच्छा धाराशास्त्री बनने का अभ्यास कर रहा था. इस प्रयोग में सत्कार था और वह सूक्ष्म हो रहा था. मेरी कल्पना में जिन्ना, सीतलवाड और भूलाभाई खेल रहे थे.

मैं पाश्चात्य संस्कार-प्रेमियों में सुशोभित होने का प्रयत्न कर रहा था. मैं उनके जैसे कपड़े पहनता और उसी प्रकार बातें करने का प्रयत्न करता था. मेरा रहन-सहन और दृष्टि-बिंदु अधिकतर पाश्चात्य बन गया था. परंतु यह कार्य सफल नहीं होता था. बचपन से पोषित मेरी आत्मा में समायी हुई ऋषि की भावना-कल्पना द्वारा इस अभ्यास की अचूकता को वेध डालती थी.

मैं रूप, रस, गंध आदि के द्वारा सशक्त होना चाहता था, परंतु मेरे स्वभाव की वृत्तियां कल्पना द्वारा उसका विरोध करती थीं. इन दृढ़ प्रयत्नों के पीछे कल्पना का बल नहीं था. मेरी इच्छा-शक्ति और कल्पना के बीच जहां विरोध उत्पन्न होता था, वहां कल्पना जीतती और मैं हार जाता. महाबलेश्वर में मैं अनेक बार ‘कोनोट पीक’ पर जाया करता था. वहां यह सब से ऊंची चोटी है. इसके पास अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में जानेवाली नदियों के स्रोत हैं. इस कारण मैं इसे ‘सागरग्रंथि’ कहा करता था.

जब मुझे प्रतीति हुआ कि मेरी सारी भावनाएं निष्फल हो गयीं, और ‘यक्षेदास्यामिमोदिष्ये’ करना ही मेरे भाग्य में रह गया, तब मैं वहां बैठकर रो पड़ा.

इस विषादयोग में मैंने प्रेरणा के लिए दो-तीन बार योगसूत्र पढ़ा, और जो पहले मेरी समझ में नहीं आता था, वह अब समझ में आया.

प्रथम- जिस अभ्यास का स्वभाव सत्कार न कर सके, वह अभ्यास नहीं, मजदूरी है.

द्वितीय- केवल चित्तवृत्ति का निरोध व्यर्थ है. मैं व्यवसाय में एकाग्रता पोषित कर रहा था. केवल दूसरे विषय से मन हटाकर व्यवसाय के विषय में उसे संलग्न रख रहा था. यही नहीं, वरन रात-दिन बड़े बैरिस्टरों के लक्षण मन में रखने से मैं उनके जैसा बनने का प्रयत्न भी कर रहा था. परिणाम स्वरूप मैं भासना का- मैं कैसा होना चाहता हूं, इसका सम्पूर्ण कल्पना चित्र निरंतर उपभोग कर रहा था. इस भावना के बिना निरोध के प्रयत्न में सफलता नहीं मिलेगी.

इन दो नवीन दृष्टियों से मैंने अपना जीवनक्रम निश्चित करना आरम्भ किया. मैंने पुराने तरीके- ध्यान, प्राणायाम, वैराग्य प्राप्त करने का प्रयत्न आदि सब छोड़ दिये. अपने स्वभाव- जिसे मैंने कुचल डालना चाहा था- को ही मैंने मध्यबिंदु बनाया.

स्वभाव- जो कि मैं हूं उसका कारण- ही मुख्य वस्तु है, यह मैंने समझ लिया.

गीता के अनेक समझ में न आनेवाले सूत्रों का अर्थ मेरी समझ में आ गया. स्वभावनियतंकर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषं. अपने स्वभाव के नियमों के अनुसार जो कर्म करता है, वह पाप एकत्र नहीं करता. इसी से भगवान पतंजलि ने कहा है, कि योग साधन करने के लिए यदि और कुछ न हो सके, तो वीतराग में चित्त लगाना चाहिए. यह न हो सके, तो विषयों में और वह भी असुविधा-जनक मालूम हो, तो किसी भी वस्तु में मन लगाना चाहिए. अपने पुराने क्रम को छोड़ देने से मेरे मन में जो यह विचार उत्पन्न हो गया था कि मैं अपराधी हूं, वह दूर हो गया. मैं इसकी छान-बीन करने लगा कि पूर्वग्रह प्रयुक्त किये बिना मेरा स्वभाव किस प्रकार की भावनाओं को सिद्ध करना चाहता है. क्षणभर मैंने ऐसे उल्लास का अनुभव किया कि जैसे मुझे मुक्ति मिल गयी हो.

आत्मदमन करके ‘अपूर्व’ पति बनने में मुझे कर्तव्यभ्रष्टता मालूम होने लगी थी. यह पुरानी रीति मैं त्याग देना चाहता था. मैंने इसकी शुरुआत की. मेरे हृदय में जो प्रणय-विह्वलता का पागलपन था, मेरे भावना-जीवन में सहचरी के बिना जो रिक्तता थी, वह सब मैंने लक्ष्मी से कह देने का निश्चय किया.

कृष्ण भवन, महाबलेश्वर

(तारीख –  20-5-1918)

 

‘आज मैं इन शब्दों से सम्बोधित कर रहा हूं, इससे तुझे आश्चर्य होगा. इसका कारण मैंने नीचे बताया है. फुरसत में तू इस पत्र को पढ़ना और सम्भाल कर रख छोड़ना.

जब मैं महाबलेश्वर आया, तब मेरे मन में अपने जीवन के अनेक प्रश्नों का निर्णय करने की आशा थी. वे प्रश्न कौन-से हैं, यह तूने कभी नहीं पूछा. वे मेरे मन में किस प्रकार रखे हुए थे, इसका तुझे स्पष्ट ज्ञान नहीं था. मैं बताता नहीं था, कारण कि बताने से भला तू समझ सकती थी?… आज तक यह सब इस प्रकार रहा, इसमें दोष किसका है? थोड़ा दोष तेरा और ज़्यादा दोष मेरा है… तू मुझे पहचानती ही नहीं है.’ इसके पश्चात उसमें मेरी हृदय-व्यथा का इतिहास है.

‘अंत में गीता ने मेरे हृदय के घावों को भरा. मेरे पुराने अविस्मृत प्रेम की वेदना कम हुई और तेरे प्रति मेरे व्यवहार में सुधार हुआ, ठीक है न? बालिका का जन्म हुआ और मैंने अपनी प्रतिज्ञा का अच्छी तरह पालन करना आरम्भ किया… ऑपरेशन कराने के लिए मिरज जाते समय मैंने तुझसे अपना दुख कहा था. फिर भी तूने अपने मन में उस बात को नहीं उतारा… मैं क्या करूं? मैं दुख में भी स्वार्थी और आत्म-संतोष में भी स्वार्थी था. अपने हृदय के भंवर को तुझसे छिपाने का पाप मैं करता हूं. जब मैं तेरी तपश्चर्या का विचार करता हूं, तब मेरे मन को कुछ होने लगता है. सदा इसी तरह हम लोग किस प्रकार रहेंगे? 1905 में हमारा साथ हुआ. 13 वर्ष बीत गये. तेरह वर्षों बाद मैं इस निश्चय पर आया हूं… जब तक तेरे प्रति अपना कर्तव्य पालन न करूं, तब तक मेरे समान मिथ्याचारी कोई नहीं है… तू मेरे सारे जीवन में दिलचस्पी लेनेवाली कब बनेगी? वह दिन कब आयेगा, जब तू मेरे विचार को अपना विचार, मेरी भावना को अपनी भावना समझ सकेगी? तू मेरा हाथ नहीं थामेगी?…’

इस अंतिम प्रश्न में, डूबते हुए मनुष्य की-सी करुण प्रार्थना थी. जब हम मिले, तब लक्ष्मी मधुरता और उदारता से हंसी. उसके पास और कोई कहने की बात नहीं थी. उसकी समझ में मैं देवता था, और देवता को ही पागल करने का अधिकार न हो, तो और किसे हो सकता है?

परंतु आदर्श पति बनने के प्रयोग करते हुए इस प्रकार के विशुद्ध सम्बंध में जो कृत्रिमता थी, वह हट गयी और लक्ष्मी मेरी मित्र बन गयी.

मैं उसके समीप निःसंकोच-भाव से अपनी निर्बलताएं स्वीकार करने लगा. वह उन्हें समझने का दावा नहीं करती थी, परंतु मेरे प्रति उदार हृदय से निर्वाह कर लेती थी.

उसके सुख की सीमा नहीं थी.

प्लूटार्क के जीवन-चरित्र में से जो मुझे प्रिय थे उनमें- टामस केंपिस का ‘क्राइस्ट का अनुकरण’, ‘धम्मपद’ और नीत्शे की अनेक कृतियों को मैंने पढ़ा, और उनके अनेक दृष्टिकोणों का मनन किया. अपने उस समय के अंग्रेज़ी अंकनों पर से मैंने आगे जाकर ‘मानवता नां आदर्षनो’ (मानवता के दिव्य दर्शन) लिखा. नीत्शे की ‘सुपरमेन’ की भावना ने मुझ पर बड़ा प्रभाव डाला, परंतु इससे मुझे संतोष नहीं हुआ. ‘सुपरमेन’ के वर्णन के अनुसार मनुष्य राग, भय, और क्रोध-रहित होकर, निर्द्वंद्वता से नित्य स्वस्थ रहकर उसके साथ ही विलासाकांक्षा, प्रभाववृत्ति और प्रणय-तरंगों को निरंकुशता से पोषित कर सकता है, यह कैसे हो सकता है? राग नहीं होगा? द्वेष नहीं होगा? निर्द्वंद्व होने से विलास की सूक्ष्मता किस प्रकार भोगेगा?

जब मैं अपनी इस समस्या को हल करने में लगा हुआ था, तब उन्हीं दिनों ‘गुजरात के नाथ’ की कहानी सम्पूर्ण हुई. हाजी मुहम्मद ने दूसरी कहानी की मांग की, और मेरे मन की विचार-धारा से ‘पृथ्वीवल्लभ’ ऊपर उठ आया.

इस प्रकार ‘पृथ्वीवल्लभ’, आत्मकथा का एक परिच्छेद बन जाता है. इस खींचतान का एक छोर मृणाल थी और दूसरा छोर था मुंज. मृणाल हार गयी. उसका सत्कार-हीन शुष्क वैराग्य गुलामी की जंजीर की तरह शांत हो गया. मुंज की विजय हुई.

‘पृथ्वीवल्लभ’ मेरे हृदय की ज्वाला से सृजित हुआ है, और उसी से वह जीवित है. अनेक लोग मानते हैं, कि मेरी सब कहानियों की अपेक्षा इस कहानी में अधिक कलात्मकता है. इस पर नाटक बना और इस पर से चलचित्र भी तैयार हुआ है. मेरी अन्य पुस्तकों से पहले इसका अनुवाद हिंदी और मराठी में हुआ. बांग्ला और कन्नड में भी इसका अनुवाद हुआ था, वह पुस्तक-रूप में प्रकाशित हुई या नहीं, यह मैं नहीं जानता. गुजरात में भी इसके अनेक संस्करण हुए.

‘पृथ्वीवल्लभ’ जब सम्पूर्ण हुआ, तब भावनगर के प्रोफेसर ने उसकी खूब खबर ली. जब से मैंने ‘काम चलाऊ धर्मपत्नी’ नामक कहानी लिखी थी, तभी से गुजराती विवेचकों का एक दल मुझे कुचल डालने पर सदैव तत्पर रहने लगा था. अब वह समरांगण में कूद पड़ा.

‘काम चलाऊ धर्मपत्नी’ की सूझ मुझे एक अनुभव से हुई थी. एकबार मैं रेलगाड़ी में भड़ौंच जा रहा था, तब एक वृद्ध ने किसी दूसरे की स्त्री और बच्चे को मेरा समझकर मुझे उलझन में डाल दिया था. उस उलझन को मैंने कहानी रूप में प्रस्तुत किया. विवाह के अवसर पर छोटे स्टेशन पर भिन्न-भिन्न बारातें आयीं और उस वृद्ध की भूल के कारण राव साहब- कहानी के नायक- और परायी स्त्री को लोगों ने पति-पत्नी समझ लिया, और अंत में दोनों जब एक शयन-गृह में मिले, तब उन्हें पता लगा कि लोगों ने उन्हें पति-पत्नी समझ लिया है, और इतना ही नहीं परंतु उस सम्बंध के अनुरूप सुविधाएं भी दे दी हैं.

इस कहानी को पढ़कर एक विवेचक ने कहा- ‘यह कहानी लिखते हुए मुनशी का हाथ क्यों न कट गया?’

ऐसे मनुष्यों में, नीति पारे की तरह, सरलता से सरक जाने वाली वस्तु है, और जब साहित्य में अनीति को सम्भव बनाने वाली बेढंगी घटनाएं चित्रित की जाती हैं, तब उन्हें प्रतीत होता है कि वह पारा हाथ से सरक गया है.

‘पृथ्वीवल्लभ’ का साहित्य में सृजन करके मैंने गुजरात में प्रचलित साहित्य-प्रणालियों पर अनजाने में आक्रमण आरम्भ कर दिया था. कलाकार की स्वतंत्रता की धर्म-ध्वजा मेरे हाथ में आकर गिर पड़ी.

मुझे अपना मार्ग स्पष्ट दीख पड़ा. मैंने सेफो के काव्य और बिलिटस के गीत आनंद से पढ़े थे. मुझे ‘गीतगोविंद’ और ‘जानकी हरण’ को जला डालने की कभी इच्छा नहीं हुई थी. मैंने शेक्सपीयर के ‘वीनस और एडोनिस’ की रसिकता से जगत में प्रलय आने की बात कहीं नहीं पढ़ी थी. ‘पृथ्वीवल्लभ’ के हृदय में जो तरंगें थीं, वे यदि मेरे हृदय में जाग गयी हों, यदि उन तरंगों ने मेरी कल्पना के गर्भ में उस पुरुष का सृजन किया हो और उस पुरुष को शब्दों द्वारा संसार में लाने की मुझ में शक्ति हो तथा इस प्रकार जीवनदान दिये हुए व्यक्ति में ऐसा व्यक्तित्व हो, कि लोग पढ़कर उसे अनुभव कर सकें, तो फिर उस ‘पृथ्वीवल्लभ’ को कलंकित करने का जगत को क्या अधिकार है?

जिस संतान को मैंने कल्पना के गर्भ में धारण किया और जन्म दिया है, वह यदि दूसरों को पसंद न आये, तो क्या मुझे उसके टुकड़े-टुकड़े कर देने चाहिए? उसे क्यों न संसार में विहार करने दिया जाए? यदि वह अयोग्य होगी, तो विलुप्त हो जायेगी, जीने और किसी को जिलाने के योग्य होगी, तो जीवित रहेगी.

भिन्न-भिन्न कोटि के लोगों ने ‘पृथ्वीवल्लभ’ पर अपना पुण्य-प्रकोप प्रदर्शित किया है. इस प्रकोप के पीछे की दृष्टि को मैं समझ सकता हूं, परंतु स्वीकार नहीं कर सकता.

यदि इसका नाम ‘कला के लिए कला’ हो, तो उस धर्म को मैंने स्वीकार कर लिया है. और यदि यह मान लिया जाए कि इस सारी वस्तु-स्थिति के रहते हुए भी मैं भूल कर रहा हूं, तब भी मुझे ‘पृथ्वीवल्लभ’ लिखने के लिए कभी पश्चाताप नहीं हुआ.

मैंने बचपन से ही संसार के साहित्य-सम्राटों- व्यास और कालिदास, होमर और गाइथे, ड्यूमा और ह्यूगो, शेक्सपियर और शेली की चरणरज को शीश झुकाकर मस्तिष्क पर चढ़ाया है. मुझे गुजराती नहीं आती. मेरी कल्पना के पंख इतने शक्तिशाली नहीं हैं कि मैं जहां चाहूं, उड़ सकूं. मेरी सृजन-शक्ति परिमित है.

मैंने सरस्वती की पूजा की है, दीनता से, शिशुभाव से.

मैंने अपना हृदय चीरकर उसके चरणों में ‘पृथ्वीवल्लभ’ को रखा है. यह पुष्प यदि किसी को नीरस मालूम हो या पल भर में मुरझा जानेवाला हो, तो इससे मुझे क्या?

अंजलि-रूप बनने में ही इस पुष्प की पहली और अंतिम सफलता है.

1921 का अप्रैल मास आया. कोर्ट में छुट्टियां हुईं और हम माथेरान के ‘सहारा कॉटेज’ में रहने गये. मेरा खयाल था कि व्यवसाय के, साहित्य के और आत्मविकास के चढ़ाव की समाप्ति पर मैं आ रहा था. लक्ष्मी अब सच्ची सहचरी बन गयी थी. मेरे और उसके बीच कर्तव्यपरायणता का अंतर नहीं रहा था. मेरी तरंगों और भावनाओं की सहयोगिनी नहीं मिल सकती, यह सोचकर मैं संतोष धारण कर रहा था.

जीजी मां की तपश्चर्या भी फलीभूत हो गयी थी. दौहित्र ठिकाने लग गया था. कसनदास मुनशी की हवेली के आगे ही उसके पुत्र की हवेली उन्होंने बनवा ली थी. अड़सठ तीर्थों की यात्रा कर चुकी थीं. बेटा-बहू स्थिर हो गये थे. टेकरे की रौनक पुनः आ गयी थी. जब घर में निवास किया गया, तब उन्होंने गंगा-पूजन कराया था. जाति में मिठाई बंटवायी थी. ‘सहारा कॉटेज’ के झूले पर वे प्रतिदिन बैठा करती थीं. उनके साथ उनके साथी भी होते थे- पनडिब्बा, हिसाब का रजिस्टर, पेंसिल, ऐनक, सरला और जगदीश. ‘भाई’ के मित्र और मित्र-बंधुएं भी आते जाते रहते थे. दौहित्र अपनी बहू के साथ आया. ठाकुरमाई और भाभी भी आये.

प्रतिदिन बेटा, बहू और बच्चे घोड़े पर बैठकर घूमने जाते और जीजी मां खुशी से फूली न समातीं. ‘तापी बहन’, ठाकुरमाई कहते- ‘रोज शाम को तुम्हारा बेटा बारात के घोड़े पर चढ़ता है और बहू लेकर घर आता है’ -और जीजी मां हंस पड़तीं.

परंतु पुत्र के हृदय की व्यथा उनसे छिपी नहीं थी. उसके किये हुए प्रयत्नों की वे साक्षी थीं. इसीसे ईश्वरभक्ति और आध्यात्म-ज्ञान को गौण समझकर, वृद्धावस्था का भार दूर हटाकर, पुत्र के विचार और भावना में हिस्सा बंटाकर वे उसके एकाकीपन के भार को हलका करती थीं.

पुत्र कहानी लिखता, तो पहले जीजी मां को पढ़कर सुनाता. वह कुछ करके आता कि तुरंत उसे वे उसके मुख से सुनतीं. उसकी कृति या उसके विषय में कुछ छपता तो उसे वे पढ़तीं, और काटकर तथा सम्भालकर रख लेती थीं.

1919 से मुझे जो नये सत्य दिखलाई पड़ने लगे थे, उनका मैं व्यवस्थित रूप से मनन कर रहा था. अनेक बार जल्दी उठकर ‘बलवर्धन’ शृङ्ग पर जाकर पुराने आत्म-विकास के क्रम को नया रूप प्रदान करता था.

मेरी विचारधारा एक ही मध्य-बिंदु के आस-पास घूमा करती थी. मेरे स्वभाव में मेरी शक्ति, विकास और मेरी आत्म-सिद्धि का क्षेत्र, समृद्धि और साधन तीनों थे. उसी में से और उसी के द्वारा मुझे अपना कर्तव्य खोज निकालना था, उसी में से मुझे उसका अनुसरण करने की शक्ति प्राप्त करनी थी. यह स्वभाव और कर्तव्य आत्मा थी और जो उसका विरोधी हो, वह अनात्मा.

मई के अंत में मैंने अंकित किया-

‘यदि मुझे अपने विकास की साधना करनी हो, तो अपने स्वभाव-विरोधी तत्वों के साथ बिगतज्वर होकर युद्ध किये बिना मेरा विस्तार नहीं है. अन्यथा मैं तिनके के तुल्य सिद्ध हूंगा. इन विरोधी तत्त्वों- अनात्मा के विरुद्ध जूझना मेरे व्यक्ति-विकास का पहला कदम है.

प्रत्येक कदम पर मेरा विकास होता है- मैं जैसा था या जैसा हूं, उससे भिन्न बनता हूं. परंतु इस निरंतर होनेवाले विकास के अंत में क्या है? केवल यही कि मैं जैसा हूं उससे भी अधिक प्रौढ़ बनूं, अधिक आत्मवान बनूं, बस यही. इस प्रकार उत्तरोत्तर अधिक आत्मवान बनने की क्रिया-भावना ही मेरे और सबके जीवन की मुख्य क्रिया है.

इस क्रिया से प्रौढ़तर व्यक्तित्व प्राप्त करते जाने का नाम ही आत्म-सिद्धि है. अतः मेरी स्वभावजन्य वृत्तियों के सर्वांगसुंदर विकास में ही आत्मसिद्धि-मोक्ष-सन्निहित है. प्रत्येक भावनाशील पुरुष का यही ध्येय होता है, मेरा भी यही ध्येय हो सकता है. आत्मसिद्धि प्राप्त करने की मेरी इच्छा नग्न-पशुता का आनंद उठाने की इच्छा से भिन्न है. यह अधिक सम्पूर्ण और संवादी जीवन भोगने की इच्छा है.

जो कुछ मेरे स्वभाव में है, उसे ही मूलभूत सामग्री समझकर, उसी को समृद्ध करने की यह इच्छा है. यह इच्छा भी इसमें समायी हुई है, कि मेरी शक्तियां इस प्रकार विकसित हों कि जिससे कार्य-अवकाश के नये क्षेत्र मिल सकें.

ऐसे महान व्यक्तियों की, जिनमें आत्मीयता अधिक परिमाण में हो, प्रशंसा करने की इच्छा मुझे होने लगती है. यह भी इसी का एक अंग है.

इस इच्छा का ध्येय निरंतर अधिकाधिक विकास-सिद्धि के लिए आकुल होना है- तृप्ति नहीं, मुझे यदि तृप्ति होती है, तो भावना की क्रिया रुक जाती है. यदि तृप्ति न होने दूं और क्षण-क्षण पर विकास प्राप्त करने को- अपूर्वता पाने को तरसता रहूं, तो उसके फलस्वरूप मैं भावनात्मक अपूर्वता को प्राप्त कर लूं.

दुर्भाग्यवश अब तक मैंने अपने बाह्य स्वरूप को विकसित करने का प्रयत्न किया है- आंतरिक स्वरूप को नहीं.

मैंने बाल संवारे, अपनी आवाज़, रहन-सहन और आचार को सुधारने के प्रयत्न किये. मैंने शारीरिक और मानसिक साधनों से समृद्ध होने के लिए परिश्रम किया. मुझे कुछ बनने की इच्छा थी. लोगों का ध्यान आकर्षित हो और मेरा प्रभाव पड़े, ऐसा व्यक्ति मैं बनना चाहता था. परंतु आत्मसिद्धि, जिससे कि व्यक्तित्व प्राप्त होता है, वह इस साधन या समृद्धि से नहीं मिल सकती. वह तो अपने स्वभाव की शक्तियों को अधिक अच्छी तरह व्यक्त करने, अधिक प्रौढ़ व्यक्ति बनने से मिल सकती है.

मैं कमाता हूं, मैं घूमता-फिरता हूं, मैं लिखता हूं, परंतु उनमें विकास नहीं है, महत्त्व नहीं है. मैं क्या था और आज क्या हूं? इसका माप ही मेरे महत्त्व का माप है. ‘करने’ की अपेक्षा ‘होना’ ही सत्य वस्तु है. ‘मैं करता हूं’ और ‘मैं किया’ यह मिथ्या बकवाद मैं किसलिए करता हूं? मैं अधिक अंश में ‘हो जाऊं’ तो अन्य प्रकार की सेवा की अपेक्षा अधिक सेवा करूं. मेरे सच्चे महत्त्व का माप मेरे व्यक्तित्व में है, कार्यों में नहीं.

जब मैं किसी महापुरुष से मिलता हूं, तब उसके कार्य की अपेक्षा वही बड़ा दीखता है. मिल्टन ने कहा है कि जब तक कवि का जीवन महाकाव्य न बन जाए तब तक वह महाकाव्य नहीं लिख सकता. यदि मैं इसके लिए निरंतर प्रयत्न करता रहूं कि मेरी कल्पना और अनुभव केवल उत्तरोत्तर बढ़ती हुई अपूर्वता को प्राप्त करे, तो मुझे भावनात्मक अपूर्वता मिल सकती है.

भावनात्मक अपूर्वता के लिए तरसे बिना यदि केवल सिद्धि की अभिलाषा करता हूं, तो मुझे आनंद प्राप्त नहीं होता. उस स्थिति में तो तृप्ति मुझे दग्ध करती है. भगवान व्यास के कथनानुसार मैं ‘पतन्ति नरके।़शुचौ.’ का अनुभव करता हूं. ‘न चायुक्तस्य भावना न च भावयतः शांति अशांतस्य कुतः सुखम्,’ यह सूत्र भलीभांति मेरे समझ में आ रहा है. प्रयत्नों की परम्परा के सिलसिले में यदि मैं बढ़ती हुई अपूर्वता का उपभोग करूं, तो मैं सशक्त, सुंदर और विशिष्ट बन जाऊं. बाह्य आचार के उपयोग को मेरा हृदय रोक रहा है. परंतु यदि मुझे सारा संसार मिल जाये, और मैं अपनी आत्मा को खो बैठूं तो वह किस काम का है?

मैं जगत जीतने के लिए निकलूं और जीते हुए जगत को अपना न बना सकूं, तो इसका क्या अर्थ है?

मैं अपने स्वभाव के अनुसार ही- अपने तरीके पर ही जीवित रहूं, यही अब मेरा धन है- बाकी सब मिथ्या है.

‘स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्।’ थोड़े ही दिनों के बाद मैं इस नये दर्शन को सूत्र-रूप में अंकित करता हूं-

  1. आनंद वह है, जो प्रत्येक अनुभव पर अधिक सूक्ष्म अनुभव करने की उल्लासमय आकुलता उत्पन्न करता है.
  2. जिस अनुभव के बाद पुनः वही अनुभव करने की इच्छा न हो, वह तृप्ति है.
  3. अनुभव या कलाकृति, आचार या विचार, जिसका अधिक सूक्ष्म स्वरूप में साक्षात्कार करने की तीव्र उत्कंठा होती रहे, वह आकुलता है.
  4. जहां भावनात्मक अपूर्वता होती है, वहां सरसता अवश्य होती है. जहां तृप्ति से अरुचि उत्पन्न हो, वहां से सरसता लुप्त हो जाती है.
  5. अपूर्वता के लिए आकुलता बढ़ने से व्यक्तित्व का विकास होता है. जिस कर्तव्य से व्यक्तित्व बढ़ता है, वह धर्म है, जिससे नहीं बढ़ता वह सब अधर्म है.

प्रणाली के अनुसार निर्मित मेरी समझदारी इतनी जबर्दस्त थी कि रसिक होना विषय-लम्पटता का स्पर्श करना है. इस भ्रम को अनजाने में मैंने अपनाया था. परंतु कल्पना और जीवन की विविधता का उपभोग करने की अपनी रसिकता से मुझे लज्जित होने की क्या आवश्यकता है?

इन विचारों का पहला परिणाम यह हुआ कि रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द की सरसता के प्रति अपनी वृत्तियों पर दबाव डालने की अपेक्षा मैं उनकी अपूर्वता को खोजने लगा. मैं केवल फीकी और उबली हुई चीज़ें खाया करता था. उसके स्थान पर केवल तेल-मिर्चों के सिवा अन्य सब चीज़ें थोड़ी-थोड़ी खानी आरम्भ कर दीं. कोई भी वस्तु अधिक नहीं खाता था जिससे कि तृप्ति होती मालूम हो. इस प्रकार मैं एक रोटी खाने लगा. कम खाने से शरीर में सुधार हुआ और प्रत्येक वस्तु थोड़ी-थोड़ी खाने से सूक्ष्मता से उसका स्वाद ले सका. इसी प्रकार मुझे जो रूप, स्पर्श और शब्द की सूक्ष्मता का अभ्यास करने में हीनता मालूम होती थी, वह दूर हो गयी. जप, ध्यान और प्राणायाम मैं आत्मदमन के लिए किया करता था. अब उसके स्थान पर उन्हें आतुरता का पोषण करने का और तृप्ति को रोकने का साधन बनाया.

कला और साहित्य में स्थित मेरी सरसता के खयालों पर भी इन विचारों ने नया प्रकाश डाला-

‘मनुष्य की शरीर-रेखाओं में स्थित सरसता को बार-बार देखने-अनुभव करने की मुझमें उत्कंठा होती है. इस सरसता को परख कर मुझे आनंद मिलता है, इसे अनेक बार अनुभव करने पर भी इस आनंद से अरुचि नहीं होती. विनस डी मेलो या एपेलो बेल्वेडियर देखकर मुझे तृप्ति नहीं होती. इस आनंद में तृष्णा नहीं है. ज्यों-ज्यों आनंद का अनुभव करता हूं त्यों-त्यों उसकी सीमा बढ़ती जाती है. इनसे मुझे विषय-लालसा नहीं होती. मैं शुद्ध हो जाता हूं. मेरी शक्तियां भावनाशील बन जाती हैं. शरीर और उसके संग के प्रति मेरे मन में मान और पूज्य भाव उत्पन्न होता है.’

‘इसी प्रकार साहित्य की सरसता-स्वरूप एपिसाइकिड्यन, बिलिट्स के गीत, गीतगोविंद या मेघदूत को बार-बार पढ़ने से मुझमें अधमता नहीं आती. मेरी प्रणयभावना सूक्ष्म होती है.’

‘इस सूक्ष्मता में मैं क्यों न प्रसन्न होऊं?’

इस भावना धर्म के वशीभूत होकर मैंने उन्हीं दिनों नये-नये संकल्प किये.

अब तक मैं कहानियां लिखकर संतोष कर लिया करता था. अब मैंने गुजरात की अस्मिता, साहित्य और कला के तथा मानवता के प्रति अपने आदर्श गुजरात को समक्ष रखने का निश्चय किया. यह मेरा धर्म बन गया. इस धर्म के अनुरूप बनने के लिए मैंने महाभारत और अन्य पुराण, गुजरात के साहित्य और इतिहास का अध्ययन आरम्भ किया. ‘बलवर्धन शृङ्ग’ पर बैठकर मैंने आदिपर्व शुरू किया.

इस प्रकार मैंने 1921-22 में महाभारत, वायु, मत्स्य, मार्कण्डेय, शिव, विष्णु, भागवत और ब्रह्मांड पुराण पढ़े. कोई यह न समझ बैठे कि मैंने उन्हें संस्कृत में पढ़ा. मेरा संस्कृत का ज्ञान बड़ा सीमित है. साधारणतया मैं संस्कृत के अंग्रेज़ी या गुजराती अनुवाद पढ़ता था. और जहां सुंदर वर्णन आता था, वहां उसका मूल पढ़ता था, उस अध्ययन के भी मैंने विस्तार के साथ उदाहरण लिये. यह अध्ययन मैंने 1922 में भी अवकाश के समय जारी रखा. उसी के अंतर्गत गुजराती में ‘भारतीय इतिहास के सीमाचिह्न’, ‘राम जमदग्नेय’ आदि लेख लिखे. इस प्रेरणा के द्वारा 1922 में ‘पुरंदर पराजय’ नामक मेरा पहला नाटक लिखा गया. और बाद में पौराणिक और वेदकालीन नाटक और उपन्यास भी इसी प्रेरणा द्वारा लिखे गये.

महाभारत के पढ़ने से मानवता के अनेक रहस्य मेरी समझ में आये और मैंने ‘मानवता के दिव्य दर्शन’ (मानवता नां आर्ष दर्शनां) शीर्षक आदिवचन लिखा.

उसमें मैंने आर्यत्व की भावना को अपनी नयी दृष्टि के अनुसार आलेखित किया-

‘आर्य शक्तिशाली है, उसकी बुद्धि राग-द्वेष से अस्थिर नहीं है, वह नित्य सत्वस्थ है. वह अपनी आत्मा, अपनी विशिष्टता, अपने स्वभाव और शक्ति के रहस्यों को देख सकता है. वह अयुक्त नहीं, एक आत्म-संवादी शक्ति है, योगी है.’

अपने स्वभाव को लाक्षणिक महाशक्ति में परिवर्तित कर डालना ही आर्य मानवता है. जब आर्य तेजोमय और प्रतापी बनी हुई अपनी स्वभावजन्य विशिष्टता के साथ तादात्म्य की सिद्धि करता है, तब इंद्र के वज्र की तरह, विद्युत के बल के समान वह एक प्राकृतिक शक्ति बन जाता है. वह अपने स्वभाव- आत्मा की ही विशिष्टता के पथ पर विचरण करता है. मयि सर्वाणि कर्माणि कहकर सारे कर्तव्यों को अपनी ही बुद्धि से योग्य समझकर वह युद्ध करता रहता है- श्री, विजय और भूति प्राप्त करने के लिए, अपने स्वभाव की सिद्धि प्राप्त करने के लिए, अपने आपको ही अपना शासनकार, अपने आपको ही अपनी नीति और अपने स्वभावजन्य धर्म को ही अपना धर्म समझकर.

 

हम सबों के होमरूल लीग में जुड़ जाने के पश्चात ‘गुर्जर सभा’ समाप्त हो गयी थी. ‘षड्रिपुमंडल’ में से इंदुलाल निकल गये थे. कांतिलाल पंड्या आगरा में प्रोफेसर नियुक्त हो गये थे. बाकी रहे हुए हमलोग परस्पर स्नेह-सम्बंध का आनंद उठा रहे थे.

1915 में जब से मैं सूरत की साहित्य-परिषद में गया था, तब से मनहरराम मेहता से मेरा परिचय हुआ था. वे साहित्य-परिषद के परम-भक्त थे और सूरत में भी उसकी योजना बनाने के लिए उन्होंने प्रयत्न किये थे. वे हाई कोर्ट में दुभाषिये थे. धीरे-धीरे हमारी मित्रता बढ़ने लगी. उनकी इच्छा थी कि बम्बई में एक साहित्य-विषयक संस्था स्थापित की जाय.

उस समय मनहरराम ने ‘रामछंद’ का आविष्कार किया था, और रामायण का बालकांड उन्होंने उसी में लिखा था. मुझे वह छंद बड़ा पसंद आया था.

नानालाल के अपद्यागद्य की अपेक्षा यह अधिक सुगम और नियमबद्ध है. और मेरा मत है कि यदि कोई सिद्धहस्त कवि इस छंद में आलेखन करे, तो गुजराती कविता बड़ी समृद्ध हो जाये.

मनहरराम ने इसी छंद में ‘शिवाजी और आ़फजलखां’ नामक काव्य लिखा था और जब वह प्रकाशित हुआ, तब उसे पढ़कर मैंने शिवाजी महाराज के स्मरण ताजे किये थे.

1921 में चंद्रशंकर मुझसे कहा करते थे कि मैं ‘समालोचक’ का सम्पादक-पद स्वीकार कर लूं. मैंने यह निमंत्रण स्वीकार किया, परंतु इस शर्त पर कि उसका स्वामित्व एक कम्पनी को सौंपा जाए, जिसमें दस हजार के शेयर हों और चंद्रशंकर तथा मैं दोनों सम्पादक बनें. गोवर्धनराम के पुत्र रमणीयराम को यह बात पसंद न आयी. मैंने सारी तैयारी कर रखी थी. अतः मनहरराम और मणिलाल नानावटी के साथ मैंने परामर्श किया, और नरसिंहराव भाई का आशीर्वाद प्राप्त करके 1922 के मार्च में ‘साहित्य प्रकाशक कम्पनी’ और ‘साहित्य संसद’ की स्थापना की.

‘गुजरात’ के पहले अंक से ही भारी धूम मच गयी. उसकी लेखमाला में रणजीतराम का ‘हेमीओ’, मेरा उपन्यास ‘राजाधिराज’, ललित का ‘सखि, आनंद वसंते’, मनहरराम का लेख ‘गुर्जर संगीत’, प्रो. शाह का नाटक ‘मने नहीं’, रायचुरा का ‘गुजरातण राधा’, धनसुखलाल का ‘अमारी नवल कथा’, शंकरप्रसाद रावल का ‘नवुं साहित्य’ आदि थे.

‘गुजरात’ की अभिलाषा केवल ‘वीसमी सदी’ का स्थान लेने की ही नहीं थी, वरन गुजरात की अस्मिता का संदेश-वाहक बनने की थी. पहले अंक में ही सम्पादक के स्थान से मैंने यह संदेश स्पष्ट करने का प्रयत्न किया-

‘दुनिया में और भारत में प्रकट हुई नयी भावनाओं और चैतन्य के कारण गुजरात में भी कुछ-कुछ आशाएं और प्रवृत्तियां प्रकट हुई हैं. हमारे साहित्य और संस्कार के व्यक्तित्व का स्पष्ट रूप से विकास करने के लिए सब ओर प्रयत्न हो रहे हैं, और इस व्यक्तित्व के फल स्वरूप जीवन में संस्कार, भाषा और भाव, कला और समाज में सांस्कारिक अस्मिता प्रकट हुई दीख पड़ती है. इस अस्मिता को व्यक्त करके, उसका विकास करके, गुजरात को अन्य सब संस्कृतियों में एक संस्कारात्मक के रूप में स्थान देना- इस प्रकार की भावना की तरंगें चारों दिशाओं में फैली हुई हैं. इन तरंगों में बहे हुए अनेक गुजरातियों की इच्छा से इस ‘साहित्य संसद’ को खड़ा किया गया है… यूरोपियन तत्त्वज्ञानी देकार्त कह गया है- ‘मैं विचार कर सकता हूं, इसी से मेरा अस्तित्व मुझे मालूम होता है.’ आज गुजराती भी यह कह सकते हैं कि हमारा जीवन हमें निराला मालूम हो रहा है. गुजरात का इतिहास, आचार और विचार औरों से भिन्न प्रकार का, अधिक लाक्षणिक दिखाई देता है. गुजराती युवक का आत्म-त्याग, गुजराती स्त्रियों का चरित्र-बल, गुजराती नागरिकों का उत्साह, गुजराती जनता का साहस, गुजरात के गांधीजी का जीवन और आदेश निराले हैं, निराले होते जा रहे हैं, और इसी से उसकी सांस्कारिक अस्मिता काल्पनिक नहीं, वास्तविक है, और इसी से उसे साहित्य में व्यक्त करने का प्रयत्न मिथ्या नहीं, वरन आवश्यक है.’

1922 के मई मास में हमारे साहित्य-व्योम में एक नया तारा उदित हुआ.

1918 के अंत में मैं बाबुलनाथ पर रहने आया. थोड़े दिनों बाद एक दिन मैं अपनी छत पर खड़ा था और रास्ते से इंदुलाल और उनके मित्र निकल रहे थे.

‘क्यों मुनशी कैसे हो?’ इंदुलाल ने मुझे नीचे से पुकारा. ‘लीला बहन, ये हैं मुनशी.’ उसने परिचय कराया और हमने एक दूसरे को नमस्कार किया.

बड़ी-बड़ी आंखें हंसती दिख पड़ीं. चलने का ढंग भी मेरी दृष्टि से बाहर न रहा. लीला के विषय में चंद्रशंकर ने मुझसे अनेक बातें की थीं, वे मुझे याद ही थीं. अहमदाबाद के किसी धनाढ्य की वह पत्नी थी. साहित्य रसिक थी और कविता लिखती थी. मेरे मित्र जनुभाई सैयद की शिष्या थी. इंदुलाल उसके मित्र थे. मास्टर उसके मामा के मित्र होने के कारण उसे भांजी की तरह मानते थे.

जिस मकान में मैं रहता था, दूसरे दिन उसी मकान का ब्लॉक किराये पर लेकर लीला का परिवार उसमें रहने के लिए आया.

रात को लीला मुझसे मिलने के लिए ऊपर आयी. बचपन में ‘तनमन’ की कहानी पढ़ने के बाद उसके रचयिता से मिलने की उमंग उसके मन में उठ आयी थी. लक्ष्मी ने और मैंने उसके साथ कुछ देर बातें की.

अनेक बार रात को, जब मैं और लक्ष्मी कुछ देर तक छत पर बैठा करते थे, तब एक-दो बार लीला हमसे मिलने के लिए आयी थी. एक बार इब्सन के नाटकों के विषय में हमने चर्चा की. गुजराती स्त्रियों में कदाचित ही पायी जानेवाली उपहास करने की आदत को उस समय उसने अपने में पनपाया था. स्त्रियों के अधिकारों के विषय में उसका उत्साह अपरिमित था.

स्त्रियों के प्रति मेरी दृष्टि सामान्यतया तिरस्कार-युक्त थी. अपने अध्ययन के गर्व में मुझे इस उन्नीस वर्ष की लड़की के अध्ययन और दृष्टि में छिछोरापन मालूम हुआ.

जब भी मैं किसी नयी स्त्री के साथ बात करता था, तभी ‘देवी’ के स्मरण संचय की दीवार हमारे बीच खड़ी हो जाती थी. जहां किसी स्त्री का अपने प्रति जरा भी पक्षपात दृष्टि पड़ता था, वहां से मैं भाग खड़ा होता था. इस अवसर पर भी कुछ ऐसा ही हुआ.

1920 में लंका के सफर से वापस आने पर लीला मुझसे मिलने आयी. बिना पति के, केवल स्त्राr-सखी और पुत्री को साथ लेकर भारत-भ्रमण करती हुई यह युवती प्रत्येक का ध्यान आकर्षित कर लेती थी. मैंने किसी रुद्राक्ष और शुक्लाम्बर-धारिणी पुण्यभागिनी तापसी के स्वप्न-दर्शन के समान कुछ क्षण उसे देखा और फिर वह अदृश्य हो गयी.

उससे मिलने के बाद यह विचार आने लगा कि हजारों बार जिस ‘तनमन’ का चिंतन किया है, वह अब नहीं मिलेगी. 1907-8 के बाद जो दुख दूर हो गया था, वह पुनः होने लगा. मन में यह पागलपन भरी कल्पना उठती और दूर हो जाती थी कि कहीं इस रूप में ‘तनमन’ तो नहीं आ गयी है? परंतु मैंने कल्पना पर काबू पा लिया. मैं अब व्यवहारी बन गया था.

1922 के अप्रैल-मई में हमलोग महाबलेश्वर में बंगला लेकर रहे. सबेरे तीन घंटे तक जब मैं घूमने जाता, तब रस-भरी कल्पनाएं मुझपर अधिकार जमा लेतीं. उस समय मैं ‘राजाधिराज’ की ‘मंजरी’ का सृजन कर रहा था.

उन्हीं दिनों लीला ने अपने लिखे हुए रेखाचित्र (रेखाचित्रो) ‘गुजरात’ में छपवाने के लिए मेरे पास भेजे. बाद में उन लेखों का ‘रेखाचित्रो’ नाम मैंने ही बताया था.

मैंने उसका पत्र पढ़ा और रेखाचित्र भी पढ़े. उसके लिखे हुए मेरे रेखाचित्र में मैंने पढ़ा-

‘मनुष्य-स्वभाव परखने की इनकी शक्ति अद्भुत है. इनमें बुद्धि की ज्योति चमकती है और साथ ही अहं की चमक भी उतनी ही है.’

‘बुद्धि के शिखर पर से ये बेचारे जगत पर दृष्टि डालते हैं. किसी ने यह कहा है कि इनके पात्रों में गर्व बहुत है, इनके विषय में भी यह कहा जा सकता है.’

‘केवल पृथक्करण करने के लिए ही ये सायन्टिस्ट की तरह जनता के साथ मिलते हैं. स्वभाव के सारे तत्वों को ये देखते हैं, दयाहीन रूप से उसका वर्गीकरण करते हैं और यह समझ सकते हैं कि ऐसा कर सकता हूं.’

‘ऐसे मनुष्य की बुद्धि के आगे जगत झुक सकता है, पर उसे प्रेम नहीं कर सकता. आत्मसम्मान अधिक है, दूसरों की ओर तिरस्कार-पूर्वक देखने की वृत्ति भी कुछ अंशों में है, रहन-सहन सभ्यता-पूर्ण और अच्छा है.’

वे जगत के प्रति लापरवाह हैं, कारण कि उससे वे कोई अभिलषित वस्तु प्राप्त नहीं कर सके. अभिमान के कारण, इस स्थिति के विषय में वे संसार के आगे फरियाद नहीं करते, उल्टे उसका अधिक तिरस्कार करते हैं. उसकी समीक्षा करने में और अपने मानसिक चक्षुओं के समीप उसे चूर्ण करने में ही वे आनंद समझते हैं. कोई उनके प्रति समभाव प्रदर्शित करे, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता, कारण कि उनकी मान्यता है कि समभाव-दर्शन उनके गौरव को क्षति पहुंचाता है.

‘परंतु कदाचित इस दिखनेवाली बुद्धि की सतह के नीचे हृदय के कूप में ऊर्मियों का मीठा वारि लहरा रहा होगा, किसी ने वह जल पिया होगा, परंतु वह जल है तो दुर्लभ ही.’

‘हृदय की तो बरतने से ही कीमत बढ़ती है!’

बाईस वर्ष की इस युवती ने मेरे साधारण परिचय के पश्चात, जाने या अनजाने में यह बाण छोड़ा था, और तीस वर्ष की मेरी स्वस्थता को आर-पार वेधकर उसने मर्मस्थल को वेध डाला था. यदि व्रूरता से ऐसा किया हो, तो अमानुषिक है, स्थूल भूमि को फोड़कर ‘वारि’ निकालने की इच्छा से किया हो, तो भयंकर है.

मुझे इसका भान हुआ, फिर भी मैंने परवाह नहीं की. मेरी भावना की भागिनी- ‘तनमन’ मुझे मिल गयी हो, ऐसा मुझे क्षण भर जान पड़ा.

मैं तुरंत ‘कोनोट पीक’ पर अकेला ही घूमने गया. उस समय मेरे जीवन के रंग बदल गये. उसका वर्णन ‘शिशु अने सखी’ में है-

‘गिरि शृंगावलियों के अंधकार को भेद कर, नव सृष्टि की नूतन और प्रथम ही हो, ऐसी ऊषा किसी उच्च-शिखर के कोने को सोने से मढ़ रही हो, इस प्रकार अभिनव आशा उसके हृदय को मढ़ने लगी.’

‘उसके पैरों में पंख लग गये. मानो स्वप्न में गुंजित हो रहा हो, ऐसे गम्भीर संगीत को, व्योम में नर्तन करती ज्योतिर्माला के घुंघरुओं ने नये-नये ताल दिये.’

यह किसी कल्पना-विलासी की उड़ान नहीं, स्वानुभव है.

दूसरे दिन मैंने पत्र का उत्तर लिखा. उसे बार-बार पढ़कर उसमें संशोधन किये- कहीं तरंग में आकर मैं कोई अशोभनीय बात न लिख डालूं. मैंने ‘गुजरात’ के लिए धारावाहिक लेख लिखने का उसे निमंत्रण दिया. मैं लीला को अच्छी तरह पहचानता नहीं था. उनके गृह-जीवन का मुझे ज्ञान नहीं था. परंतु यह निश्चित था कि मेरा हृदय पुकार रहा था कि मुझे ‘जन्मजन्मांतर की सखी’ मिल गयी थी.

हमने ‘गुजरात’ के सिलसिले में पत्र-व्यवहार आरम्भ किया. 1978 के श्रावण का ‘गुजरात’ का अंक, मानसिक सहजीवन व्यतीत करने का हमारा पहला प्रयत्न था.

गुजरात की अस्मिता के इस मुखपत्र के लिए मनहरराम मेहता ने मंगलगीत लिखा- ‘जय थजो, जय थजो, पुनित गुजरात नो.’ (पुनीत गुजरात की जय हो, जय हो.) इस अंक की सामग्री हमारे नये साहित्य सम्प्रदाय के वेग का परिचय देगी.

‘रेखाचित्रो’ द्वारा शैली और साहित्य पद्धति में नयी प्रणाली शुरू हुई. मेरे मित्रों ने मेरा ‘रेखाचित्र’ पढ़ा और लीलावती सेठ कौन है, इसकी तलाश करनी आरम्भ की. उस समय से हम दोनों के नामों का एक साथ गुणगान होने लगा.

जुलाई-अगस्त में उसके सौतेले पुत्र ने, जिस मकान में हम रहते थे, उसी में नीचे का एक ब्लॉक किराये पर लिया, पर मेरा उसके साथ परिचय नहीं था.

अक्टूबर में यह बात सुनने में आयी कि लीला कुछ दिनों के लिए  बम्बई आनेवाली है.

एकबार मैं ब्रीफ पढ़ रहा था कि नीचे से किसी के गाने की ध्वनि सुनाई पड़ी. मेरा हृदय एकदम धड़क उठा.

मैंने लीला को कभी गाते नहीं सुना था. परंतु वह आवाज़ मुझे किसी अद्भुत रीति से परिचित मालूम हुई.

‘नीचे कौन गा रहा है?’

‘लीला बहन,’ लक्ष्मी ने कहा.

मैं विह्वल हो उठा.

भोजन के बाद लीला ऊपर आयी. हमने इस प्रकार बातें कीं, जैसे हमारी वर्षों की पुरानी मैत्री हो.

उस रात को मुझे नींद नहीं आयी. इस सान्निध्य के दूरगामी भयंकर परिणामों को मैं देख सका. विपत्ति के बादल चढ़ आये थे, यह निश्चित था. जिस क्षण मैंने जीवन के सीधे चढ़ाव चढ़कर ऊपरी कोर को जैसे-तैसे पार किया, उसी क्षण सामने की सपाट भूमि में दरार पड़ गयी. भंवरों से भयानक बना हुआ दुस्तर नदी का गर्जन करता हुआ पाट मेरे पैरों के आगे फैल गया…

फिर भी मेरी रगें तांडव नृत्य कर रही थीं.

तेरह वर्षों की समाधि के परिणामस्वरूप साक्षात हुई ‘देवी’ पट के उस पार- फिर भी निकट- जीवित खड़ी थी…

और मेरा आधा रास्ता सम्पूर्ण हुआ.

(समाप्त)

जनवरी  2015 

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