सीधी चढ़ान (दूसरी क़िस्त)

बचपन में मैं जिस बालिका के साथ सचीन में खेला था, उसकी स्मृतियों द्वारा मेरी

कल्पना ने ‘देवी’ का निर्माण कर लिया था. उस कल्पना-मूर्ति के चारों ओर मैंने एक छोटी-सी सृष्टि की रचना की थी और उसमें मैं सुख-दुख-दोनों का अनुभव करता था. मेरी कल्पना-विलासी भावनाएं उस सृष्टि के द्वारा व्यक्त होती और उनके कारण होने वाले दुखों को- जो कि मेरे ही पैदा किये हुए थे- जीतने के लिए मुझे अथक प्रयत्न करना पड़ता.

आज ढेर-से पत्र और अंकित की हुई बातें इस सृष्टि की साक्षी देती हैं. समकालीन अश्रुओं और निःश्वासों से भीगी हुई उस सामग्री का उल्लेख किये बिना मेरे विकास की दिशा को समझना असम्भव-सा है.

1907 में जब मैं बम्बई आया, तब मुझे ‘देवी’ की बहुत ही याद आया करती. जब तक पेटीट लायब्रेरी में पढ़ता रहता, तबतक मैं उससे बचा रहता, बाकी समय मैं अकेलेपन से अकुलाया करता. कोई भी सुंदर लड़की दिखलाई पड़ती कि तुरंत मुझे विचार आता- कहीं ‘देवी’ तो नहीं आ गयी, और विचार गलत सिद्ध होने पर मुझे आघाता पहुंचता. जब डाकिया द्वार खटखटाता, तब उसका पत्र आने की कल्पना से हृदय धड़कने लगता और मेरे तरसने में भारी अकुलाहट भर जाती.

मैं ‘देवी’ के साथ आठ वर्ष तक खेला था. 1903 में चार दिनों के लिए उससे फिर मिला था. उसके बाद मैंने उसके विषय में कुछ नहीं सुना. यद्यपि वास्तविक वस्तुस्थिति की याद बनी ही रहती थी, तथापि कुछ झूठी-सी धीरे मालूम देती थी, और यह तरसना सच्चा जीता-जागता बन जाता था. धीरे-धीरे ‘देवी’ संस्मरण-मूर्ति न रहकर सदा की सहचरी बन गयी.

“हो मने भूली गयो छे मारो छेलडो रे.”

इस गीत की पंक्तियां बोलते ही मेरा काल्पनिक साहचर्य शुरू हो जाता था. सारा समय मैं मीराबाई के भजन गा-गाकर भावनाओं को बहलाया करता. जब अपने अकेले जीवन से अकुला उठता, तब चर्नी रोड से विरार का टिकट लेकर दोपहर की गाड़ी में बैठ जाता. विरार पहुंच कर लौटती गाड़ी से चर्नी रोड आ जाता. दोनों बार मैं कोई खाली-सा डब्बा देखकर बैठता. उस समय मुझे भ्रम होता कि ‘देवी’ मेरा साथ दे रही हैं और मैं नाटक के गीत गा-गाकर प्रेम संवाद करता. यह कल्पना-विलास मेरे उस समय के विषम जीवन का उल्लास और प्रेरणा बन गया.

मन जब बहुत उद्विग्न होता, तब देर तक बैठकर मैं कागज़ पर अंग्रेज़ी में हृदय के भाव व्यक्त करता. इस प्रकार लिखे हुए अनेक भावों में से कुछ मेरी उस समय की मनोदशा का परिचय देंगे-

“किसने सोचा था कि मैं ऐसी दीन स्थिति को पहुंच जाऊंगा? अपने स्वभाव के कठोर शासन की सीमा में ही मुझे जीना है. मुझे किसी प्यार देने वाले ही आवश्यकता है. प्यारहीन अंकेली ज़िंदगी मुझसे सही नहीं जाती.

“मेरे हृदय की वृत्तियों को मित्र क्या संतुष्ट कर सकेंगे? क्या वे विश्वास और सम्बंध के योग्य सिद्ध होंगे? या मेरे दीन हृदय को पल भर बहलाकर फिर उससे द्रोह करेंगे? निर्बल, पागल मनुष्य की तरह मैं चारों ओर लिपटने के लिए छटपटाता फिरता हूं, परंतु यदि कहीं किसी अपात्र पर विश्वास कर बैठा तो? आशाहीन इस स्नेह-तृष्णा की वेदना को मैं किससे कहूं? मुझे दूसरों के सुख से बड़ी ईर्ष्या होती है. दुनिया ने मुझे क्रूरता से दूर धकेल दिया है. मैं किस प्रकार इसका बदला लूं? मैं अकेला पैदा हुआ हूं. अकेला और दुखी ही मरने के लिए मेरा सृजन हुआ है?”

फिर दूसरे दिन इस प्रकार लिखा है-

“कोई मेरी सहायता नहीं करेगा? मैं स्नेह बिना मरा जा रहा हूं. मैं हृदय-विहीन ही क्यों न उत्पन्न हुआ? दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो मेरा अंत कर दे? अनेक बार दीवार के साथ सिर टकरा कर प्राण देने की मेरी इच्छा होती है, परंतु दुष्ट गर्व मुझे रोक लेता है. ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जीवन मिला है, तो उसका कर्तव्य पूर्ण करने में ही, बहादुरी है.”

‘देवी’ के साथ मैं वार्तालाप करता था, इसका एक जगह उदाहरण है. उसमें मैं ‘देवी’ के रूप में अपने को प्रणय-वचन से सम्बोधित करता हूं और अपनी सृजनात्मक कला की नींव डालता हूं-

“मैं अकेली थी. मुझे बंधन बांधते नहीं थे. शृंखला मुझे जकड़ती नहीं थी. अकेली और शोक-ग्रस्त मैं अपने मार्ग पर चलती थी.

“गहरा, घना अंधकार मेरे चारों ओर फैल रहा था. अपने लग्नेश ग्रह को शाप देती हुई मैं अंधकार में डूब जाती.

“तेज की केवल एक किरण मेरे पथ को आलोकित करती थी, मुझे आश्वासन देती थी.

“एक तारा चमका, टूटा, देव का दूत उतर आया. मैं भ्रमित हो गयी. भ्रम को दूर करने के लिए मैंने बड़े प्रयत्न किये, परंतु मैं निष्फल रही. अपने माधुर्य से उनसे मुझे सींचा, प्रेम के सुनहरे तार से मुझे बांध लिया. उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया, मुझे उठा लिया, डूबने से बचा लिया; अब मुझ पर निराशा हावी नहीं हो पा रही थी.

“मैं सुखी हो गयी. जीवन अब शुष्क नहीं रहा. मेरी भावना अब मृगतृष्णा नहीं थी, उसमें अब मेरी तृषा मिटानेवाला रस भरा था.

“नाविक-बिना गोते खाती हुई, मार्ग भूली हुई अपनी नाव मैंने उसे सौंप दी. यह नौका, सरकती, हंसती हुई उसके जादू-भरे स्पर्श से तरड़ों पर सहर्ष नाचने लगी.

“जीवन अब असह्य नहीं था. वह मेरे पार्श्व में था. अब मुझे अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया था; मुझे अपने देवदूत के योग्य बनना था. स्वागत करते हुए उसके हाथों में मैं समा गयी और पहले की अपेक्षा अधिक सरस बन गयी. जीवन में तेज आ गया. उसने मुझे वह सब दिया, जिसकी मुझे आवश्यकता थी, जिसके लिए मैं तड़पा करती थी.

“उसका नाम था प्रणय.

“बहुत समय बाद मैंने सुख देखा. मैं उससे मिलने को सदा तरसा करती. बिछुड़ने पर अधीर बन जाती. मिलन ही मेरा एक-मात्र आनंद था. सारा दिन दूर से सुनाई देती हुई उसकी पग-ध्वनि या मधुर शब्दों की आवाज़ मेरे हृदय के तार-तार को झंकृत करती रहती. रात को अंतर दूर होता और मैं स्वप्न में उसके साथ जा बसती.

“उसके स्पर्श की ऊष्मा से मैं फूलती-फलती. परंतु मैं स्वार्थिनी थी, मूर्खा में मैं एक बार ही पागल हो उठी. वह लापरवाह नहीं था, फिर भी उस की कल्पित लापरवाही मेरे लिए असह्य हो उठी. मैं कुछ हो गयी. आवेश में आकर मैं चण्डी के समान लड़ने को तत्पर हुई-

“ओह! उसे जाने क्या-क्या कहते हुए मेरी दुष्ट जिह्वा कट क्यों न गयी?

“उसके मुख से हंसी लोप हो गयी. वह कांपने लगा. उसने निःश्वास छोड़ा. उसके ओंठ फड़कने लगे. कपोल पर से एक अश्रु-बिंदु ढलक पड़ा. उसे ऐसा लगा कि मैं उसे त्याग दूंगी.

“बाद में- बहुत पीछे जाकर मुझे पता लगा कि मैंने उसे ठेस पहुंचाई थी.

“मैंने क्षमा के लिए याचना की. क्या मैं इतनी क्रूर थी? क्या मेरी भूल अक्षम्य थी? ओह! किसलिए- किसलिए ऐसी भूल करने से पहले मैं मर न गयी?

“मैं रोती हूं… मैं थर-थर कांपती हूं… क्या वह मुझे क्षमा नहीं करेगा? वह लौटकर नहीं आयेगा? मेरे गरम-गरम आंसू भी मेरे उस अपराध को नहीं धो सकेंगे?

“प्यारे पंछी! आ, लौट आ. तेरा स्वागत करने को तेरा पिंजरा राह देख रहा है.

“मैंने उसे प्रणाम किया; उसने उत्तर दिया. परंतु उसकी आवाज़ में से लगावट चली गयी थी. उसका मस्तक धीरे-से झुका. आंखें स्थिर भाव से देखती रहीं, और खेद-पूर्वक हम एक-दूसरे से अलग हुए.

“पहले के उत्साह से आप्लावित अभिवादन का चैतन्य कहां गया? पहले की स्नेहसिक्त विदा की आकुलता कहां गयी? कहां गया वह अचल भक्ति के शिलालेख के समान न भूलनेवाला हस्त-स्पर्श?

“अरे प्रियतम! मुझे चेत नहीं है. मैं मरने को पड़ी हूं. काली रात मेरा गला घोंट रही है. तू मूझे क्षमा नहीं करेगा? पहले-जैसा बन जा, मुझे और तो कुछ भी नहीं चाहिए.

“अतीत को भूल जा. मैं निर्बल भी… स्वछंद थी… हां, थी. परंतु मेरा अपराध एक ही था, मेरे प्रेम की सीमा नहीं थी. तेरे बिना मैं जीवित नहीं रह सकती थी.

“मैं निर्बल हूं, मुझे सशक्त बना; मैं मूर्खा हूं, मुझे समझ दे; परंतु मेरा त्याग न कर और यदि अब भी निष्ठुर ही बने रहना है, तो अपने प्रेमपूर्ण वक्षस्थल पर मुझे मर जाने दे.

“मेरी याचना का तिरस्कार न करना, मेरा सुख तेरे हाथ में है. अब भी नहीं मानेगा? यदि अब भी मेरे अपराध को अक्षम्य समझ रहा है तो याद रखना कि मेरे जीवन की ज़िम्मेदारी तेरे सिर होगी. मैं प्राण दे दूंगी, तो इसका दोषी तू ही होगा. परंतु नहीं… मुझे आशा है कि वह दिन अवश्य आयेगा, जब तू फिर मेरी ओर देखेगा.

“प्रियतम, तेरे प्रेम-पूर्ण हृदय को मैं जानती हूं. उसमें मेरा स्थान है. चाहे मैं भूलं, चाहे गिरूं, परंतु वहीं मुझे आश्रय मिलेगा-जिस प्रकार मेरे हृदय में सर्वदा तुझे मिलेगा, उसी प्रकार.

“मेरे प्रियतम, वह क्षण अवश्य आयेगा, जब हम दोनों के हृदय एक होकर नाचेंगे. तब हम एक-दूसरे के संग में जगत को जगत के दिये हुए दुखों के भूल जायेंगे. फिर किस लिए विलम्ब कर रहा है? प्राण, उस धन्य क्षण को किस लिए दूर ठेल रहे हो? आओ, हम दो हैं; दो से अब एक बन जायं.”

जब मैं बहुत उद्विग्न हो जाता, तब गीता के श्लोकों को दुहराने में अपने रोग का निदान खोजता. मैंने गीता का अध्ययन नहीं किया. था, केवल कुछ श्लोकों का जाप कर-कर के स्वस्थ मनोदशा प्राप्त करने का यत्न करता था. इस प्रकार अनजाने में मैं जयपज्ञ की प्रबल-शक्ति से सहायता लेता. उस समय कार्लाइस से भी बहुत प्रोत्साहन मिला.

एक जगह अडित किया है-

“कार्लाइल मेरा परम-मित्र बन गया है. उसने मुझे बड़ी हिम्मत दी है. उसकी सहायता से मुझ में हाथ-पैर चलाने की शक्ति आ गयी है. अंत तक मैं हाथ-पैर चलाता रहूंगा.”

उस समय के मेरे अस्वस्थ मन की साक्षी देती हुई एक दूसरी टिप्पणी है, जिसमें मैं आत्म-परीक्षा करता हूं-

“प्रमाद और आलस्य की संतान! तू समय का कितना अपव्यय करता है? तुझे अपनी ज़िम्मेदारी का कुछ ध्यान है? तूने त्री की तरह रोना सीखा है! लड़कियों की तरह पल-पल में निराश होता है! तुझे किसी के आधार की आवश्यकता है! अपने निर्बल-हृदय को स्थिर करनेवाले की ज़रूरत है!

“फिर-फिर वही आवाज़ तेरे कानों में सुनाई पड़ती है- यह सब किसके लिए?

“तू इतना निर्बल है कि तुझसे अकेले जीवित भी नहीं रहा जाता? जब तेरा जीवन-क्रम रचा गया, तब किसकी सहायता ली गयी थी? तूने किसका हिसाब जोड़ा था? स्वस्थ हो; साहस, हिम्मत से अपनी भावना सिद्ध करने का प्रयत्न कर.”

पुनः निराशा की चाप सुनाई देती है. आत्मघात के विचारों से मैं हृदय में खेलता हूं.

“मेरे कानों में हमेशा आवाज़ सुनाई देती है कि मैं मरने जा रहा हूं. इस संसार में रहने की अपेक्षा मरना अधिक अच्छा है.

“मेरी नज़र के आगे दृश्य बनता है. मेरी आंखें बंद हैं. मेरी चिता के आसपास आग देने वाले खड़े हैं. चिता का धुआं, मुझमें जो कुछ है, उसे ले जाता दीख रहा है. मुझमें बसने वाला ‘कोई’ पुकार रहा है कि इस स्थूल के संकीर्ण-मार्ग में मैं किसलिए भटक रहा हूं? क्यों नहीं इन पार्थिक बंधनों को तोड़ डालता? क्यों नहीं इस दुखी जीवन को, उकता देने वाले चक्र को, अंतिम नमस्कार कर देता?

“मैं जीवित रहने योग्य नहीं हूं. मुझे संसार के प्रति आकर्षण नहीं रहा. जो भावना पृथ्वी पर मनुष्य को सुखी करती है, वह अब लोप हो गयी है. क्षणिक आनंद और चिरजीवी निराशा के बीच मेरा जीवन झकोरे खा रहा है. इसके चारों ओर गहरा अंधकार छा गया है.

“अनेक बार मैं अपनी शैया में तड़पा हूं, और मैंने मृत्यु की कामना की है. मुझसे कहीं अच्छे, और शक्तिशाली मनुष्य पर जाते हैं, किंतु मैं ही क्यों जी रहा हूं?

“फिर-फिर यही विचार मेरे मन में क्यों आते हैं? जब मैं अपनी बीमारी से उठा, तब मुझे लगा था कि मेरे जीवन का गया हुआ रस फिर लौट आया है, परंतु नहीं, एक वर्ष तो बीत भी चुका है, फिर भी मैं ज्यों-का-त्यों हूं. मेरा और संसार का क्या सम्बंध रह गया है. कुछ भी नहीं. मुझे संसार ने क्रूरता से दुःख दिया है. मुझे किसलिए यहां अधिक जीना चाहिए? ‘हेलमेट’ में शेक्सपियर नायक से कहलाता है कि ईश्वर ने आत्मघात न करने की आज्ञा दी है. परंतु नहीं, ईश्वर ने कभी ऐसा नहीं कहा. यह तो हम लोग ही कहा करते हैं. मृत्यु मुझसे दूर भाग जाती है. प्लेग भी मुझसे दूर भागता है. रोग भी मुझे मृत्यु के  समीप नहीं ले जाता. मैं कहां घसीटा जा रहा हूं? शक्ति-धारा के चुक जाने पर मृत्यु को निमंत्रण दे सकूंगा, यह आशा नहीं रही. जान पड़ता है, मेरे जन्म के समय किसी ने मुझे शाप दिया था कि- ‘प्रत्येक सुख से वंचित होकर तू दुखी जीवन व्यतीत करेगा.’

“इस जीवन-व्यवहार का हेतु क्या है? तुच्छ, विजय को प्राप्त करना? लोकप्रियता पाना? नहीं, नहीं. मृत्यु की शरण में जाना ही श्रेयस्कर है.

“किसलिए तड़पते हुए रहा जाय? निराश होकर बीमार की तरह घूमने की अपेक्षा समय पर आत्मघात कर लेना क्या बुरा है?”

1906 के उद्धरण पुनः पुनः शक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं-

“इस विशाल संसार में मेरा कौन है? मैं किसका हूं? पृथ्वी की दिशाएं उत्तर देती हैं- कोई नहीं!

“यह दुःख का भार कब तक वहन किया जाय? जब मैं दूसरों को प्रवृत्तिपरायण, सुख और सुयोगों का भोग करते देखता हूं, तब मुझे विचार होता है कि मौत क्यों नहीं आती?

“इस अरण्य-समान पृथ्वी के लिए मेरे मन में मोह नहीं रहा. प्रतिकूल लोगों से मैत्री मुझे शांति नहीं देती. क्या मुझे अंत तक दुःख ग्रस्त और अकेला रहना पड़ेगा?

“अपनी उमड़ती हुई अभिलाषाओं का मुझे लगा घोंट देना पड़ता है. अपने क्रांतिकारी हृदय को भी कुचल देना पड़ता है. मुझे हिम की तरह कठोर संयम धारण करना पड़ता है और करना पड़ेगा- कुछ दिनों के लिए नहीं, कुछ वर्षों के लिए नहीं, कुछ वर्षों के लिए नहीं, वरन दस, बीस या पचास वर्षों के लिए.

“मैं अपने-आपको निष्प्राण यंत्र की तरह क्यों नहीं बन सकता? इसके बिना मेरा उद्धार नहीं है. मेरे पास सब-कुछ है, पर एक वस्तु नहीं है, और क्योंकि यही एक वस्तु नहीं है, इसलिए कुछ भी नहीं है. ‘सुख’ शब्द मुझे कितना कर्कश मालूम देता है! मेरे लिए सुख है ही कहां? सब दुख का रूप धरकर आते हैं. परंतु क्या मुझे इनसे डरना चाहिए? नहीं, चाहे श्रम से मैं मर जाऊं, पर हार स्वीकार न करके कठोर श्रम को ही अपना साथी बनाऊंगा. मुझे किसी मनुष्य की सहायता नहीं चाहिए. जिस संसार ने मेरे सुख-स्वप्न अधूरे रख दिये और आज मुझे इस दशा तक पहुंचा दिया, उसकी मुझे क्या परवाह हो सकती है?

“मूर्ख आत्मा! सुख के विचार छोड़, मेहनत कर! अंत में तेरी क्षीण होती हुई शक्तियों को मृत्यु और विनाश के सामने हार ही जाना है.”

‘देवी’ के संस्मरणों से शक्ति प्राप्त करने का नुस्खा भी चल रहा हैः

“यह मैं कैसे जाल में फंस गया हूं! श्रम करने की शक्ति भी नहीं रही. व्यायाम छोड़ दिया, पढ़ना छोड़ दिया, हाथ-पर-हाथ रखकर बैठना शुरू कर दिया. यह मूर्खता है. जबतक श्वास है, तबतक बहादुरी से क्यों न जीवित रहा जाय?

“यह नशा कब उतरेगा? प्रयत्न न करना और अधमता में पड़े रहना! कायर! तू मरने की आशा कर रहा है, पर मृत्यु के बदले रोग लग गया, तो? तेरा कोई मित्र नहीं है, कोई अभिन्न नहीं है जो प्रेम से तेरी मदद करेगा. जब तेरी बुद्धि क्षीण होगी, तेरी शक्तियां विनष्ट होंगी तब क्या संसार तेरी ओर देखकर हंसेगा नहीं? और यह तुझे कभी अच्छा लगेगा?

‘नहीं… कभी नहीं. मुझे स्वास्थ्य प्राप्त करना चाहिए, विजय मिलने तक प्रयत्न जारी रखना चाहिए, मरना तो है ही, फिर जब तक जीवित हूं- जब तक देह-यंत्र टूटता नहीं, तब तक वीर की तरह डटे रहना चाहिए.

“देवी! मैं तेरे योग्य बनने के लिए जीऊंगा. एक भी ऐसा काम नहीं करूंगा जो तेरे योग्य नहीं होगा, और कुछ नहीं तो तेरी याद के सहारे ही जीऊंगा.

कुछ महीनों बाद का एक दूसरा उद्धरण पुनः मेरी विह्वलता की ओर इशारा करता है.

“अकेले जीवन में रिक्तता भर गयी है. हृदय थक गया है. ईश्वर ने जैसी सृष्टि रची है, मेरे लिए वह वैसी नहीं रही. सम्पूर्ण प्रवृतियों पर अंधकार छा गया है. उस धन्य क्षण की मैंने बड़ी प्रतीक्षा की, जब दूर से आती हुई किरण मेरे सूने हृदय में प्रकाश डालेगी और जहां रात है, वहां दिन उदय कर देगी. परंतु, प्रेम की दैवी उमंगों का मैंने कभी अनुभव नहीं किया. क्रूर शिशिर ने विनाश फैला दिया है. मैं थका हुआ, हारा हुआ, अभागा मनुष्य जीवन के पथ पर बढ़ रहा हूं. जीवन से प्रेम ओझल हो गया है. आत्मा में शांति नहीं है. बिना साथी का मेरा दृष्टि-पथ धुंधला हो रहा है. कोई प्रियजन मेरे टपकते आंसुओं को नहीं पोंछता. शोक और भय मेरे सूने हृदय को कुचल रहे हैं. मेरे थके हुए मन के विश्राम के लिए कोई सुकोमल स्थान नहीं है. किसी मधुर मुख से निकला संगीत मुझे शांत होने की प्रेरणा नहीं देता. मेरी आत्मा के साथ किसी आत्मा ने उल्लासमय सम्बंध नहीं बांधा. किसी प्रियतमा से मैंने नहीं कहा- ‘तू मेरी है, और मैं तेरा हूं.”

रक्त से लिखे हुए मेरे अनुभूत भावों का यहां सक्षात्कार होता है. यह कहना कठिन है कि यह महत्त्वाकांक्षी, निर्जीव और एकाकीपन से अधीर हो रहे कल्पना-विलासी युवक की रुग्ण मनोदशा थी, अपनी शक्ति का जिसे भान नहीं- ऐसे साहित्यकार की यह सृजनवृत्ति थी, अथवा आचार में संयमी युवक के हृदय में से इस प्रकार जातीय-वृत्ति झांक रही थी. धीरे-धीरे ये भाव प्रचुर मात्रा में कल्पना-विलासी बनते जाते हैं-

“स्वप्न-सृष्टि के प्रकाश में, जहां संस्मरण हलकी छाया के समान फैलते हैं, वहां एक स्वरूप दीख पड़ता है- प्रकाशमय, दैवी और मोहक, और ही ऊषा के समान तेजस्वी और लजाते हुए सौंदर्य से सुशोभित. मेरे जीवन पर शासन करती हुई यह तारिका है. उल्लास से वह मेरी नौका को खे रही है. वही मेरा आश्वासन है और वही मेरी प्रेरणा. अंधकार और अरण्य से निकालकर ले जाती हुई वही मेरी ज्योति-शिखा है.

“भावभरी मृदुलता से वह मुझे बुलाती है- हमारी आत्माओं को जुदा रखने वाली भयंकर और निःसीम अनंतता के उस-पार से. मेरी स्मरण-शक्ति उसकी स्मृति की रेखाओं को स्पष्ट करती है और सदैव के लिए बीत गये उन दिनों की सुरम्यता का मैं फिर से अनुभव करता हूं.

“वह मेरे लिए तरसते हैं. मैं अनंतकाल की अवहेलना करता हूं. वियोग के दुस्तर सागर को पार करता हूं. हम मिलते हैं-कभी न बिछुड़ने के लिए.

“हम साथ-साथ रहते हैं. प्रत्येक स्थान पर- स्वर्ग के सौंदर्य- प्रासादों में, किसी भव्य विश्व-खंड में, किसी दूर चमकते तारे पर, और हम प्रलयकाल में साथ-ही-साथ एकरूपता पा जाते हैं.”

अक्तूबर 1910 में एडवोकेट की टर्म में भरती होने आया, तब हृदय-व्यथा से कुछ अंशों में छुटकारा पा चुका था, उसका साक्षी एक उद्धरण इस प्रकार है-

“व्यथा का एक वर्ष बीत गया. काल के आमने-सामने के तटों पर हम लगातार खड़े रहे.

“देवी! तेरे निमंत्रण का तिरस्कार करके, सांसारिक बंधनों में बंधते हुए क्या मैं उचित कर रहा हूं? तेरी निर्दोषिता, पवित्रता, त्याग, भक्ति के क्या मैं योग्य हूं?”

मुझ से उत्तर देते नहीं बनता.

“इस एकाकी और दम घोंटनेवाले विग्रह  में यदि मैं किसी अन्य की सहायता लूं, तो मुझे क्षमा करना.”

चार वर्षों के पश्चात यह सम्पूर्ण अनुभव ‘वेरनी वसूलात’ (प्रतिशोध) में नया रूप धारण करता है और मैं अपनी अस्वस्थ मनोदशा पर बड़ी कठिनाई से काबू पाता हूं. परंतु ‘देवी’ की कल्पना-मूर्ति मेरे और संसार की अन्य त्रियों के बीच में एक पर्दा खड़ा कर देती है- पीछे से जब उसका भेदन हो जाता है तब तक.

छह

मनु काका को मैंने ‘आधे रास्ते’ में नाना भाई के नाम से परिचित कराया था. जहां तक याद है, जब मनु काका का और मेरा जनेऊ हुआ था, तब हम बाल-ब्रह्मचारी बनकर साथ घूम थे. उनके भतीजे शिव-प्रसाद उनसे एक वर्ष बड़े थे. छुट्टी के दिनों में जाति के जिन लड़कों के मंडल में मैं सम्मिलित होता, उनमें मनु काका और शिवप्रसाद भी थे.

मनु काका के प्रति मुझे पहले से ही बड़ा आकर्षण था. मुझमें जो चीज नहीं थी, वह उनमें थी. मैं पढ़ने में लीन, गम्भीर, डरपोक, खेल खेलने में अशक्त, आयु के हिसाब से अधिक पढ़ने वाला था. मनु काका खिलाड़ी, बहादुर, वाचाल, स्नेही, हंसमुख, मौजी, छिछोरे और प्रत्येक खेल में बेजोड़ थे, केवल पढ़ने के समय उनकी गर्दन झुकती थी.

धीरे-धीरे मनु काका के साथ मेरी मैत्री प्रगाढ़ हुई. मुझे प्रतीत हुआ कि उन्हें शिक्षा देकर, प्रेरणा देकर महान बनाने का कर्तव्य मेरे सिर पर आ पड़ा है. मनु काका को मेरी बुद्धि और शक्ति में इतना विश्वास उत्पन्न हुआ कि उससे मुझे में भी आत्मविश्वास आ गया. संयुक्त कुटुम्ब में इस मातृहीन बालक को जो अकेलापन मालूम होता था, वह मेरी संगति से दूर हो गया.

धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के आगे दिल खोलने लगे. वे अपनी मां का दुख रोते, मैं अपना रोता. ‘देवी’ की प्रणय-कथा, जो मेरा दम घोट रही थी, मैंने उन्हें कह सुनाई, और उस कल्पना-मंदिर में मुझे भक्ति करते देखने का उन्हें अधिकार मिल गया. इस प्रकार अपने दुःख को हम मसल-मसल कर चिकना करने लगे.

बढ़ते हुए युवकों को शोभा न देने वाली इस प्रकार की रोती मनोदशा का पोषण करने में हम शक्ति और समय का अपव्यय करने लगे. मैं दो बार एल.एल. बी. में फेल हुआ, वर्ष खराब किये और मेरा विकास चार वर्ष के लिए रुक गया. मेरे सहवास में मनु काका ने जिस भाव-विह्वलता का पोषण किया, वह उनसे न सही गयी. इनके  लाड़लेपन को पोषण मिला और अंत में छह वर्ष बाद उन्होंने पढ़ना छोड़ दिया. फिर भी हमारे बीच मैत्री का सम्बंध स्थिर ही रहा.

1907 से 1911 तक जब हम साथ-साथ नहीं थे, तब पत्र-व्यवहार किया करते थे. मेरे इन पत्रों में भाषण, टीकाएं, गप्पे और हृदय की आकुलताएं, सब आ जाती हैं-

पीपलवाड़ी, बम्बई (तारीख नहीं लिखी)

“पत्र मिला. तुम्हारा यह विश्वास देखकर कि मैं बम्बई कुशलपूर्वक पहुंचूंगा, मुझे आनंद हुआ. इस विश्वास के लिए मेरी ओर से बधाई. मुझे तो जान पड़ता था कि गाड़ी चर्नी रोड पहुंचेगी ही नहीं और पहुंचेगी भी तो मैं उसमें नहीं हूंगा. बड़ा आश्चर्य हुआ कि अंत में आ ही पहुंचा.

“आप भड़ौंच में विहार कर रहे हैं, यह जाना. संतोष हुआ या असंतोष, यह कैसे कहा जा सकता है. लोग बातें करते हैं कि भाई साहब शाला में जाकर सरस्वती-पूजा करने की अपेक्षा, उससे भी अधिक पूज्य, जो देवी घर में उपस्थित हैं, उनकी पूजा करना अधिक पसंद करते हैं- बेचारों ने एलफिंस्टन कालेज जाना बंद कर दिया. उनका ध्यान और कहीं था. स्वयं फेल होने पर कभी आत्मघात करने को तैयार थे और अब फेल होने का कलंक लगने पर भी भड़ौंच में संक्राति का आनंद मना रहे हैं…

अभी मैं यहां स्वस्थ नहीं हुआ. मेरे पास सब कुछ है, परंतु एक चीज नहीं है, इससे कुछ भी नहीं है. मेरे दुख की सीमा नहीं है. जाने दो यह बात. मैं मूर्ख हूं.”

“मेरी बात तुम से भिन्न है. मैं हूं एकाकी और स्नेहविहीन. मनुष्यवत् नहीं परंतु यंत्रवत भटकना ही मेरे लिए बदा हुआ है. यदि मुझमें कुछ मनुष्यत्व है तो वह स्नेह करने की और उसे निभाने की मेरी शक्ति में समाविष्ट हैं…

“प्लेग की छुट्टियां मिलीं. प्रसन्नता हुई और खेद भी हुआ. खेद इसलिए हुआ कि अपने कमरे के एकांत में बैठकर चिंता से तड़-तड़प कर मरना होगा. प्रसन्नता इसलिए हुई कि बड़ौदा आकर तुम्हारा भावपूर्ण साहचर्य पाने का सौभाग्य मिलेगा.”

छुट्टी खत्म हुई और मैं बम्बई लौट गया. अरविंद घोष पर उस समय मुकदमा चल रहा था. मैंने एक पत्र में पूछा-

“घोष-कोष के लिए क्या किया? मैं बड़ी मुश्किल से पचास रुपये भिजवा सका हूं. घोष साहब की बहन अधिक पैसे मांग रही है. यदि कोष में पैसे न इकट्ठे हों तो एकत्र करा कर भेज देना. जान पड़ता है, बेचारे का बुरा समय है. अंतिम सप्ताह में बड़ी उथल-पुथल मची. भारत की स्थिति देखते हुए प्रत्येक को स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ कर जाना चाहिए.”

हिंदू लॉज, बम्बई

12-7-1609

रात के बारह बजे

“बाहर दिनों के तुम्हारे मौन ने आज मुझे अत्यंत दुखी कर डाला है. अपने ढंग का कटाक्ष और आक्षेप से भरपूर एक पत्र तुम्हें लिखने की तैयारी कर रहा था कि आज सुबह तुम्हारा पत्र मिल गया. इसलिए अब उलहना देने की हिम्मत नहीं रही. पहली बार तुम्हारा पत्र दिल खोल कर लिखा गया था. तुम्हारा दुख पढ़कर मैं भी उतना ही दुखी हूं. मरीज के बिना दर्द को कौन समझ सकता है? क्षण भर के लिए सोचा कि समय और स्थान के बंधन काट कर मानो मैं तुम्हारे पास पहुंच रहा हूं.

तुम दुखी हो, कारण कि संसार को देखने  वाली तुम्हारी दृष्टि खोटी है. तुम अभी बालक हो. स्वावलम्बी मनुष्य की दृष्टि से देखना सीखो. संसार तुम्हारे आगे पड़ा है- आक्रमण करने और जीतने के लिए. बिना मां के जीना दुख की बात तो ज़रूर है, पर इसके लिए आंसू बहाने से क्या मिलता है? माता के लिए रोते हो या सोची हुई बात पूरी न होने के कारण, अथवा इच्छित सुविधाएं कोई नहीं देता, इस स्वार्थ से रोते हो? यह स्वार्थ ही हुआ न! अपनी माता के लिए स्नेह रखो; परंतु विशुद्ध और निःस्वार्थ! क्यों नहीं मान लेते कि वह तुम्हारी आंखों के आगे है- तुम्हारी हिम्मत बढ़ाती, दुख में तुम्हें आश्वासन देती, तुम्हें उच्च आदर्शों के लिए प्रेरित करती, उसके योग्य बनने के लिए प्रोत्साहन देती. निर्बलता से किसलिए हार मानते हो? अपने स्नेह को शक्तिशाली वीर के स्नेह का रूप दो, मूर्ख बालक के रुदन का नहीं! यह रोग तुम्हारे मन में कहां से आ घुसा? उपवास करने से तुम स्वतंत्र होगे? कैसी मूर्खता है! तुम कभी ऐसी स्थिति में पहुंच सकते हो, जब अन्न के बिना बिल्कुल काम चला सको? यदि थोड़ा-सा खा लिया, तो भर-पेट क्यों न खा लिया जाय?

“यह सब कारण अर्थहीन हैं. केवल नाम-मात्र को खाओगे, तो शक्ति जायगी, क्षीणता आयेगी, और साथ ही अनेक दुख और कठिनाइयां आयेंगी. एक चुल्लू पानी के लिए भी किसी स्नेह-हीन सम्बंधी की कृपा पर अवलम्बित होना पड़ेगा-ऐसी मूर्खता न करना. आज जो निराश्रयता-सी मालूम होती है, कल वह चली जायगी. ज़रा हिम्मत रखो. जब कुछ वर्ष बीत जाएंगे और प्रेम-विह्वल हाथों से भोजन करते हुए इन दिनों को स्मरण करोगे, तब अपनी इस मूर्खता पर हंसी आयेगी. कहावत है कि ‘रोटी खानी शक्कर से, दुनिया जीतो टक्कर से.’

“हिम्मत रखो. दूसरों के दोषों के लिए कहीं अपने को दंड दिया जाता है? प्रिय भाई! सब तुम्हारा तिरस्कार करते हैं, यह विचार तुम्हारे मस्तिष्क में व्यर्थ ही घुस बैठा है. लोग चाहते हैं या नहीं, इसकी तुम्हें क्यों चिंता है? मैं अपने अनुभव से कहता हूं, जितने लोग हमारे आस-पास होते हैं, उन सबको किस कारण हम पर स्नेह रखना चाहिए? हमारी अवगणना करने, तिरस्कार करने के लिए भी तो कोई होना चाहिए? इसके बिना हम अपने स्नेहियों का मूल्य नहीं आंक सकते. सूर्य का ताप प्रखरता से जलाता न हो, तो हम शीत से विरक्त हो जायेंगे.

“तुम मरने की इच्छा करते हो! कैसी उदार इच्छा है! संसार में सब के लिए अप्रिय हो गये? यदि यह समझते हो कि कोई स्नेही नहीं है, तो बेचारी मेरी भाभी का क्या होगा? दूर गांव में, बाप के घर के दुखों में, वह तुम्हारी ओर प्रेम-भरी, उमंग-भरी आतुर आंखों से देख रही है, उसका क्या होगा? दिन-रात वह तुम्हारे सुख की कामना करती है, उसका क्या होगा?

“पत्र बहुत लम्बा हो गया. पढ़ते हुए थक जाओगे, परंतु अपने दुख के समय पर दौड़कर न पहुंचने वाले को क्षमा करना. पत्र शुष्क या समझदारी या ढिठाई से पूर्ण जान पड़े, तो भी उसका मनन करना. यदि उसका शब्द-शब्द ध्यान में लाओगे और हृदय में धारण करोगे, तो मैं कृतार्थ होऊंगा.

“पुनश्च-कुछ गगज्यादा कम लिखा गया हो तो क्षमा करना. तिलक महाराज का मामला कल शुरू हो रहा है.”

 

हिंदू लॉज, बम्बई, 30 जुलाई 1909

“पत्र मिला. कर्त्तव्य-पालन करते हुए तुम्हें दंडित होना पड़ा. खैर, यदि सबने साथ दिया होता, तो तुम्हारी अवश्य विजय होती. जब तिलक महाराज को दंड मिला, तब हम सब भी आपस में निश्चय करके लॉ-क्लास से अनुपस्थित रहे थे. केवल गिने-चुने विद्यार्थी ही क्लास में गये थे. प्रिंसिपल के गुस्से की सीमा नहीं थी. परंतु बेचारे क्या करते! कालेज के विद्यार्थिंयों की अपेक्षा हम अधिक स्वतंत्रता का आनंद उठाते हैं. कानपुर की खून-खराबी की खबर मिली होगी. बम्बई की स्थिति पुनः कल से पूर्ववत हो गयी है. फिर भी सिपाही अधिक संख्या में इधर-उधर घूमते रहते हैं और निःशत्र मजदूरों पर विजय प्राप्त करने की खुशी जाहिर करते हैं.”

अश्रुओं से सिंचित, स्वानुभूति की वेदना से भरपूर, एक पत्र आज भी हृदय की व्यथा व्यक्त करता है-

बड़ौदा, 2-11-1609

 

अपने स्वस्थ क्षणों में तुम मुझे पागल समझोगे और कभी-कभी तो मुझे भी ऐसा लगने लगता है कि मैं पागल ही हूं; परंतु मुझसे रहा नहीं जाता. मुझपर जो कुछ बीतती है, वह मुझे कह डालनी चाहिए. यदि ऐसा न करूं तो मैं दस घुटकर मर जाऊं. इस समय रात को यदि मुझे कुछ पढ़ना हो, तो मुझे अपनी भावनाएं यहां व्यक्त कर देनी चाहिए. बड़ा प्रयत्न करने पर भी वे रोकी नहीं जातीं. तुम्हें इतने ज़ोर से ‘अपना’ कहता हूं, इसके लिए क्षमा करना. अन्य कई लोगों का तुम पर अधिकार है, यह मैं जानता हूं. परंतु मैं तो आश्रयहीन हूं.

“तुम जानते हो कि हमारे कवि-गण ‘कौमुदी’ पर किस तरह न्यौछावर हैं! अनेकों ने इसे ‘प्रणयवाहिनी’ बनाया है. इस समय मुझे भी इच्छा होती है कि मैं भी इसे वैसा ही बना लूं. इस सुंदर प्रकाश को अपने भावों का वाहन किस प्रकार बनाऊं? इसके द्वारा काल के दूसरे तट पर बसी हुई अपनी प्रेयसी के साथ किस प्रकार एक रूप हो जाऊं?

“एक दूसरे का दुख बांटते हुए हमने अनेक चांदनी रातें बिताजी हैं, और दुख भुलाये हैं. इस समय यह चांदनी मुझसे सहन नहीं होती- देखता हूं, और मुझे वेदना होती है. यह वेदना मैं किससे कहूं? और उसके कारण टपकते हुए इन आंसुओं को कौन पोंछे? लॉन की ओर मुझसे देखा नहीं जाता. मैं कांपता हूं और अपने अकेलेपन के भान से मुझे रोना आता है… कल रात तीन बजे तक मुझे नींद नहीं आयी. मेरा गला सूख गया और आंखों में आंसू भर आये. जब रोया तब नींद आयी; और वह भी स्वप्न-भर सी. सारा दिन वह मधुर आवाज़ सुनाई देती रहती है.

‘मन भूली गयो छे मारो छेलडो रे,

जूठी जूठी कानुडा तारी प्रीत, मारा राज!”

“सारा दिन मैं पागलों की तरह भटकता रहा. मेरा हृयद त्री का-सा है. वह मेरे वश में नहीं रहता. तुम्हारी संगति में इससे वश में कर लेना चाहता था, पर ऐसा हुआ नहीं. मैं पागल हूं, क्या नहीं? यह पत्र भी क्यों लिख रहा हूं? न लिखने योग्य सब इसमें लिखा है. तुम्हें हंसी आयेगी. तुम हंसो… हंसो… तुम तो व्यावहारिक हो. अपनी तिरस्कार-पूर्ण हंसी हंसो. परंतु, ऐसा एक हास्य, विडम्बनापूर्ण एक शब्द मेरा हृदय चीर डालेगा. मैंने बहुत सहा है, अब और नहीं सहा जाता. मैं तो इन पंक्तियों को बार-बार दुहराऊंगा.

‘वन वगडामां भूली पडी त्यां अमृत प्यालो पीधो रे,

पीधो, लीधो सार सृष्टिनो, कोल अमर त्यां दीधो रे,

हुं गांडी के दुनिया गांडी, आप करी ल्यो गणती रे.”

मैं निर्जन वनमें रास्ता भूल गयी हूं, वहां मैंने भ्रमृत का प्याला पीकर सृष्टि का सार पा लिया है. वहीं मैंने अमर वचन दे दिया. हे मेरे स्वामी, मैं पागल हूं या दुनिया पागल है, इसका निर्णय आप ही कर लें.

 

जब मैं भावों और कल्पनाओं की तरंगों में डुबकियां लगा रहा था, तब भड़ौच में जीजी-मां और लक्ष्मी, मेरा नाम स्मरण करके जीवन बिता रही थीं. जीजी-मां आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ती थी और सरल-हृदया लक्ष्मी सास के स्नेह और शिक्षा के नये सांचे में ढल रही थी.

जीजी-मां ने लिखा है-

“मैं हिंडोले पर बैठी हुई झूल रही थी. घर में कोई नहीं था. मैंने गाना आरम्भ किया. मुझे एक ही बोल आता था, वह इस प्रकार था-

‘तमे पोढोने सारंगपणि

तारी अखिया में निंद भराणी.’

इसपर से विचार आया कि व्यर्थ समय नहीं खोना चाहिए. कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे कुछ नयी जानकारी हो और कुछ ज्ञान बढ़े. मैं पुराण, आख्यान आदि जानती-समझती हूं, परंतु गीता मुझे ज़रा भी समझ में नहीं आती. एकाएक उपर्युक्त भजन के बोल की स्फुरणा से शब्द निकले. ‘ब्रह्तरंग’ नामक वह भजन जब धीरे-धीरे गाया जाने लगा, तब पेन्सिल लेकर उसे कागज़ पर अंकित करने लगी.”

इस प्रकार जीजी-मां ने पंचीकरण, योगवशिष्ठ और गीता का अध्ययन आरम्भ किया. परंतु, ज्ञानयोग की अपेक्षा उनका कर्मयोग सबल था.

सारे घर में केवल दो बड़ी थीं; ननद और भाभी. परंतु रुखीबा ने अभी अपनी चुप्पी नहीं छोड़ी थी. वे सुबह-शाम चबूतरे पर आकर बैठतीं, जाति की आने-जाने वाली त्रियों को इकट्ठा करके पंचायत करतीं और जीजी-मां का दिल दुखाने वाले ताने सुनाया करतीं. जीजी-मां का भी निःशब्द असहयोग चल रहा था.

एक दिन सबेरे जब वे चबूतरे पर नहीं आयी, तब जीजी-मां को चिंता हुई. ‘दोपहर हो गयी, फिर भी वे नीचे उतरती नहीं दीख पड़ीं. क्या बात हुई? इतने वर्षों के वैर के पश्चात, बिना बुलाये उनके कमरे में जाना चाहिए या नहीं? जाने पर अपमान किया तो?’ इस प्रकार के संकल्प-विकल्प करती हुई जीजी-मां अंत में बीच का दरवाजा खोलकर ऊपर नयी. वहां रुखीबा अपने कमरे में अचेत अवस्था में पड़ी थीं. उन्हें बड़ा तेज़ बुखार था.

जीजी-मां ने वैद्य बुलाया और रुखीबा की सेवा आरम्भ की. जब वे चेत हुई, तब अप्रिय भाभी को देखकर ज़रा हिचकिचाई, परंतु अनिच्छा से उनकी सेवा स्वीकार करनी पड़ी. तीन महीने तक पैरों खड़े जीजी-मां ने अपंग-सी बनी हुई रुखीबा की अकेले सेवा-सुश्रूषा की.

पहले तो जीजी-मां की सेवा-सुश्रूषा से रुखीबा का गर्व उबल उठा- ‘हाय हाय, यह भी मेरे भाग्य में था!’ परंतु अंत में दुर्जेय रुखीबा विजित होकर बिस्तर से उठीं. छुटपन में तेजस्विनी ननद को जितना मान मिलता था, उतना ही जीजी-मां उन्हें देती रहीं. बीस वर्ष का विष उतर गया. पहले रुखीबा मुझे आता हुआ देखते ही खटाक-से दरवाज़ा बंद करके अपना क्रोध शांत करती थीं, परंतु अब मुझे भी सत्कार मिलने लगा जब मैं भड़ौच जाता, तब पाक-कला की वे अद्वितीय निष्णात, कई वर्षों से भूली हुई अपनी इस कला को ताज़ा करके जीजी मां के लड़के के आगे उपहार धरा करतीं. भयंकर रुखीबा को-जिनके गर्जन से सारी जाति त्रस्त होती और घर सुलग उठते थे- अपनी मुख्य वैरिन ‘चिमन मुन्शी की लड़की’ के वशीभूत हुआ देखकर सभी विस्मित हुए.

 

भड़ौच उस समय विचित्र-सी नगरी थी. वह न शहर था, न गांव, इसलिए दोनों की असुविधाएं वहां थीं. कलक्टर उसके सामुदायिक जीवन में बड़े-से-बड़ा व्यक्ति था. कलक्टर अर्थात् मुगल बादशाह का बादशाह. भड़ौचियों ने इस गोरे अधिकारी को खुश करने का धर्म स्वीकार किया था. इस धर्म की आड़ में जो खुशामदें होती थीं, उसके कई प्रसंग मैंने ‘स्वप्नद्रष्टा’ में वर्णित किये हैं.

एक पारसी भाई का सूत्र था- ‘साहब के पेट में घुसें, तो सोने के बनकर निकलें.’

अनेक वर्ष हुए, भड़ौच में राव बहादुर चुनीलाल वेणीलाल सी.आई. ई. कलक्टर के दाहिने हाथ थे. उनके पुत्र रा.ब. मोतीलाल पिताजी के परम-मित्र थे. उस समय मोतीलाल काका म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष थे. वे मिलनसार, हंसमुख, उदार हृदय के और बहुत भले आदमी थे. उनके सभी लाभ उठाते और अनेक पहुंचे हुए लोग उन्होंने शहर वालों से गालियां भी दिलवाते थे.

मोतीलाल काका के पुत्र रामलाल भाई, मनु काका और मैं- हम तीनों की निराली मित्र-त्रिपुटी थी. मोतीलाल काका मुझे अपने पुत्र के समान मानते थे और मैंने भी उनके परिवार को अपना समझा था. मैं अकेला ही होता.

उनके कारण मैं शहर की प्रकट हलचलों में भाग लेने लगा.

हमारे एक नगर-निवासी ने कलक्टर को अपने घर चाय पर बुलाया. उन्होंने मुझ से अंग्रेज़ी में भाषण लिखवाया; कारण कि वे मजिस्ट्रेट बनना चाहते थे. मैंने अपनी आडम्बरयुक्त शैली में लिखा- भाषण करने वाले सज्जन प्रत्येक अंग्रेज़ी शब्द के नीचे गुजराती उच्चारण भी लिखवा ले गये; कारण कि अंग्रेज़ी लिपि में शब्द पढ़ने की अपेक्षा स्वदेशी लिपि में पढ़ने की देशभक्ति उन्हें प्रिय थी, परंतु उनके दुर्भाग्य से मैंने शब्द को दो भिन्न लाइनों में लिख दिया था- ‘माई टंग इज नॉट ए-लोक्वेंट इनफ… आदि.

चाय-पानी शुरू हुआ. वे सज्जन भाषण देने के लिए खड़े हुए. पढ़ते-पढ़ते ‘माई टंग इज़ नॉट ए-, कह कर रुके, ‘ए’, फिर से उच्चारण किया. उलझन में पड़ गये, इससे पुनः ‘ए’ का दीर्घ उच्चारण किया. जब लोग हंस पड़े तब घबरा कर उन्होंने जल्दी से ‘लोक्वेंट’ इनफ टु’ कह कर पढ़ डाला.

एक बार एक गोरे कलक्टर की त्री प्रसूति के लए विलायत जाने वाली थी. उसे गांव के अनेक लोगों ने मानपत्र दिया. बड़ी  उम्र में साहब को पुत्र प्राप्ति हुई, इसके लिए उन्हे बधाइयां दी गयी. खुशामदों के ग्रासों से सर्वदा अतृप्त रहने वाला कलक्टर भी खुशामद के इस एक ग्रास से अति-तृप्त हो गया.

उसने कहा- “मैंने अनेक अवसरों पर मानपत्र लिये हैं, परंतु मानपत्रों के इतिहास में इस मानपत्र का स्थान निराला ही है.”

कांग्रेस द्वारा स्वाभिमान का संचार करने से पहले प्रत्येक जिले का मुख्य शहर अधिकतर कलक्टर के खुशामदियों का अखाड़ा बना हुआ था. भड़ौच की इस अधम मनोदशा के अंधकार में एक उज्ज्वल-व्यक्ति थे- अम्बाशंकर उत्तमराम मलजी अथवा सबके मत से ‘छोटू भाई’.

जब मैं कालेज में था, तब छोटी अवस्था में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट प्लीडर की परीक्षा पास करके वकीलों में और गांव के बड़े लोगों में अग्रस्थान प्राप्त किया था. छोटू भाई वकील थे, राजनीतिज्ञ थे, परंतु इससे भी अधिक जीवन में जिन कलाकारों की मैत्री का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, उनमें वे अग्रगण्य थे. भड़ौच में वे ‘व्यक्ति’ नहीं थे- ‘संस्था’ थे. छोटू भाई के जीवन में अस्वास्थ, उत्पाद या अविचार जैसी कोई चीज़ नहीं थी. गौरव-पूर्ण स्वास्थ्य से वे अपने हाथों अपना मार्ग तय करते रहे. छोटू भाई ने बहुत किया, परंतु उनकी विशिष्टता ‘करने’ की अपेक्षा ‘होने’ में अधिक थी.

वे साफ़-साफ़ और थोड़ा बोलते थे. उनकी कानूनी दृष्टि सूक्ष्म थी. हिसाब में वे बेजोड़ थे. दृढ़ता उनकी वकालत का मुख्य लक्षण था. न्यायाधीश भी उनसे डरते थे. हाईकोर्ट में जब उनकी ओर से अपील दाखिल होती थी, तब साथ में उनकी टिप्पणी भी अवश्य होती थी. वकील के रूप में वे बुद्धिमान और मनुष्य के रूप में महान थे.

1904 या 1905 में वे कांग्रेस में सम्मिलित हुए. सूरत कांग्रेस के पश्चात जब उग्र-पक्ष का ज़ोर बढ़ गया, तब वे धीरे से खिसक गये. उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा- “मुझे इसमें रास्ता नहीं दीख पड़ता.”

भड़ौच में प्रायः गड़बड़ी ही रहती थी, परंतु छोटू भाई इस सब से अलग रहते. म्युनिसिपैलिटी के लिए एक वकील ने नया पक्ष खड़ा किया और उनको उसका पहला प्रमुख बनाया. परंतु वहां द्वेष का वातावरण फैलते देखकर वे वहां से भी हट गये.

बाद में वे ‘सहकारी मंडलों’ के काम में लग गये और सारे गुजरात में वर्षों तक उसकी व्यवस्था की. आगे बढ़ती हुई राजकीय मनोवृत्ति उन्हें भली न लगती, पर उन्होंने कभी उसका विरोध नहीं किया. अधिकारियों के साथ वे विवेकपूर्ण व्यवहार करते- उसमें खुशामद की गंध तक न होती.

एक गोरे कलक्टर की ऐसी आदत थी कि जब वकील मुकदमा दायर करने के लिए आते, तब वह अपने हाथ में कहानी की पुस्तक लेकर बैठ जाता. एक दिन शाम को छोटू भाई एक फौजदारी केस के लिए उसके बंगले पर गये.

“मि. मलजी, यह आपकी कुर्सी है, आप यहां से केस चलाये.”

इस प्रकार कहकर ‘साहब बहादुर’ वहां से दूसरे छोर पर जाकर आराम कुर्सी पर लेट गये और हाथ में कहानी की पुस्तक ले ली.

‘मि. मलजी, अब आप वहां से बोलिये, मैं यहां सुन रहा हूं.”

छोटू भाई ने कागज़-पत्र बंद कर दिये.

“मैं आपको समझाने आया हूं, केवल बोलने नहीं.”

इतना कहकर वे चल दिये. यह बात हाईकोर्ट में भी पहुंची थी, ऐसा कुछ, धुंधला-सा स्मरण है.

छोटू भाई कभी किसी के आगे अपना दिल नहीं खोलते थे. मानव व्यवहार को भी उन्होंने अपूर्व कला से व्यवस्थित बनाया था. प्रत्येक पत्र का दूसरे दिन उत्तर दे देते थे. सामाजिक अवसरों पर शहर में जो चाहता था, उन्हें निमंत्रित करता, और छोटू भाई अधिक नहीं, तो दो मिनट के लिए अवश्य वहां उपस्थित होते. वे एक भिश्ती की बारात में गये थे, इससे भड़ौच के गर्व को आघात पहुंचा था. जब वे म्युनिसिपैलिटी में थे, तब वहां के काम के और अपने व्यवसाय के घंटे उन्होंने व्यवस्थित रूप से बांट दिये थे.

हमारा तीन पीढ़ियों का सम्बंध था. पिताजी की मृत्यु के पश्चात अनेक लोग हमें भूल गये, पर छोटू भाई ने हमारी खबर लेते रहना अपना कर्त्तव्य समझा. इसमें स्वार्थ नहीं था. व्यवहारिकता की अपूर्व भावना से वे ओतप्रोत थे. स्वयं गांव का नेतृत्व करते थे, परंतु प्रीवियस से लेकर एडवोकेट एक की परीक्षा में मैं जब-जब पास हुआ, तब-तब वे स्वयं उसके दूसरे दिन बधाई देने पहुंचते रहे. जब मैं पास हुआ, तब पहले वर्ष ही बिना कहे उन्होंने मुझे दो-तीन अपीलें भेज दीं. कहीं मैं पर्याप्त फीस न लूं, इसलिए उन्होंने इसे भी स्वयं निश्चित करके साथ ही भेज दिया.

यह सब विचारशील व्यवस्था-शक्ति का परिणाम था, परंतु इसमें शुष्कता नहीं थी. उनकी हंसी सदा स्नेहयुक्त होती थी. जब ईश्वर ने उन पर पारिवारिक दुख का असह्य भार डाल दिया, तब भी जो लोग आंसू पोंछने के लिए आते, उनसे पूर्ण स्वस्थता से मिलते थे.

एक बार बम्बई के प्रखर धारा-शात्रियों को छोटू भाई की उलट-पलट कर जांच पड़ताल करते मैंने देखा था. उन सब का जोश, पानी की उछलती हुई लहरों की तरह छोटू भाई के धैर्य के साथ टकराता और फिर लौट जाता था. उनका स्वभाव उग्र था, मूर्खों के साथ उनमें अधीरता आ जाती, परंतु उसे विचित्र संयम से स्वस्थ रखने की शक्ति उन्होंने प्राप्त की थी.

1942 में, जब मैं यह लिख रहा हूं, कुछ महीनों पहले ही उनका देहांत हो गया. अंत तक उनका कार्यक्रम ज्यों-का-त्यों अखंड रहा.

आज मुझे यह पता नहीं लगता कि भड़ौच में इस महत्ता को आंकने की या उसकी कद्र करने की शक्ति है या नहीं. इस युग में गुजरात में मानवता का मूल्य  केवल गांधीजी की निकटता से आंका जाता है, जब कि छोटू भाई व्यवहार में उनसे दूर थे. सच्ची महत्ता आत्मविकास में है, यह समझने की शक्ति या उदारता किसमें है? परंतु, यदि कठोर संयम से जीवन की व्यवस्था करना ‘योग’ हो, अपनी दृष्टि में जो सत्य दिखे, उसका अनुसरण करने में ही मनुष्यत्व का मूल्य हो, चंचल राग-द्वेष से दूर रहकर स्वास्थ्य की सिद्धि प्राप्त करने के अनवरत प्रयत्न में महत्ता हो, तो छोटू भाई महान गुजराती थे. ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ उक्ति पर उन्होंने अपना मनुष्यत्व निर्मित करने का प्रयत्न किया था और छोटे-से कार्यक्षेत्र और मर्यादित शिक्षा में विघ्नों के रहते हुए भी उन्होंने सफलता प्राप्त की थी.

(क्रमशः)

दिसंबर  2013 

 

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