सीधी चढ़ान (तीसरी क़िस्त)

समाज सुधार करने की मेरी लगन छोटी-मोटी प्रवृत्तियों में कुछ-न-कुछ कार्य करती रही.

मैंने शिखा छोड़ दी और दूसरों से छुड़वाई. मैंने ‘पीताम्बर’ पहनना छोड़ दिया और अपने मित्रों को भी धोती पहनकर खाना सिखाया. अनेकों में मुक्त-कंठ से नाटक के गायन गाने की आदत डाली. अनेकों को अपनी त्रियों को पढ़ाने-लिखाने वाला बना दिया. एक मित्र को ‘डम्बेल्स’ घुमाना सिखाया. उसकी बुआ ने विरोध प्रदर्शित किया- “मूर्खो, देवों के समान गोल शरीरों को मछुओं की तरह गठीला क्यों बनाते हो?” इस प्रकार मैंने अपनी जाति में युवकों को बिगाड़ने वाले के रूप में थोड़ी ख्याति प्राप्त की.

सीमंत के जाति-भोज के लिए भड़ौंच के भार्गव सुविख्यात थे. घर बेचकर भी इसे किये बिना उनका काम नहीं चलता था. इस प्रकार कई परिवार गृह-हीन हो गये थे. 1906 से मैंने इसके विरुद्ध जूझना शुरू किया. कई लोगों से प्रार्थना की, अनेकों को समझाया, कई बार कसमें खिलायीं, परंतु जब तक 1913 में इस रिवाज़ का खात्मा नहीं हो गया, तब तक भार्गवों की जाति सीमंत का जाति-भोज पेट भर-भर कर खाती रही.

1904 में हम कई मित्रों ने अरविंद घोष के ‘वंदेमातरम्’ और अन्य राष्ट्रीय पत्र पढ़ने के लिए ‘मुफ्त पुस्तकालय’ खोला. वहां हम मिलते और देश-भक्ति के भाषण करते. ज्यों-त्यों करके हम उसका खर्च चलाते थे. 1907 में जब मैं बम्बई आया, तब सेठ गोरधनदास चंदनवाले से मिला और उनकी उदारता से भड़ौंच में ‘दादाभाई नौरोजी फ्री लायब्रेरी’ की इमारत खड़ी हुई.

यह मेरा पहला प्रकट रचनात्मक कार्य था.

उस समय की अविस्मरणीय घटना है टेकरे (टीला) का ‘जाजरू (पाखाना) पुराना.’ यदि कोई महाकवि मिल जाय, तो उसकी कीर्तिगाथा महाकाव्य में वर्णित करने योग्य है. उस सौजन्य-पूर्ण ज़माने में, जबकि अभी दुष्ट अंग्रेज़ी शिक्षा ने बुरी आदतें नहीं डाली थीं, मुंशी के टेकरे का एक भाग, दीवारों से संवृत, सामुदायिक रूप से शरीर सुख की रक्षा के लिए अलग ही रखा गया था. 1895 में जब हमारे संयुक्त कुटुम्ब की विभक्ति हुई, तब पिताजी और अधुभाई काका अर्वाचीन विचारों के वशीभूत हुए. उन्होंने पुरानी व्यवस्था को बदल कर टेकरे के लोगों के लिए दो पाखाने बनवाये और शर्त करके, पीछे से हमारे तबेले में जाने के लिए खाड़ी की दीवार में खिड़की बनाकर दरवाजा लगा दिया. यूनानी कवि होमर के इलियड में ट्राय के गर्वपूर्ण कंगूरों का जो स्थान है, वही स्थान इस महाकाव्य में इन दो गृहस्थापत्य की कलाकृति के अनिवार्य अंग पा सकते हैं.

टेकरे (टीले) पर उस समय एक वीर कूटनीतिज्ञ रहता था. हमारी जाति के जिन पटवारियों ने सूरत और भड़ौंच जिले के गांवों में सरकारी मालगुजारी वसूल करने के भगीरथ पराक्रम किये हैं, उनमें वे अग्रगण्य और कालाग्नि के समान दुःसह माने जाते थे. हमारे ये पड़ोसी इस महाकाव्य के नायक हैं. उनके क्रोध का कोई पार नहीं था. वे लड़ते, तो वायु भी पीछे हट जाती. भड़ौंच जिले की चौपाल में बैठे-बैठे उन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा की- “मुंशियों से टेकरा छीन लिया जायगा.”

हिटलर के जगत-विजेता होने का संकल्प करने से पहले यदि किसी ने उसी परिणाम में महत्त्वाकांक्षा प्रदर्शित की थी, तो हमारे इस पड़ोसी ने. उन्होंने सिद्ध कर दिया कि संकल्प की सीमा किसी वस्तु की इच्छा रखने पर ही नहीं, चाहे जगत ऊपर हो या टीले की खाड़ी के नीचे हो- उसका वास्तविक मूल्य संकल्प की दृढ़ता पर है. संकल्प सिद्ध करने में वे कुशल थे. ‘माणका मुन्शी’ भड़ौंच में डिप्टी कलक्टर-पटवारियों के मुखिया थे. उन्हें खुश रखने में ही भलाई थी. और वे थे भोले. उन्हें खुश होते देर नहीं लगती थी- वे मित्रों के आगे अकेले में कारण भी बताते थे- ‘माणका मुन्शी लायक न होते, तो मैं कभी झुक सकता था? कभी नहीं.’

‘माणका मुन्शी’ स्वर्गवासी हुए और टीले के मुंशियों का तेज नष्ट हुआ. मुंशियों में बड़ी उम्र का योग्य पुरुष कोई नहीं था. त्रियों को सीधा करने में कितनी देर लगती थी? उस कूटनीतिज्ञ ने समझा कि उनकी भीष्म प्रतिज्ञा को पूर्ण करने का समय अब आ पहुंचा.

उन कृतनिश्चयी महारथी को इसमें ज़रा भी संदेह नहीं था कि वे सत्य निष्ठ थे. काफी पूछ-ताछ करके, अनेक दस्तावेजों की खोज-बीन करके उन्हें विश्वास हो गया था कि सन् 1800 ई. के लगभग जब पेशवा ने पेशवाई नहीं खोई थी और नेपोलियन यूरोप को कंपा रहा था, तब टीला मुंशियों का नहीं, वरन उनके अपने पूर्वज जगुभाई देसाई का था. उन्हें यह भी विश्वास हो चुका था कि करसनदास मुंशी ने अनुचित तरीके से वह टीला जगुसेठ से छीनकर, मुंशियों का बना लिया था. वरसाई के इकरारनामे की तरह इस इकरारनामे को फाड़ फेंककर, जगुदेसाई के टीले को उन्हीं के वंशजों का टीला बनाकर, दुष्कृतों का विनाश करके धर्मसंस्थापन करना ही उनका जीवन-मंत्र बन गया.

पिताजी के स्वर्गवास के बाद सातवें या आठवें दिन आक्रमण की दुंदुभि बज उठी. इलियड का वीर नायक एकिलीस जिस प्रकार तंबू से निकला था, उसी प्रकार हमारे पड़ोसी निकले- कहां से यह बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं- और आंखें फाड़ कर, छाती तानकर, पैसे वाले जो कुछ पचा बैठे थे, उनके प्रति गुर्राहटभरा गर्जन किया.

मैं था डरपोक. अपने शिरच्छत्र को हाल ही में खो चुका था. अपमान कभी सहा नहीं था. मैं थर-थर कांपने लगा. नीचे उतरा, तो जीजी-मां को अपशब्दों से पीड़ित और आंसू बहाते देखा.

इस कथा के नायक ‘तंतुविग्रह’ में प्रवीण थे. मुझे कहना चाहिए कि हिटलर को जो इस प्रकार का विग्रह खोज निकालने का यश प्रदान किया जाता है, वह अज्ञानता की पराकाष्ठा है. इस ‘तंतुविग्रह’ का पहला स्वरूप इस प्रकार का था. आते-जाते छत की ओर दृष्टि जमाकर वे महारथी कहते- ‘टीला जगुदेसाई का है’ या ‘पाखाना, खिड़की मेरे हैं’ या ‘पैसे-वालों की खाकर पचाई हुई ज़मीन उनके रोम-रोम से फूटकर निकलेगी.’ इस स्वगत सम्भाषण में अपशब्दों की भरमार तो होती ही थी, साथ-साथ वे छाती ठोककर मुहल्ले को गुंजा देते थे. उसे सुनकर मुहल्ले के बच्चे और उनके सगे-सम्बंधी बाहर निकल आते. हम तो उस समय घर में घुसकर ही बैठे रहते थे.

थोड़े दिनों, आठ-नौ बजे तक अपमान सहन करने के लिए हम लोग कान लगाये बैठे रहते. कभी-कभी यह विचार भी आता था कि इससे तो घर छोड़कर चले जायं, तो अच्छा.

इस अनुभव की एक विशेषता यह थी कि हमारे उन पड़ोसी का पुत्र मेरा मित्र था और जब वैसा अवसर आता, तब वह तुरंत मेरे पास आकर अपना दुखड़ा रोने लगता था.

आरम्भ किये हुए को पूर्ण करना बुद्धिमानों का दूसरा लक्षण है और इसके अनुसार हमारे पड़ोसी ने ‘तंतुविग्रह’ के साथ आक्रमण आरम्भ किया. कभी वे वीर हमारे ‘ट्राय के गर्वपूर्ण कंगूरे’ को ताला लगा देते और मुहल्ले वाले तड़प उठते, और कभी लकड़ियों  का गठ्ठा खाड़ी की खुली ज़मीन पर डलवा कर नया मोर्चा खड़ा करते. मुहल्ले में तुमुल-ध्वनि होती, वीर कुपित होता, सब कांपने लगते. कभी उन्हें कूटनीति की हवा लगती और वे जीजी-मां से आकर मिल जाते. ‘मैं कनुभाई को कभी दुख नहीं दूंगा’ इस प्रकार आश्वासन देते और जाते-जाते यह धमकी भी दे जाते, ‘पर देखना, मैं बड़ा खराब आदमी हूं.’ फिर पंद्रह दिन बीतते कि पुनः ‘तंतुविग्रह’ आरम्भ हो जाता.

इस विग्रह के लिए मैं बिल्कुल अयोग्य था. बचपन से कभी गाली नहीं दी थी. कभी किसी से वाद-विवाद शायद ही किया हो. बड़ी इच्छा होती थी कि कमर कसकर निकल पडूं, पर जैसे ही इच्छा होती थी, वैसे ही मर जाती थी. ‘मारा केसर मीना कंथ हो, सिधावो जी रणवाट’ गाकर, कोई जोश दिलाने वाला भी नहीं था, इससे हिनहिनाता हुआ घोड़ा आगे बढ़ने की अपेक्षा सामान्य रूप से जहां होता था, वहीं बैठ जाता था.

जीजी-मां को ‘तंतुविग्रह’ से कठोर आघात पहुंचा. उन्होंने ठाकुर मामा से सलाह ली. मृत-पति की प्रतिष्ठा के लिए और बालक-पुत्र के अधिकार के लिए उन्होंने निश्चय किया कि झुका न जाय. उन्होंने भगवान त्रिपुरारि से सहायता मांगी. मैंने पुस्तकों की खोज-बीन की, प्लुटार्क के जीवन-चरित्रों में, कार्लाईल की प्रोत्साहक जीवन-कथाओं में, देश-विदेश के महाकाव्यों में गढ़ की रक्षा के लिए बाहर निकले हुए अनेक बहादुरों के उल्लेख थे, परंतु इस प्रकार के गढ़ के लिए क्या किया जाय, यह किसी स्थान पर भी नहीं मिला. इस प्रकार की वीरता के उदाहरण के अभाव में मैं जैसा था, वैसा ही रहा.

अंत में हमारे पड़ोसी ने युद्ध आरम्भ किया. उन्होंने तीन-चार दिनों तक सबेरे आते-जाते छत पर आंखें गड़ाकर ऊंचे स्वर में सिंहनाद किया- ‘यह जगुदेसाई का टीला है, जिसे न रहना हो, वह यहां से चला जाय.’ फिर पिछली खिड़की के द्वार पर हमारे ताले के ऊपर अपना ताला जड़कर वे अपने गांव चले गये.

हमारी छावनी में घबराहट फैल गयी. अर्जुन के पराक्रम को स्मरण करके, मैं साइकिल पर सवार होकर गांव के बाहर, जहां मेरे मामा रहते थे, वहां उन्हें बुलाने के लिए गया- जिस प्रकार कौंतेय श्रीकृष्ण को निमंत्रण देने गया था उसी प्रकार. जाते हुए रास्ते में एक-दो लड़के भी साइकिल से टकराये और कुचले, मरे नहीं.

ठाकुर मामा कटिबद्ध होकर इस धर्मयुद्ध में सम्मिलित हुए. द्वार पर लटकता हुआ शत्रु का ताला हमने तोड़ डाला. ‘हमने’ का मतलब मामा के हाथ और मेरी उपस्थिति
से है.

दुश्मन की सेना आयी. उसमें से एक महारथी डंडा लेकर आये और मामा को द्वार के साथ दबा दिया. वीर भार्गव के रुधिर की सरिता सरलता से बहती रुक गयी. हमारा ताला टूट गया. जिस प्रकार ‘ट्राय के गर्वपूर्ण कंगूरे’ के आगे यूनानी और ट्रोजन वीरों के भाले और ढाल बिखर गये थे, जिस प्रकार लंकागढ़ के भव्य-कोट के आगे  के महारथियों के शत्रात्र बिखर गये थे, उसी प्रकार मुंशी के टेकरे के स्थापत्य की इस अविस्मरणीय कलाकृति के आगे दो-दो तालों के टुकड़े भूमि पर बिखरे पड़े थे. अब यह विग्रह क्षुद्र, अर्वाचीन शौर्य-विहीन हो गया, वह महाकाव्य की वस्तु बनने से रह गया. देव-दानवों के महावीर सहवरों से हम वकील के गुमाश्ते के गुलाम बन गये. शाम को हमारी ‘बारात’ फौजदार के घर गयी. हमने दावा किया, हमारे पड़ोसी ने ‘तंतुविग्रह’ जारी रखने के प्रयत्न किये. ‘खिड़की खाली करनी पड़ेगी, हवेलियां उठवाकर रहूंगा!’ हमारे पड़ोसी ने कहा. जीजी-मां ने घर-घर जाकर दस्तावेज इकट्ठे किये. अपने हाथ से उनकी नकल की. वृद्धों में से कौन गवाही देगा, यह निश्चित किया. ‘पाखाना पुराण’ की सुनवाई होने की तैयारी हुई, अतः हम गवाहों के लिए दौड़-धूप करने लगे. मैं तो लाड़ला और सुकोमल था, किसी से विनती करना मुझे आता नहीं था. और दबाव कैसे डाला जा सकता था? कोई ‘नहीं’ कह देता, तो मुझे सिर कटने के सदृश दुख होता. यदि मामा मुझे किसी के घर ले जाते, तो उसी रात को हमारे पड़ोसी वहां जा पहुंचते, मिन्नतें करते, सिफारिशें करवाते. ‘पैसे वालों ने मुझे मार डाला- तुम क्यों हम गरीबों को मार रहो हो?’ दूसरे दिन गवाह अदालत में आने से इन्कार कर देता और हम पुनः शिकारी कुत्ते की तरह उसके पीछे पड़ जाते.

डाक्टर बरजोरजी गांव के बड़े ही प्रतिष्ठित सज्जन थे. पिताजी के समय म्युनिसिपैलिटी में साथ थे. अनेक बार वे अहाते के द्वार से आये और गये थे. उन्होंने हमें गवाही देने लिए आने के स्वीकृत दे दी. दूसरे दिन हमारे पड़ोसी एक सम्बंधी को लेकर उनसे मिल आये. डाक्टर बरजोरजी ने गवाही देने की अनिच्छा प्रगट करते हुए मुझे पत्र लिखा. मामा ने कहा- “कोई बात नहीं, हम इसे ठीक कर लेंगे.”

डाक्टर बरजोरजी के अस्सी वर्षीय पिता सोरबशा सेठ, बड़े काका के पुराने मित्र, शहर के बाहर रहते थे. हम उनके पास पहुंचे. उन्होंने ‘माणका के साई’ के पुत्र का प्रेम से स्वागत किया. ‘कौन-सा अहाता? कौन-सा गैरेज? कौन-सी खाड़ी?’ हमने उन्हें याद दिलायी. हमने बात की और सेठ को गुस्सा आ गया. “बरजोर इन्कार करता है? ‘माणका भाई’ के लड़के की मदद नहीं करेगा, तो किसकी करेगा? मैं कहूंगा उससे बेटा, घबराना मत.”

दूसरे दिन डाक्टर बरजोरजी हमारे घर आये- “अरे, तुम बाबा जी से क्यों कहने गए? मैं गवाही दूंगा. इसमें बात ही क्या है?”

मुकदमा चला. तीन दिन मुझसे उलट-पलट कर जिरह की गयी. दीवानी अदालत का, अभियुक्त के रूप में मुझे यह पहला अनुभव हुआ.

जीजी-मां घर बैठकर नकलें करतीं. मिलने योग्य गवाहों से मिलतीं. ‘पाखाना पुराण’ से भार्गवों के टीलों में ज़ोरदार चर्चाएं चल पड़ीं. हमारे पड़ोसी के मित्र कहने लगे- “अब टीला जगुसेठ का हो जायगा.”

जीजी-मां विचार करतीं- ‘हार गये, तो क्या होगा?’ मुझे हारने का दुख नहीं था. हारने से भी अधिक दुख तो इस बात से होता था कि अपने पड़ोसी के समान मेरी जीभ नहीं चलती थी. मैं अपने-आपको इसके लिए धिक्कारता था कि उसके सामने उद्दंडता से मुझसे बोला नहीं जाता था.

अंत में हम जीत गये. यह फैसला हुआ कि अहाता-पाखाना सबके, और द्वार हमारा. पड़ोसी ने अपील की और वहां भी हारा!

यह ‘पाखाना-पुराण’ 1913 में हाईकोर्ट में समाप्त हुआ. मुंशिओं का स्थान टीले पर निर्णय और अचल रहा. इस प्रकार टीले का अंतिम-विग्रह समाप्त हुआ. देवताओं ने पुष्पवृष्टि की या नहीं, यह तो ज्ञात नहीं, पर विपक्षियों के मुख से तो वह लगातार होती ही रही.

* * *

नन्हीं, सरल हृदय, विश्वासी लक्ष्मी, जीजी-मां की योजना में शामिल हो गयी थी. केवल यह प्रश्न सास को उलझन में डालता था कि उसका अविकसित मानस पुत्रवधू बनने के योग्य कब होगा. परंतु मैं मित्र के समीप हृदय खोलने के अवसर मिलने से घर से स्वस्थ और संतुष्ट रह सकता था. और लक्ष्मी के मूक आत्म-समपर्ण में ऐसा प्रभाव था कि उस के प्रति असंतोष व्यक्त करना बड़े अपराध के सदृश प्रतीत होता था.

1909 के अप्रैल में सत्र पूरा हो गया, इसलिए मुझे बम्बई में रहने की आवश्यकता न रही. उस समय मेरा स्वास्थ्य अधिक खराब हो रहा था, इससे डाक्टर ने मुझे पढ़ना छोड़ देने के लिए कहा. परिणामस्वरूप मैंने हारमोनियम मंगवाया. मनु काका और रामलाल भाई थे ही. अतः हम तीनों ने एक ही शिक्षक रख लिया- जिसका वाचाल और विनोदी स्वभाव हमें संगीत से भी अधिक आनंद देता था.

हमारे शिक्षक संगीत में बड़े निष्णात थे. उनके छोटे लड़के बहुत सुंदर गाते और तबला तथा हारमोनिया बजाते. शहर के लोग इस शिक्षक से बड़े खुश रहते थे. उन्हें शिक्षा देने के लिए घर बुलाना तो भड़ौंच में प्रतिष्ठित नागरिक का लक्षण बन गया था. हमारे मास्टर आते, चुटकुले सुनाते, और जैसे शिष्य थे, वैसी ही शिक्षा देते.

मुझे स्वर का ज्ञान नहीं था, इसलिए मैंने ‘हार मोनियम शिक्षिका’ मंगायी और केवल स्मरण शक्ति की सहायता से सैकड़ों गायन फटाफट बजाने शुरू कर दिये. इस यांत्रिक अभ्यास के बदले स्वर परखना सीखा होता, तो आज वास्तविक संगीत से जिस प्रकार अछूता रहा हूं, उस प्रकार न रहता.

भड़ौंच उस समय श्रद्धावान शहर था. किसी भी धार्मिक ढोंग करने वाले नये आदमी को हमारे शहर में सुविधा मिल जाती थी. यज्ञ, सत्संग, कथा-वार्ता आदि जारी रहते थे. शंकराचार्य आते और जटाधारी योगी आते. कोई नागा महात्मा आकर गांव के बाहर ठहरते. उनके दर्शन करने के लिए द्वार से लेकर घर के भीतर तक भूमि पर कपड़े बिछाये जाते. वे आते, पीताम्बर और नकली वर्क का मुकुट पहन कर. गली के सामने पहुंचने पर उनके साथ आई हुई तीन-चार त्रियां बारी-बारी से चार पैरों पर घोड़ा बनतीं और योगींद्र उस घोड़े पर विराजमान होकर आते.

एक बार शहर में खबर फैली कि भागेकोट के घाट पर एक मंदिर में महादेव के शिव-लिंग की ‘ओम प्रतिष्ठा’ की ज़रूरत है. सारा शहर उमड़ पड़ा. मंदिर के पुनरुद्धार के लिए चंदा किया गया. अच्छे-अच्छे लोग कहने लगे कि उस लिंग से गम्भीर शब्द निकलते हैं. ‘ओम प्रतिष्ठा’ के प्रण किये गये. मैं भी देखने गया. ‘हूं… अ…हूं…अ’ का वाद अवश्य हो रहा था, यह उस भीड़ के बीच में से मैंने भी सुना. कुछ दिनों बाद आवाज़ बंद हो गयी. लोगों ने समझा कि अब चंदे की रकम से भगवान शंकर संतुष्ट हो गये हैं.

जब मंदिर बनने लगा, तब पानी निकलने के छिद्र में से एक मरे हुए मेंढक का
शव मिला.

प्रतिवर्ष एक योगिराज अपने शिष्यों-सहित नर्मदा-स्नान करने भड़ौंच आते और एक महीना रहा करते थे. नगर-निवासी उनका आतिथ्य करते और वे प्रवचन करते थे. वे प्रवचन मुझे सुंदर, गम्भीर और प्रेरणा-मूलक जान पड़े. शिष्य बनने वालों को वे योग सिखाते थे. ‘वर्ण-व्यवस्था ईश्वर की बनायी कैसे हो सकती है?’ इस विषय में शंका उठाने मैं एक बार उनके पास गया था.

जीजी-मां और चार अधेड़ आयु की विधवाओं का एक भक्त-मंडल था. वह रोज गीता पढ़ता और आपस में उसका विवेचन करता था. जीजी-मां ने एक दिन मुझसे कहा- “योगिराज की एक शिष्य नर्मदा-स्नान करने भड़ौंच आयी है, उसने भक्तमंडल में गीता पर बड़ा सुंदर प्रवचन किया है.”

तीन-चार दिनों बाद बड़े ही भक्तिभाव से जीजी-मां इस ‘महात्मा’ के नाम से परिचित होने वाली योगिराज की शिष्या को घर ले आयी.

‘महात्मा’ लम्बी, सत्ताईस वर्ष के लगभग, और रूपवान न होने पर भी यौवन से प्रदीप्त महिला थीं. शरीर पर उन्होंने केवल सफेद वत्र पहन रखा था. उनकी बड़ी, और तेजस्वी आंखों में केवल आध्यात्मिक तेज ही था, यह नहीं कहा जा सकता था. तीसरी मंजिल के अपने बड़े कमरे में बैठ कर मैं तबला बजा रहा था, तभी वहां ‘महात्मा’ आयी. मैं भी गीता और योग-सूत्र का रसिक था, अतः मैंने पूज्यभाव से नमस्कार किया.

मेरे तीसरे मंजिल के कमरे के पीछे छत थी. उसके पीछे एक हवा और रौशनी वाली कोठरी थी, जिसमें पुराना सामान पड़ा रहता था. सारा घर देखने के बाद ‘महात्मा’ को वह कोठरी पसंद आयी. जीजी-मां ने उन्हें वहां रहने के लिए निमंत्रित किया.

दूसरे दिन ‘महात्मा’ भोजन करने आयी. वे तेल-मिर्च नहीं खाती थीं. उनके लिए जीजी-मां ने अलग से पकाया. एक सेर दूध के बिना उनका काम नहीं चलता था. वह भी मंगाया गया. खाते-खाते मैंने योगाभ्यास की बात छेड़ी.

मैं उस समय ‘त्रैगुण्यविषयावेदा नित्रैगुण्यो भवार्जुन’ को समझने के प्रयत्न कर रहा था. योगसूत्र के अनेक सूत्रों को समझ सकने में मैं असमर्थ था मैंने प्रश्न किये. ‘महात्मा’ ने केवल ‘शब्दाडम्बर-पूर्ण उत्तर दिये. अंत में उन्होंने यह प्रतिपादन करना शुरू किया कि सब योगों में ‘प्रेम-लक्षण-भक्ति’ का योग श्रेष्ठ है. मैं तत्त्वज्ञान का थोड़ा-बहुत अभ्यासी, कैंट और स्पेन्सर के सिद्धांतों से प्रभावित और योग की प्रक्रियाएं सीखने के लिए उत्सुक था, इससे मेरा समाधान नहीं हुआ, परंतु जीजी-मां और उनकी मंडली को ‘महात्मा’ की सुमधुर वाणी ने मुग्ध कर लिया.

जो भी हो, मुझे एक बात तो मान ही लेनी चाहिए; इससे पहले ऐसी विदुषी और वाचाल त्री के साथ मैंने कभी बात नहीं की थी. इससे यह बात पक्की है कि मुझे बहुत आनंद आया.

उस रात ऊपर की कोठरी साफ नहीं हुई थी, इसलिए ‘महात्मा’ जीजी-मां के साथ पहली मंजिल में ही सोई.

सबेरे जल्दी उठकर, नर्मदा में नहाकर, मंदिर में संध्या करके, आठ बजे के लगभग ‘महात्मा’ तीसरी मंजिल पर, जहां मैं तबला बजा रहा था, आयी. मैंने उनका हृष्ट-पुष्ट शरीर देखा, तेजस्वी आंखें देखीं, और हृदय सिहर उठा. श्रद्धालु माता, छोटी बालिका बहू, एक ही एक जवान लाड़ला बेटा, बड़ी हवेली, तीसरी मंजिल, पिछली कोठरी और महीने भर तक नर्मदा में नहाना! पैर से लेकर सिर तक मेरे शरीर में सिहरन व्याप्त हो गयी. हमने उल्टी-सीधीं बातें की और मुझे घबराहट हुई- ‘कहीं इस देवी ने चीख मारी तो मेरे इगगज्ज़त मिट्टी में मिल जायगी!’ यह भय मेरे हृदय में समा गया.

कोई बहाना खोजकर मैं दीवानखाने में उतर आया और उन्हें भी बुला लिया. वहां हमारी खिड़कियों के सामने पड़ोसी की खिड़कियां पड़ती थीं. महम्मद आता-जाता रहता था. लक्ष्मी भी आती थी. वहां मैं निर्भय हो गया.

मैंने पुनः ‘महात्मा’ से उनके अपने विषय में पूछा- “योगिराज को छोड़कर तुम अकेली क्यों आयी?”

“मेरी उनके साथ नहीं बनती. इस पत्र का मुझे उनको कड़ा उत्तर देना है.”

उन्होंने मुझे पत्र दिया. उसमें पूज्यपाद श्री महाराज योगिराज की आज्ञा से शिष्या श्री… को आज्ञा दी गयी थी कि एक वर्ष के लिए पूज्यपाद ने उनका बहिष्कार किया है. इसलिए उन्हें किसी तीर्थ-स्थान में रहकर, जप-तप करके प्रायश्चित करना चाहिए.

“यह तो दंड दिया गया है. तुमने कोई अपराध किया मालूम होता है!” मैंने कहा.

यह मेरी मूर्खता थी. ‘महात्मा’ ने समझा कि मैं उनमें दिलचस्पी ले रहा हूं, इसलिए उन्होंने इस प्रकार बातें करनी शुरू कीं, जैसे मुझसे बहुत पुराना परिचय हो. “योगीराज योग के अभ्यासी हैं, साथ ही वैद्य भी हैं और वाममार्गी भी. जब मैं सात वर्ष की थी, तब मेरी विधवा मां ने मुझे योगीराज को समर्पण कर दिया. उनके आश्रम में मैं पढ़ी, होशियार हुई. उन्होंने मुझे मुख्य शिष्या बनाया. मैं उनकी पटरानी भी थी- परंतु नियमानुकूल, हठयोग के शासन के अनुसार. गये वर्ष योगीराज बम्बई गये. वहां किसी और को प्रिया बनाया. मैं भी किसी दूसरे पुरुष के साथ हंसी मज़ाक करने लगी. योगीराज कुपित हुए. मैंने उत्तर दिया- “तुम दूसरी को पसंद कर सकते हो, तो मैं क्यों न करूं? अंत में योगीराज ने इस प्रकार बहिष्कार की आज्ञा दी है.”

घर की त्रियों के सिवा मेरा अन्य किसी त्री से परिचय नहीं था. मेरी कल्पना में जो नारी चित्रित थी, उसकी सर्वगुण-सम्पन्नता मेरे मन में हमेशा छायी रहती थी. भ्रष्ट त्रियों के विषय में बहुत पढ़ा था, पर उसे दृष्टि से आज पहली बार ही देखा. जिस प्रकार केकड़े को देख कर कंपकंपी आती है, उसी प्रकार मुझे कंपकंपी आयी और वहां से भाग जाने को मेरा मन करने लगा.

“तब तो तुम्हें दंड मिला है, क्यों?” मैंने पूछा- “यहां नर्मदा स्नान के लिए आयी हो, यह बात झूठी है न?”

“मुझे दंड कैसा? मुझे एक मुंहतोड़ उत्तर लिख दो. मैं उन्हें समझ लूंगी.”

‘महात्मा’ की आंखों में खून उतर आया. ज्यों-त्यों बात खत्म करके मैं भोजन करने गया, और महात्मा ने झूले पर बैठे-बैठे भावपूर्ण स्वर में ‘कन्हैया क्या जाने मेरी प्रीत’ (कानुडो शुंजाणें मारी प्रीत) यह गीत गाना आरम्भ कर दिया. किसी प्रकार खाना खत्म करके मैं ऊपर जा बैठा. जीजी-मां से कहने की हिम्मत नहीं हुई, कहीं वे मुझे ही खराब समझ बैठीं, तो? यह त्री यदि मुकर गयी, तो मुझ पर ही आ बनेगी.

शाम को चार बजे के लगभग ‘महात्मा’ फिर ऊपर पधारीं. मैंने स्पष्ट कहा- “इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है.” जीजी-मां से यदि यह सब कह दूं, तो सारा भक्त-मंडल दुत्कारेगा, यह निश्चित था. मैंने आगे कहा- “सबसे अच्छा रास्ता यह है कि तुम चांदोद जैसी जगह पर जाकर रहो. वहां प्रायश्चित भी कर सकोगी और लोग जान भी नहीं पायेंगे.”

‘महात्मा’ को मेरी सलाह पसंद न आयी. उन्होंने ऐसी धृष्टता से, जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था, सीधी बातें कीं- “मैं योग करती हूं और हमारा तो हठयोग है, इसमें त्री को पुरुष के संसर्ग की आवश्यकता होती है. तुम मेरी सहायता न करोगे?”

यह निर्लज्जता देखकर मैं दंग रह गया. मेरा वश चलता तो पास पड़ा हुआ तबला मैं उसके सिर पर दे मारता, परंतु मेरे मन में यह डर घुस बैठा था कि तनिक-सी भी अवज्ञा करने से यह मेरी फजीहत कर सकती है, इसलिए मैं सावधान हो गया. “मुझे इस बात पर विचार करना चाहिए, कारण कि मैं इतना संस्कारी नहीं हूं.”

“नहीं, तुम तो सब तरह से योग्य हो.”

मैं रास्ता खोज रहा था और वह मुझे मिल गया- “अभी तुम चांदोद चलो. मैं तुम्हें वहां छोड़ आऊं. फिर तुम वहां रहना. इतने में मुझे विचार करने का समय भी मिल जायगा.?”

“मैं चांदोद में किसी को नहीं जानती.”

“परंतु मैं तो जानता हूं न, मैं तुम्हारे लिए सब तरह की सुविधा करवा दूंगा.” मैंने कहा. “महात्मा’ खुश हो गयीं और ‘कन्हैया क्या जाने मेरी प्रीत’ गाते हुए नीचे उतर गयी.

मैंने जीजी-मां को तीसरी मंजिल पर बुलाकर सारी बात कही. उन्हें भी दोपहर से इस त्री के तौर-तरीके अच्छे नहीं लग रहे थे.

जीजी-मां से चांदोद जाने की अनुमति मिलने पर रात को ‘महात्मा’ तैयारी में व्यस्त रहीं. मैं भी तैयारी करने लगा और फिर तीसरी मंजिल की सीढ़ी का दरवाजा बंद करके सो गया. सबेरे जल्दी उठा और साढ़े आठ बजे ‘महात्मा’ के नदी से नहा कर आने के पहले भड़ौंच के स्टेशन पर पहुंच गया और पौने नौ बजे बड़ौदा की ट्रेन में बैठ कर नौ-दो ग्यारह हुआ.

जब मैं मनुकाका के घर पहुंचा, तब मेरा कलेजा ठिकाने आया.

मेरे जाने के बाद जीजी-मां ने महात्मा से कहा, “भाई तो काम से परदेश गया है, तुम्हें चांदोद पहुंचाने के लिए महम्मद सिपाही तैयार है.”

‘महात्मा’ की आंखों में आंसू आ गये.

इतने में हमारी जाति के दो आदमी, इस त्री ने एक दूसरे गांव में भी ऐसी लीला की थी, उसके विषय में बात करने जीजी-मां के पास पहुंचे. जीजी-मां ने ‘महात्मा’ से घर छोड़ने के लिए साफ शब्दों में कह दिया. हमारी जाति वालों ने पुलिस का डर दिखा कर उन्हें किसी दूसरे स्थान पर पहुंचा दिया.

जाते-जाते ‘महात्मा’ लक्ष्मी से कहतीं गयी, “इस जन्म में तो ‘भाई’ मिलेंगे नहीं, परंतु उनसे कहना कि दूसरे जन्म में भेंट होगी.”

मैंने यह संदेश सुना और मैं निश्चिंत हो गया. इस जन्म में तो मैं निर्भय हो ही गया था, आगे की बात आगे देखी जाएगी.

यह अनुभव ‘अपराधी कौन’ के कई परिच्छेदों के लिए पर्याप्त हो गया.

* * *

1909-10 में मैं अपने अध्ययन में शिथिल हो गया था. मेरा अधिक समय मित्रों के साथ आनंद मनाने में, गायन और टेनिस में, शहर की और जाति की चौधराई करने में बीतता था. फिर भी मैं अंग्रेज़ी में लेख लिखता रहा था और उनमें से अनेक हिंदुस्तान रिव्यू, इंडियन लेडीज़ मेगज़ीन और ईस्ट एण्ड वेस्ट में प्रकाशित भी हुए. अपने कमरे के एकांत में भाषण करने का अभ्यास भी जारी ही था.

उस समय सिविल सर्विस के लिए विलायत जाने के मैंने बड़े प्रयत्न किये. मेरे मित्र धीरजलाल नाणावटी ने मेरे लिए वहां पढ़ने और रहने की सुविधा कर रखी थी. बड़ा प्रश्न केवल यह था कि खर्च के पैसे कहां से लाये जाएं. इस विषय में मनुकाका के मामा मंछाशंकर वकील ने मुझे पूरा प्रोत्साहन दिया.

जब से मैं बम्बई में आया, तभी से मुझे उनका सहारा था. मुझ पर उस बुद्धिमान और व्यवहार-कुशल ज्ञानी का बड़ा प्रभाव पड़ा. वे स्माल कॉज कोट में प्रमुख वकील थे और पीछे जाकर वहां न्यायाधीश नियुक्त हुए. वे व्यवहार में कभी चूकते नहीं थे और छोटी-से-छोटी उलझनों को भी सुलझाने में समर्थ थे. भूलेश्वर में स्थित ‘गुजरात क्लब’ के वे प्राण थे. ज्योतिष का उन्हें अगाध ज्ञान था और सारे जीवन को उन्होंने वेदांत की सहायता से एक-रस बनाया था. मुझसे उन्हें बड़ी दिलचस्पी थी. जब जाता, तब हंसकर बात करते और मेरी मुश्किलों को हल किया करते थे.

1-3-1909 के पत्र में मैंने मनुकाका को लिखा-

“क्लार्क (बड़ौदा कालेज के प्रिंसिपल) ने अभी प्रमाणपत्र नहीं भेजा. उनसे मिलकर तुम उसे तुरंत भेजने का प्रबंध करना. कल ही मैंने अर्जी दी है. टाटा के आफिस में कोई बड़ा आदमी है, उसे तुम्हारे मामा से कहने के लिए तैयार किया है. परंतु मुझे ‘स्कालरशिप’ पाने का सौभाग्य मिलेगा, ऐसा नहीं लगता क्योंकि अनेक उम्मीदवार मुझसे कहीं अधिक छोटी आयु के और अधिक बुद्धिमान हैं. परंतु यह तो नहीं कहा जाएगा कि छोटेपन से मैंने अपनी आकांक्षा सिद्ध करने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न नहीं किया? क्या तुम जानते नहीं कि सिविल सर्विस के लिए मैं कितना लालायित हूं और यह ध्येय सिद्ध न होने पर मुझे कितनी निराशा होगी?

“सरोजिनी नायडू नाम की कवियित्री के अत्यंत सुंदर वाग्वैभवशाली और उत्साह-प्रद व्याख्यान सुन रहा हूं. वास्तव में यह त्री अद्भुत है.”

मेरा सोचा हुआ ठीक रहा. मंछाशंकर काका मुझे पादशाह के पास ले गये और उन्होंने मुझे आशा छोड़ देने को कहा.

अंत में मैं जुलाई 1910 में एल. एल. बी. की परीक्षा में पास हुआ. मनुकाका को मैंने ता. 17 जुलाई के पत्र में लिखा-

“पास होने का समाचार सुना और मुझे जरा खेद हुआ. सुख हो या दुख, मुझसे अकेले नहीं रहा जाता. परंतु अब ठीक है… जरा पागल हो गया हूं और मेरे पागलपन में पागलों से भी अधिक उन्माद है.

“मैंने कहीं एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें विवाह से अगली रात को वर खो जाता है. परिणाम-स्वरूप कन्या पागल हो जाती है.  और फिर किसी के भी पैरों की आहट सुनने पर उसे जान पड़ता है कि उसका वर आ रहा है. वह प्रतीक्षा करती बैठी रहती है- अनेक वर्षों तक, जब तक स्वयं अनंत में विलीन नहीं हो जाती तब तक.

“मेरी स्थिति उस कन्या जैसी ही हो गयी है. प्रत्येक डाक में जब बधाई के पत्रों का ढेर आता है, तब मेरा हृदय अप्राप्य के लिए तरसता है. जो बधाइयां नहीं आतीं, उनको पाने की आशा रखता हूं. जो पत्र कभी नहीं आता, उसकी प्रतीक्षा करता हूं और वह नहीं आता, इससे दुख में डूब जाता हूं. मुझे वेदना-रहित आनंद कभी प्राप्त नहीं होता.

“यह आशाविहीन पगला स्वप्न है, मेरे रुग्ण मन की मूर्खतापूर्ण कल्पना है. परंतु बिना इसके मैं कैसे जी सकता हूं? यह सारी विजय नीरस है. सारा जगत सूना जान पड़ता है. जाने दो. भले ही भूतकाल इसके शवों को दफना दे…

“कल दक्षिण अफ्रीका के मि. एच. एस. एल. पोलक आये हैं और हमारे यहां अतिथि बनकर ठहरे हैं. लगभग 15 दिनों में हम दक्षिण अफ्रीका के विषय में एक सभा करेंगे. मोतीलाल काका सभापति का स्थान लेंगे.”

उस समय भारत में गांधीजी का नाम सुनाई पड़ने लगा था. पोलक और हम बैठकर भारत के महान पुरुषों के गुणगान कर रहे थे, मैं अरविंद का भक्त था. पोलक ने कहा- “मैंने तुम्हारे सब महापुरुष देखे हैं. पर उसमें गांधी के जूतों के फीते बांधने लायक भी कोई नहीं है.” मुझे इससे बहुत बुरा लगा था, ऐसा याद है.

मंछाशंकर काका मेरे विलायत जाने के लिए योजना बनाने लगे. लगभग पांच हज़ार जेवरों और ज़मीन से इकट्ठे करने का मेरा विचार था. मेरी धारणा थी कि दस-बारह हज़ार में मैं सिविल सर्विस में पास हो जाऊंगा, या बेरिस्टर बनकर आऊंगा. किस स्टीमर में जाना है, यह भी मैंने निश्चित कर लिया. मैंने जीजी-मां से बात की. उन्होंने ठाकुर मामा से कहा. दूसरे दिन, ब्याज के साथ कितना खर्च होगा, यदि फेल हो गया तो क्या दशा होगी, आदि का मसविदा लेकर वे भाई-बहन मेरे पास आये. हिसाब पर हिसाब लगे. भविष्य भयंकर प्रतीत हुआ और विलायत जाने के मेरे प्रयत्नों पर पानी फिर गया. बहुत दिनों तक मैं टूटे हुए हृदय से भाग्य को दोष देता रहा.

मेरे जीवन में अनेक बार ऐसा हुआ है कि इच्छित वस्तु न मिलने से लाभ हुआ है. कई वर्षों बाद धीरजलाल नाणावटी सिविल सर्विस में पास होकर, रंगून में ‘लीगल रिमेम्ब्रेन्सर’ के पद पर पहुंचे. उससे तंग होकर वे छुट्टी लेकर बम्बई में वकालत करने आये. एक बार हम बीती बातों का स्मरण कर रहे थे, तब उन्होंने विलायत में मेरे लिए की हुई तैयारी की चर्चा की. मैं जा न सका, इसके लिए मैंने दुख प्रकट किया.

“वही तुम्हारे लिए धन्य क्षण था,” उन्होंने कहा- “आज जो कुछ, भी हो, उसी क्षण ने तुम्हें बनाया है.”

22 जुलाई को मैं डिग्री लेने बम्बई गया. यह विचार करने के लिए मैं  मंछाशंकर काका के पास गया कि अब क्या करना चाहिए. उनके भाई जमीयतराम काका ऊपर रहते थे. अंग्रेज़ी पोशाक पहने हुए एक सज्जन ऊपर से उतरे और उन्होंने अंदर झांका.

“क्यों, मंछाशंकर भाई! तबीयत तो ठीक है न?” कहकर वे हंसे. मछाशंकर काका ने उनका स्वागत किया.

“नहीं, मैं अब जाऊंगा, गुडनाइट कहकर वे चले गये.

“देखा, इसी का नाम है ग्रहदशा. इनको पहचाना?”

“नहीं.”

“ये है भूलाभाई देसाई, एडवोकेट, अहमदाबाद में प्रोफेसर थे. आज चार हज़ार रुपया महीना कमा रहे हैं. ये कोई विलायत गये थे? तुम भी एडवोकेट बन जाओ. जगुभाई से पूछ आओ.” मंछाशंकर काका ने कहा और इस परीक्षा के विषय में मुझे सब समझाया.

इस प्रकार मेरे भविष्य के निर्माण में भूलाभाई अकस्मात ही सहायक बन गये. परंतु क्या इसे अकस्मात कहा जायगा? भूलाभाई और मैं सदा एक दूसरे के साथ गुंथे हुए रहे हैं, इच्छा से या अनिच्छा से, उन दो तारों के समान, जो दूर होते हुए भी पास-पास ही अनंत व्योम में फिरते रहते हैं, एक दूसरे से भिन्न होने पर भी एक दूसरे से आकर्षित. मनुकाका को भड़ौंच से मैंने 26-7-1910 को एक पत्र लिखा-

“मैंने एडवोकेट की परीक्षा के विषय में  अधिक फिर लिखूंगा. मेरे स्वास्थ्य के कारण सब मुझे निरुत्साहित कर रहे हैं. सब के विरोध के आगे मैं अकेला ही दृढ़ और अटल हूं. मुझे निरुत्साहित करने के इस प्रकार के प्रयत्नों से मेरा मन व्यग्र हो उठता है.

“ऐसे कार्यकलाप का क्या अर्थ है, जिसमें किसी की महत्त्वाकांक्षा को पोषण न मिले? सारा संसार मुझे उल्टा घूमता नज़र आता है.

“तुम्हारे नरुभाई ने मेरे आगे लम्बा भाषण किया. उन्होंने कहा कि यह व्यवसाय बहुत अच्छा है, इसमें पैसा भी खूब मिलता है, परंतु उन्होंने इस विषय में संदेह प्रकट किया कि इस व्यवसाय के लिए जितनी बुद्धि की आवश्यकता है, उतनी मुझमें है.

“मुझे तुम्हारे प्रतापी मामा की भव्य-उपस्थिति में भी दो क्षण बिताने का सम्मान प्राप्त हुआ. सच पूछो तो मैं ही वहां जा घुसा. मैंने उनसे प्रश्न किया कि मुझे क्या करना चाहिए? जवाब में वे दर्प के साथ कुछ क्षण मेरी ओर देखते रहे. फिर मानो प्रत्येक शब्द के लिए मुझे पचास रुपये का बिल देना हो, इस प्रकार गम्भीर आवाज़ में बोले- “हां, अभी दो वर्ष और.”

“ऐसे सुंदर भाषण के पश्चात मुझे जितनी भी जल्दी हो सके, भाग आना चाहिए था. मैंने वही किया.

“मुझसे अब बड़ौंदा नहीं आया जायगा. डिग्री प्राप्त करने के ‘प्रहसन’ के लिए बम्बई आया, इससे तबीयत खराब हो गयी है. बीमार होकर पड़ा हूं. दवाई पीता रहता हूं. लायब्रेरी के लिए भी कुछ करना है. मि. पोलक फिर आने वाले हैं.”

नरुभाई थे- नर्मदाशंकर सालिसिटर, मंछाशंकर काका के स्वर्गीय बड़े भाई के पुत्र-बाद में मेरे परम-मित्र. मामा थे- मंछाशंकर काका के भाई जमीयत-राम काका- जिनके साथ बाद में मेरा सम्बंध पिता-पुत्र की तरह हो गया. परंतु उस समय उनकी यह धारणा थी कि मैं शौकीन और ढीठ लड़का हूं, और रत्न के समान उनके मनु को बिगाड़ रहा हूं.

उन्हीं दिनों मैं सख्त बीमार पड़ा.

“दवा और खुराक घड़ी की तरह नियमित चल रहे हैं. दिल खोलकर बात करने के लिए कोई मित्र नहीं है, ध्येय जैसी कोई वस्तु तो है ही नहीं. चारों ओर अनेक पुस्तकें पड़ी हैं, पर पढ़ने की मनाही है. निर्बल शरीर क्षीण हो गया है. घर से बाहर सिर नहीं निकाला जाता, परंतु मन छटपटा रहा है, उछल रहा है, शक्ति-प्रदर्शन के क्षेत्र खोजता है. मैं जंजीर से बंधे जानवर की तरह हो गया हूं, जैसे भूखा जंगली चीता पिंजरे में तड़प रहा हो.

14-8-1910

“आज सुबह से शाम के पांच बजे तक पेट में बड़ी सख्त दर्द हुई, और मैं अकेला बिना परिचर्या के पड़ा रहा. बुढ़िया-नौमी थी, इससे किसी को मेरी ओर देखने की फुरसत नहीं थी. शरीर को जब इतना कष्ट हो, तब मानसिक दुख भी होता ही है. ओंठ चबाकर, वेदना की चीख को दबाकर, अकेलापन सहन करना ही मेरे भाग्य में लिखा है.

“यदि मैं शेयर गिरवी रखूं, तो मोतीलाल काका छह हज़ार रुपये दे सकते हैं. पांच प्रतिशत ब्याज होगा. परंतु इतना कर्ज सिर पर लेकर बैरिस्टर बनना तो बड़ा महंगा पड़ेगा और व्यवसाय जमाते हुए पांच वर्ष जो प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, तब तक खाऊंगा क्या?

“दूसरी बात, कोआपरेटिव सोसायटी के आडिटर की जगह खाली है. मोतीलाल काका ने अर्जी देने के लिए कहा है. उनकी सिफारिश से डेढ़ सौ रुपये की नौकरी मिलेगी. अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर के मिलकर पांच सौ रुपये होंगे. वे जनवरी में सनद के लिए काम आयेंगे. नौकरी अच्छी है और एडवोकेट की सत्र-फीस में बाधा नहीं पड़ेगा. अंत में ‘नहीं’ कहना भी तो मेरे हाथ में है.”

27-9-1910

सरकारी नौकरी के लिए इस प्रकार मैंने एक पूरी अर्जी दी. मैं किस से सलाह लूं, यह मेरी समझ में नहीं आया. बम्बई जाने से मेरा निर्बल स्वास्थ्य बिगड़ने का डर था. इसलिए जीजी-मां विरुद्ध थीं. ठाकुर मामा मुझे मुंसिफ बनाना चाहते थे. औरों को भी यह पसंद था. हमारे यहां पहले से ही एक चपरासी आगे और एक पीछे रहते आये हैं. यदि तुम मुन्सिफ बन जाओ तो फिर ‘टीले की साहबी कायम रहे.’ कौन कहेगा कि चपरासियों का विश्व में स्थान नहीं है?

मेरे पक्ष के सलाहकारों में मनुकाका और बाला (मेरी भांजी) थे. बाला खुले दिल की और बाहादुर भानजी. जीजी-मां की पाली हुई होने से वह मेरी छोटी बहन के अभाव की मूर्ति थी. उसने कहा- “मामा, तुम हाईकोर्ट में जुट जाओ. फिर इन सबका बोलना बंद हो जायगा.”

ता. 3-10-1910 की रात को मैं बम्बई के लिए चल पड़ा. सबसे कहा- “मैं सनद लेने जा रहा हूं.” मनुकाका और मेरी भानजी दोनों जानते थे कि महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित मैं पैसे और आधार से हीन-परंतु फिर भी आशा रखकर-एडवोकेट की परीक्षा की पढ़ाई के लिए जा रहा था. उनको मुझ पर विश्वास था. उनका प्रोत्साहन भी मुझे प्राप्त था. उन्होंने मुझे जो हिम्मत और आत्मविश्वास दिया उसके लिए आज भी मैं उनका ऋणी हूं.

ता. 3-10-1910 को मैंने नीचे लिखे अनुसार अंकित किया है-

“मैं अपना दुख किससे कहूं? कहां जाकर रोऊं? भयंकर और सर्वग्राही उद्वेग मुझे कुचल रहा है. जब कि मैं आगे पढ़ने, प्रगति करने जा रहा हूं, मुझे उत्साह से हंसते-हंसते विश्वास से सशक्त हो जाना चाहिए. इस समय मैं दुख-ग्रस्त हूं, खिन्नता से निसत्त्व हो गया हूं. मुझे सहायता देने वाला या मेरी हिम्मत बढ़ाने वाला कोई नहीं है. आनंद के लिए प्रेरणा करने वाला भी कोई नहीं है. सारा संसार सूने जंगल के समान है. जीवन एक वेदना है. दैवी उल्लास मेरे लिए दुष्प्रात्य है. मुझे सहारा देकर चलाने वाली, मुझे प्रेरणा देने वाली मेरी ‘देवी’ मेरे संग नहीं है. मेरे भाग्य में क्या रोना ही लिखा है?”

चार दिनों के बाद मैंने बम्बई मनुकाका को लिखा-

“आरम्भ में मुझे कोर्ट में समय पर जाना चाहिए. मैं हाईकोर्ट में जाने लग गया हूं और पांच घंटे झपकियां लेता रहता हूं. जो काम हो रहा है वह इतना उकताने वाला है कि बैठे-बैठे अकुलाहट होने लगती है और बैरिस्टरों की ओर मुंह फाड़ कर देखते-देखते थकान हो आती है. अभी तो बेकारी का जीवन बिता रहा हूं; पर नवम्बर में कुछ कर सकूंगा.”

हाईकोर्ट का यह प्रथम दर्शन था.

(क्रमशः)

जनवरी  2014 

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