परिक्रमा

सूर्य के चौगिर्द प्रदक्षिणा करती हमारी पृथ्वी ने फिर एक चक्कर पूरा कर लिया. लेकिन पृथ्वी केवल सूर्य के चौगिर्द ही नहीं घूमती. प्रकाश के देवता की प्रदक्षिणा करती-करती वह अपना भी चक्कर काटती, आनंद नृत्य करती जाती है. प्रकाश की इस आराधना में वह शिशिर के हिम प्रदेशों में सुदूर निकल जाती है और फिर वसंत के वनकुंजों में वापस आ जाती है. अपने ही चौगिर्द नृत्य करती हई वह चंद्रमा का कुंभ खाली कर देती है और पूरा भर भी देती है.

    इस रमणीय ऋतुकीड़ा अथवा तिथि-परिर्वतन से हमारे किसी आदिद्रष्टा को अमृत का संदेश मिला होगा. घोर शिशिर के हिमखंडों को पार करके वह आदिद्रष्टा वसंत के झरने के किनारे आ पहुंचा होगा. अमावस के खाली कुंभ पर से गुजरती हुई उसकी दृष्टि पूनम के छलकते कुंभ पर ठहरी होगी. और वह एक अद्भुत मंत्र बोल उठा होगा- अमृतस्य पुत्राः. इस पृथ्वी में सर्वत्र मृत्यु की काली छाया के नीचे जी रहे मनुष्यों को ‘अमृत का पुत्र’ कहना कितनी हिम्मत की बात है! इस क्षरणशील, मरणशील संसार में अक्षर तत्त्व के दर्शन के बिना कोई ऐसी वाणी नहीं बोल सकता.

    याज्ञवल्क्य अति अविचलित भाव से गार्गी से कहते हैं.

    ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः। एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, द्यावापृथिव्यौ विधृतौ तिष्ठतः। एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतव संवत्सरा इतिविधृतास्तिष्ठन्ति।’

    ‘हे गार्गि, इस अक्षर तत्त्व की सत्ता से सूर्य-चंद्र अपने-अपने स्थानों में स्थित हैं. गार्गि, इस अक्षर तत्त्व सत्ता से आकाश और उसी  प्रकार पृथ्वी, अपने-अपने स्थान पर स्थित है. इस अक्षर तत्त्व की सत्ता से पल, घंटा, दिन, रात, शुक्ल तथा कृष्णपक्ष तथा वर्ष अपने अपने स्थानों पर हैं.’

    मनुष्य के प्राण को जब किसी बृहद चेतना का स्पर्श हो जाता है, तब वह अपने शरीर, मन और बुद्धि की दीवारों में से निकलकर उस महाशक्ति को अनुभव करता है. इस सृष्टि का चक्र तो चलता ही रहता है; परंतु साथ ही हमारे मन का भी चक्र कैसा चलता रहता है! यह मन का चक्र ही हमें पहले वाले अक्षर तत्त्व के चक्र से पृथक कर देता है. हमारे जीवन में से वह अनायास सरल गति को छीन लेता है. और हम मन के खड़े किये चक्र के आरे के नीचे कुचलते-पिसते जाते हैं.

    पृथ्वी यदि अपनी ही धुरी पर घूमती रहे और वह बृहद प्रकाश की प्रदक्षिणा करना भूल जाये, मनुष्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. अपने अहम् की, मनोमय सृष्टि की धुरी पर तो वह नाचता है, पर इस अहम् का जगत् के साथ तथा दूसरों के हृदय के साथ तालमेल बैठाना भूल जाता है. और इसीलिए मनुष्य की गति में नृत्य नहीं प्रकट होता. उसका आनंद-घट फिर छलक नहीं पाता. उसके शिशिर पर फिर वसंत की जय-पताका नहीं फहरा पाती. उसकी मृत्यु में से अमृत-गान नहीं उठता.

    यह अमृत किस प्रकार प्राप्त हो? अपने अहम् की एकांकी धुरी पर नाचते हुए हम कभी नित्य आनंद का रास नहीं खेल सकते. अपनी ही इच्छाओं में जकड़े रह कर विश्व से साथ तालमेल नहीं बैठा सकते. पृथ्वी की सूर्य-प्रदक्षिणा और स्व-परिक्रमा द्वारा ऋतुचक्र चलता है; उसी तरह हमें अपने अंतर के ‘धर्मचक्र’ को चलाना पड़ेगा. इसमें अपने आनंद की लय को हमेशा दूसरों के आनंद के साथ जोड़ना पड़ेगा. हमारी दृष्टि, जो हम में ही बद्ध है, उसे अंजन से आंजकर बाहर देखना पड़ेगा. ‘बोधिचर्यावतार’ में शांतिदेव का एक सुंदर श्लोक हैः

ऋजु पश्येत सदा सत्त्वांश्चक्षुषा संपिबन्निव।

एतान्येव समाश्रित्य, बुद्धत्वं में भविष्यति।

    öसभी प्राणियों को मानो आंखों से पी रहा होऊं, इस तरह ऋजु-कोमल भाव से देखूं. ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर मैं बुद्धत्व प्राप्त कर सकता हूं.

    बद्ध और बुद्ध में दृष्टि का यही अंतर है. बद्ध मनुष्य अपनी जाति, वाद, पक्ष के अलावा दूसरे को ऋजुता से नहीं देख सकता. बुद्ध जैसे प्रेम से पी रहा हो, इस तरह सब पर दृष्टि डालता है. और ये प्रेम-भीने नेत्र ही दूसरों को अहम् के कारागार से बाहर लाते हैं. जागता हुआ आदमी दूसरे को किस प्रकार जगाता है, इसका उदाहरण ‘मज्झिमनिकाय’ के ‘दन्तभमि सुत्तन्त’ में है.

    एक बार अचिरवत श्रमण जंगल में एक कुटिया में रहते थे, राजकुमार जयसेन उधर घूमने निकले. अचिरवत के पास जाकर उन्होंने पूछा- ‘मैंने सुना है कि भिक्षु प्रसाद रहित, उद्योगी, संयमी बनकर विचरते है, उनका चित्त एकाग्रता को प्राप्त होता है.’

    ‘ऐसा ही है राजकुमार, ऐसा ही है.’

    ‘अच्छा अग्निवेश, आपने जो कुछ सुना हो, जो कुछ समझा हो, उसके अनुसार मुझे धर्म का उपदेश दें.’

    ‘राजकुमार, मैं तुम्हें सुने-समझे के अनुसार धर्म का उपदेश नहीं दूंगा. मैं तुमसे कहूं और तुम मेरे प्रवचन का अर्थ न समझो, तो वह मेरे लिए व्यर्थ का ही श्रम होगा.’

    ‘आप उपदेश दें. क्या पता, मुझे आपके व्याख्यान का अर्थ समझ में आ जाये.’

    ‘अच्छा राजकुमार, मैं उपदेश दूंगा. तुम मेरे कहने का अर्थ समझ लोगे, तो ठीक है और अगर न समझ सको, तो अपने मत पर स्थित रहना, आगे न पूछना.’

    ‘उपदेश दीजिये अग्निवेश, नहीं समझूंगा तो आगे नहीं पूछूंगा.’

    उसके बाद अचिरवत श्रमण ने राजकुमार जयसेन को उपदेश दिया. पर उसे सुनने के बाद ‘यह मानने का कोई कारण नहीं कि भिक्षु प्रमादरहित विचरते हुए चित्त की एकाग्रता को प्राप्त कर लेता है,’ ऐसा कहकर राजकुमार जयसेन चला गया.

    कुछ देर बाद अचिरवत भगवान बुद्ध के पास पहुंचे और उनसे सारी बात कहीं. भगवान ने उससे कहा-‘अग्निवेश, क्या यह संभव है कि जो निष्कामता से ही जाना जा सकता है, देखा जा सकता है, प्राप्त किया जा सकता है, उसे कामभोगों के बीच रहता हुआ, कामों को भोगता हुआ, काम के विचारों से भक्षित होता हुआ, उसी की आग में झुलसता हुआ, राजकुमार जयसेन जान सकेगा, देख सकेगा, साक्षात्कार कर सकेगा?

    ‘अग्निवेश, समझो कि गांव या कस्बे के पास महार्पवत है, और दो मित्र अपने गांव या कस्बे से निकलकर उसके नीचे पहुंचते हैं. उनमें से एक मित्र पर्वत की तलहटी में खड़ा रहता है और दूसरा चोटी पर चढ़ जाता है. फिर नीचे खड़ा मित्र ऊपर वाले मित्र से पूछता है- मित्र, पर्वत पर चढ़कर तुम क्या देख रहे हो? उसे उत्तर मिलता है- पर्वत पर खड़ा हुआ मैं आश्रम, वन, भूमि, तडाग की सुंदरता देख रहा हूं. पर नीचे खड़ा मित्र कहता है- यह संभव ही नहीं कि तुम पहाड़ पर चढ़कर आश्रम और वन आदि देख सको.

    ‘तब उस पर्वत पर चढ़ा आदमी नीचे उतरकर अपने मित्र को ऊपर ले जाता है और थोड़ी देर बाद उससे पूछता है- दोस्त, पहाड़ पर चढ़कर क्या देख रहे हो? जो पहले नीचे खड़ा था और अब पर्वत पर चढ़ गया है, वह उत्तर देता है- मित्र, मैं आश्रम- वन वगैरह देख रहा हूं.

    ‘तब यदि दूसरा कहे कि मित्र अभी तो तुम कह रहे थे कि यह संभव ही नहीं है और अब कहते हो कि आश्रम-वन वगैरह देख रहा हूं, तो वह उत्तर देगा-सौम्य, यह महापर्वत आड़े आता था, इसीलिए मैं उन दृश्यों को नहीं देख पाता था.

    ‘अग्निवेश, राजकुमार जयसेन भी इस महापर्वत से भी बड़े अविद्या-स्कंध पर्वत से ढंका हुआ है, बंधा हुआ है. जो निष्कामता से ही जाना, देखा, प्राप्त किया जा सके, उसे क्या यह इस प्रकार प्राप्त कर सकेगा? परंतु अग्निवेश, यदि तुमने ये दोनों दृष्टांत उसे सुनाये होते, तो आश्चर्य नहीं कि राजकुमार जयसेन प्रसन्न हो जाता और तुम्हारे प्रति कुछ सुंदर-सा कार्य करता.’

    मनुष्य की आंखों को अपने अहम् और ममत्व का महापर्वत ढंक देता है, दूसरा कोई नहीं. अन्यथा यह पृथ्वी, जल, प्रकाश, वायु और आकाश तो हमें अपने संकीर्ण स्व में से बाहर निकलने की प्रेरणा देते हैं.

    भगवान बुद्ध ने राहुल से कहा था- ‘राहुल, पृथ्वी-समान भावना का ध्यान कर. पृथ्वी-समान भावना का ध्यान करने से राहुल तेरे मन को रुचने वाले स्पर्श तुझे घेर नहीं सकेंगे. जिस प्रकार राहुल, पृथ्वी पर पवित्र वस्तु भी फेकी जाती है और अपवित्र भी, पर पृथ्वी उससे दुखी नहीं होती, ग्लानि अनुभव नहीं करती, घृणा नहीं करती, उसी प्रकार राहुल, तेरे चित्त को अच्छे लगने वाले स्पर्श तुझसे चिपट न सकेंगे.’

    पृथ्वी जैसे अपार धैर्य, अनंत क्षमा एवं प्रकाश की आराधना के बिना हमारे जीवन में भारमुक्त गति नहीं आ पायेगी. अंनत में सहज ही भ्रमण करते हुए इन तेजस पिंडों के साथ अपने हृदय के स्पंदन को मिलाकर ही तो वैदिक ऋषि गा उठे होंगे.

    स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।

    सूर्य और चंद्रमा की तरह हम कल्याण मार्ग का अनुसरण करें.

– मकरंद दवे

(जनवरी 1971)

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