आर्यभट

♦  डॉ. एम.टी. सहस्रबुद्धे      

      भारतीय ज्योतिषशास्त्र के महापंडितों में आर्यभट का नाम बहुत प्रसिद्ध है. वस्तुतः आर्यभट नाम के दो ज्योतिषशास्त्राr हो चुके हैं. किंतु विशेष प्रसिद्ध प्रथम आर्यभट ही हैं, और उनके ग्रंथ का नाम ‘आर्यसिद्धांत’ कहा जाता है.

     ज्योतिषशास्त्र के उपलब्ध सिद्धांत-ग्रंथ, प्रायः ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के रचे हुए हैं, ऐसी मान्यता है. किंतु ज्योतिष विषयक विचारों को सिद्धांत का स्वरूप वेदों में ही मिल चुका था, ऐसा कहा जा सकता है. ज्योतिषशास्त्र का धार्मिक विधि-विधानों से बड़ा ही घनिष्ठ सम्बंध रहा है. वैदिक यज्ञक्रिया में ज्योतिषशास्त्र की आवश्यकता पग-पग पर दिखाई देती है.   

     मानव, जीव तथा स्थूल-सूक्ष्म जगत का परस्पर सम्बंध, यह सम्बंध अच्छी प्रकार बना रहे, इसके लिए अनुकूल-प्रतिकूल काल का उचित मान, निश्चित काल-बिंदुओं का निर्देश करनेवाले ग्रह-नक्षत्रादि, उनकी गतिविधियां, काल मापने की पद्धतियां आदि का कुछ स्वरूप वेदों में ज़रूर है. परंतु उनमें निर्दिष्ट बातों का ठीक निर्णय करना कठिन हो जाता है.

     अर्वाचिन काल के ज्योतिष-ग्रंथ वैदिक-परम्पराओं और विचारों से पूर्णतया परिचित दिखाई देते हैं. सुव्यवस्थित रूप में जो ज्योतिष-ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमें प्राचीनत्व और प्रतिभा-संपन्नता का दृष्टि से ‘आर्यभटीय’ का स्थान बहुत ऊंचा है.

     इस ग्रंथ के चार भाग हैं, जिन्हें ‘पाद’ कहते हैं. प्रथम पाद का नाम ‘दशगीतिक’ है. इसमें ग्रहों के ‘भगण’ दिये हैं, यानी कृत, त्रेता, द्वापर और कलि इन चार युगों में हर एक ग्रह आकाश-वृत्त में कितनी बार घूमता हैं, इसकी संख्या दी गई है. पृथ्वी के भ्रमण की यानी दैनंदिन गति की भी संख्या 1,58,37,500 बतायी गयी है.

     दूसरे पाद का नाम ‘गणितपाद’ है. इसमें क्षेत्रफल, घनफल, त्रैराशिक, अपूर्णांक, वर्ग, वर्गमूल, घनमूल आदि विषय हैं. तीसरा ‘कालक्रियापाद’ है, जिसमें काल-विषयक बातें हैं. चौथे में भूगोल अर्थात पृथ्वी रूपी गोल, उसका ग्रहों के साथ भ्रमण, चंद्रमा की क्षयवृद्धि, नक्षत्र और ग्रहों के विषय में अन्य कुछ बातें आदि विषय हैं, इसका नाम ‘गोलपाद’ है.

     आर्यभट का जन्म कब हुआ, इस विषय में कोई विवाद नहीं हैं, क्योंकि व स्वयं अपना जन्म-समय अपने ग्रंथ में देते हैं. ‘काल-क्रियापाद’ में वे कहते हैं कि जब कलियुग के 3,600 वर्ष बीते, तब उनकी आयु तेईस वर्ष थी. इससे स्पष्ट है कि उनका जन्म शक संवत 398 में हुआ. अन्य प्रमाणों से भी यही इनका जन्मकाल सिद्ध होता है.

     उनके जन्मस्थान के विषय में भी कुछ निश्चित विधान अब किया जा सकता है. त्रिवेंद्रम से आर्यभट के ग्रंथ का ‘नीलकंठी’ नामक व्याख्यान प्रकाशित हुआ है. उसमें बताया है कि आर्यभट दक्षिण के अश्मक जनपद के निवासी थे. गणितपाद में आर्यभट ने अपने गांव का निर्देश कुसुमपुर नाम से किया है, जो कि बिहार के पटना का एक प्राचीन नाम भी है. परंतु आर्यभट का कुसुमपुर दक्षिण में था, यह अब प्रायः सिद्ध हो चुका है.

     इन विषयों पर शोधकार्य अभी चल ही रहा है, और नये प्रमाण उपलब्ध होने से निर्णय बदल भी सकते हैं. असली महत्त्व की बात यह है कि इतने पुरातन काल के इस ज्योतिर्विद ने आधुनिक ज्योतिर्विदों को भी विस्मय हो, ऐसे कुछ सिद्धांत बताये हैं.

     ज्योतिष विद्या के आधुनिक साधन प्राचीन साधनों की अपेक्षा बहुत ही बढ़-चढ़कर हैं, संख्या में भी और कार्यक्षमता में भी. किंतु विस्मय की बात यह है कि अधिक सक्षम साधनों के द्वरा भी जिस सत्य का आविष्कार करने के लिए, पश्चिम को कोपर्निकस (1473-1543) की प्रतीक्षा करनी पड़ी, वह सिद्धांत आर्यभट हज़ार साल पहले बता चुके थे.

     वैसे तो यह सिद्धांत वेदों में भी पाया जाता है, पर आर्यभट उसकी अभिव्यक्ति निःसंदिग्ध शब्दों में करते हैं. ‘गोलपाद’ में वे कहते हैं- ‘नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि निश्चल वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उलटी गति से जा रहे हैं. उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं.’

     ‘दशागीतिकपाद’ की चतुर्थ आर्या में उन्होंने स्पष्ट ही कहा है कि प्राण नामक कालखंड में यानी पल के छठे भाग में पृथ्वी एक कला आगे बढ़ती है. अर्थात पृथ्वी चल है, वह घूमती है, सूर्य को केंद्र में रखकर.

     आर्यभट मनुष्य के श्वासोच्छ्वास को साधन बनाकर काल की गणना करते हैं. सामान्यतः व्यवस्थित आरोग्य-संपन्न मनुष्य को श्वासोच्छ्वास में जो समय लगता है, उसे ‘प्राण’ कहा गया है. उतने काल में पृथ्वी एक कला अंतर आगे जाती है. इस छोटे-से काल-परिमाण को लेकर युग और महायुगों तक की कालगणना भारतीय ज्योतिर्विद करते हैं. इस प्रकार उन्होंने पिंड के जीवन का ब्रह्मांड के जीवन से सामंजस्य दिखाया है.

     काल की गणना आर्यभट सत्ययुग के आरम्भ से उनके अपने काल तक करते हैं, जैसा कि और ज्योतिर्विद भी करते है. परंतु कलियुग 4,32,000 वर्षों का ही होता है और द्वापर, त्रेता, सत्य इनका कालखंड भी उसी गुणक्रम में होता है, ऐसी उनकी मान्यता नहीं है.

     वेदों में ‘युग’ शब्द किसी दीर्घकाल का बोधक होता है और इस काल के आरम्भ में ग्रहों की स्थिति जैसी रहती है, वैसी ही फिर से जब दिखाई दे, उतने कालखंड को युग कहा होगा. काल के ऐसे विविध प्रकार के आवर्त हो सकते हैं और उन्हें ‘युग’ संज्ञा दी जा सकती है, ऐसा आर्यभट का मंतव्य जान पड़ता है. इसलिए उनकी युग-कल्पना अन्य ज्योतिषियों से कुछ भिन्न है.

     भारतीय ज्योतिषियों ने व्यास और परिधि का सम्बंध बहुत सूक्ष्मता से निर्धारित किया है. आर्यभट भी उनका परस्पर परिमाण निर्दिष्ट करते हैं. ग्रीक और अरबों को नवम शताब्दी तक ज्यार्धों का प्रयोग मालूम नहीं था. इनके बहुत पहले आर्यभट ने इस बात की सूक्ष्म जानकारी दी है, यह भारतीयों के लिए बड़े गर्व की बात है.

       चंद्र-ग्रहण का कारण पृथ्वी की छाया तथा सूर्य-ग्रहण का कारण चंद्रमा है, राहु-केतु जैसे दैत्य नहीं, इस बात को आर्यभट जानते थे.

     निसर्ग की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आर्यभट जैसे ज्योतिषियों ने यंत्र बनाने के प्रयास भी किये थे. उनके ग्रंथ के ‘गोलपाद’ के बाईसवें श्लोक में पारे, तेल अथवा जल से घूमने वाले सूक्ष्म गोल-यंत्र का वर्णन है. ग्रहों का वेध लेने के लिए अलग प्रकार का गोल-यंत्र दिया हुआ है. इसके लिए एक मोटी, गोल व सर्वत्र समान लकड़ी की ज़रूरत होती है. इस लकड़ी के बीच में पृथ्वी का गोल बैठाया जाता है. उसके बाद आकाश-वृत्त, नाड़ी-वृत्त इत्यादि होते हैं. इन यंत्रों द्वारा रूप से ग्रहों की गति गिनी जाती थी.

     संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि प्रथम आर्यभट के समय ही भारतीय ज्योतिषशास्त्र अन्य देशों की अपेक्षा बहुत उन्नत और विकसित था.

(मार्च 1971)

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