कुलपति उवाच
03 संतुलन
के.एम. मुनशी
अध्यक्षीय
04 हम ही अपने स्वर्ग के निर्माता हैं!
सुरेंद्रलाल जी. मेहता
पहली सीढ़ी
11 तू ज़िंदा है तो…
शैलेंद्र
धारावाहिक उपन्यास (भाग – 7)
116 हिन्देन्दु
श्याम बिहारी श्यामल
शब्द-सम्पदा
134 पंच-परमेश्वर और पंचायती-माल
अजित वडनेरकर
व्यंग्य
60 जय हो जन-प्रतिनिधि की
अरुण कुमार जैन
आवरण-कथा
12 मेरा विकसित भारत
सम्पादकीय
14 विकसित होने की विडम्बना और खुशहाल भारत की कल्पना
प्रियदर्शन
19 एक ऐसा भारत बने…
शिवदयाल
25 एक तार्किक और नैतिक भारत की ज़रूरत
मधुसूदन आनंद
29 फिर अपनी ही खोज करनी होगी
ध्रुव शुक्ल
33 असली आज़ादी
आचार्य तुलसी
आलेख
35 जोड़ने-जुड़ने की राह
विद्यानिवास मिश्र
47 भारतीय मानस में स्वदेश-चिंता
रणजीत साहा
58 मज़हब की ढहती दीवार
77 क्षमा करना स्वयं पर उपकार करना है
लोकेंद्रसिंह कोट
80 विभाजन के अलाहुणे
सविता मनचंदा
84 बुद्धकालीन कला-नेत्रियां
शरद पगारे
89 `मुझे अपनी शर्तों पर जीने दो’
सतीश पाण्डेय
96 मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या…
अखिलेश श्रीवास्तव `दादूभाई‘
102 प्रकृति के संयोजन तथा संवर्धन का अद्भुत उदाहरण है एथेंस
हरिसुमन बिष्ट
127 `इसके बावजूद पृथ्वी घूमती है…’
आदित्य कुमार दत्त
137 किताबें
कथा
39 माफी
रमाकांत शर्मा
63 लोहे के पैर
राजेश श्रीवास्तव
कविताएं
46 कौन हो तुम
सुधीर कुमार सोनी
62 धरती का दर्द
सुदर्शन वशिष्ठ
74 आदिवासी रचनाएं
93 …वक्त तो लगता है
हस्तीमल हस्ती
126 चार ग़ज़लें
विज्ञान व्रत
समाचार
140 भवन समाचार
144 संस्कृति समाचार
