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धारावाहिक – नवनीत हिंदी https://www.navneethindi.com समय... साहित्य... संस्कृति... Tue, 26 Mar 2019 09:21:14 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://www.navneethindi.com/wp-content/uploads/2022/05/cropped-navneet-logo1-32x32.png धारावाहिक – नवनीत हिंदी https://www.navneethindi.com 32 32 मैं जोहिला – प्रतिभू बनर्जी https://www.navneethindi.com/?p=2705 https://www.navneethindi.com/?p=2705#comments Tue, 26 Mar 2019 09:20:18 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=2705 Read more →

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`नर्मदा‘ व `सोन या शोणभद्र‘ के अतिरिक्त `जोहिला‘ वह तीसरी महत्त्वपूर्ण नदी है, जो मध्य भारत के मेकल पर्वतश्रेणी स्थित अमरकंटक पहाड़ के पठार से निकली है. पुराणों में जोहिला को ज्योतिरथा के नाम से भी पुकारा गया है. 

पुरातन काल से प्राचीन भारत के लोगों ने देश के भूगोल सम्बंधी अपने सटीक प्राचीन ज्ञान को `गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिम कुरु‘ की अवगाहन प्रार्थना के जरिये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है. इसी प्रार्थना के जरिये सनातन हिंदू ज्ञान परम्परा में देश की सप्त नदियों को पवित्र नदियों के रूप में चिह्नित किया गया, जिनमें से नर्मदा अर्थात रेवा एक है. महामुनि मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर के सम्मुख नर्मदा के स्वरूप का उद्घाटन करते हुए कहा था–   इयं माहेश्वरी गंगा महेश्वरतनुद्भवा।   प्रोक्ता दक्षिण गंगेति भारतस्य युधिष्ठिर।। 

अर्थात, हे युधिष्ठिर! महेश्वर शिव के शरीर से उत्पन्न होने के कारण नर्मदा को माहेश्वरी गंगा कहते हैं. जिस क्षेत्र से नर्मदा प्रवाहित हो रही है, वह क्षेत्र (इंद्रप्रस्थ के) दक्षिण में अवस्थित होने के कारण इसे दक्षिण गंगा भी कहते हैं.

साथ ही इसी सनातन परम्परा में जहां समस्त नदियों को स्त्राrलिंग माना गया, वहीं ब्रह्मपुत्र व सोन को पुल्लिंग मानते हुए उन्हें महानद का मान दिया गया. ऐसा शायद इनके प्रचंड वेग व शक्तिवान प्रवाह के कारण था.

यह एक भौगोलिक चमत्कार है कि एक ही पठार से निकलने के बावजूद नर्मदा व सोन बिलकुल विपरीत दिशाओं में बहते हैं. 1312 किलोमीटर की यात्रा कर नर्मदा नदी जहां पश्चिम में गुजरात के भड़ोच में अरब सागर से मिलती है, वहीं 785 किलोमीटर लम्बा रास्ता तय कर पूर्व वाही सोन नद, पटना के समीप गंगा से जा मिलता है. इसे हिरण्यवाह भी कहा गया है. 289 किलोमीटर लम्बी जोहिला सोन की एक सहायक नदी है, जो पूर्वी मध्य प्रदेश के शहडोल के निकट दशरथ घाट के समीप उससे मिलती है. यह दशरथ घाट ही वह स्थल है, जहां अयोध्या नृपति राजा दशरथ ने आखेट खेलने आ, शब्दभेदी बाण से जंगली पशु के धोखे में श्रवण कुमार का वध कर दिया था. 

पूरे अमरकंटक क्षेत्र व नर्मदा तट में थोड़े बहुत रूपांतरण के साथ नर्मदा- सोन- जोहिला को लेकर एक लोककथा प्रचलित है. यह कथा प्रकृति के उपादानों के मानवीकरण करने की हमारी आदिम सहज वृत्ति का एक अनुपम उदाहरण है. हमारी यही सहज वृत्ति वायु, अग्नि, चंद्र व सूर्य को देवताओं की भांति तथा तारों को ऋषियों की भांति मान कर उन्हें आदर व श्रद्धा देती है. यही वृत्ति पर्वतों को पंख दे पक्षियों की भांति कल्पना की उड़ान देती है. और यही वृत्ति नदियों के दो रूप मानती आयी है. नदी का पहला रूप तोय या जलरूप, जिसे हम अपनी खुली आंखों से देखते हैं. यह रूप स्थूल रूप है. परंतु इसके अलावा एक दूसरा रूप भी है, जो सूक्ष्म रूप है, जो नदी की दैवी सत्ता है. तभी हम गंगा नदी को गंगा मैया तथा नर्मदा नदी को नर्मदा माई के रूप में पुकारते हैं.

लोककथा के अनुसार, मेकल कन्या नर्मदा के विवाह हेतु एक अटपटी किंतु कठिन शर्त रखी गयी. जो नरश्रेष्ठ अमरकंटक क्षेत्र में पसरी नेत्र व्याधि की दुर्लभ औषधि `बकावली‘ पुष्प (परवर्ती नाम `गुल बकावली‘) लेकर आयेगा, उससे नर्मदा का ब्याह होगा. शर्त अत्यंत कठिन थी जिसे पूरी करने में सफल हुआ सोन अर्थात शोणभद्र. तदनुसार दोनों का विवाह निश्चित हुआ.  

बारात ले नर्मदा की देहरी में आने के बाद उसने नर्मदा की अनुपमा सखी जोहिला (कहीं-कहीं उसे नाईन कहा गया) को देखा और उसका दिल उस पर आ गया.  जोहिला ने भी उसका प्रेम स्वीकार कर लिया. ठीक विवाह से पहले नर्मदा ने उन दोनों को रंगरेलियां मनाते हुए देख लिया. विवाह के लिए वधूवेश में तैयार हो फेरे लेने की प्रतीक्षा में बैठ अपने वैवाहिक जीवन के सुखद सपने बुनती नर्मदा के लिए ये वज्राघात से कम न था. ाढाsधित, क्षुब्ध व अपमानित नर्मदा ने सोन को प्रबल धक्का दिया व खुद पिता का घर त्याग, पश्चिम वाहिनी हो गयी. तेजस्विनी नर्मदा के भय से सोन पहाड़ से कूदकर पूर्व की ओर भाग चला. जोहिला ने भय से पूर्ववाही हुए सोन का अनुसरण किया व उससे ब्याह कर सुहागिन हो गयी. सबकी दुलारी व पूज्या नर्मदा, बिन ब्याही रह गयी. उस प्रणय वंचिता का दर्द लोगों का दर्द बन गया. उसे लोक सहानुभूति मिली. दूसरी ओर सोन की सुहागन बनकर भी लोगों के लिए जोहिला रही वह कलंकिनी, जिसने नर्मदा से उसका होने वाला पति छीन लिया. 

गायत्री, सावित्री, करगंगा एवं कपिला वे आरम्भिक छोटे नदी-नाले हैं, जो नर्मदा में मिलते हैं. इनसे मिलकर ही नर्मदा अपना शैशव रूप त्याग बड़ी होती है. इसी तरह खुज्जी व गंगई वे आरम्भिक छोटे नदी- नाले हैं, जो सोन से मिल उसे बड़ा बनाते हैं. जोहिला के शुरुआती सहायक नदी- नालों में करौंधी, पोती, गिरार, तिनके, पंडरिया और घोड़ाचटार हैं. 

(1)

पहचाना मुझे? …नहीं न!! 

नहीं पहचाना जान कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा. 

एक साधारण स्त्राr को उसके परिजनों व आस-पास निवास करने वालों के अतिरिक्त साधारणत: कोई नहीं जानता. जो कुछ लोग जानते भी हैं, वे उसे अमुक की बेटी, बहन, पत्नी, मां, भाभी, चाची या ऐसे ही किसी अन्य रूप में जानते हैं. किंतु उसके इस अपरिचय या बहुत थोड़े-से परिचय के बावजूद उसका अपना एक अस्तित्व फिर भी होता है.  भले ही लोग- बाग याद न रखें, तमाम नातों-रिश्तों के बीच उसका अपना एक नाम भी होता है; अपरिचय के बाद भी एक अलग व्यक्तित्व होता है. स्वाभाविक रूप से मेरा भी है. 

वह कोई भी स्त्राr, जो समाज में अनजानी या अल्प परिचिता है, अपने अज्ञात- अल्पतम ज्ञात परिचय के बाद भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने की नैसर्गिक इच्छा हमेशा अपने हृदय में संजोकर रखती है, उसे पालती है. वह केवल इच्छा ही नहीं पालती, वरन ज़रूरत पड़ने पर उस अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संघर्ष भी करती है. उसके इस संघर्ष से समाज में कोई उथल-पुथल भले ही न मचे, उसके संघर्ष से समय के पन्नों में किसी ाढांति की सुगबुगाहट की आहट भले ही दर्ज न होती हो, लोग-बाग भले ही उसके विरोध या समर्थन में अपने-अपने मतों का खंडन-मंडन करते न दिखते हों, भले ही उसके चारों ओर के परिवेश में कुछ बदलता नहीं दिखता हो, पर उस संघर्ष को असफल या निरर्थक नहीं माना जा सकता. आप मानो या न मानो, उस संघर्ष से उस स्त्राr के मन में अपने होने के प्रति एक आश्वस्ति जागती ज़रूर है. और अपने होने की वह अनुभूति, जो उस स्त्राr के मन में जागती है क्या कम बड़ी उपलब्धि है? फिर उस संघर्ष को लोक स्वीकृति मिले या ना मिले. 

मैंने भी अपने होने की अनुभूति को बनाये रखने के लिए बहुत संघर्ष किया है, विपरीत परिस्थितियों को झेला है, कष्ट किया है. न केवल मानसिक प्रताड़ना तथा सामाजिक अपमान का सामना किया है, वरन सामाजिक रूप से मान्य व स्थापित नैतिक मापदंडों का उल्लंघन भी किया है. परंतु अपने अस्तित्व के लिए यह सब करने वाली दुनिया की मैं ना तो प्रथम स्त्राr हूँ और ना ही अकेली. 

बहुत पीछे छूट गये अतीत में यादों के झरोखों से झांक आज जब मैं अपने हृदय को टटोलती हूं तो मुझे अपने किये पर कोई ग्लानि, पश्चाताप या किसी प्रकार के शर्म की अनुभूति नहीं होती. ऐसा तो तब होता, जब कुछ त्रुटि करने की भावना या किसी प्रकार का अपराधबोध चोरों की भांति मेरे मन के किसी कोने में दुबक कर बैठा होता.  

अपने जीवन के पथरीले ऊबड़-खाबड़ पथ पर प्रवाहित हो मैं सहस्राब्दियों से लोक प्रदत्त लांछना सहती आ रही हूं. जैसे मुझे लोक-लांछना मिली, वैसे ही मेरी अनन्या सखी नर्मदा को मिली लोक- सहानुभूति व सम्मान. राजकुमार सोन की प्रणयवंचिता व अविवाहिता रह जाने का दर्द लिये पश्चिम गामिनी हो, नर्मदा पूज्या हो गयी और मैं प्रियतम सोन का प्रणयदान और साथ पाकर भी लोगों के लिए रही वही कलंकिनी, जिसने अपनी प्रिय सखी नर्मदा का होने वाला पति उससे छीन लिया. 

नर्मदा द्वारा रखी गयी शर्त को अपने साहस, चातुर्य और सामर्थ्य के बल पर पूरा कर राजपुत्र शोणभद्र अर्थात सोन बारात लेकर आये तो थे उसे ब्याहने; किंतु उनका ब्याह हुआ मुझसे. जिस नाटकीय परिस्थिति में मैं सोन की हुई, वह हठात घटित हुई थी. इतनी हठात कि मैं उसके सामने बेबस, निरीह-सी बिना प्रतिरोध समर्पित हो गयी. झूठ नहीं कहूंगी, उस समर्पण के समय नरपुंगव राजपुत्र सोन के प्रति मेरे मन में एक अव्यक्त आकर्षण अवश्य था. नर्मदा के प्रति थोड़ी-सी नारी सुलभ ईर्ष्या भी थी. परंतु भगवान महादेव साक्षी हैं, मैंने नर्मदा से कोई छल नहीं किया. सोन जैसे नरश्रेष्ठ का प्रेम मिलना मेरा प्रारब्ध था. फिर भी मेरा दुर्भाग्य, मुझे यह लोकनिंदा मिली कि मैंने कुंवर शोण को अपने रूप- यौवन के भ्रमजाल में इस तरह फांसा कि वह उससे निकल न सका. 

मेरा केवल एक ही दोष था. वह यह कि आर्य शोणभद्र ने, जिसे लोग `सोन’ तथा `हिरण्यवाह’ के नाम से भी जानते हैं, मुझसे अपना प्रेम निवेदित किया और उनसे अनायास मिले उस प्रेम को मैंने हृदय से स्वीकारा. हां, अपना मस्तक गर्व से उठा कर कहती हूं कि उस प्रेम को स्वीकारने के बाद मैंने उसे साधिकार पाने के लिए पुरजोर चेष्टा की एवं साहस के साथ समस्त विपरीत परिस्थितियों का सामना किया. प्रेम करके हार जाना मुझे गवारा न था. 

आज समय के गवाक्ष से झांक कर पीछे देखती हूं, तो पाती हूं कि मुझ जैसी न जाने कितनी लड़कियों ने प्रेम किया और केवल दुख पाया. अपने विवश, निरीह प्रेम को लेकर वे खुद तो मरीं, साथ में अपने अनुरागी प्रेमियों को भी मर मिटने पर मजबूर किया. काश, उनका प्रेम माखन-सा कोमल न हो, प्रस्तर शिला-सा कठोर व सुदृढ़ होता. काश, उनके आकुल – विह्वल प्रेम ने उनके प्रेमियों को मर मिटने की सीमा तक लाचार न कर दिया होता! क्यों नहीं उन प्रेम दीवानियों ने अपने प्रेमियों के साथ मरने या उनके लिए मर मिटने की अपेक्षा मेरी तरह उनके साथ जीना पसंद किया? जब वे लड़कियां प्रेम कर सकीं, तो फिर उसे पाने के लिए विद्रोह क्यों नहीं कर सकीं, समाज के सामने तन कर खड़ी क्यों न हो सकीं और अपने प्रेमियों को जयी बनने का साहस क्यों नहीं दे सकीं?  

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शरणम् – नरेंद्र कोहली (धारावाहिक उपन्यास – 4) https://www.navneethindi.com/?p=2524 https://www.navneethindi.com/?p=2524#respond Tue, 01 Nov 2016 10:21:32 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=2524 Read more →

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धृतराष्ट्र को कुछ व्याकुल देख, संजय ने पूछा- ‘कुछ चाहिए महाराज?’

‘थोड़ा जल.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘और संजय, चलो, हम गंगा-तट वाली वाटिका में बैठें? उस दिशा में वातास का बड़ा सुख है.’

धृतराष्ट्र आशंकित था कि यदि कहीं गांधारी फिर इस ओर आ निकली और उसने उनकी चर्चा सुन ली तो वह उससे इस कारण से भी रुष्ट होगी कि वह कृष्ण और अर्जुन की कथा लिए बैठा है. अपने पुत्रों की उसे कोई चिंता ही नहीं है. युद्ध को दस दिन हो गये हैं; और उसे अब तक अपने पुत्रों की वीरता का कोई प्रमाण नहीं मिला है. उनकी कोई चर्चा भी नहीं हुई है. धृतराष्ट्र ने हस्तिनापुर से हरकारे भी नहीं भेजे हैं कि वे ही कोई समाचार ले आयें…

संजय चुपचाप देखते रहे. सेवकों ने गंगा-तट की वाटिका में उन दोनों के बैठने के लिए सारा प्रबंध कर दिया. वह गंगा-तट तो था; किंतु प्रतिबंधित क्षेत्र था. राजपरिवार से असम्बद्ध लोग वहां नहीं आ सकते थे. अंतःपुर की स्त्रियों का तो वह अत्यंत प्रिय स्थल था. संजय को हो तो हो, सम्राट को तो उन स्त्रियों का कोई भय नहीं था. सम्राट का ध्यान उस ओर नहीं था तो उन्हें स्मरण भी नहीं कराया जा सकता था.

संजय का अनुमान ठीक निकला. कुछ ही क्षणों में दुःशासन की पत्नी ज्योत्स्ना ही उधर आ निकली.

‘महाराज, अपनी पुत्रवधू ज्योत्स्ना का प्रणाम स्वीकार करें.’

‘सौभाग्यवती भव.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘किसी विशेष कार्य से आयी हो?’

‘कार्य तो कोई विशेष नहीं है; किंतु प्रातः से ही आपको खोज रही हूं.’ वह बोली- ‘कुछ निवेदन करना चाहती हूं.’

‘कहो पुत्री. ऐसी कौन-सी बात है जो तुम महारानी गांधारी से न कहकर मुझे कहने आयी हो.’

‘महारानी सुनतीं तो मैं उनसे ही कहती; किंतु आप भी जानते हैं कि वे गंधार की राजकुमारी हैं. वहां की मिट्टी से उनका शरीर बना है और वैसा ही कठोर उनका मन और स्वभाव है. जैसे शरीर जड़ तत्त्वों से बना है, वैसे ही मन भी तो जड़ ही है. मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि वे अपने पुत्रों के साथ युद्ध में क्यों नहीं चली गयीं. वह उनकी प्रकृति के लिए अनुकूल स्थल है.’

‘यह तो तुम उनसे ही पूछना. मैं तो इतना ही जानता हूं कि गांधारी मधुर भी है और कठोर भी. मेरे प्रति उसका व्यवहार स्नेहपूर्ण और मृदुल है. उसमें गंधार की कठोरता मैंने कभी नहीं देखी.’

‘मुझे आप क्षमा करेंगे महाराज.’ ज्योत्स्ना ने कहा- ‘आपने आज तक ऐसी कोई अन्य स्त्राr भी देखी है, जिसने अपनी संतान का जीवन नष्ट करने के लिए, अपने हाथों आघात कर, अपना गर्भपात कर लिया हो.’

‘ठीक कहती हो पुत्री. किंतु वह पुरानी बात है. वह सामयिक आवेश था; एक प्रकार का पागलपन का दौरा पड़ा था उसे, अन्यथा वह अपने पुत्रों से इतना प्रेम न करती.’

‘उनसे कहें कि वे थोड़ा प्रेम अपनी पुत्रवधुओं के लिए भी बचा रखें.’

‘क्या हुआ?’

‘आज प्रातः जब मैं उनको प्रणाम करने गयी तो अपनी चिंताओं के कारण पूछ बैठी कि कुरुक्षेत्र से कोई समाचार आया है क्या? तो उन्होंने कहा- ‘तुम चटखारे लेकर भेड़ का भुना हुआ मांस खाओ. मेरे पुत्र युद्धक्षेत्र में अपना रक्त बहा रहे हैं; किंतु तुम्हें उससे क्या?’

‘बुढ़िया पगला गयी है. उसके पुत्र अपनी इच्छा से युद्धक्षेत्र में गये हैं. अपनी पत्नियों के धकेलने से नहीं.’ धृतराष्ट्र ने मुस्कराने का प्रयत्न किया- ‘शत्रुओं पर विजय पाने के लिये गये हैं. धन-दौलत, सम्पत्ति और सत्ता के लिए गये हैं.’

‘कैसे गये हैं और क्यों गये हैं, वह पृथक् विषय है; किंतु अपने पति के प्रति चिंतित होना पत्नी का स्वभाव है.’ ज्योत्स्ना बोली- ‘किंतु गंधारकुमारी क्या जानें. उनके पति तो कभी युद्ध में गये ही नहीं.’

‘कटाक्ष कर रही हो.’ धृतराष्ट्र ने अपनी ज्योतिहीन आंखें जैसे उसपर जमा दीं- ‘यह सत्य है कि मैं कभी युद्ध-क्षेत्र में नहीं गया, किंतु मैं आजीवन अपनी रक्षा के लिए, युद्ध ही तो करता रहा हूं. मैंने अपना रक्त बहाया नहीं किंतु अपना रक्त जितना मैंने पिया है, संसार के किसी योद्धा ने नहीं पिया होगा. तुम रुष्ट हो अपनी सास से किंतु अपना वाक्-बाण मेरे वक्ष में मार रही हो.’

‘भूल हो गयी महाराज.’ वह बोली- ‘किंतु आप महारानी को समझा दें कि वे मुझसे इस प्रकार का दुर्व्यवहार न किया करें. नहीं तो…’

‘नहीं तो?’

‘मैं स्वयं को मर्यादित नहीं रख पाऊंगी. विष मेरे भीतर ही बहुत है और मैं किसी भी समय उसे उगल सकती हूं. मुझे भय है कि मेरे हृदय के विष से बुझे बाण कोई अनर्थ न कर डालें. मैं अपने परिवार में रक्तपात नहीं चाहती; नहीं तो कुल-क्षय में समय ही कितना लगता है.’

‘नहीं. उस विष को तुम अपने पास ही संभाल कर रखो. बड़े काम की चीज़ है. और जहां तक कुल-क्षय की बात है, वह तो कुरुक्षेत्र में हो ही रहा है.’

धृतराष्ट्र की मुख-मुद्रा कह रही थी कि उसे अब इस विषय में और चर्चा नहीं करनी है, ज्योत्स्ना अब चली जाये, तो उसे सुविधा होगी.

वह चली गयी.

‘गयी?’ धृतराष्ट्र ने पूछा.

‘जी महाराज.’

‘इन स्त्रियों का पारस्परिक युद्ध कभी समाप्त होने को ही नहीं आता. हस्तिनापुर का राजप्रासाद इनके लिए कुरुक्षेत्र का युद्धक्षेत्र ही है. पता नहीं ईश्वर ने सास-बहू का कैसा सम्बंध बनाया है, उनमें कभी सौहार्द हो ही नहीं सकता. देवरानियों और जेठानियों में भी एक स्वर्ण-कंगन के लिए महायुद्ध हो सकता है, जबकि उन लोगों को यह भी पता नहीं है कि उनके पास कितना-कितना स्वर्ण संचित होकर उनकी पेटियों में व्यर्थ ही पड़ा है.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘अच्छा छोड़ो इन्हें. …यह बताओ कि अर्जुन अपना ज्ञान बघारता रहा और कृष्ण खड़ा सुनता रहा? आश्चर्य है. कितना अच्छा होता यदि कृष्ण अर्जुन के तर्क को मान जाता और उसका रथ लौटाकर, उसे युद्ध-क्षेत्र से कहीं दूर, बहुत दूर ले जाता. चाहे द्वारका ही ले जाता.’

‘श्रीकृष्ण कैसे मान जाते…?’ संजय ने कुछ कहना चाहा.

‘क्यों? क्यों न मानता? आखिर अर्जुन की सारी बातें आदर्श से आपूर्त थीं. सुनने में कितनी मधुर, अच्छी और भली लगती हैं. प्रत्येक भला आदमी ऐसी ही बातें करना चाहता है.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘लोग इसी प्रकार के सुंदर लगने वाले पुष्पित कथनों से सत्य को धूमिल कर देते हैं. युद्ध से पहले तुम भी तो गये थे पांडवों को समझाने-शांतिदूत बन कर. क्या समझाया था उन्हें? यही सब तो कहा होगा.’

‘मैं शांतिदूत नहीं, आपका दूत बनकर गया था महाराज. इसलिए सत्य की भाषा नहीं, आपकी भाषा बोलता रहा था.’ संजय ने कहा- ‘तब पांडव मोहग्रस्त नहीं थे, अतः उन्होंने मेरी बात नहीं मानी. युद्ध के पहले दिन, अर्जुन मोह में पड़कर यह सब कह रहा था, श्रीकृष्ण मोहग्रस्त नहीं थे, इसलिए उन्होंने अर्जुन की बात नहीं मानी. अर्जुन का सत्य श्रीकृष्ण के सत्य से बहुत भिन्न है; उनमें कोसों की दूरी है.’

‘तो फिर क्या कहा कृष्ण ने?’

श्रीकृष्ण ने करुणा और शोक से आविष्ट, अश्रुपूर्ण व्याकुल आंखों वाले अपने उस मित्र, अर्जुन को धैर्य से देखा- क्षणभर में क्या हो गया इस योद्धा को?

‘अर्जुन, ‘कुरुक्षेत्र’ नामक भौगोलिक स्थान से तो तुम्हारा परिचय है; किंतु ‘धर्मक्षेत्र’ का अर्थ क्या है- वह तुम नहीं समझ पा रहे हो. एक बार सांसारिक भूमिका को त्यागकर, यदि हम धर्म की भूमिका पर आरूढ़ होकर बात करें, तो धरातल बदल जाता है.’

‘कैसे बदल जाता है धरातल? धरा वही रहेगी तो धरातल कहां से बदल जायेगा? और धरातल बदल जाने से हत्या, हत्या नहीं रहेगी क्या?’

‘हां.’

‘विचित्र बात है.’

‘हां, है तो विचित्र किंतु सत्य है.’

‘वह कैसे?’

‘अर्जुन, तुम सामान्य सांसारिक मनुष्य की भूमिका में हो और इसीलिए साधारण भीरु मनुष्यों के समान सोच रहे हो. उसी प्रकार व्यवहार कर रहे हो. तुम्हारा चिंतन विकृत हो गया है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘किंतु मैं धर्म की भूमिका पर स्थित हूं. तुमने कहा था कि मैं तुम्हें दोनों सेनाओं के मध्य ले चलूं. मैंने तुम्हें केवल दोनों सेनाओं के ही मध्य नहीं, धर्म और अधर्म के मध्य लाकर खड़ा कर दिया है. तुम्हारे लिए ये कौरवों और पांडवों की सेनाएं हैं; और मैं बता रहा हूं कि ये धर्म और अधर्म की सेनाएं हैं. तुम्हारे लिए तुम्हारे सामने तुम्हारे सगे-सम्बंधी खड़े हैं और मेरे लिए यहां केवल अधर्म, सेना के रूप में खड़ा है. धर्म की भूमि पर खड़े होने वाले व्यक्ति के लिए, कोई अपना-पराया नहीं होता, कोई रक्त-सम्बंध नहीं होता, कोई सांसारिक सम्बंध नहीं होता. यहां या तो धर्म है या अधर्म.’

‘लौकिक धरातल ही सही. मेरा वही धरातल है. मेरे पैर धरा पर ही टिके हैं, न वायु में उड़ रहा हूं, न अधर में लटका हूं. मैं अब भी कह रहा हूं कि मैं अपने ही पूज्य पितामह और गुरु को युद्ध में बाणों से कैसे मारूंगा?’ अर्जुन की चिंता स्पष्ट थी.

‘युद्ध में किसी को मारने की और कोई विधि है ही नहीं.’ श्रीकृष्ण परिहास की मुद्रा में आ गये थे.

‘पितामह का आप भी इतना सम्मान करते हैं…’

‘किंतु सम्मानित व्यक्ति भी अधर्म का पक्ष लेकर सम्मानित नहीं रह जाता.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘इस समय अधर्म की भूमिका पर खड़े भीष्म, न सम्मानित और पूज्य हैं, न पितामह हैं. वे अधर्म की सेना के महासेनापति हैं. वे अधर्म की रक्षा कर रहे हैं. और अधर्म की रक्षा करने के लिए वे धर्म का वध भी कर रहे हैं. इसलिए मैं किसी भी धरातल पर उनसे अपना कोई सम्बंध स्वीकार नहीं करता.’

‘और मैं आप से कह रहा हूं कि मैं पृथ्वी के राज्य के लिए तो क्या, स्वर्ग के राज्य के लिए भी अपने बंधु-बांधवों को नहीं मारूंगा. मैं अपने बंधुओं के रक्त से सने राज्य को प्राप्त करने के लिए युद्ध नहीं करूंगा. उससे तो कहीं अच्छा है कि मैं शिक्षा मांग कर जीवन-यापन कर लूं.’ अर्जुन बोला- ‘आप मेरा मानवीय तर्क नहीं समझ रहे. मानव के दृष्टिकोण से नहीं देख रहे. मैं एक आदर्श को प्रस्तुत कर रहा हूं.’

‘क्या आदर्श है तुम्हारा?’ श्रीकृष्ण का स्वर शूल के समान तीखा था- ‘अपने स्वधर्म से भाग जाना?’ युद्ध के क्षेत्र में आकर अपने भाइयों और सेना की अपेक्षाओं को ध्वस्त कर, उन्हें भ्रम में रख कर युद्ध में पीठ दिखाना?’

‘नहीं. राज्य के लिए, धन-सम्पत्ति के लिए, अपने सुख और भोग के लिए, किसी का वध तो नहीं ही करना चाहिए. राजाओं को इसलिए तो युद्ध नहीं करना चाहिए कि वे अपने लिए साम्राज्य स्थापित कर सकें. युद्ध में भयंकर नर-संहार होता है. यदि पांच पांडवों के कष्ट झेल लेने से लक्ष-लक्ष लोग मृत्यु का ग्रास बनने से बच जाते हैं तो उन पांच लोगों को कष्ट झेलने में क्या आपत्ति है? क्या वे मानवता के लिए इतना भी नहीं कर सकते?’

श्रीकृष्ण देख रहे थे कि भविष्य में गांधारी भी उनसे यही पूछने वाली थी. उसका भी यही प्रश्न होगा कि श्रीकृष्ण ने इस युद्ध को रोका क्यों नहीं? यदि वे चाहते तो महाभारत का युद्ध रुक सकता था. और श्रीकृष्ण ऐसा कुछ नहीं कहने वाले थे, जिसका अर्थ यह होता कि वे युद्ध को रोकने में असमर्थ थे. अर्जुन से भी वे यह नहीं कह सकते थे कि अर्जुन की मानवता वरेण्य है. श्रीकृष्ण चाहते तो कह सकते थे कि मानवता के लिए पांच पांडव और उनके परिवार, कष्ट सहें, इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है; किंतु वे पांच श्रेष्ठ मानव तथा उनके संगी-साथी, उनके बंधु-बांधव दानवों को सुख देने के लिए कष्ट क्यों सहें? अधर्म को फलने-फूलने का अवसर देने के लिए धर्म उसे अपना कंठ क्यों रेतने दे?

यदि अर्जुन का दृष्टिकोण मानवीय होता तो श्रीकृष्ण उसका स्वागत करते किंतु वह सारा चिंतन ही मोह और भ्रम पर आधृत था. वह मान रहा था कि युद्ध के मूल में राज्य की कामना है. कौरवों के प्रति शत्रुता का भाव है. …और धर्म की भूमि पर खड़े श्रीकृष्ण देख रहे थे कि दुर्योधन और उसके साथी चाहे राज्य और धन-सम्पत्ति के लिए मनुष्य का रक्त बहाने आये थे; किंतु श्रीकृष्ण, पांडवों को लेकर राज्य के लिए युद्ध करने नहीं आये थे. वे धर्म की स्थापना के लिए वहां, उस युद्धक्षेत्र में खड़े थे. श्रीकृष्ण का अवतार, राज्य की स्थापना के लिए नहीं, धर्म की स्थापना के लिए हुआ था.

‘ओह अर्जुन, युद्ध के इस कठिन समय में यह पापमय अज्ञानजनित मोह, तुम्हारे मन में कहां से उदित हो गया. यह तुम्हारे पूर्व-जन्मों के किन पापों का फल है?’ श्रीकृष्ण बोले- ‘अनार्य पुरुषों के योग्य, स्वर्ग और कीर्ति से पतित करने वाला यह भाव कहां से अंकुरित हो गया तुम्हारे मन में?’

‘मैं मानवता की रक्षा के लिए निवेदन कर रहा हूं.’ अर्जुन ने कहा- ‘प्राणियों की जीवन-रक्षा के लिए प्रयत्नशील हूं.’

श्रीकृष्ण का स्वर कुछ कठोर हो गया- ‘क्लीव मत बनो.’

‘क्लीव?’ अर्जुन का मुख आश्चर्य से खुल गया- ‘आप मुझे क्लीव कह रहे हैं.’

‘आत्मरक्षा और धर्मरक्षा के लिए न लड़ने वाले नपुंसक, यह कायरता वीर अर्जुन के योग्य नहीं है. शोभा नहीं देता तुम्हें, युद्ध से विमुख हो जाना. हृदय की इस तामसिक दुर्बलता को त्यागो. परंतप! उठकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ.’

अर्जुन की आंखों में अश्रु थे- ‘युद्ध के लिए खड़ा हो जाऊं? अपने पूज्य पितामह और आचार्य को युद्ध में अपने तीखे बाणों से बींध दूं. सखा! ऐसा कठोर आदेश मत दो.’

‘इसमें कठोर क्या है? तुम्हें तुम्हारा धर्म स्मरण करा रहा हूं.’ श्रीकृष्ण के चेहरे पर मुस्कान थी- ‘पर यह भी सत्य है कि धर्म कभी कोमल नहीं होता. धर्म पर वीर ही टिक सकते हैं. वीर होकर भी तुम धर्म से च्युत हो रहे हो.’

‘कठोर नहीं, यह क्रूर कर्म है?’ अर्जुन जैसे भड़क उठा- ‘अपने गुरुओं की हत्या करूं? अपने सम्बंधियों की हत्या करूं? वह भी केवल राज्य के लिए? कोई अन्यायी, अधर्मी, पापी सामने होता तो मैं उसका अभी वध कर देता.’

‘एक ही बात को मत रटे जाओ. वेश को नहीं, उनके हृदय को पहचानो, अर्जुन! उनके ध्येय को देखो.’ श्रीकृष्ण बोले.

‘क्या कहना चाहते हैं आप?’

‘गुरु कौन है यहां? किस में गुरुत्व का भाव है? सभी ओर तुच्छता है, स्वार्थ है, ईर्ष्या है. महानता कहां है? अध्यापक हो जाने मात्र से कोई गुरु तो नहीं हो जाता.’ श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा- ‘और अर्जुन, क्या तुम पहले नहीं जानते थे कि पितामह और द्रोणाचार्य युद्ध में तुम्हारे विरुद्ध लड़ने के लिए सामने खड़े होंगे. आज नयी बात क्या हो गयी? युद्ध की योजना के समय से ही स्पष्ट था यह. और भीष्म दुर्योधन के महासेनापति हैं, इसकी घोषणा तो कब से हो चुकी. आज कुछ नया तो नहीं हुआ है, जो यहां आकर इस प्रकार बिदक
रहे हो.’

‘ठीक कह रहे हैं कृष्ण आप!’ अर्जुन ने जैसे कराह कर कहा- ‘किंतु धन की इच्छा मुझे कभी भी इतनी नहीं रही कि उसके लिए अपने गुरुओं की हत्या… वे सामने खड़े होंगे, यह तो ज्ञात था. वे विराटनगर के युद्ध में भी मेरे सामने थे; किंतु उनका वध नहीं किया था मैंने. अब भी उसकी कल्पना नहीं कर पा रहा हूं.’

श्रीकृष्ण कुछ सहज हुए ः तो अर्जुन यह सब सोच रहा है.

‘ठीक कह रहे हो अर्जुन!’ वे बोले- ‘सांसारिक भोगों के लिए गुरुओं की तो क्या, किसी की भी हत्या, हिंसा है, राक्षसी कृत्य है; और हिंसा पाप है.’

‘तो फिर हम क्या करने जा रहे हैं? क्यों खड़े हैं हम युद्धक्षेत्र में?’

‘हम पाप का वध करने आये हैं, धर्म की स्थापना के लिए.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘दुर्ग को तोड़े बिना उसके भीतर छिपे दस्यु का वध तुम नहीं कर सकते. और पितामह दुर्ग की प्राचीर के समान, दुर्योधन की रक्षा कर रहे हैं. वे पाप की रक्षा कर रहे हैं. उनको मार्ग से हटाये बिना तुम पाप का वध नहीं कर सकते. तुम युद्ध नहीं करोगे तो पितामह और द्रोणाचार्य मिल कर सारे संसार पर दुर्योधन का, अर्थात पाप का, अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर देंगे. तुम अपने गुरुजनों के रक्त से भीगा राज्य नहीं चाहते; और वे धर्म का वध कर उसके रक्त में भीगा राज्य दुर्योधन को प्रदान कर देंगे. तुम पांचों भाइयों और तुम्हारे पुत्रों के शवों को रौंद कर राजसिंहासन पर पाप विराजे, यह स्वीकार है तुम्हें?’ श्रीकृष्ण ने क्षणभर रुक कर अर्जुन की ओर देखा- ‘भिक्षा मांग कर जीवन निर्वाह करना श्रेयस्कर होता तो मैं भी तुम्हारे ही साथ चलता; किंतु सोचो, जिस राजसभा में पांडवों के सम्मुख पांचाली का चीरहरण हो सकता है, उस राजसभा में कौन-सी कुलवधू घसीट कर नहीं लायी जा सकती. तुम चाहते हो कि दस्यु सिंहासन पर बैठें और धर्मराज का शव हस्तिनापुर के सिंहद्वार पर लटकाया जाये? और वह लटकाया जाने वाला एकमात्र और अंतिम शव नहीं होगा…’ श्रीकृष्ण का स्वर ऊंचा उठा- ‘वह क्रम बन जायेगा. साम्राज्य की नीति बन जायेगी.’

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे सारा रक्त सूख गया हो.

‘वह दुर्योधन की भूल थी.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘वस्तुतः मैं तो देख ही नहीं पाया कि वे लोग क्या कर रहे हैं.’

‘आप देख नहीं रहे थे; किंतु जानते तो थे. कर्ण का आदेश नहीं सुना था आपने?’ संजय ने कहा- ‘पांचाली का चीत्कार नहीं सुन रहे थे आप. पर उस समय तो आप प्रसन्न थे. ऐसे घृणित कृत्य पर भी प्रसन्नता. उस नीचता को आप अपने पुत्रों की उपलब्धि मान रहे थे.’

‘पितामह तो देख भी रहे थे और सुन भी रहे थे. उन्होंने क्या कर लिया?’ धृतराष्ट्र के स्वर में लज्जा नहीं थी.

‘राजा आप थे. राजसभा आपकी थी.’ संजय ने बड़ी कठिनाई से अपने स्वर को ऊंचा उठने से रोका.

‘गांधारी ने आकर रोक तो दिया.’ धृतराष्ट्र ने कहा.

‘हां, पर देखा तो उन्होंने भी कुछ नहीं था. उनकी आंखों पर पट्टी बंधी हुई थी.’

‘हां, पर कितना डांटा था, उसने दुर्योधन को.’

‘हां. नारीत्व का अपमान वे कैसे सहन कर लेतीं.’ संजय ने कहा- ‘आपने नहीं सोचा; किंतु माता गांधारी ने कल्पना की होगी कि यदि भविष्य में उस राजसिंहासन पर कोई और कौरवों का कोई विरोधी बैठ जाये. राजा बदल जाये. राजनीति बदल जाये. तो उनकी अपनी पुत्रवधुओं के साथ भी ऐस्व्ही व्यवहार हो सकता है. भानुमती, काशिका और ज्योत्स्ना को भी उसी प्रकार निर्वस्त्र किया जा सकता है.’

‘मौन हो जाओ संजय. तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो.’ धृतराष्ट्र का स्वर गर्जन जैसा था.

‘जानता हूं; किंतु आपको बताना चाहता हूं कि यह कोई अच्छा कृत्य अथवा अच्छी परम्परा तो नहीं है, जिससे आप प्रसन्न हो रहे थे.’

धृतराष्ट्र का चेहरा उतर गया. उसने सचमुच कभी ऐसी किसी सम्भावना की कल्पना नहीं की थी.

‘तुम यह बताओ कि अर्जुन ने क्या कहा. तुम बहकते बहुत हो.’ उसने अपना चेहरा दूसरी ओर फिरा लिया था.

संजय का इस प्रकार का सत्य-कथन उसे तनिक भी अच्छा नहीं लगता था. वह चरित्रवान था; किंतु उसका यह अर्थ तो नहीं था कि अपने स्वामी को ही सत्य की कृपाण से कोंचता रहे…

‘क्या करूं मैं? किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूं.’ अर्जुन की हताशा उसे निगले जा रही थी.

श्रीकृष्ण को लगा, अर्जुन अभी अपने ही हाथों से अपना माथा पीटना आरम्भ कर देगा.

‘युद्ध का परिणाम अनिश्चित होता है. मैं नहीं जानता कि युद्ध में हम जीतेंगे या वे. मैं न इनसे हारना चाहता हूं और न इनको जीतना चाहता हूं…’

‘जीतना क्यों नहीं चाहते?’

‘क्योंकि इन सब का वध किये बिना इनको जीता नहीं जा सकता; और इनका वध कर मुझे जीने की कोई लालसा नहीं है. फिर मैं उनकी हत्या कैसे कर दूं?’

‘अपने बाणों से.’ कृष्ण मुस्करा रहे थे- ‘या फिर कृपाण से, या शूल से. जैसे तुम चाहो.’

‘आपको परिहास सूझ रहा है और मैं दैन्य के रोग से विमूढ़ हो गया हूं.’ अर्जुन रुका और फिर जैसे एक आवेग में बोला- ‘मुझे बताइए कृष्ण कि मैं क्या करूं. पूजा के योग्य पितामह और आचार्य…’

‘कौन है आचार्य? द्रोण? कौन-सा आचरण शुद्ध है उनका? संसार में जब भी कोई धर्म और सत्य की रक्षा के लिए गांडीव उठाता है अर्जुन, सबसे पहले उसके अपने ही, उसके पूज्य ही, उसकी भुजा थाम लेते हैं. वही तुम्हारे साथ हो रहा है.’

‘द्रोण जैसे भी हैं, मैंने उनसे शिक्षा पायी है. उनका मैं युद्ध में बाणों से प्रतिरोध कैसे करूं. जिनके चरणों में पुष्प चढ़ाने चाहिए, उनके वक्ष पर बाणों से प्रहार करूं? धन की इच्छा से…’

‘मैं जानता हूं कि तुम्हें धन की इच्छा नहीं है, तुम्हें भिक्षा की इच्छा है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘संन्यासी ईश्वर-निर्भर होने के कारण भिक्षा पर निर्भर रहता है! वह मानता है कि भिक्षा का वह अन्न उसे ईश्वर की ओर से प्राप्त हो रहा है. इसीलिए वह तपस्या है; किंतु युद्ध से भागकर, अपने मोह को सर्वश्रेष्ठ निर्णय मानकर, भिक्षाटन करना तपस्या नहीं है. न ही वह ईश्वर-निर्भरता है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘और यदि तुम युद्ध से भागे तो तुम्हारे ये शत्रु तुम्हें भिक्षा मांगने के योग्य भी नहीं छोड़ेंगे. भागते हुए, मार्ग में कहां तुम्हारा शव गिरेगा, यह कौन जानता है.’

अर्जुन की कल्पना में अनेक दृश्य उभरे… कोई मरुभूमि थी, जहां वह चलता जा रहा था. वह क्षितिज को छू लेना चाहता था… किंतु तभी एक बाण आकर उसकी पीठ में धंस गया. जब तक वह पलट कर बाण मारने वाले को देखता, अनके अश्वारोही उसके सिर पर आ चढ़े. उनके धनुष खिंचे हुए थे और त्यौरियां चढ़ी हुई थीं- ‘छुपकर युद्ध से भाग रहा था कायर.’

‘मैं युद्ध से भागा नहीं, युद्ध त्याग आया था. युद्ध की इच्छा होती तो मैं पीठ पर नहीं, वक्ष पर बाण का प्रहार सहता.’ उसने उन्हें पहचानने का प्रयत्न किया- उनमें कोई भी महारथी नहीं था. सब साधारण सैनिक थे. वे उसकी पीठ पर प्रहार कर उसे भगोड़ा कह रहे थे. वह भिक्षाटन के लिए जा रहा था किंतु उसे भिक्षा कहां मिली?… मिला एक बाण, वक्ष पर नहीं, पीठ पर… किसी महारथी का नहीं, साधारण अनजाने सैनिकों का… और उपाधि मिली ‘भगोड़ा’.

अर्जुन अपने वर्तमान में लौटा.

‘तो युद्ध करूं?’ उसने श्रीकृष्ण की ओर देखा.

‘और कर भी क्या सकते हो? युद्ध तुमने नहीं चुना है. उन्होंने तुम्हें बाध्य किया है. उन्होंने तुम्हें घेरा है. वे कोई समझौता नहीं चाहते, युद्ध चाहते हैं. उन्हें युद्ध का दान दो.’

‘पता नहीं हम यह युद्ध जीतेंगे भी या नहीं; किंतु जिनको मारकर मेरी जीने की भी इच्छा नहीं है, वे ही धृतराष्ट्र पुत्र युद्ध में मेरे सम्मुख खड़े हैं.’

‘तुम उनको मारना नहीं चाहते और वे तुम्हें जीने नहीं देंगे.’

‘मैंने कहा न कि मैं दैन्य के दोष से मूढ़ हो गया हूं. आपकी शरण में आया हूं. आपका शिष्य हूं. आपसे पूछ रहा हूं. मुझे बताइए- कृष्ण! कि मेरे लिए श्रेयस्कर क्या है.’ अर्जुन बोला- ‘मुझे लगता है कि सम्पूर्ण पृथ्वी का निष्कंटक राज्य ही नहीं, देवताओं का आधिपत्य भी मेरे इस दुख का निवारण नहीं कर सकेगा, जो इस समय मेरी इंद्रियों को मथ रहा है.’

संजय चुप हो गये.

‘डर गया बेचारा.’ धृतराष्ट्र ने जैसे प्रसन्नता से ताली बजा दी- ‘मैं अर्जुन को इतना दुर्बल-हृदय नहीं समझता था. हम
व्यर्थ ही उसे महान योद्धा मानकर उससे भयभीत थे. वह लक्ष्यभेदी है, योद्धा नहीं है.’

‘आपको लगता है, वह डर गया.’ संजय ने धीरे से कहा- ‘और मुझे लगता है कि उसके हृदय में देवत्व जाग उठा. वह राज्य जैसे तुच्छ लक्ष्य के लिए असंख्य हत्याओं का जघन्य अपराध नहीं करना चाहता था. वैसे सत्य तो यह है कि युधिष्ठिर को भी कभी राज्य का लोभ नहीं रहा; नहीं तो अपने विरुद्ध रचे गये षड्यंत्र को जानते हुए भी वह आपके आदेश पर शकुनि के साथ द्यूत खेलने न बैठ जाते. ऐसी पितृभक्ति तो दुर्योधन के मन में भी नहीं है, जितनी युधिष्ठिर ने दिखायी है.’

‘पितृभक्ति. उहं.’ धृतराष्ट्र ने जैसे युधिष्ठिर को मुंह चिढ़ाया- ‘उसे कहां पता था कि उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा जा रहा है. वह अपनी मूर्खता में ही द्यूत खेलने बैठ गया था. जाने अपने आपको क्या समझता है. वह शैशव से ही अपने पिता पांडु के समान मूर्ख है.’

‘आपके षड्यंत्र के विषय में उन्हें सब कुछ ज्ञात था.’

‘तुम कैसे जानते हो?’

‘विदुर जब उन्हें निमंत्रित करने इंद्रप्रस्थ गये थे तो उन्हें सचेत कर आये थे.’

‘क्यों? विदुर ने ऐसा क्यों किया?’

‘वे इस युद्ध को टालना चाहते थे.’

‘मूर्ख हो तुम.’ धृतराष्ट्र प्रसन्न दिखाई पड़ रहा था- ‘और वह विदुर जो स्वयं को इतना नीतिवान समझता है, वह भी राजनीति को नहीं समझता.’

‘मैंने तो कभी अपने बुद्धिमान होने का दावा नहीं किया.’ संजय ने कुछ कटु स्वर में कहा- ‘अब आप यह बताइए कि इस मूर्ख से आगे का विवरण सुनना है, या मैं घर जाऊं?’

धृतराष्ट्र ने कुछ भौचक होकर अपनी अंधी आंखें मिचमिचाई- ‘अर्जुन वहां से चला गया क्या?’

‘कैसे जाता?’

‘क्यों? युद्ध की इच्छा नहीं थी तो वहां खड़ा किसलिए था- गणिकाओं का नृत्य देखने?’

‘सारथ्य तो श्रीकृष्ण कर रहे थे.’ संजय ने कहा- ‘उन्होंने अश्वों को एक अंगुल भी हिलने नहीं दिया.’

‘तो?’

‘मैं युद्ध नहीं करूंगा.’ कहकर, अर्जुन चुप हो गया.                 

(क्रमशः)

(यह उपन्यास वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है.)

मई 2016

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गीता एक धर्म-ग्रंथ है और जीवन-ग्रंथ भी. जीवन के न जाने कितने रहस्यों की परतें खोलने वाला ग्रंथ बताया गया है इसे. पर गीता का कथ्य किसी उपन्यास का कथ्य भी बन सकता है, यह कल्पना ही चौंकाती है. वरिष्ठ-चर्चित रचनाकार नरेंद्र कोहली ने इस कल्पना को साकार कर दिखाया है. वे इसे ‘शुद्ध उपन्यास’ मानते हैं, पर गीता के दर्शन को समझने-समझाने का यह सराहनीय प्रयास है.

दासी ने आकर प्रणाम किया और बोली- ‘महाराज, महारानी पूछ रही हैं कि यदि आपकी इच्छा हो तो आपके लिए कुछ स्वादिष्ट फल भिजवा दें. संजय जी का भी अभी तक कोई सत्कार नहीं किया गया है.’

‘हां. संजय के लिए रसीले और स्वादिष्ट फल भिजवा दो.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘किंतु मुझे फल नहीं चाहिए.’

‘तो क्या लेना आपको रुचिकर होगा?’ दासी ने पूछा.

‘मेरे लिए कोमल मांस की कुछ भुनी हुई बोटियां, जो दांतों में न फंसें और अच्छी तरह चबायी जा सकें.’

दासी चली गयी.

संजय पुनः अपने मन में संरक्षित चित्रों में खो गया. धृतराष्ट्र पितामह को युद्ध के लिए कोस रहा था; किंतु अर्जुन भी लड़ने को कम उत्सुक नहीं था. अपनी उत्सुकता में ही उसने मान लिया था कि इस युद्ध में जो भी योद्धा उसके विरोध में खड़ा है, आज वह उसे मार ही डालेगा. आज वह महाकाल के हाथ का उपकरण बनेगा. इसी आतुरता में उसने कहा- ‘मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य स्थापित कर दें अच्युत! युद्धाभिलाषी इन योद्धाओं को एक बार उनके जीवित रूप में देख लूं. देखूं तो इस महासंग्राम में मुझसे संघर्ष कर, दुर्योधन की जय की इच्छा करने वाले ये कौन-कौन दुर्बुद्धि अधर्मी मरने के लिए आये हैं.’

‘बोलो संजय.’ धृतराष्ट्र ने मानो उसे उसकी निद्रा से जगाया.

किंतु संजय कुछ बोले नहीं. उनकी स्मृति सचित्र हो गयी थी. वे देख रहे थे… श्रीकृष्ण अर्जुन की ओर देख कर मुस्कुराए- ‘तुम गुडाकोश हो…’

‘निद्रा को जीतने वाला?’ अर्जुन के स्वर में प्रश्न था.

‘वह कौन-सी बड़ी बात है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘निद्रा को ही नहीं. तमोगुण को जीतने के कारण गुडाकेश हो तुम.’

संजय जानते थे कि यदि उन्होंने धृतराष्ट्र को यह संवाद सुना दिया होता तो वह कहता- ‘हां! दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा न करें, तो मैत्री कैसे निभे.’

धृतराष्ट्र के मन की कटुता से परिचित थे संजय. उसके मन में विष ही विष भरा था. बहुत विषाक्त था मन उसका. सिवाय अपने पुत्रों के और किसी की प्रशंसा सुन ही नहीं सकता था.

इस बार कई दासियां आयीं. उन्होंने उन दोनों के हाथ धुलाये. हाथ पोंछने को श्वेत वस्त्र दिये. दोनों के सम्मुख चौकियां रख कर, उनपर सुंदर चित्रों वाले आवरण-वस्त्र बिछा दिये और फिर उनके पीछे, दूसरी पंक्ति में खड़ी दासियों ने संजय के सम्मुख फल और धृतराष्ट्र के सम्मुख भुना हुआ मांस परोस दिया.

धृतराष्ट्र कुछ देर तक मौन और निक्रिय बैठा रहा. दासियों के जाने की पदचाप निःशब्द हो गयी तो उसने पूछा- ‘दासियां गयीं?’

‘गयीं महाराज.’

धृतराष्ट्र ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और संजय से कहा- ‘खाओ. देखो तुम्हारी रुचि के फल हैं न.’

संजय ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया और एक प्रकार के मुग्ध भाव से बोला- ‘श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को लाकर दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया, जहां से दोनों सेनाओं के प्रमुख भागों का निरीक्षण किया जा सके.’

‘कुछ कहा नहीं?’ धृतराष्ट्र ने पूछा.

‘कहा.’

‘क्या कहा?’

‘उन्होंने कहा- तुमने ठीक ही उन्हें दुर्बुद्धि कहा है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘देखो, भीष्म, द्रोण तथा संसार के अन्य सारे राजाओं को देखो. इन सबको कौरव मानो. दुर्योधन के मित्र और शुभचिंतक. कोई पूछे पितामह से कि वे किस धर्म के लिए युद्ध करने आये हैं. क्षत्रियों का धर्म पापियों की रक्षा करना नहीं होता और वे दुर्योधन के लिए दीवार बने खड़े हैं. प्रजा में दुश्चरित्रता यहीं से आरम्भ ही नहीं होती, गौरवान्वित भी होती है. धर्मात्मा भीष्म, पितामह भीष्म, इस वृद्धावस्था में भी अधर्म की रक्षा के लिए सशस्त्र खड़े हैं. कोई पूछे उनसे कि वे कैसे क्षत्रिय हैं जो असहायों को क्षत से बचाने के लिए नहीं, धर्म को क्षत देने के लिए तत्पर खड़े हैं. असहाय लोगों को क्षत से त्राण कभी भी नहीं दिया उन्होंने.’ श्रीकृष्ण रुके, ‘मुझे लगता है कि भीष्म हों या द्रोण- ये दोनों ही केवल द्रुपद से अपनी शत्रुता निभाने आये हैं. अन्यथा कोई कारण नहीं है कि वे पांडवों के शत्रुओं के मित्र बन, उनकी रक्षा करने के लिए इस भयंकर युद्ध की रचना करें.’

‘पार्थ ने दोनों सेनाओं को दृष्टि भर कर देखा.’ संजय ने धृतराष्ट्र से कहा.

श्रीकृष्ण, अर्जुन की ओर देख रहे थे. अर्जुन अपने सामने खड़ी सेनाओं को देख ही नहीं रहा था, कुछ सोच भी रहा था. उसकी मुद्रा गम्भीर थी. उसमें युद्ध के समय पाया जाने वाला वीरोचित भाव नहीं था. वह उस समय युद्ध में खड़ा क्षत्रिय नहीं, मानव जीवन की नश्वरता को पहचानता हुआ कोई संन्यासी लग रहा था.

…कौन था दोनों सेनाओं में? पक्ष में, विपक्ष में?… अर्जुन देख रहा था और सोच रहा था… मित्र के रूप में और शत्रु के रूप में? पितृ-तुल्य, काका-ताऊ, मातुल और श्वसुर थे. पितामह थे, आचार्य थे. भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र तथा सुहृद थे. ये सब युद्ध करने को खड़े थे. मरने-मारने को तैयार. अपने प्राण देने और दूसरों के प्राण लेने को तत्पर. यह कोई शोभा-यात्रा नहीं थी, युद्ध था. किसी के भी प्राण जा सकते थे. एक प्रकार से महाप्रलय ही था. जाने इनमें से कोई जीवित बचकर अपने परिवार में लौट कर जा भी पायेगा या नहीं… विराटनगर में उसने अकेले इन सारे प्रमुख कौरव योद्धाओं से युद्ध किया था; किंतु वहां उसने किसी का वध नहीं किया था. यहां उसे पितामह का वध करना होगा. आचार्य को मारना होगा. और अकेला वही तो नहीं है मारने वाला. शत्रु पक्ष के योद्धा भी तो मारेंगे. एक ओर महाराज युधिष्ठिर खड़े हैं, दूसरी ओर अभिमन्यु खड़ा है. वे दोनों भी तो मारे जा सकते हैं. उसके सारे भाई, सारे पुत्र, सारे मित्र, कोई भी मारा जा सकता है. वे सब यमराज का मार्ग रोके, उनके सामने खड़े हैं. वह देख रहा था, उन सबके कंठ में अदृश्य यम-पाश पड़ा था… शायद वे कभी अपने परिवार में जीवित न लौटें… मनुष्य के लिए युद्ध आवश्यक था क्या? ‘हे प्रभु, मनुष्य युद्ध क्यों करता है? तुमने क्षात्र धर्म बनाया ही क्यों?’

‘तुम फिर मौन हो गये.’ धृतराष्ट्र ने संजय को टोका- ‘बहुत थके हुए हो? नींद आ रही है क्या? यहीं पर्यंक लगवा दूं तुम्हारे लिए.’

‘नहीं महाराज. ऐसा कुछ नहीं है.’

‘तो बोलते क्यों नहीं?’

‘बता तो रहा हूं महाराज.’ वह रुका, ‘मैं मृत्यु के उस महोत्सव को देखकर सम्मोहित हो गया था.’

‘अपनी नहीं, अर्जुन की बात कहो.’

‘जी. दोनों सेनाओं को देखकर, अर्जुन ने ऐसे अवसाद का अनुभव किया, जिससे उसका इससे पहले कभी परिचय नहीं हुआ था. करुणा की आंच में हृदय पिघला जा रहा था. अंतड़ियां थीं कि ऐंठ-ऐंठ कर पीड़ा से चीत्कार कर रही थीं…’

‘तुम उसकी अंतड़ियों की दशा कैसे देख पाये?’ धृतराष्ट्र ने वक्रता से पूछा- ‘मुझे लगता है कि वे अर्जुन की नहीं, तुम्हारी ही अंतड़ियां रही होंगी. तुम भी तो शांति के बहुत बड़े समर्थक हो. युद्ध की ऐसी तैयारी देखकर तुम्हारी अंतड़ियां भी अवश्य ऐंठी होंगी.’

‘मेरी अंतड़ियां भी ऐंठी थीं; किंतु अर्जुन को देखकर कोई भी उसकी दशा समझ सकता था. चेहरा हृदय के भाव प्रकट कर देता है महाराज.’ संजय ने कहा- ‘श्रीकृष्ण देख रहे थे; अर्जुन का वर्ण इतना श्वेत और रक्तहीन क्यों होता जा रहा था? वह उन्हें भयभीत-सा क्यों लग रहा था?’

l l l

‘कृष्ण!…’

श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा.

‘मेरा शरीर शिथिल हो रहा है. मेरा मुख सूखा जा रहा है.’ उसने अपने सूखे होंठों को गीला करने के लिए उन पर जिह्वा फिरायी.

‘देख रहा हूं.’ कृष्ण ने कहा- ‘किंतु क्यों सूख रहा है तुम्हारा मुख?’

‘ये जो युद्ध के लिए सामने खड़े हैं, ये सब हमारे स्वजन ही हैं. इन्हें मारना है मुझे.’ अर्जुन एक प्रकार से हकला गया था. अटकते-अटकते स्वर में बोला- ‘मेरा शरीर कांप रहा है, रोमांच के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. त्वचा जल रही है और मेरी पकड़ इतनी शिथिल हो रही है कि मेरे हाथ से गांडीव खिसकता जा रहा है.’

उसने एकदम असहाय दृष्टि श्रीकृष्ण पर डाली- ‘और तो और, खड़ा रहना भी मेरे लिए कठिन हो रहा है. मुझे कहीं और ले चलो कृष्ण.’

अर्जुन का यह रूप देख श्रीकृष्ण चकित रह गये- ‘तुमने स्वयं ही तो दोनों सेनाओं के योद्धाओं को देखने की इच्छा प्रकट की थी.’

‘की तो थी; किंतु जाने मुझे क्या हो गया है. मेरा मन भ्रमित हो रहा है.’

‘भ्रमित है या मोहित है? वैसे क्या भ्रम है?’

‘कुछ समझ में नहीं आ रहा सब ओर अशुभ लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जैसे सब कुछ समाप्त हो जाने को है. मुझ पर अवसाद का आक्रमण हुआ है, जैसे खेतों पर टिड्डी दल उतर आता है. दौरा पड़ा है मुझ पर, अवसाद का. लगता है, कोई भी नहीं बचेगा. हमने अब तक जो कुछ बनाया था, बचाया था जो कुछ सोचा-समझा था, चिंतन-मंथन किया था, मनुष्य ने आज तक जो ज्ञान अर्जित किया था, वह सब कुछ समाप्त हो जायेगा. यह महाप्रलय जैसा है. अगली पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं बचेगा, या शायद अगली पीढ़ियां ही नहीं बचेंगी…’

‘तुम अगली पीढ़ियों के लिए इतने चिंतित क्यों हो? वह तुम्हारा दायित्व नहीं है. वे अपने लिए स्वयं निर्माण कर सकती हैं.’

‘किंतु मनुष्य इसलिए तो निर्माण नहीं करता कि एक युद्ध हो और वह सब कुछ समाप्त हो जाये. मुझे अपना ही नहीं, मानव मात्र का भविष्य पूर्णतः अंधकारमय दिखाई दे रहा है. मैं गिर पडूंगा सखे, मुझे संभाल लो.’

‘यह योद्धाओं का योद्धा अर्जुन कह रहा है.’ श्रीकृष्ण तनिक भी चिंतित दिखाई नहीं दे रहे थे, वरन् वे तो हंस रहे थे, ‘तुम्हारा तो नाम ही अर्जुन है; जो अर्जन करता है; युद्ध में विजय का अर्जन.’

‘आप हंस रहे हैं कृष्ण!’ अर्जुन के स्वर में पीड़ा थी, ‘मैं विजय अर्जित करने ही आया था; किंतु अपने स्वजनों के शव बिछा देना तो विजय नहीं है. मैं शत्रुओं को मारने आया था, अपने परिजनों को नहीं.’

‘शत्रु आकाश से नहीं टपकता. युद्ध में जो व्यक्ति विरोधी पक्ष के साथ खड़ा हो जाये, वही शत्रु हो जाता है अर्जुन. जो अधर्म के पक्ष में खड़ा हो जाये, वही धर्म का शत्रु है.’ कृष्ण बोले- ‘क्षत्रिय अपने रक्त-सम्बंध को नहीं देखता. वह स्वजन-निष्ठुर होता है. योद्धा का धर्म है कि अपने मार्ग में आये, अधर्मी व्यक्ति को मार गिराये, न कि उससे अपने सम्बंधों को स्मरण करता रहे; और उसे बचाता रहे. अधर्म पर विजय ही तुम्हारा धर्म है.’

‘विजय किसलिए? राज्य-सुख के लिए?’

‘तुम्हें राज्य-सुख नहीं चाहिए?’

‘इस मूल्य पर नहीं.’

‘विजय भी नहीं चाहिए?’

‘इस समय न मुझे विजय की आकांक्षा है और न ही राज्य-सुख की.’ अर्जुन का कंठ अवरुद्ध होता जा रहा था- ‘गोविंद! राज्य और राज्य के सुख की तो क्या, लगता है, इस समय मुझे जीवन की भी इच्छा नहीं है. यदि यही जीवन है तो मुझे जीने की भी आकांक्षा नहीं है.’

‘क्यों? अकस्मात् ही ऐसा क्या हो गया?’ कृष्ण ने अपने मित्र को वक्र दृष्टि से देखा- ‘क्या तुम नहीं जानते थे कि भीष्म और द्रोण तुम्हारे विरुद्ध लड़ने को खड़े हैं. उन्हीं लोगों के बल पर दुर्योधन ने तुम लोगों को आज तक वंचित नहीं रखा? तुम लोगों के साथ हुए अन्याय के लिए दुर्योधन से अधिक दोषी तो ये ही लोग हैं. दुर्योधन की तो आकांक्षा मात्र थी, कर्म तो इन्हीं लोगों का था… और अभी-अभी
तो तुम यह देखना चाहते थे कि युद्ध में तुमसे लड़कर कौन-कौन अपने प्राण देने आया है.’

‘हां! किंतु जिनके लिए मुझे राज्य की आकांक्षा थी, वे युद्ध में अपने प्राण त्यागने यहां सामने खड़े हैं…’

‘अपने भाइयों तथा पुत्रों की मृत्यु से आशांकित हो?’

‘यही समझ लीजिए. जब सारे ही लोग मारे जाएंगे तो धर्मराज क्या श्मशान की भस्म पर राज्य करेंगे?’

‘कोई भी कभी मरता नहीं अर्जुन. इस प्रकृति में कुछ भी नष्ट नहीं होता. यहां केवल रूप बदल जाते हैं.’

‘यह कैसी बात कह रहे हैं कृष्ण?’

‘शरीर के अस्तित्व और अनस्तित्व में कोई विशेष अंतर नहीं है; क्योंकि दोनों ही नश्वर हैं.’

‘वह ठीक है किंतु यह बताइए कि जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है या धर्म?’

‘तुमने अपने मोह के कारण मेरी बात सुनी ही नहीं.’ कृष्ण बोले- ‘वैसे यदि जीवन और धर्म में से किसी एक को चुनना हो तो धर्म को चुनो क्योंकि वह शाश्वत है.’ कृष्ण बोले- ‘और वैसे भी युद्ध का नियम है कि तुम शत्रु को नहीं मारोगे तो शत्रु तुम्हें मार डालेगा.’

‘मार डालें.’ अर्जुन भन्ना कर बोला- ‘ये लोग शस्त्र लेकर मुझ निःशस्त्र को मार डालें, तो भी मैं इनके वध का इच्छुक नहीं हूं. मैं भूल नहीं सकता कि ये मेरे स्वजन हैं.’

‘तुम ही क्यों, कोई भी स्वजनों को मारना नहीं चाहता. किंतु पर-जनों को भी क्यों मारा जाये?’ श्रीकृष्ण का स्वर कुछ नम्र हुआ, ‘तुम ठीक कहते हो अर्जुन! हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनके साथ जीना चाहते हैं, जिनके लिए जीना चाहते हैं, यदि वे हमारा जीवन नहीं चाहते तो हमें ही इस जीवन का क्या करना है.’ श्रीकृष्ण रुके, ‘किंतु कोई महत्त्वपूर्ण निश्चय करने से पहले विचार करो, ‘स्व-जन कौन है?’ हमने क्या यह शरीर अपने रक्त सम्बंधियों की सुख-सुविधाओं के लिए धारण किया है? उनकी रक्षा के लिए अधर्म को गले लगाने का प्रण किया है?’

‘न सही उनके लिए.’ अर्जुन बोला- ‘अपने लिए ही सही. किंतु मैं यह समझ नहीं पा रहा कि इस पृथ्वी के लिए ही क्या, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी, धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध कर, हमारा क्या भला होगा.’

‘इतना प्रेम है तुम्हें इन पापी अनाचारी, दुराचारी धृतराष्ट्र-पुत्रों से, उन आतताइयों से?’ श्रीकृष्ण के चेहरे की प्रफुल्लता तनिक भी मलिन नहीं हुई, ‘जब तुम मेरे पास, युद्ध के लिए सहायता मांगने द्वारका आये थे, तब क्या तुम नहीं जानते थे कि युद्ध में इन्हीं धृतराष्ट्र पुत्रों को मारना है. जब मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे रथ का सारथ्य करूं तो क्या, वह सारथि इस युद्ध के लिए नहीं, प्रभास की यात्रा का आनंद लेने के लिए चाहिए था तुम्हें?’

‘जाने तब मैंने यह सब क्यों नहीं सोचा.’ और सहसा अर्जुन के स्वर में एक दुर्बल-सा चीत्कार जन्मा- ‘अपने बंधु धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध करना और अपने पक्ष के इन वीर बंधुओं को मरवा डालना… यह हमारे योग्य कर्म नहीं है. माधव! स्वजनों का वध कर हमें क्या सुख मिलेगा. ये आतताई सही किंतु इनकी हत्या से हमें पाप ही लगेगा.’

‘तुम भी तो उनके स्वजन हो. वे तुम्हारी हत्या से क्यों संकोच नहीं करते? तुम्हें मार, उन्हें पाप नहीं लगेगा?’ श्रीकृष्ण बोले- ‘तुम उन्हें नहीं मारोगे तो वे तुम्हारा वध कर ही देंगे.’

श्रीकृष्ण मुस्करा रहे थे.

‘वे लोभ-दंशित चेतना वाले लोग हैं.’ अर्जुन का चेहरा क्षोभ से लाल हो रहा था.

‘और हम?’

‘वे अपने कुल के नाश के दोष और मित्रों से शत्रुता करने के पाप को नहीं देख रहे हैं. मोह का पर्दा पड़ा है उन मूर्खों
की आंखों पर. उससे होने वाली अपनी क्षति वे नहीं देख पा रहे हैं.’ अर्जुन बोला- ‘किंतु…’

‘किंतु?’ कृष्ण ने उसकी ओर देखा.

‘हम तो कुलक्षय के दोषों को जानते हैं. हम लोभ के दंश से मूढ़ नहीं हुए हैं.’ अर्जुन अपने आत्म-गौरव को प्रकट करना चाह रहा था- ‘हम ही कुछ समझदारी क्यों नहीं दिखाते. उस पाप से निवृत्त होने के लिए हम क्यों विचार नहीं करते?’

‘वे लोभ-दंशित चेतना वाले हैं.’ श्रीकृष्ण हंसे- ‘और तुम्हारी चेतना मोह द्वारा दंशित है. लोभ और मोह में कोई बहुत अंतर नहीं होता.’

अर्जुन श्रीकृष्ण की ओर देखता रह गया- उनकी दृष्टि में उसमें और कौरवों में कोई विशेष अंतर नहीं था?

‘अरे अर्जुन नहीं लड़ना चाहता तो न लड़े. उसका विवेक जागा है. वह शांति चाहता है, तो यह कृष्ण क्यों उसे भड़का रहा है. यह कोई लड़कों का खेल है?’ धृतराष्ट्र के स्वर में वितृष्णा थी- ‘कृष्ण क्यों पड़ा है मेरे पुत्रों के पीछे. द्वारका से यहां आकर भाइयों से भाइयों को लड़ने को बाध्य कर रहा है. न राज्य उसका, न सेना उसकी. फिर भी अनामंत्रित अतिथि के समान हस्तक्षेप किये जा रहा है.’

संजय समझ रहा था कि धृतराष्ट्र के मन में क्या चल रहा है. यदि अर्जुन अपनी इस दुर्बलता के कारण युद्ध से हट जाता है तो दुर्योधन की विजय निश्चित है. इससे अधिक धृतराष्ट्र ईश्वर से भी क्या मांग सकता था.

‘अर्जुन बिना किसी और के दबाव के, स्वेच्छा से दुर्योधन को विजय का उपहार दे रहा है.’ धृतराष्ट्र ने सोचा- ‘…पर यह कृष्ण. यह क्यों मानेगा? यह तो संसार का विनाश करा कर ही रहेगा. उसका तो जन्म ही विनाश के लिए हुआ है. पहले अपने छह भाई कटवाए, अपने मामा को मारा, यादवों में फूट डलवायी और अब…’

l l l

‘भाभी, यह अर्जुन को क्या हो गया है.’ पारंसवी ने कहा- ‘निश्चित रूप से आपने उसे ऐसे क्षात्र धर्म विरोधी
संस्कार तो नहीं दिये होंगे. इतना बड़ा योद्धा और किसी रुदनशील बालक के समान ऐसा दीन हो रहा है. किसी ने उसे कोई अनिष्टकारी पदार्थ खिला-पिला तो नहीं दिया?’

‘नहीं. ये मेरे संस्कार नहीं हैं. यह उसके किसी पूर्वजन्म का कोई पाप है, जो इस समय उदित होकर उसे मोह में डाल रहा है. वह शरीर के धरातल पर जी रहा है, इसलिए मोहग्रस्त हो गया है.’ कुंती ने कहा- ‘किंतु अच्छी बात यह है कि वह कृष्ण के साथ है. अब ज्ञान तो कृष्ण ही देगा, वह ही उसके इस मोह को दूर कर सकता है. नहीं तो दुर्योधन की विजय निश्चित है.’

‘नहीं भाभी. श्रीकृष्ण के होते हुए, दुर्योधन कभी विजयी नहीं हो सकता. सूर्य के सम्मुख अंधकार कभी ठहर नहीं सकता.’ विदुर ने कहा- ‘यह तो आरम्भिक सूचना है. उसके पश्चात् युद्ध तो हो ही रहा है न, और अर्जुन युद्ध कर भी रहा है. अर्जुन शिखंडी को अपने बाणों का कवच न देता तो पितामह शर-शैया पर कैसे लेट जाते.’

‘हां. देवर ठीक कह रहे हैं. युद्ध तो हो ही रहा है और अर्जुन उसमें भाग भी ले रहा है. ये सूचनाएं तो युद्ध आरम्भ होने से पहले की हैं.’ कुंती जैसे स्वयं अपने-आप को समझा रही थीं.

‘लगता है, तुमने विचार कर लिया है.’ कृष्ण मुस्करा रहे थे.

‘हां, मैंने विचार किया है.’ अर्जुन बोला- ‘कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट होता है; और धर्म के नष्ट होने से कुल को अधर्म ग्रस लेता है.’

‘बहुत कुछ सोच लिया तुमने.’ कृष्ण तनिक भी विचलित नहीं थे, ‘किंतु एक बार पुनः सोचो.’

‘क्या?’

‘तुम दुर्योधन को मारोगे तो कुलधर्म नष्ट होगा. किंतु दुर्योधन धर्मराज अथवा अभिमन्यु का वध करेगा तो कुलधर्म नष्ट नहीं होगा?’

‘मैंने यह तो नहीं कहा.’ अर्जुन तड़प कर बोला- ‘मैंने कहा कि वह लोभ-दंशित है; उसे भी विवेक से काम लेना चाहिए.’

‘अच्छा, तुमने यह नहीं कहा.’ कृष्ण बोले- ‘तुमने कहा कि कुल के नष्ट होने से कुल-धर्म नष्ट होता है. जब कुल ही नहीं बचा तो कुल-धर्म का अस्तित्व ही कहां होगा?’ कृष्ण बोले- ‘कहा या नहीं कहा?’

‘कहा’

‘सोचना यह है कि धर्म नाश से कुल नष्ट होता है या कुल के नाश से धर्म नष्ट होता है? समाज के पापों से धर्म भ्रष्ट
होता है या धर्म के दोषों से समाज भ्रष्ट होता है?’

‘क्या?’

‘कौरवों ने स्वयं को तुमसे पृथक् मान कर, अपने कुल को दो फाड़ किया. भीम को विष दिया. तुम पांचों भाइयों को तुम्हारी माता के साथ वारणावत में जलाया, अधर्मपूर्वक तुम्हारा राज्य छीना, उससे कुल नष्ट होने को है अथवा कुल नष्ट हो चुका, इसलिए धर्म नष्ट होने को है?’

अर्जुन की आंखों के सामने वे सारे दृश्य घूम गये किंतु वह चकित था कि उसके मन में प्रतिशोध का भाव नहीं जागा.

‘मैंने कभी नहीं सोचा कि हम भी दुर्योधन या दुःशासन को विष दे दें या महाराज धृतराष्ट्र अथवा महारानी गांधारी को वारणावत जैसी अग्नि में जला दें. क्योंकि मैं जानता हूं कि कुल के नाश से धर्म नष्ट होता है.’

‘तुम्हारा मन ही भ्रमित नहीं है, तुम्हारा ज्ञान भी भ्रमित है. आज सारा कौरव वंश नाश के कगार पर खड़ा है. नष्ट नहीं हुआ है. क्यों?’ कृष्ण ने पूछा- ‘पहले उनका धर्म नष्ट हुआ है या वंश?’

अर्जुन मौन बैठा रहा.

कृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा- ‘कुल अभी नष्ट नहीं हुआ है. किंतु धर्म का नाश तो हो चुका है. पहले दुर्योधन नष्ट नहीं हुआ. पहले उसका धर्म नष्ट हुआ. बुद्धि भ्रष्ट हुई है. एक बात जानते हो?’

‘क्या?’

‘वायुमंडल में कोई स्थान कभी वायु-शून्य नहीं रहता. यदि किसी स्थान से वायु उष्ण होकर ऊपर उठ जाती है तो दूसरे स्थान की शीतल वायु आकर उस रिक्त स्थान को भर देती है.’

‘जानता हूं.’

‘धर्म के साथ भी ऐसा ही होता है. धर्म नष्ट होता है तो उसके रिक्त स्थान को अधर्म आकर भर देता है.’ कृष्ण बोले- ‘यदि अधर्म का नाश कर दिया जाये तो धर्म स्वतः आकर स्वयं को स्थापित करता है.’

‘जानता हूं.’

‘किंतु यह नहीं जानते कि दुर्योधन का धर्म नष्ट हो चुका है, इसलिए उसे अधर्म ने ग्रस लिया है. और अब उसका वही अधर्म उसकी मृत्यु बनेगा.’

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‘तो कृष्ण ने दुर्योधन की मृत्यु की घोषणा कर दी है?’ धृतराष्ट्र तड़प कर बोला और उठ कर व्याकुल-सा टहलने लगा.

‘कृष्ण ने नहीं, दुर्योधन के अधर्म ने उसकी मृत्यु की घोषणा की है.’ संजय ने धृतराष्ट्र की तड़प को अनदेखा कर, बलपूर्वक कहा.

उसके मन में अनेक कठोर शब्द थे. किंतु उन्होंने कहा नहीं. जानते थे कि यह अधर्मी, हठी, अहंकारी बूढ़ा किसी भी प्रकार अपनी भूल को स्वीकार नहीं करेगा. वह कभी नहीं मानागा कि यदि उसके मन में सत्ता का पापयुक्त मोह नहीं होता, यदि उसने अपने पुत्रों को पाप के मार्ग पर बढ़ने से रोका होता, तो न इस युद्ध की स्थिति  आती और न उसके पुत्रों के मरने की सम्भावना उत्पन्न होती.

‘अधर्म की यह घोषणा तुमने सुनी है या कृष्ण ने? अधर्म आया था क्या कृष्ण से यह सब कहने; या कृष्ण अधर्म के घर गया था?’ धृतराष्ट्र संजय की ओर मुख कर कड़क कर बोला- ‘तुम यमराज के घर से होकर आये हो, या कृष्ण उनका आतिथ्य ग्रहण कर के आया है? मैंने तो नहीं सुनी मृत्यु की यह घोषणा. वैसे यह घोषणा कब हुई थी? पृथ्वी पर हुई, या गगन-मंडल में हुई? कुरुक्षेत्र में हुई थी, द्वारका में हुई थी अथवा हस्तिनापुर में?’

‘जिस दिन आपने युधिष्ठिर को युवराज पद से हटाकर वारणावत भेजा था, उस दिन हुई यह घोषणा तीनों लोकों ने सुनी थी.’ संजय ने निर्भय होकर, स्थिर स्वर में कहा- ‘आपने तब ही सुन ही ली होती, तो अधर्म मरता, दुर्योधन नहीं. किंतु आप मोह और लोभ के मारे बधिर बने बैठे रहे.’

धृतराष्ट्र को लगा कि संजय के स्वर में जैसे महाकाल की ध्वनि सम्मिलित हो गयी थी.

दासियों की हलचल से आभास हुआ कि गांधारी इधर आ रही थी.

धृतराष्ट्र ने मौन साध लिया… ‘यह बुढ़िया जाने क्यों टिक कर अपने कक्ष में नहीं बैठ सकती. जब देखो, यहां-वहां डोलती फिरती है…’ वह सोच रहा था.

‘आपकी धर्म-चर्चा समाप्त हुई या नहीं?’

संजय ने कोई उत्तर नहीं दिया. वे जानते थे कि उनका उत्तर कुछ भी हो, गांधारी उनसे रुष्ट ही होगी. वैसे भी प्रश्न उनसे नहीं पूछा गया था. वे अनावश्यक हस्तक्षेप क्यों करें? उनके प्रति गांधारी कभी भी सदाशय नहीं रही. उसके मन में जो कुछ घुमड़ रहा था, उसे वह कह नहीं पा रही थी. संजय स्वयं ही उठकर यहां से चले जाएं तो गांधारी को उसका मनोवांछित मिल जायेगा.

‘धर्म-चर्चा संक्षेप में कभी हुई है कि आज होगी.’ धृतराष्ट्र ने कुछ हल्के ढंग से कहा- ‘अभी तो मैं ही बैठा हूं, यदि कहीं मेरे स्थान पर पितामह भीष्म होते तो धर्म-चर्चा प्रलय तक चलती.’

गांधारी न हंसी न मुस्कायी. उसका चेहरा कुछ और विकृत हो गया- ‘धर्म की चर्चा हो तो संक्षेप में हो जाती है. किंतु अधर्म की चर्चा हो तो रुकने पर ही नहीं आती.’ उसने अपनी दासियों को सम्बोधित किया- ‘चलो मुझे वाटिका में ले चलो.’

गांधारी चली गयी तो धृतराष्ट्र के कंठ से स्वर फूटा.

‘यह मेरी चौकसी करने के लिए, मेरे आस-पास चक्कर काट रही है. पता नहीं क्या सुनना चाहती है. या इसको संदेह है कि मैं तुम्हारे सामने इसकी निंदा तो नहीं कर रहा. यह नहीं सोचती कि निंदा करने और सुनने के लिए इसकी पुत्रवधुएं ही पर्याप्त हैं.’ वह रुका- ‘चलो छोड़ो इसको. जिस दिन उनका पैंतरा चल गया, इसको तो इसकी बहुएं ही सीधा कर देंगी. बड़ी महारानी बनी फिरती है बुढ़िया. …हां, तो अर्जुन ने क्या कहा?’

अर्जुन असमंजस में था. उसके पास श्रीकृष्ण के प्रश्नों के उत्तर नहीं थे. वह श्रीकृष्ण से कभी भी तर्क में जीत नहीं पाया था तो आज ही क्या कर लेता, जबकि उसका अपना मन इतना घबराया हुआ था. उसका मन कुछ सोचने-समझने के योग्य रह ही नहीं गया था. …किंतु यदि आज तर्क नहीं कर सका तो उसे युद्ध करना होगा और उसके कुल का नाश होगा. …या तो तर्क ही कर ले या फिर युद्ध ही कर ले.

क्या करे वह? …श्रीकृष्ण को रथ में छोड़कर वह उतर जाए और जो भी दिशा सामने पड़े, उसकी ओर चल पड़े. …किंतु ऐसी स्थिति में भी उसे यह चेतना थी कि युद्ध की घोषणा हो चुकी है. शस्त्रास्त्र चल रहे हैं. वह जिस भी दिशा में जायेगा, सैकड़ों बाण उसका पीछा करेंगे. …तो क्या हो जायेगा? उसकी मृत्यु ही तो हो जायेगी. उसे तो वैसे भी अब जीने की कोई इच्छा नहीं थी…

अर्जुन ने कहा- ‘चाहे किसी भी कारण से हो, किंतु अधर्म की व्याप्ति से हे कृष्ण! कुलस्त्रियों की प्रवृत्ति दूषण की ओर अग्रसर हो जाती है…’

अर्जुन की आंखों के सामने नये से नये दृश्य उभर रहे थे और वे एक से बढ़कर एक, भयानक थे… अपरिचित पुरुषों की सशस्त्र भीड़ हस्तिनापुर के राजमहलों में घुसती चली जा रही थी. उनको रोकने वाला वहां कोई नहीं था. परिवार में कोई योद्धा बचा ही नहीं था… अर्जुन ने दुर्योधन और उसके भाइयों को मार दिया था. वहां महल की सुरक्षा के लिए नियत सैनिक भी नहीं थे. कैसे रहते? जब उनके स्वामी ही मारे गये तो वे कैसे टिक पाते. किसके भरोसे टिकते… और ऐसी स्थिति में तो वे सैनिक भी दस्यु हो जाते हैं. वे आततायी पुरुष अंतःपुर में भी प्रवेश कर रहे थे. उन्होंने धृतराष्ट्र के प्रासाद को आग लगा दी थी. चारों ओर प्रचंड अग्नि थी और स्त्रियों और बच्चों का चीत्कार था. एक पुरुष तो एक छटपटाती स्त्राr को बलात अपने कंधे पर उठाये राक्षसी हंसी हंसता हुआ, भागा जा रहा था… अर्जुन ने अपने कुल की स्त्रियों का सामूहिक चीत्कार और उन पुरुषों का अट्टहास सुना… अर्जुन को लगा वहां असंख्य पांचालियां थीं और वे सब दुःशासनों के हाथों में विवश तड़प रही थीं… उन्हें बचाना होगा… वनवास के समय धर्मराज ने अर्जुन को गंधर्वों के अधिकार में पड़ गयी कुरु स्त्रियों को बचाने का आदेश दिया था. गंधर्व उनके मित्र थे तो क्या. उन्हें कुरुवंश की स्त्रियों का अपमान करने की अनुमति नहीं दी जा सकती थी. अर्जुन ने दुर्योधन जैसे शत्रु को मुक्त कराया था गंधर्वों से. वह तो छोटा-सा युद्ध था. अब इस विराट युद्ध के पश्चात कुरु स्त्रियों की रक्षा कौन करेगा?…

‘स्त्रियां प्रतिरोध न करें तो पुरुष तो अधर्मपूर्वक दूषण को तत्पर रहता ही है. स्त्रियों की इच्छा न भी हो तो भी अधर्मी पुरुष उसे अपने भोग के लिए बाध्य करता है. अत्याचार करता है. इससे हे वार्ष्णेय! परिणामस्वरूप दुष्ट पिताओं की दूषित संतानें उत्पन्न होती हैं… माताओं की अच्छा के विरुद्ध. उनके संस्कारों की विरोधी.’

‘कुछ विचार कर बोलो अर्जुन!’ श्रीकृष्ण जैसे कोई उत्सव मना रहे थे- ‘तुम कह रहे हो अधर्म की व्याप्ति से कुलस्त्रियां दूषित हो जाती हैं.’

‘नहीं होतीं क्या?’

‘अधर्म की व्याप्ति से केवल स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी दूषित हो जाते हैं. अधर्म व्याप्त होता है तो स्त्राr और पुरुष का भेद नहीं करता. पहले पुरुष को अधर्म ग्रसता है और तब पुरुष स्त्राr के साथ अत्याचार करता है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘सोचने की बात यह है कि अधर्म व्याप्त ही कब होता है?’

‘सत्य है कि अधर्म स्त्राr और पुरुष का भेद नहीं करता; किंतु महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि उससे कुल का नाश होता है.’

अर्जुन अपने निष्कर्ष पर पहुंच चुका था, वह संवाद अथवा विवाद की मानसिकता में नहीं था.

‘कुलक्षय?’ श्रीकृष्ण अब भी मुस्करा रहे थे- ‘विचार ही करना है तो विचार करो कि कुलक्षय किसके दोष से होता है. दुःस्वप्न मत देखो. कुलक्षय तुम्हारी इच्छा से तो नहीं होता.’

‘किसी की इच्छा से होता हो. मैं तो इतना ही जानता हूं कि कुलक्षय से कुलधर्म का नाश होता है; और कुलधर्म के नाश से कुल को अधर्म ग्रस लेता है.’

‘विपरीत दिशा से सोच रहे हो.’ श्रीकृष्ण अब भी प्रसन्न मुख दिखाई दे रहे थे- ‘कुल का नाश होने से, अधर्म कुल को नहीं ग्रसता.’

‘तो?’

‘जब कोई व्यक्ति या कुल, धर्म का त्याग करता है, तो अधर्म उसे ग्रस लेता है.’ श्रीकृष्ण ने कहा- ‘पृथ्वी के घूमने के कारण उसके जो क्षेत्र सूर्य के प्रकाश से वंचित हो जाते हैं, वहां अपने आप अंधकार आ जाता है. जैसे प्रकाश का नाश नहीं होता, वैसे ही धर्म का नाश नहीं होता. मनुष्य ही उसे त्याग देता है, उससे विमुख हो जाता है. अतः वह स्वयं अधर्म को आमंत्रित करता है, उसके लिए अपने जीवन में स्थान बनाता है. और जब अधर्म कुल को ग्रस लेता है, तब कुल का नाश होता है.’

‘यह कैसी बात कह रहे हैं आप कृष्ण?’ अर्जुन अकबकाया-सा बैठा था.

‘उन्हें देखो, जो तुम्हारे सामने खड़े हैं.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘उन्होंने धर्म का त्याग किया है. अतः उन्हें अधर्म ने ग्रस लिया है, इसलिए उनके कुल का नाश अवश्यम्भावी हो गया है. इसमें तुम्हारी इच्छा-अनिच्छा क्या करेगी. तुम लड़ो या न लड़ो, इनका नाश तो होना ही है. अधर्म किसी की रक्षा नहीं करता. वह तो विनाश का अग्रदूत है. रोकना हो तो युद्ध को नहीं, अधर्म को रोको.’

‘किसी की इच्छा से हो. युद्ध में पति मारे जाएंगे, पत्नियों को तो जीवित रहना होगा.’ अर्जुन अपना ही राग अलापे जा रहा था- ‘अन्य पुरुषों, अश्रेष्ठ पुरुषों, पतित पुरुषों का उन कुल-स्त्रियों से सम्बंध होगा… इच्छा से हो, अनिच्छा से हो. स्त्रियां दूषित होंगी. दूषित स्त्राr-पुरुषों से कैसी संतानें उत्पन्न होंगी? मिश्रित और अश्रेष्ठ स्वभाव वाली, संस्कारों से हीन वर्णसंकर संतानें. सारी श्रेष्ठ परम्पराएं नष्ट हो जाएंगी…’

‘सामने शत्रु-सेना सज्जित है और तुम युद्ध-शास्त्र की चर्चा न कर, समाजशास्त्राrय चिंतन कर रहे हो.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘ऐसे ही घातक और नपुंसक चिंतन के कारण लोग युद्ध से भयभीत हो जाते हैं. युद्ध को टालते हैं. युद्ध से बचने का प्रयत्न करते हैं; और शत्रु का साहस बढ़ाते हैं. कंस से उग्रसेन नहीं लड़े, इसीलिए तो कारागार में बंद हुए. मेरे पिता वसुदेव आरम्भ में ही कंस से नहीं भिड़े; अतः उन्होंने अपने छह पुत्रों को कटते हुए देखा…’

‘तो दोष मातुल वसुदेव का था?’

‘दोष अधर्म से न लड़ने वालों का है.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘जो देश, राष्ट्र और समाज अधर्मियों से लड़ने और मरने से घबराते हैं; उनसे समझौते करते हैं, वे ही अपमानजनक और पतित जीवन व्यतीत करते हैं. दास बनकर जी लेते हैं; किंतु अपने सम्मान के लिए लड़ कर मर नहीं सकते. वस्तुतः तुम युद्ध से बचने के बहाने ढूंढ़ रहे हो.’ श्रीकृष्ण मुस्कराए- ‘जानते हो क्यों?’

‘क्यों?’

l l l

संजय मन ही मन मुस्कराए.

‘संजय क्या बात है? चुप क्यों हो गये?’

‘मुझे स्मरण हो आया महाराज कि ऐसी बीहड़ स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक कथा सुना डाली.’

‘कैसी कथा?’

‘उन्होंने बताया कि एक राजा जब न्याय करने बैठता था तो बहुत कठोर होता था. हत्या का कोई अपराधी सामने आते ही वह निस्संकोच उसे मृत्युदंड दे देता था.’

‘ठीक ही तो करता था.’ धृतराष्ट्र ने कहा.

‘हां, करता तो वह ठीक ही था; किंतु एक दिन एक हत्या की घटना उसके सामने लायी गयी और हत्यारे के रूप में उसका अपना पुत्र उसके सामने खड़ा था. अकस्मात ही राजा के मस्तिष्क में पुत्र-प्रेम की ज्वाला जल उठी. वह उसके प्रकाश में नहीं, उसके ताप में सोचने लगा. उसका विवेक नहीं, मोह जागा. वह बहुत संवेदनशील और मानवीय हो उठा. कहने लगा कि हत्या कर राजकुमार ने तो मूर्खता की ही है. किसी पागलपन में की होगी हत्या. किंतु हम तो मूर्ख अथवा पागल नहीं हैं न. हमें क्या अधिकार है कि हम एक जीवित मनुष्य के प्राण ले लें. जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो हमें किसी के प्राण लेने का क्या अधिकार है. हमें तो कुछ समझदारी से काम करना चाहिए.’ संजय ने रुककर धृतराष्ट्र की ओर देखा- ‘देखा आपने, मोह ने उसे समझदार बना दिया था. श्रीकृष्ण भी अर्जुन से यही कहना चाहते थे कि वह धर्म-बुद्धि से नहीं, मोह-बुद्धि से युद्ध का विरोध कर रहा है.

‘तो अर्जुन मान गया क्या?’

‘नहीं. कहां माना वह. बोला, आप नहीं जानते कि कुलघातियों को नरक की प्राप्ति होती है.’

अर्जुन जैसे किसी शुक के समान कंठस्थ पाठ दोहरा रहा था. श्रीकृष्ण की  बात वह सुन ही नहीं रहा था- ‘नरक की यातनाएं कितनी भयंकर होती हैं.’

‘होती होंगी’; श्रीकृष्ण बोले- ‘किंतु धर्म-युद्ध से भागने वाले क्षत्रियों को भी स्वर्ग नहीं मिलता. उन्हें धरती पर ही नरक की ज्वाला में जलना पड़ता है.’

‘वर्णसंकरों की वृद्धि से सारी परम्पराएं नष्ट हो जाती हैं.’ अर्जुन बोला- ‘पितरों को पिंड और जल देने की क्रिया भी लुप्त हो जाती है. वे उस लोक में भी अन्न-जल को तरस जाते हैं.’

‘दुष्ट-दलन न करने से, पितरों को छोड़ो, जीवित प्रजा को भी अन्न और जल नहीं मिलता.’ श्रीकृष्ण ने तीखे स्वर में कहा- ‘पुरानी परम्पराएं नष्ट होंगी तो नयी परम्पराओं का उद्भव होगा. सृष्टि तो अपने मार्ग पर चलती ही रहेगी. धर्म स्वयं को पुनः स्थापित करेगा.’

‘कृष्ण! ऐसे पितरों का भी पतन हो जाता है.’ अर्जुन का स्वर रुदन के बहुत निकट हो चला था.

‘पतन अपने कर्मों से होता है धनंजय.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘सत्य से आंखें मत चुराओ.’

‘मुझे तो शाश्वत धर्म भी नष्ट होता दिखाई पड़ रहा है.’ अर्जुन बोला- ‘कृष्ण, धर्म की रक्षा करो.’

‘धर्म कभी नष्ट नहीं होता. उसका त्याग करने वाले नष्ट हो जाते हैं.’ श्रीकृष्ण बोले- ‘और सुनो, उस शाश्वत धर्म की स्थापना के लिए अधर्मियों का वध करना पड़ता है. पापियों का रक्त पीकर धरती पवित्र होती है.’

श्रीकृष्ण की तर्जनी कौरवों की सेना की ओर उठी हुई थी.

‘जनार्दन! मैंने परम्परा से सुना है कि कुलधर्म का नाश करने वाले लोगों का अनंत काल तक नरक में वास होता है.’

श्रीकृष्ण देख रहे थे कि मोह के कारण अर्जुन की बुद्धि जड़ हो गयी थी. वह कोई भी तर्क न सुन रहा था, न स्वीकार कर पा रहा था. उसके मोह का नाश आवश्यक था, अन्यथा वह द्वंद्व में फंसा, कुतर्क ही करता रहेगा. रोग मस्तिष्क में था तो मस्तिष्क का ही उपचार
करना होगा. उसे जीवन और मृत्यु का वास्तविक रूप समझाना होगा. जीवन क्या है, मृत्यु क्या है; कौन जीता है, कौन मरता है.

‘हाय! हम लोग राज्यसुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने जैसा बड़ा पाप करने के लिए यहां उद्यत हुए हैं.’ अर्जुन जैसे विलाप कर रहा था.

‘तुम स्वजनों को मारने के लिए नहीं, अधर्म से लड़ने के लिए धर्मक्षेत्र में खड़े हो. आत्मरक्षा के लिए खड़े हो. यदि तुम शस्त्र नहीं उठाओगे, तो वे अपने शस्त्राsं से तुम्हारी हत्या कर देंगे.’ श्रीकृष्ण के स्वर में एक अलौकिक बोध था.

‘यदि मुझ निहत्थे और अप्रतिरोधी को धृतराष्ट्र-पुत्र अपने शस्त्राsं से मार डालें तो भी मेरा कल्याण ही होगा. इस पाप से तो बच जाऊंगा मैं.’

श्रीकृष्ण पुनः हंसे, ‘तुम उनसे नहीं भी लड़ोगे तो वे तुम्हें ही नहीं, तुम्हारे भाइयों, तुम्हारे पुत्रों और सम्बंधियों को मार डालेंगे. तुम्हारे वंश की स्त्रियां तब भी सुरक्षित नहीं रहेंगी. द्रौपदी के साथ हुए दुर्व्यवहार को कैसे भूल गये तुम? तुम उस पाप को दुहराए-तिहराए जाने का अवसर देना चाहते हो?’

अर्जुन ने जैसे कुछ नहीं सुना. वह अपना धनुष-बाण छोड़कर उदास मन से युद्धक्षेत्र में खड़े अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया.

(क्रमशः)

(यह उपन्यास वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है.)

अप्रैल 2016

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धारावाहिक उपन्यास – 2

गीता एक धर्म-ग्रंथ है और जीवन-ग्रंथ भी. जीवन के न जाने कितने रहस्यों की परतें खोलने वाला ग्रंथ बताया गया है इसे. पर गीता का कथ्य किसी उपन्यास का कथ्य भी बन सकता है, यह कल्पना ही चौंकाती है. वरिष्ठ-चर्चित रचनाकार नरेंद्र कोहली ने इस कल्पना को साकार कर दिखाया है. वे इसे ‘शुद्ध उपन्यास’ मानते हैं, पर गीता के दर्शन को समझने-समझाने का यह सराहनीय प्रयास है.

संजय की आंखों के सामने वह दृश्य घूम गया. दुर्योधन आचार्य द्रोण के निकट गया और बोला, ‘आचार्य, पांडवों की इस विशाल सेना को देखिए. और देखिए, आपके शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने कैसा व्यूह रचा है. न सिखाया होता आपने तो आज ये इस प्रकार हमारे सामने व्यूहबद्ध खड़े होते? क्यों सिखा दिया आपने उसे यह सब?’

धृतराष्ट्र का मन फिर से अटपटा गया, ‘अरे जब महासेनापति पितामह थे तो यह मूर्ख दुर्योधन, द्रोणाचार्य के पास क्या करने गया. जाना ही था तो पितामह के पास जाता. नहीं तो राजा के समान अपने स्थान पर बैठा रहता. महासेनापति स्वयं युद्ध आरम्भ करने के लिए आदेश लेने उसके पास आते. और यह धृष्टद्युम्न द्रोण का शिष्य कब से हो गया?’

‘मैं भी नहीं जानता महाराज.’ संजय ने कहा- ‘द्रोण अपने आश्रम में तपस्या कर रहे थे, वे अपने आश्रम में किसी को कुछ सिखाते नहीं थे. तब तक द्रुपद का कोई पुत्र भी नहीं था. जब अपनी दरिद्रता से पीड़ित होकर द्रुपद के पास कांपिल्य आये, तो वहीं झगड़ा कर, स्वयं को अपमानित मान, वे हस्तिनापुर आ गये, पितामह के पास.’

‘तो फिर धृष्टद्युम्न, द्रोण का शिष्य कैसे हुआ? या दुर्योधन की मति भ्रष्ट हो गयी है? घबरा गया है युद्ध से?’

‘मैं ऐसा तो नहीं कह सकता महाराज. न राजा दुर्योधन को देखकर ऐसा लगा; किंतु एक किंवदंती है कि द्रोणाचार्य के वध के लिए धृष्टद्युम्न, ऋषियों के मंत्रों से, रथ और शस्त्राsं के साथ हवनकुंड से उत्पन्न हुआ था. तब द्रुपद ने उसे शस्त्र-विद्या सीखने के लिए द्रोणाचार्य के पास भेज दिया था; और द्रोण ने भी अपना भवितव्य मान, उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और शस्त्र विद्या सिखायी.’

‘पागल है द्रोण कि अपने वध के लिए उत्पन्न हुए शस्त्रधारी युवक को शस्त्रविद्या देगा.’ धृतराष्ट्र जैसे आपे में नहीं था, ‘जो द्रोणाचार्य बिना सिखाये, एकलव्य का अंगूठा ले सकता है, वह अपने वध के लिए जन्मे धृष्टद्युम्न को, अपने घोर शत्रु द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न को, शस्त्रविद्या सिखायेगा.’ वह रुका, ‘चलो छोड़ो. किंवदंती है, तो किंवदंती सही. वैसे भी उस सारे काल में द्रोणाचार्य हस्तिनापुर में थे. मैंने तो कभी नहीं जाना कि कब धृष्टद्युम्न हस्तिनापुर आया और कब द्रोण के आश्रम में रहा. ऐसा कुछ हुआ होता तो पितामह उसे हस्तिनापुर में एक क्षण भी टिकने न देते. तुम बताओ, क्या कहा दुर्योधन ने?’

‘राजा दुर्योधन ने कहा- वहां बड़े-बड़े धनुषों के साथ भीम और अर्जुन के समान शूर खड़े हैं. सत्यक का पुत्र सात्यकी युयुधान, तथा महारथी द्रुपद और विराट अपने रथों में युद्ध के लिए सन्नद्ध खड़े हैं.’

‘द्रोण को दिखाई नहीं दे रहा था वह सब कि दुर्योधन उसे बताने गया.’ धृतराष्ट्र की खीज पराकाष्ठा पर थी.

‘मैंने ऐसा कुछ राजा दुर्योधन से पूछा नहीं था.’ संजय का स्वर भी कुछ कसैला हो आया था. यह बुड्ढा जाने क्यों उलटे-सीधे प्रश्न करता है.

‘यादवों में से कृष्ण के अतिरिक्त और कौन आया है पांडवों की ओर से लड़ने?’

‘यादवों में से…’ संजय जैसे इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे, ‘कृतवर्मा है; किंतु वह तो दुर्योधन की सेना में है. श्रीकृष्ण की गोप सेना को राजा दुर्योधन पहले ही मांग लाये थे…’

‘मैं पूछ रहा हूं कि पांडवों की ओर से युद्ध करने कौन-कौन से यादव वीर आये हैं?’

संजय को आशंका हुई, कहीं धृतराष्ट्र उनका मुंह ही न नोच ले.

‘वही सोच रहा हूं.’ संजय ने धैर्यपूर्वक कहा- ‘वैसे पहले अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा ही था कि श्रीकृष्ण के परिजन उनको त्याग गये हैं.’

संजय देख रहे थे कि धृतराष्ट्र चाहे हस्तिनापुर में अपने प्रासाद में बैठा था; किंतु उसका मन तो युद्धक्षेत्र में ही था. जाने क्यों अभी तक उसने युद्ध क्षेत्र में जाने की इच्छा प्रकट नहीं की थी… शायद इसलिए कि उसमें जिज्ञासा, उत्सुकता, व्यग्रता और व्याकुलता तो बहुत थी; किंतु अपनी कामना के विरुद्ध तथ्यों को स्वीकार करने का साहस नहीं था.

‘तो बताओ.’

‘दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के सम्मुख जिन लोगों के नाम गिनाये, उनमें तो और कोई यादव नहीं था… हां एक युयुधान सात्यकी था.’ संजय ने धीरे-धीरे सहज भाव से कहा- ‘जाने क्यों?’

‘बलराम नहीं था वहां?’ धृतराष्ट्र जैसे झपट ही पड़ा.

‘नहीं. बलराम नहीं थे. वस्तुतः कृष्ण का कोई भी भाई और कोई भी पुत्र वहां नहीं था.’

‘उन सबको सुरक्षित द्वारका छोड़ आया और मेरे पुत्रों को मरवाने यहां आ गया यह कृष्ण.’ धृतराष्ट्र का क्रोध उसके सारे चेहरे पर बिखर गया था.

‘मुझे ऐसा नहीं लगता.’ संजय ने कहा- ‘मैंने सुना है कि बलराम ही इस युद्ध में पांडवों का पक्ष लेने के लिए प्रस्तुत नहीं थे. उन्होंने श्रीकृष्ण से असहयोग किया ताकि पांडवों का पक्ष दुर्बल पड़ जाए; और दुर्योधन को जय की प्राप्ति हो. इसलिए वे तीर्थयात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र और द्वारका दोनों से ही दूर चले गये.’

‘तुम कहना चाह रहे हो कि बलराम अपनी अनुपस्थिति से दुर्योधन की सहायता कर रहा है?’

‘मेरे मन में तो यह भी आता है कि युद्ध में श्रीकृष्ण के निःशस्त्र रहने का कारण भी बलराम ही हैं. सम्भवतः उन्होंने कहा होगा कि यदि श्रीकृष्ण उनके शिष्य दुर्योधन के विरुद्ध शस्त्र-प्रयोग करेंगे, तो वे भी शस्त्र उठा लेंगे. और यदि वे शस्त्र उठाते तो पांडवों के विरुद्ध अर्थात् श्रीकृष्ण के विरुद्ध उठाते.’

‘क्या प्रमाण है तुम्हारे पास?’

‘प्रमाण तो कोई नहीं है. बस अनुमान मात्र है.’ संजय ने कहा- ‘आपको स्मरण होगा, उप्पलव्यनगर में पांडवों के मित्रों और सहायकों की बैठक हुई थी तो श्रीकृष्ण ने कहा था कि उन लोगों को पांडवों की सहायता करनी चाहिए. और बलराम ने तब भी अपने भाई का विरोध किया था. स्वयं को ‘मध्यस्थ’ कहा था उन्होंने. वे अब भी ‘मध्यस्थ’ ही माने जाएंगे. किंतु उनका हृदय तो राजा दुर्योधन के पक्ष में ही है.’

‘हो सकता है; पर उससे क्या होता है. बलराम दुर्योधन के पक्ष से लड़ने के लिए तो नहीं आया न.’ धृतराष्ट्र ने कुछ उदासीन स्वर में कहा- ‘कृष्ण के अन्य भाई? उसके पुत्र?’

‘उन सबको भी बलराम अपने साथ ले गये.’

‘बलराम की इच्छा से ही तो वे सब कृष्ण को छोड़ नहीं गये होंगे; उनके अपने मन में कृष्ण के प्रति कोई विरोध नहीं था? कोई तो विरक्ति होगी.’

‘यह तो शोध और चिंतन का विषय है महाराज!’ संजय ने धीरे-से कहा- ‘अभी तक तो ऐसी कोई घटना प्रचारित नहीं हुई है. हां उनका एक पुत्र राजा दुर्योधन का जामाता अवश्य है.’

‘यादव कायर नहीं हैं कि युद्ध से भयभीत हो गये हों.’ धृतराष्ट्र अपनी चिंतन प्रक्रिया में उलझा हुआ था, ‘वे कृष्ण के धर्म से तंग आ गये होंगे. संसार में किसको पड़ी है कि अपना भोग-विलास छोड़कर धर्म की स्थापना के लिए सारी सृष्टि में मारा-मारा फिरता रहे, सिवाय कृष्ण के. मैंने कहा न कि ये धर्म के पक्षधर संसार के लिए संकट ही होते हैं.’

‘यादवों में भी परस्पर विरोध की सम्भावना हो सकती है.’ संजय ने कहा- ‘मैंने सुना है कि द्वारका में उग्रसेन और अक्रूर का विरोध थम नहीं रहा है. श्रीकृष्ण उनके झगड़ों से पर्याप्त पीड़ित हैं; किंतु वे उनके वश में नहीं हैं, जबकि श्रीकृष्ण ने अक्रूर को प्रसेनजित की हत्या के लिए भी क्षमा कर दिया था और स्यमंतक मणि भी उसे दे दी थी.’

‘होगा.’ धृतराष्ट्र ने अवज्ञा के भाव से कहा- ‘दुर्योधन ने द्रोणाचार्य को और किन-किन वीरों के नाम बताये? लड़ने कौन-कौन आया है?’ एक छोटे-से विराम के पश्चात् वह पुनःबोला- ‘द्रुपद और विराट तो वृद्ध होने को आये.’

‘तो पितामह और आचार्य कौन-से युवा हैं.’ संजय से कहे बिना रहा नहीं गया. उनका मन जैसे खौल रहा था. यह व्यक्ति इतना एकपक्षीय सोचता है कि उससे किसी प्रकार के संतुलन की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती.

‘ठीक है. तुम यह बताओ कि दुर्योधन ने क्या कहा.’ धृतराष्ट्र जैसे अपने आप से ही कह रहा था, ‘वह मूर्ख भी जाने क्यों पितामह से अधिक महत्त्व आचार्य को देता है. पितामह की क्षमता को जानता नहीं और कर्ण के ही समान उनकी अवज्ञा करता रहता है. कर्ण का ही प्रभाव होगा यह. पछतायेगा एक दिन. मैं कह रहा हूं, वह पछतायेगा एक दिन.’

‘अब क्या पछताना.’ संजय ने कहा, ‘अब तो पितामह शर-शैया पर लेटे हुए हैं.’

‘ठीक है. ठीक है. मुझे बताओ कि दुर्योधन ने क्या कहा.’

‘दुर्योधन ने कहा, धृष्टकेतु, चेकितान, और वीर काशिराज भी हैं. पुरुजित, कुंतिभोज और नरपुंगव शैव्य भी हैं.’ संजय ने बताया.

‘कुंतिभोज वहां था?’ धृतराष्ट्र के स्वर का संशय अत्यंत मुखर था.

‘अपने पुत्रों के साथ वे भी थे.’

‘कुंती के विवाह के पश्चात् आज तक तो कुंतिभोज ने कभी उसकी सुध नहीं ली और अब अंतिम समय में युद्ध करने आ गया. शांति से अपने घर में बैठा रहता बुड्ढा, तो उसका क्या बिगड़ जाता. वहां उसे चैन की मृत्यु तो प्राप्त होती.’

‘शायद वे अब तक के अपने व्यवहार का प्रायश्चित करने ही आये हैं. वैसे भी क्षत्रिय अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े मरना श्रेयस्कर नहीं मानता.’ संजय अनायास ही कह गये, ‘युधामन्यु, वीर उत्तमौजा, अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र सब ही महारथी हैं; और वे सब युद्ध में उपस्थित थे.’

‘अच्छा, अभिमन्यु भी… द्रोपदी के पुत्र भी… ये लोग युद्ध करने योग्य हो गये हैं? कल तक तो वे दूध पीते बच्चे थे.’

‘राजा दुर्योधन ने कल के उन दूध पीते बच्चों को महारथी स्वीकार किया है महाराज!’ उन्होंने द्रोणाचार्य से कहा था- ‘आपके जानने के लिए अपनी सेना के विशिष्ट योद्धाओं का भी मैं वर्णन करता हूं.’

‘द्रोण उन्हें जानते नहीं थे क्या? वे नये-नये कौरवों के पक्ष में आये थे क्या?’ धृतराष्ट्र चिढ़कर बोला- ‘दुर्योधन समझता है कि वे अपने आश्रम में आंखें मूंदे बैठे रहते हैं. संसार में किसी को जानते ही नहीं? द्रोण कितना कुचक्री है, इसे कौन नहीं जानता?’

‘सम्भवतः उन सबके नाम लेकर, उनकी वीरता का बखान कर, राजा उन लोगों को प्रसन्न करना चाहते हों.’ संजय ने कहा- ‘वीर के रूप में अपने नाम की घोषणा सुनकर किसे अच्छा नहीं लगेगा. उससे युद्ध का परिवेश बनेगा. योद्धाओं के मन में उत्साह जागेगा.’

‘सम्भव है, ऐसा ही हो.’ धृतराष्ट्र सहमत हो गया, ‘किन-किन को वीरता का प्रमाणपत्र दिया उसने?’

उन्होंने कहा- ‘आप, भीष्म, कर्ण, युद्धविजेता कृपाचार्य, अश्वत्थामा तथा सोमदत्त का पुत्र सोमदत्ति भूरिश्रवा भी.’

‘तो सबसे पहले द्रोण का ही नाम लिया, ताकि वे प्रसन्न हों.’ धृतराष्ट्र ने कहा, ‘किंतु मूर्ख यह नहीं जानता कि उससे पितामह रुष्ट भी हो सकते थे. …और फिर उसने कर्ण का नाम क्यों लिया? कर्ण तो पितामह के जीवित रहते युद्धक्षेत्र में न आने की प्रतिज्ञा कर चुका था.’

‘हां! पर कर्ण कोई अपने घर में तो बैठा नहीं रहा.’ संजय ने कहा- ‘वह वहीं है, कौरवों के स्कंधावार में. हां! यह सत्य है कि न तो पितामह ने उसे कोई दायित्व सौंपा और न ही उसने पितामह के सक्रिय रहते स्वयं युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की.’

‘दुर्योधन शायद बताना चाहता है कि और कोई उसका साथ छोड़ दे, तो छोड़ दे; किंतु कर्ण उसे नहीं छोड़ेगा.’ धृतराष्ट्र ने कहा और साथ ही उसने जोड़ दिया- ‘किंतु एक कर्ण के भरोसे यह युद्ध तो नहीं जीता जा सकता.’

‘दुर्योधन ने और किसी का नाम नहीं लिया; किंतु इतना अवश्य कहा कि अन्य भी अनेक शूर मेरे लिए प्राण त्यागने के लिए प्रस्तुत हैं. वे सब नाना शस्त्राsं को धारण करने वाले और युद्ध-विशारद हैं.’

‘क्यों वह द्रोण को बताना चाहता है कि वह केवल उनके ही भरोसे युद्ध नहीं कर रहा है; उसके पास और भी प्राण देने को आतुर योद्धा हैं.’

‘मैं कह नहीं सकता कि राजा दुर्योधन के मन में क्या था.’ संजय से शांत भाव से कहा.

‘कैसी है तुम्हारी यह दिव्य दृष्टि, जो यहां से कुरुक्षेत्र तक देख सकती है और दुर्योधन के सम्मुख खड़े होकर उसके मन में नहीं झांक सकती?’

‘महाराज! मेरे पास आपके इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं.’- संजय ने कहा- ‘महर्षि व्यास ने अपने तपोबल से जो मुझे दिया, वह है; उसके अतिरिक्त मेरा अपना कुछ नहीं है. मैं इतना ही जानता हूं कि दिव्य दृष्टि दूर के दृश्यों को देख सकती है; शायद कुछ दूर की ध्वनियों को सुन भी सकती है; किंतु किसी के वक्ष के भीतर उसके मन में क्या है, अथवा उसके मस्तक में सुरक्षित मस्तिष्क में क्या है, यह देखना मेरे लिए सम्भव नहीं है. आपका आदेश हो, तो आगे की बात करूं अथवा घर जाऊं… थोड़ा विश्राम करूं. थक गया हूं.’

‘सुनाओ. इतने भी नहीं थके हो कि जाकर बिस्तर पर पड़ जाओ. युद्ध से एक आध बाण का घाव खा आये होते तो बात और थी.’

‘राजा दुर्योधन ने निष्कर्ष के रूप में आचार्य को आश्वस्त करते हुए कहा- ‘भीष्म द्वारा रक्षित हमारा सैन्यबल सीमारहित है और भीम द्वारा रक्षित पांडवों का सैन्यबल सीमित है. आप सब अपनी-अपनी वाहिनियों के साथ व्यूहों में यथास्थान स्थित रहकर पितामह की रक्षा करें’.’

‘मेरा यह मूर्ख बेटा!’ धृतराष्ट्र ने अपना सिर पीट लिया.

‘क्या हुआ महाराज?’

‘द्रोण को ऐसा उपदेश देने की क्या आवश्यकता थी.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘भीष्म की रक्षा कर द्रोण को क्या मिलना था. उससे तो कहना चाहिए था कि भीष्म के धराशायी होते ही वह आचार्य को प्रधान सेनापति बना देगा. यही तो चाहता होगा द्रोण, कौरवों की सेना का महासेनापति बनना.’

‘वह भी ठीक है महाराज.’ संजय ने कहा- ‘किंतु यह भी सत्य है कि द्रोणाचार्य के परम शत्रु द्रुपद की सेना का नाश भीष्म ही सबसे अधिक उत्साह से करते रहे. भीष्म जब तक सुरक्षित रहे, द्रोण को धृष्टद्युम्न से कोई भय नहीं रहा.’

‘शायद तुम ठीक कह रहे हो. मैं ही कभी-कभी पगला जाता हूं.’

‘आपको अपने पुत्रों की चिंता है, और कोई बात नहीं है.’

‘वह तो है ही.’ धृतराष्ट्र ने अपनी अंधी आंखें संजय की ओर घुमायीं, ‘फिर क्या हुआ?’

‘पितामह ने शायद राजा दुर्योधन की बात सुन ली थी. वे प्रसन्न हो उठे. वे कुरुवृद्ध पितामह भीष्म, जिन्हें इस युद्ध का हर प्रकार से विरोध करना चाहिए था, उन्होंने दुर्योधन के मन में हर्ष जगाने के लिए, युद्ध आरम्भ करने की घोषणा-सी करते हुए, सबसे पहले सिंहनाद की शैली में उच्च स्वर में ‘प्रतापवान’ शंख फूंका.’

‘इस बुड्ढे को जाने लड़ने-मरने की इतनी उतावली क्यों थी. घर में रहकर खाता-पीता, दासियों से सेवा लेता. उनका सुख भोगता.’ धृतराष्ट्र का स्वर अत्यंत रुष्ट था, ‘वानप्रस्थ या संन्यास ले लेता, तो भी शायद हम अधिक सुरक्षित रहते. किंतु वह राज-काज से दूर क्यों जाता. पद किसी से छोड़ा जाता है कि वह छोड़ता. सबसे पहले युद्ध-क्षेत्र में जा कूदा और शंख भी फूंक दिया… फिर?’

‘होना क्या था. पितामह के सिंहनाद से चारों ओर भय व्याप्त हो गया. शंख, भेरी, गोमुख और नगाड़े बज उठे और बजते ही चले गये. उनसे वहां ऐसा भयंकर शोर हुआ कि प्रलय का सा दृश्य उपस्थित हो गया.’

‘पांडवों ने शंख नहीं फूंके?’

‘फूंके. फूंके क्यों नहीं.’ संजय ने कहा.

संजय उनका विस्तार से वर्णन कर धृतराष्ट्र को भयभीत करना नहीं चाहता था. वह अपनी कल्पना में स्पष्ट देख रहा था. सबसे पहले श्वेत अश्वों से युक्त, विराट रथ पर बैठे हुए, श्रीकृष्ण और अर्जुन ने दिव्य शंख फूंके. श्रीकृष्ण ने ‘पांचजन्य’ और अर्जुन ने अपना ‘देवदत्त’ नामक शंख फूंका. विकट कर्म करने वाला, भीम कहां पीछे रहने वाला था. वह तो जाने कब से इस प्रकार शंखों के फूंके जाने की प्रतीक्षा कर रहा था. उस वृकोदर ने अपना ‘पौंड्र’ नामक महाशंख ऐसा फूंका कि कुरुक्षेत्र का कण-कण कांप उठा.

‘तुम मुझे डराने का प्रयत्न मत करना.’ संजय को मौन देखकर धृतराष्ट्र ने अपनी त्यौरियां चढ़ा लीं. ‘मैं किसी से डरता नहीं हूं.’

‘नहीं. मैं वैसा कोई प्रयत्न नहीं कर रहा हूं. मैं तो वही कह रहा हूं, जो मेरी आंखों ने देखा, जो मेरे कानों ने सुना, जो मेरे मन ने अनुभव किया. वैसे आपके भयभीत होने, न होने से कोई अंतर पड़ता है क्या? आपको युद्ध-क्षेत्र में तो जाना नहीं है.’

‘ठीक है; किंतु तुम वही सुनाओ, जो तुमने देखा है, या देख रहे हो.’ धृतराष्ट्र ने कड़वाहट के साथ कहा- ‘वह सब मत कहना, जो तुमने अनुभव किया है, या जो तुम्हारा मन चाहता है. तटस्थ रहकर बात करना. किसी का पक्ष मत लेना.’

‘कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने ‘अनंतविजय’ नाम का शंख फूंका. नकुल और सहदेव ने भी ‘सुघोष’ और ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाये.’

‘जाने इस युधिष्ठिर ने अपने शंख का नाम ‘अनंतविजय’ क्यों रख लिया है.’ धृतराष्ट्र अपने अधरों ही अधरों में बड़बड़ाता जा रहा था- ‘किसी युद्ध में कोई विजय मिले या न मिले, शंख का नाम अवश्य ही अनंतविजय रखेंगे.’

‘क्योंकि राजा युधिष्ठिर धर्मराज हैं. उनके जीवन का आधार सत्य है. और सत्य की सदा ही विजय होती है. उसका कोई अंत नहीं है.’

‘तुमसे पूछा किसी ने?’

‘आपने अभी तो पूछा.’

‘मेरा मन अपने-आप से बातें कर रहा था.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘मैंने तुमसे पूछा नहीं था. चलो तुम बताओ कि और किस-किस ने शंख बजाये.’

‘छोड़िए महाराज. क्या करेंगे, शंखों के नाम सुनकर. उनकी ध्वनि सुनना अलग अनुभव है; नामों में कुछ नहीं रखा…’

और संजय की आंखों के सम्मुख कुरुक्षेत्र का वह दृश्य आ गया, जहां विराट धनुष वाले काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट और अपराजित सात्यकी भी शंख बजा रहे थे. कहना तो वे चाहते थे- ‘हे पृथिवीपते, द्रुपद ने, द्रौपदेयों ने, महाबाहु सौभद्र अभिमन्यु ने- सबने पृथक्-पृथक् शंख बजाये. धरती हिल गयी. कौरवों के सैनिकों के हृदय दरक गये.’

किंतु यह सब कहा नहीं.

धृतराष्ट्र चिंतित था. कुछ देर मौन ही रहा. फिर बोला- ‘संजय, उस भयंकर घोष ने मेरे पुत्रों का हृदय चीर दिया होगा.’

‘महाराज. आपके पुत्रों के विषय में तो मैं कुछ नहीं कह सकता; किंतु पृथ्वी और आकाश को उस उद्घोष और उसकी प्रतिध्वनि ने गुंजायमान कर दिया. वहां सब कुछ नाद के आघात से डोल रहा था, जैसे शंख न बजे हों, भूकम्प आया हो.’

‘पर उससे क्या. यह दुर्योधन कुछ नहीं समझेगा. वह यमराज के पगों की आहट को भी नहीं सुन पा रहा है.’ धृतराष्ट्र ने अपने दांत पीसे.

संजय की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. उन्हें लग रहा था कि अभी धृतराष्ट्र का सारा क्रोध अश्रुओं में परिणत हो जायेगा. तो वे आगे सुनायें या न सुनायें?

‘अर्जुन ने क्या किया? मेरे बेटों को ललकारा?’

‘नहीं. आपके पुत्रों की सैन्य-व्यवस्था देखकर कपिध्वज अर्जुन ने अपना गांडीव संवार कर हाथ में उठाया और प्रहार को उद्यत हुआ. तब तक कुछ अस्त्राsं का आदान-प्रदान हो चुका था.’ संजय ने बताया- ‘और फिर उसने इंद्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण से कहा…’

‘सभी अपनी इंद्रियों के स्वामी होते हैं. कृष्ण में ऐसी क्या विशेषता है कि उसे इंद्रियों का स्वामी-हृषीकेश-कहा जाये.’ धृतराष्ट्र खौंखिया कर बोला, ‘तुम्हारी इंद्रियों का स्वामी क्या तुम्हारा कोई पड़ोसी है. हं… बड़ा आया हृषीकेश.’

‘आपको बुरा लगा शायद.’ संजय ने कहा- ‘किंतु श्रीकृष्ण को इस अर्थ में इंद्रियों का स्वामी नहीं कहा जाता. मैं अपने विषय में तो जानता हूं और निस्संकोच कह भी सकता हूं कि मैं अपनी इंद्रियों को अभी अपने वश में नहीं कर पाया हूं. वे प्रायः मुझ पर शासन करने लगती हैं. मेरे मन को मथ कर प्रायः अपनी उचित-अनुचित इच्छाएं पूरी करवा लेती हैं… आपने सुना होगा, अष्टावक्र ने जनक से कहा था कि संसार तुम्हारे मन में है; और यह मन तुम्हारा नहीं है. हमारी इंद्रियां भी मनमानी करने लगती हैं. श्रीकृष्ण की इंद्रियां उनके साथ अपना मनमाना खिलवाड़ नहीं कर सकतीं. उनका बल श्रीकृष्ण पर नहीं चलता…’

‘अच्छा. अच्छा. यह बखान बंद करो.’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘यह बताओ कि अर्जुन ने क्या कहा.’

(क्रमशः)

(यह उपन्यास वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है.)

मार्च 2016

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शरणम् – नरेंद्र कोहली https://www.navneethindi.com/?p=2267 https://www.navneethindi.com/?p=2267#respond Tue, 20 Sep 2016 08:18:36 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=2267 Read more →

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धारावाहिक उपन्यास – 1

(गीता एक धर्म-ग्रंथ है और जीवन-ग्रंथ भी. जीवन के न जाने कितने रहस्यों की परतें खोलने वाला ग्रंथ बताया गया है इसे. पर गीता का कथ्य किसी उपन्यास का कथ्य भी बन सकता है, यह कल्पना ही चौंकाती है. वरिष्ठ-चर्चित रचनाकार नरेंद्र कोहली ने इस कल्पना को साकार कर दिखाया है. वे इसे ‘शुद्ध उपन्यास’ मानते हैं, पर गीता के दर्शन को समझने-समझाने का यह सराहनीय प्रयास है.)

शरणम् का नेपथ्य

कोई नयी पुस्तक प्रकाशित होती है तो प्रायः लेखक से पूछा ही जाता है कि उसने वह पुस्तक क्यों लिखी. वही विषय क्यों चुना? मैं भी मानता हूं कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता. किंतु सृजन के क्षेत्र में यह मामला इतना स्थूल नहीं होता. इसलिए मुझे तो सोचना पड़ता है कि पुस्तक मैंने लिखी या पुस्तक मुझ से लिखी गयी. विषय मैंने चुना अथवा विषय ने मुझे चुना? मैं रहस्यवादी होने का प्रयत्न नहीं कर रहा हूं किंतु सृजन का क्षेत्र मुझे कुछ ऐसा ही लगता है.

गीता को मैंने पहली बार शायद अपने विद्यालय के दिनों में कुछ न समझते हुए भी पढ़ने का प्रयत्न किया था. कारण? मेरा स्वभाव है कि मैं जानना चाहता हूं कि कोई पुस्तक महत्त्वपूर्ण क्यों मानी जाती है. तो गीता को भी पढ़ने का प्रयत्न किया, समझ में आये या न आये. उसके पश्चात् अनेक विद्वानों की टीकाएं और भाष्य पढ़ने का प्रयत्न किया. किंतु ‘महासमर’ लिखते हुए मन में आया कि मूल गीता को एक बार संस्कृत में भी अवश्य पढ़ना चाहिए. तब डॉ. कृष्णावतार से भेंट हो गयी. उनसे गीता पढ़ी. महासमर लिखा गया.

किंतु इधर मेरे अपने परिवार में यह प्रस्ताव रखा गया कि हम अपने बच्चों के साथ बैठकर गीता पढ़ें. हम सब जानते थे कि बच्चों की समझ में यह विषय नहीं आयेगा और वे सोते भी रह सकते हैं. फिर भी एक दिन में पांच श्लोकों की गति से हमने गीता पढ़ी. पढ़ाने वाला था मैं, जिसे स्वयं न संस्कृत भाषा का ज्ञान है, न गीता के दर्शन और चिंतन का. फिर भी हम पढ़ते रहे. मैंने पहली बार अनुभव किया कि पढ़ने से कोई ग्रंथ उतना समझ में नहीं आता, जितना कि पढ़ाने से आता है. पढ़ाते हुए व्यक्ति समझ जाता है कि उसे क्या समझ में नहीं आ रहा है. फिर श्रोता प्रश्न भी करते हैं. मेरा छोटा पोता जो केवल तेरह वर्षों का है, कुछ अधिक गम्भीर था. वह सुनता भी था और मन में उठे बीहड़ प्रश्न भी पूछता था.

प्रश्न उसके हों अथवा मेरे अपने मन के, वे मेरे मन में गड़ते चले गये. मेरा अनुभव है कि मन में जो प्रश्न उठते हैं, मन निरंतर उनके उत्तर खोजता रहता है. चेतन ढंग से भी और अचेतन ढंग से भी. और वे उत्तर ही मुझसे उपन्यास लिखवा लेते हैं. इस बार भी वही हुआ. वे प्रश्न मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे. अपना उत्तर खोजते रहे. किंतु सबसे बड़ी समस्या थी कि मुझे उपन्यास लिखना था. मैं उपन्यास ही लिख सकता हूं और पाठक उपन्यास को पढ़ता भी है और समझता भी है. मैं जानता था कि यह कार्य सरल नहीं था. गीता में न कथा है, न अधिक पात्र. घटना के नाम पर बस विराट रूप के दर्शन हैं. घटनाएं नहीं हैं, न कथा का प्रवाह है. संवाद हैं, वह भी नहीं, प्रश्नोत्तर हैं, सिद्धांत हैं, चिंतन है, दर्शन है, अध्यात्म है. उसे कथा कैसे बनाया जाए?

किंतु उपन्यासकार का मन हो तो उपन्यास ही बनता है, जैसे मानवी के गर्भ में मानव संतान ही आकार ग्रहण करती है. टुकड़ों-टुकड़ों में उपन्यास बनता रहा. पात्रों के रूप में संजय और धृतराष्ट्र तो थे ही; हस्तिनापुर में उपस्थित कुंती भी आ गयी, विदुर और उनकी पत्नी भी आ गये. गांधारी और उसकी बहुएं भी आ गयीं. द्वारका में बैठे वसुदेव, देवकी, रुक्मिणी और उद्धव भी आ गये. उपन्यासकार जितनी छूट ले सकता है, मैंने ली. किंतु गीता के मूल रूप से छेड़-छाड़ नहीं की. मैं गीता का विद्वान् नहीं हूं, पाठक हूं. उपन्यासकार के रूप में जो मेरी समझ में आया, वह मैंने अपने पाठकों के सामने परोस दिया.

तो इसे धर्म अथवा दर्शन का ग्रंथ न मानें. यह गीता की टीका अथवा उसका भाष्य भी नहीं है. यह एक उपन्यास है, शुद्ध उपन्यास, जो गीता में चर्चित सिद्धांतों को उपन्यास के पाठक के सम्मुख उसके धरातल पर ही प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है.

‘महाराज.’ धृतराष्ट्र अच्छी तरह पहचानता था कि यह गांधारी का स्वर था. यदि एकांत न हो, तो वह उसे इसी प्रकार सम्बोधित करती थी.

‘हुं.’ धृतराष्ट्र ने न सिर उठाया, न उसकी ओर देखने का अभिनय किया. वस्तुतः इस समय गांधारी का आना उसे तनिक भी नहीं सुहाया था. यदि कोई दासी यह संदेश लेकर आयी होती कि महारानी उससे मिलने के लिए आना चाहती हैं तो शायद उसने मना ही कर दिया होता. किंतु अब क्या हो सकता था, बुढ़िया तो स्वयं ही आकर सिर पर सवार हो गयी थी.

‘दुर्योधन अब तो कुरुक्षेत्र चला गया है… पर यहां था, तो ही भानुमती को कहां कुछ कहता था. बहू के आ जाने पर बेटा पराया हो जाता है. आप भी उसे कुछ नहीं कहते. वह जानती है कि उसे रोकने वाला कोई नहीं है. इसलिए सिंहनी बनी घूमती है. आज इसका फैसला हो ही जाना चाहिए. वह इस प्रकार मेरी अवज्ञा नहीं कर सकती. सास हूं उसकी, कोई दासी नहीं.’

धृतराष्ट्र के मन में आया कि पूछे कि गांधारी ने कब अपनी सास की अवज्ञा नहीं की? किंतु इस प्रकार का हस्तक्षेप उसके लिए ही कहीं कोई समस्या न बन जाए…

‘हां हो जाएगा इसका भी फैसला. उसके लिए राजसभा का विशेष अधिवेशन बुलाया जाएगा.’ धृतराष्ट्र ने बुरा-सा मुंह बना कर कहा, ‘कुरुक्षेत्र में हो रहे युद्ध से भी बड़ा युद्ध हो रहा है न तुम्हारे यहां. उससे अधिक महत्त्वपूर्ण. उससे बड़े अधिकार का युद्ध. संसार का भविष्य भी इसी पर टिका है शायद. सास-बहू का युद्ध.’ वह रुका, ‘तुम दोनों अपना-अपना पक्ष चुनकर कुरुक्षेत्र जाकर वहीं अपना निर्णय क्यों नहीं कर लेतीं.’

गांधारी का कलेजा जल उठा. बुढ़ापे ने महाराज की बुद्धि ही भ्रष्ट कर दी है. उसके मन में जैसे गिद्धों का कोई बड़ा झुंड उतर आया था. मन हो रहा था कि धृतराष्ट्र की बोटी-बोटी नोच ले. युवावस्था में यही व्यक्ति उसका ऐसा लोभी प्रेमी था कि उसका संग छोड़ना ही नहीं चाहता था और अब वह अपनी ही पुत्रवधू के विरुद्ध उसका पक्ष लेने को भी तैयार नहीं है. इस परिवार में सब ही डरते हैं उस भानुमती से…

इससे पहले कि गांधारी की जिह्वा प्रातः नींद से जागे कौओं के झुंड के समान कांव-कांव कर उठती, द्वारपाल उपस्थित हो गया, ‘महाराज, दासियां समाचार लायी हैं कि संजय कुरुक्षेत्र से लौट आये हैं.’

धृतराष्ट्र ने चौंक कर अपना चेहरा उसकी ओर घुमाया, ‘इस प्रकार अकस्मात्?’

‘और क्या पहले हरकारा भेजता.’ गांधारी चुप नहीं रह सकी. उसे तो धृतराष्ट्र को डपटना ही था. भानुमती के बहाने न सही, संजय के बहाने ही सही, ‘सूत है आपका. कोई सम्राट नहीं है. उसे तो ऐसे अकस्मात् असूचित, अघोषित ही आना था.’

‘द्वारपाल, तुम जाओ.’ धृतराष्ट्र ने कहा. वह नहीं चाहता था कि द्वारपाल के सामने गांधारी उसे खरी-खोटी सुनाये और द्वारपाल बाहर जाकर अन्य सारे द्वारपालों को अपने महाराज की दीन स्थिति के विषय में सूचना दे.

सहसा उसने अपना चेहरा पीछे की ओर मोड़ा, ‘अरे वे दासियां तुमको सूचना देकर ही चली गयीं क्या? यहां नहीं आयीं? राजा को दी जाने वाली सूचना राजा को दी जानी चाहिए या द्वारपाल को?’

द्वारपाल की ओर से कोई उत्तर नहीं आया. वह सूचना देकर राजा को प्रणाम कर वापस जा चुका था.

‘चला गया क्या?’ धृतराष्ट्र ने जैसे अपने आप से कहा, ‘हवा के घोड़े पर सवार होकर आते हैं. मिनट भर रुकने में इनके प्राण निकलते हैं. अब सेवक भी स्वामियों के समान व्यवहार करने लगे हैं.’

‘सूचना देने आया था; सूचना देकर चला गया. आपका मित्र तो था नहीं कि चौसर बिछाकर बैठ जाता.’ गांधारी ने कुछ और विष उगला, ‘वैसे अब आपको क्या करना है दासियों का. आपके पहले ही एक सौ एक पुत्र हैं.’

‘मैं राजकीय शिष्टाचार की बात कर रहा था और तुम बच्चे पैदा करने तक जा पहुंचीं.’

‘राजकीय शिष्टाचार में दासियां कक्ष के बाहर से ही सूचनाएं देती हैं और वहीं से आदेश लेती हैं. वे राजाओं की गोद में नहीं बैठतीं.’

‘तुम्हारी भाषा बहुत अशिष्ट हो चुकी है. यह महारानियों की भाषा तो नहीं है. ऐसे में राजपरिवार के शिष्टाचार का निर्वाह कैसे होगा.’

धृतराष्ट्र के मन में स्पष्ट था कि यह गांधारी नहीं, उसकी वृद्धावस्था चिड़चिड़ा रही थी. आजकल उसके बोलने की यही शैली थी. तनिक-सा विरोध भी सहन नहीं कर सकती थी. कुछ कहो तो उसका स्वर तत्काल ऊंचा उठ जाता था. जब लड़ने लगती थी तो यह भी भूल जाती थी कि आस-पास कितनी दासियां हैं और कितने सेवक-चाकर हैं. हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र को भी ऐसा धो डालती थी जैसे किसी अति साधारण कर्मचारी को फटकार रही हो. और धृतराष्ट्र का साहस नहीं होता था कि वह उसे कुछ कह सके. जरा-सा टोक दो, तो मर्यादाहीन प्रलाप तो होता ही था, वह आत्महत्या की धमकी तक दे डालती थी. शायद अधैर्य का ही दूसरा नाम वृद्धावस्था है. और अब दासियां… उनसे भी उसे ईर्ष्या होने लगी है. धृतराष्ट्र के पास बैठी अथवा उसके आस-पास मंडराती दासियां उसे अच्छी नहीं लगतीं. उसका वश चले तो वह उन सबको धृतराष्ट्र से कम से कम कोस भर दूर रखे.

उसने गांधारी की दिशा में मुख घुमा कर कहा, ‘ठीक कह रही हो तुम. वह सूत है तो सूत के समान ही व्यवहार करेगा न.’

‘तो आप भानुमती की ताड़ना करेंगे या मैं न्याय मांगने धर्मराज अथवा कृष्ण के पास जाऊं?’ गांधारी ने उसे अपने उसी बिगड़े कंठ से धमकाया. वह पुनः अपने मूल विषय पर लौट आयी थी.

मन हुआ कि चुप रह जाये. इस समय विवाद को बढ़ाने से क्या लाभ; किंतु कहे बिना रहा भी नहीं गया, ‘मैं तो केवल यह सोच रहा था कि आज युद्ध को आरम्भ हुए दस दिन हो चुके हैं. दस दिनों से समाचारों की टोह में संजय कुरुक्षेत्र में डेरा डाले बैठा था. तो आज ऐसा क्या हो गया कि सेनाओं की कोई हलचल हुई नहीं; राजा, मंत्री और सेनापति वहीं बैठे हैं; और यह इस प्रकार औचक ही हस्तिनापुर लौट आया?’

‘यह तो वही बताएगा. पूछ लेना उसी से.’ गांधारी ने कहा, ‘किंतु मेरे प्रश्न का क्या उत्तर है?’

धृतराष्ट्र देख तो नहीं सकता था किंतु अपनी कल्पना में वह देख रहा था कि इस समय गांधारी के चेहरे पर अत्यंत कटु भाव जमे बैठे होंगे, जैसे सैकड़ों बिच्छू डंक फैलाये घूम रहे हों. धृतराष्ट्र ने कभी बिच्छू देखा नहीं था; किंतु उसके मन में उसकी एक भयंकर कल्पना थी. वही कल्पना उसने गांधारी के चेहरे पर चिपका दी थी. जाने क्यों गांधारी को संजय का धृतराष्ट्र के पास आकर बैठना तनिक भी अच्छा नहीं लगता था. ये पत्नियां भी पति को अपनी सम्पति मान लेती हैं. धृतराष्ट्र का जो कुछ था, उस सब पर उसका अधिकार था. इतना अधिकार कि उसके लिए उसे धृतराष्ट्र से कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं थी. धृतराष्ट्र के आस-पास वही रहे, वही बैठे, जो गांधारी को अच्छा लगता हो. सत्य तो यह था कि उसे किसी का भी धृतराष्ट्र के पास बैठना, उसके पास आना, उससे मिलना-जुलना अच्छा नहीं लगता था. कोई दो क्षण बैठ जाए तो तत्काल गांधारी का उपालम्भ चील के समान झपट पड़ता था, ‘हर समय दरबार लगाये बैठना आवश्यक है क्या? दरबारों से सम्राट नहीं होते, सम्राटों से दरबार होते हैं.’ क्या चाहती थी वह? बस वह बैठी अपनी बहुओं की निंदा करती रहे और उसकी दासियां उसे घेरे रहें. उसके आदेश उसकी बहुओं तक पहुंचाती रहें. बहुएं आदेश न मानें तो राजा, गांधारी के सम्मान की रक्षा के लिए बहुओं की डांट-फटकार करे, जैसे वे कहीं की अपराधिन हों. गांधारी को इस बात का अनुमान ही नहीं है कि बहुओं को तनिक-सा भी आभास हो जाए कि सास को सम्राट का सुरक्षा-कवच प्राप्त नहीं है, तो वे गिद्धों और सियारों के समान उसे जीवित ही नोच खायें… शायद वह आजकल की पुत्र-वधुओं के स्वभाव से परिचित नहीं थी.

‘दुर्योधन को भी देखो, न कोई संदेश, न संदेशवाहक; दस दिनों में एक भी संदेशवाहक नहीं भेजा.’ धृतराष्ट्र ने विषय बदला, ‘जैसे हमें अपने पुत्रों की कोई चिंता ही न हो.’

‘आप क्या सोचते हैं,’ गांधारी उखड़े हुए स्वर में बोली, ‘वह युद्ध-क्षेत्र में आपको ही स्मरण करता रहता होगा. महाराज को समाचार पहुंचाना ही उसका एकमात्र काम होगा. और कोई काम नहीं है, उसे. युद्धक्षेत्र में योद्धाओं को संदेश भेजने के लिए ही संदेशवाहक कम पड़ जाते होंगे. अब आपके पास भेजता रहे वह संदेशवाहक. कहां से कहां तक फैला हुआ यह युद्धक्षेत्र. कुछ पता भी है.’

‘ठीक है. ठीक है.’ इस बार धृतराष्ट्र कुछ चिड़चिड़ा गया. मन में तो आया कि कहे, कि वह तो नहीं जानता किंतु गांधारी तो युद्धक्षेत्र का क्षेत्रफल जानती है न. नाप कर जो आयी है. अपनी आंखों की पट्टी खोलकर कुरुक्षेत्र का चक्कर लगा कर आयी है क्या? या प्रतिदिन प्रातः वह वहां टहलने जाती है. बड़ी विदुषी बनी फिरती है. गंधार के ये सारे लोग एक जैसे ही होते हैं. पाखंडी… उसने अपनी चिड़चिड़ाहट को पीकर कहा, ‘अब प्रश्न यह है कि संजय के आने की प्रतीक्षा करूं या किसी को भेजकर उसे तत्काल आने का आदेश दूं?’

‘धैर्य रख सकें तो प्रतीक्षा करें. न रख सकें तो बुला भेजें. इसमें द्वंद्व की क्या बात है?’ गांधारी बोली, ‘किंतु जिसने अपना सारा जीवन द्वंद्व में ही बिताया हो और जो कभी किसी स्पष्ट निर्णय पर पहुंच ही न पाया हो, वह और कर ही क्या सकता है. आप तो शायद यह भी नहीं जानते कि परिवार की स्थिति देखकर, परिवार के मुखिया को इन अनसुलझे द्वंद्वों में उलझा और कर्म-पंगु देखकर ही तो मेरी बहुएं मेरी छाती पर मूंग दल रही हैं.’

‘अच्छा, उनसे कह दूंगा कि सास की छाती छोड़कर कहीं और जाकर मूंग दल लें.’ वह बोला, ‘किंतु वे मूंग दल ही क्यों रही हैं. पकौड़ियां तलेंगी क्या?’

‘मेरी पीड़ा पर मसखरी सूझ रही है आपको?’ गांधारी कुछ उग्र हो उठी, ‘मैं अपनी पर आयी तो…’ वह रुकी, ‘इससे तो अच्छा है कि संजय को बुला लीजिए और दोनों मिलकर शब्दों की जलेबियां तलिए.’

गांधारी जानती थी कि धैर्य धृतराष्ट्र के स्वभाव में नहीं है. अतः वह संजय को आने का आदेश भेजेगा ही… और धृतराष्ट्र का मन, गांधारी के वाक्य-खंड ‘मैं अपनी पर आयी तो’ पर अटक गया था. वह अपनी पर आयी तो क्या कर लेगी? वह धमका रही थी, अपने पति को, परिवार के मुखिया को, देश के सम्राट को.

वह संजय को बुलाने का निश्चय कर ही चुका था; किंतु उसे आदेश देने अथवा किसी को भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ी. संजय स्वयं ही उसे प्रणाम करने आ पहुंचा था.

‘प्रणाम राजन्! प्रणाम महारानी!’

धृतराष्ट्र ने अपना चेहरा संजय की ओर मोड़ा. अपनी प्रकाशहीन पुतलियों को घुमाया और बोला, ‘अकस्मात् ही हस्तिनापुर कैसे आ गये संजय? क्या युद्ध समाप्त हो गया? मेरे पुत्रों को विजय मिल गयी?’

‘तो मैं चलूं.’ गांधारी ने अपने हाथ से दासी को सहारा देने के लिए निकट आने का संकेत किया, ‘आप लोग धर्म-चर्चा करें.’

धृतराष्ट्र ने कुछ नहीं कहा. वह गांधारी के जाने की प्रतीक्षा करता रहा. जब उसे पूरा विश्वास हो गया कि गांधारी उस कक्ष से जा चुकी है, तो उसने संजय की ओर मुख उठाया.

‘युद्ध तो समाप्त नहीं हुआ है राजन्!’ संजय के स्वर की व्यथा धृतराष्ट्र के कानों में धमक रही थी, ‘किंतु…’

‘किंतु क्या?’ संजय की व्यथा धृतराष्ट्र को अटका नहीं सकी. संजय का क्या है, वह तो पांडवों के लिए भी दुखी होकर रोता है.

‘युद्ध के परिणाम का कुछ-कुछ आभास होने लगा है.’

‘क्या हुआ? अर्जुन मारा गया क्या या भीम नहीं रहा?’ धृतराष्ट्र का आह्लाद उसके स्वर में भी था और उसके चेहरे पर भी.

‘नहीं. अर्जुन अथवा भीम नहीं.’ संजय का कंठ अवरुद्ध हो रहा था.

‘तो क्या कृष्ण नहीं रहा? तुम उसके बहुत भक्त थे न. धर्म का प्रतिरूप मानते थे उसे. उसे विजय का ध्वज समझते थे.’

‘नहीं महाराज, नहीं.’

‘तो?’

‘शिखंडी ने पितामह को धराशायी कर दिया है.’

‘पितामह का देहांत हो गया?’ धृतराष्ट्र के स्वर में पहली बार किंचित चिंता झलकी.

‘देहांत तो अभी नहीं हुआ. श्वास चल रहे हैं.’

‘आहत हैं? क्षत-विक्षत हैं? वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिये हैं?’

‘शर-शैया पर पड़े हैं. प्राण अभी निकले नहीं हैं; किंतु पितामह अब उठ नहीं सकेंगे.’

‘वे उठेंगे नहीं, तो पांडवों से युद्ध कौन करेगा?’ धृतराष्ट्र ने सामने पड़ी चौकी पर अपनी मुट्ठी ठोक दी.

संजय उस एक वाक्य में बहुत कुछ सुन रहा था. स्पष्ट था कि धृतराष्ट्र पितामह को अपना वेतनभोगी सैनिक मानता था और उसने उन्हें पांडवों से युद्ध करने का दायित्व सौंपा था. वे धराशायी हो गये तो धृतराष्ट्र के अनुसार वे अपना कर्तव्य पालन करने से चूक गये थे. वे धराशायी हो कैसे सकते थे. उन्हें तो पांडव सेना से लड़कर उसे पराजित करना था.

धृतराष्ट्र ने स्वयं को तत्काल ही संभाल लिया, ‘पर शिखंडी ने उन्हें इतना आहत कैसे कर दिया? शिखंडी तो कोई ऐसा महान योद्धा भी नहीं है. पितामह के सामने वह चीज़ ही क्या है? कैसे कर सका वह यह दुस्साहस? हमारे योद्धा सो रहे थे क्या?’

‘नहीं. आपके योद्धा सो नहीं रहे थे.’ संजय ने कहा, ‘किंतु शिखंडी की रक्षा अर्जुन कर रहा था. शिखंडी को अर्जुन के बाणों का रक्षा-कवच प्राप्त था.’

‘अर्जुन.’ धृतराष्ट्र अपने स्थान से उठ खड़ा हो गया. वह अपनी व्याकुलता को संभाल नहीं पा रहा था. यह तो अच्छा ही हुआ कि गांधारी वहां से चली गयी थी. नहीं तो उसे अपनी सहज प्रतिक्रियाओं को भी बाधित करना पड़ता.

वह आकर अपने स्थान पर पुनः बैठा तो कुछ संयत लग रहा था, ‘किंतु यह हुआ कैसे? इन दस दिनों में पितामह और आचार्य मिलकर भी इस एक अर्जुन का वध नहीं कर सके?’

‘पितामह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे पांडवों का वध नहीं करेंगे.’

‘यही तो मूर्खता है.’ धृतराष्ट्र की उद्विग्नता पुनः ज्वार पर थी, ‘युद्ध भी करेंगे और शत्रु से प्रेम भी करेंगे. उसको मारेंगे नहीं. यह कौन-सी नीति है? बड़े नीतिवान बने फिरते हैं.’

‘राजन्! पहली बात तो यह है कि वे पांडवों को अपना शत्रु नहीं मानते और दूसरी बात है कि इसी मूर्खता के कारण ही पितामह दस दिनों तक जीवित रहे, युद्ध करते रहे और पांचालों का निर्बाध वध करते रहे. नहीं तो…’

‘नहीं तो?’

‘यदि वे पांडवों का वध करने का प्रयत्न करते तो बहुत सम्भव था कि अर्जुन पहले ही दिन उनको धराशायी कर देता.’

‘तुम कहना चाहते हो कि अर्जुन उनका वध कर सकता था; किंतु उसने नहीं किया?’

‘न केवल अर्जुन ने उनका वध नहीं किया, वरन् कृष्ण और युधिष्ठिर के निरंतर आग्रह करते रहने पर भी शिखंडी को अपने बाणों का सुरक्षा-कवच प्रदान नहीं किया, ताकि वह पितामह पर घातक प्रहार कर पाता.’ संजय ने कहा, ‘शिखंडी बार-बार पितामह की ओर बढ़ता था और हर बार अपने पक्ष से सुरक्षा और समर्थन की कमी के कारण, या कहिए अर्जुन के असहयोग के कारण उसे लौट जाना पड़ता था. और अंततः…’

धृतराष्ट्र मौन अवश्य बैठा था; किंतु उसका कठोर चेहरा तथा ज्योतिहीन आंखें संवादों के भंडार बने हुए थे.

अंततः उसने अपनी चुप्पी तोड़ी, ‘मुझे आरम्भ से बताओ संजय! धर्म के क्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित होकर मेरे और
पांडु के पुत्रों ने क्या किया?’ और सहसा उसने जोड़ा, ‘उससे पहले यह बताओ कि मेरे सारे पुत्र जीवित तो हैं? दुर्योधन सकुशल है?’

‘हां, अभी तक तो वे सब सकुशल हैं.’ संजय ने कहा, ‘मेरे वहां से चलने तक वे सब ही जीवित थे.’

‘तुम्हारा तात्पर्य है कि तुम्हारे कुरुक्षेत्र से यहां आने तक में…’

‘युद्ध में तो कुछ भी सम्भव है महाराज. वहां एक सिरे से दूसरे सिरे तक हवा में बाण उड़ते ही रहते हैं; और किसी के प्राण लेने के लिए एक बाण ही पर्याप्त होता है.’ संजय ने कहा, ‘यदि शिखंडी पितामह के प्राण ले सकता है, तो कोई भी कुछ भी कर सकता है.’

‘मुझे डरा रहे हो?’ धृतराष्ट्र के चेहरे पर सैकड़ों झंझावात एक साथ खेल रहे थे. वह संजय को धमका भी रहा था और उससे आश्वस्ति भी चाह रहा था.

‘नहीं महाराज. मैंने तो युद्ध सम्बंधी एक छोटा-सा सत्य कहा है.’ संजय ने सधे हुए स्वर में कहा.

‘तो फिर आरम्भ से बताओ.’

धृतराष्ट्र की उद्विग्नता देख संजय भी कुछ विचलित हो उठा. कभी-कभी धृतराष्ट्र पर दया भी आने लगती थी. इस वृद्ध के एक सौ पुत्र हैं; किंतु वे सब युद्ध में मृत्यु से जूझ रहे हैं. जाने कोई एक भी घर लौटेगा या नहीं… पर धृतराष्ट्र पर दया करने का अर्थ था, असंख्य निर्दोष लोगों के प्रति क्रूर होना… अधर्म से प्रेम करना…

‘कुरुक्षेत्र तो वह है; किंतु धर्मक्षेत्र क्यों कह रहे हैं उसे? वहां न यज्ञ है, न दान है, न तपस्या है.’ संजय ने अपनी ओर से प्रश्न कर दिया, ‘कोई यज्ञ करने के लिए तो वहां सेनाएं एकत्रित हुई नहीं हैं; न कोई यज्ञशाला बनवा रहे हैं वे लोग. एक-दूसरे का रक्त बहाने गये हैं; मिट्टी को रक्त से लाल करने.’

‘रक्त बहाने.’ धृतराष्ट्र अधरों ही अधरों में बुदबुदाया. फिर जैसे कांप कर बोला, ‘सत्य कह रहे हो. पर मेरा मन कहता है कि यदि यह कृष्ण चाहता तो इस युद्ध को रोक सकता था. चाहे तो अब भी रोक सकता है. पांडव पूर्णतः उसके कहने में हैं; किंतु नहीं रोका उसने. मुझे तो लगता है कि एक वही चाहता है कि यह युद्ध हो. उसकी हार्दिक इच्छा है कि क्षत्रिय लोग कटें, मरें. गिद्धों को भोजन मिले; सियार वीर योद्धाओं के शवों को घसीटें, उनकी दुर्दशा करें; और सारे क्षत्रिय समाज के परिवारों में विधवा स्त्रियां और अनाथ बच्चे ही रह जाएं- रोने-चिल्लाने के लिए, हाहाकार करने के लिए और कष्ट पाने के लिए.’

‘और दुर्योधन क्या चाहता है? आप क्या चाहते हैं?’

‘हम तो एक ही बात चाहते हैं कि पांडव युद्ध न करें.’

‘पांडव युद्ध न करें चाहे दुर्योधन उनका सर्वस्व छीन ले. उनके साथ घृणित दुर्व्यवहार करे, उनकी पत्नी का अपमान करे.’

‘वह तो राजनीति का अंग है.’ धृतराष्ट्र बोला, ‘किंतु यह कृष्ण.’ धृतराष्ट्र की इच्छा हुई कि अपना सिर धुन ले, ‘न युद्धक्षेत्र से हटता है, न शस्त्र धारण करता है. वह युद्ध का अंग माना जायेगा या नहीं.’

‘युद्ध तो महाकाल का अस्त्र है.’ संजय ने कहा, ‘कृष्ण के हाथ में कोई शस्त्र हो या न हो.’

धृतराष्ट्र ने कुछ कहने के लिए मुख खोला किंतु कुछ कहा नहीं. सोचता ही रह गया.

‘दुर्योधन शांति की बात नहीं करता.’ संजय ने पुनः कहा, ‘उसे तो अपनी विजय का इतना विश्वास है कि वह शांति का श भी सुनना नहीं चाहता. वह मानता है कि यदि वह शक्तिशाली है, तो वह न्याय की चिंता नहीं करेगा. आपके मन में एक बार भी नहीं आया कि यह युद्ध दुर्योधन के कारण हो रहा है. दुर्योधन के अन्याय के कारण हो रहा है. उसके अधर्म के कारण हो रहा है. आप युद्ध का दोष कृष्ण पर क्यों मढ़ रहे हैं?’

‘क्योंकि कृष्ण शांतिप्रिय नहीं है.’

‘रक्त-पिपासु हैं वे? हिंस्र हैं? बर्बर हैं? करुणा और प्रेम नहीं है उनके मन में?’ संजय कुछ-कुछ असंयत हो चला था.

‘नहीं. वह सब नहीं है. वह धर्मप्रिय है.’ धृतराष्ट्र का स्वर अवसाद में डूब गया, ‘कृष्ण धर्म की स्थापना का कोई भी मूल्य दे सकता है. निर्मम है वह- हृदयहीन. धर्मप्रिय लोग प्रायः स्वजन-निष्ठुर होते हैं. यदि युद्ध और शांति का निर्णय युधिष्ठिर पर छोड़ दिया जाता…’

‘तो क्या होता?’

‘युद्ध की स्थिति ही नहीं आती… मैं दुर्योधन से कह किसी न किसी प्रकार उसे पांच गांव दिलवा देता. किंतु यह कृष्ण… उसे धर्म चाहिए, प्रत्येक स्थिति में, प्रत्येक मूल्य पर. रक्त बहा कर धर्म. शवों के पर्वत पर खड़ा धर्म का प्रासाद. धर्म… पता नहीं, उसका अहिंसा में विश्वास क्यों नहीं है. ऋषियों की सेवा करता है तो फिर ‘अहिंसा परमोधर्मः’ में क्यों उसका विश्वास नहीं है?’

‘क्योंकि वे हिंसा और अहिंसा का तात्त्विक भेद जानते हैं.’ और सहसा संजय ने बात को दूसरी ओर मोड़ दिया, ‘आप कहते हैं कि कृष्ण चाहते हैं कि यह युद्ध हो.’ उसका स्वर तीखा होता जा रहा था, ‘और दुर्योधन के विषय में क्यों नहीं सोचते? वह चाहता है कि युद्ध न हो? पांडवों और कृष्ण की ओर से तो फिर भी शांति प्रस्ताव आया; किंतु दुर्योधन… दुर्योधन ने एक बार भी शांति की बात की? दूत के रूप में भेजा भी तो उस उलूक को, जो अपने अपशब्दों से पांडवों को और भी भड़का आया. युद्ध चाहता है दुर्योधन, क्योंकि वह समझता है कि अधर्म का पक्ष भी विजयी हो सकता है.’

‘आज तक तो वह विजयी होता ही आया है.’ धृतराष्ट्र तड़प कर बोला, ‘अब ऐसा क्या हो गया है कि वह विजयी नहीं हो सकता?’

‘अब तक वह विजयी होता रहा, क्योंकि धर्म ने अधर्म का प्रतिरोध नहीं किया. पुण्य ने पाप से युद्ध नहीं किया.’ संजय की वाणी में प्रखरता थी, ‘अधर्म तभी तक विजयी होता है, जब तक धर्म उसके विरुद्ध शस्त्र नहीं उठाता.’ संजय रुके. उन्हें लगा कि उन्होंने शायद धृतराष्ट्र को बहुत डरा दिया था.

‘तो भी क्या हुआ.’ संजय ने उसे सांत्वना देने का प्रयत्न किया, ‘आप क्यों चिंतित हैं. सेना तो दुर्योधन के पास ही अधिक है. एक से एक बढ़कर योद्धा भी हैं. पितामह अब शर-शैया पर हैं तो क्या हुआ. उन्होंने आपकी ओर से युद्ध कर दस दिनों तक शत्रुओं के शवों से युद्ध-क्षेत्र को पाट दिया है. द्रोणाचार्य आपके पक्ष से लड़ ही रहे हैं. अश्वत्थामा है, कृपाचार्य हैं, कृतवर्मा है. और भी अनेक हैं. इन सबको युधिष्ठिर पराजित कर पायेंगे क्या? कृष्ण का धर्म इन सबका क्या बिगाड़ लेगा?’

संजय को लगा कि यदि धृतराष्ट्र की आंखें देख सकतीं, तो संजय की मुस्कान किसी भी प्रकार छुप नहीं पाती.

धृतराष्ट्र की समझ में नहीं आया कि संजय उसको सांत्वना दे रहा है या उसका उपहास कर रहा है.

‘बात युधिष्ठिर की नहीं, कृष्ण की है. उस निर्मोही ने पितामह का भी सम्मान नहीं किया, चिंता भी नहीं की. बींध कर रख दिया शरों से. पांडवों के राजसूय यज्ञ में पितामह ने उसकी अग्रपूजा करवायी थी. उसी झंझट में बेचारा शिशुपाल कट मरा था. मेरा भय सत्य ही सिद्ध हुआ. कृष्ण ने इस युद्ध में पितामह की अग्रबलि दे दी है. यह अग्रपूजा का प्रतिदान है क्या?…’

‘क्षत्रिय तो बाण से ही प्रणाम करते हैं और बाण से ही पूजा भी करते हैं…’ संजय बोला.

‘कृष्ण को तो कोई संकोच नहीं हुआ. तुम्हें भी उसका पक्ष लेते हुए लज्जा नहीं आ रही. यह पूजा की है, उन्होंने अपने पितामह की?’ धृतराष्ट्र की अंधी आंखों से क्रोध की चिंगारियां बरस रही थीं, ‘ये धर्म के पक्षधर और सिद्धांतों के उन्नायक ही मानवता के लिए सबसे बड़े संकट बनते जा रहे हैं. इनका सिद्धांत जीवित रहना चाहिए, चाहे सारी मानवता का नाश हो जाए.’

संजय ने कुछ नहीं कहा; किंतु उसका मन कह रहा था, ‘पितामह क्षत्रिय हैं, उनके पौत्र भी क्षत्रिय हैं. जैसे बाणों से दादा स्नेह बरसा रहे थे, वैसे ही बाणों से पौत्रों ने उनकी पूजा कर दी.’

‘पितामह के जीवित रहते हमें कोई भय नहीं था; किंतु पहली सूचना उन्हीं की वीरगति की…’ अंततः धृतराष्ट्र ने ही बात आरम्भ की, ‘उन्हें उनका धर्म भी नहीं बचा पाया.’

‘यदि बात धर्म की ही है तो पितामह को क्या भय. वे आजीवन धर्म पर टिके रहे हैं. धर्म का आचरण करते रहे हैं. वे भी धर्म का मर्म जानते हैं. वे धर्म को समझकर ही तो दुर्योधन के प्रधान सेनापति बनकर युद्धक्षेत्र में खड़े थे.’ संजय ने स्वयं को पूरी तरह समेट कर कहा, ‘धर्म दो-चार तो हो नहीं सकते. पितामह और श्रीकृष्ण के धर्म भिन्न कैसे हो
सकते हैं?’

‘बहुत सीमित था पितामह का धर्म. वे इतना ही जानते थे कि धर्म की गति अत्यंत सूक्ष्म है.’ धृतराष्ट्र जैसे अपने-आप से ही बोला, ‘भ्रम की साक्षात् मूर्ति हैं पितामह! और कृष्ण भ्रमों को जड़ से उखाड़ फेंकता है.’

‘कैसे?’

‘पितामह का धर्म अपने कुल की रक्षा तक है. वे कौरवों को मरने नहीं देना चाहते थे. वंश की रक्षा ही धर्म है उनका. आत्मरक्षा धर्म है पितामह का किंतु कृष्ण का धर्म…’

‘श्रीकृष्ण का धर्म भिन्न है उससे?’

‘कृष्ण का धर्म भी आत्मरक्षा है; किंतु वहां ‘आत्म’ बहुत व्यापक है. वह ऋत् की रक्षा करेगा, किसी कुल की नहीं. वह पांडवों की भी बलि दे देगा; किंतु धर्म को पराजित होने नहीं देगा.’

‘पर ऐसा क्यों है?’ संजय चकित था, ‘श्रीकृष्ण तो पांडवों को उनका अधिकार दिलाने के लिए युद्ध कर रहे हैं.’

‘तुम छोड़ो वह सब.’ धृतराष्ट्र का अधैर्य उसके चेहरे पर ही नहीं, उसकी वाणी में भी प्रकट हो गया, ‘तुमको तो महर्षि व्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी, फिर तुम कुरुक्षेत्र क्या करने चल दिये? दस दिन धक्के खाते रहे वहां. कोई सूचना नहीं भेजी, कोई समाचार नहीं. अब आये भी तो ऐसा अशुभ समाचार लेकर.’

‘आपके पास चर्मचक्षु नहीं हैं; और महर्षि आपको दिव्य दृष्टि दे रहे थे, तो आपने मना क्यों कर दिया?’ संजय ने धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया.

‘तुम चाहते हो कि मैं अपनी आंखों से अपने पुत्रों को कटते-मरते देखूं. कोई और चर्म चक्षुओं से युक्त पिता भी होता तो ऐसे समय में अपनी इच्छा से अंधा हो जाना पसंद करता. सारा जीवन अंधकार में बिताया तो अब क्या करना था मुझे दिव्य दृष्टि लेकर.’ धृतराष्ट्र किसी बिगड़ैल पशु के समान भड़क उठा था, ‘इतने ही कृपालु थे ऋषि, तो मेरे जन्म के समय ही दे देते मुझे चर्म-चक्षु. दे दिये होते तो मुझे हस्तिनापुर के राजसिंहासन से च्युत तो न किया जाता. तब न पांडु का कोई अधिकार था राज्य पर और न पांडवों का. उस समय, मेरे जन्म के समय तो चुपचाप लौट गये. जा बैठे अपने आश्रम में. और अब दिव्य दृष्टि देने चले हैं. पर तुम्हारे पास तो थी दिव्य दृष्टि… तुम क्या करने गये थे, कुरुक्षेत्र.’

‘यहां बैठा मैं केवल देख सकता हूं; या फिर सुन भी सकता हूं. किसी चित्रपट के चित्रों के समान.’ संजय, धृतराष्ट्र के प्रश्न पर लौट आया, ‘न उन्हें छू सकता हूं, न उनसे चर्चा कर सकता हूं; क्योंकि न वे मुझे सुन सकते हैं, न मैं उनको सुन सकता हूं. मैं गया था कुरुक्षेत्र. उन सबका मन टटोलने.’

‘क्या पाया, बोलो.’

‘वहां विशेष क्या था देखने को.’ संजय ने कहा, ‘दोनों ओर की सेनाएं सज गयी थीं. व्यूह बन गये थे. युद्ध आरम्भ करने की ही देर थी कि युधिष्ठिर का भय अपने भाइयों के सम्मुख मुखर हो उठा. वे बोले, ‘दुर्योधन की इस विशाल सेना से हम कैसे लड़ेंगे? कैसे जीतेंगे?’ अर्जुन ने उन्हें आश्वस्त किया, ‘विजय तो धर्म की ही होती है; और धर्म वहां है, जहां श्रीकृष्ण हैं. हमने आजीवन श्रीकृष्ण में धर्म देखा है; इसलिए उन्हें कभी छोड़ा नहीं है. श्रीकृष्ण के अपने सारे परिजन उन्हें छोड़ गये हैं; किंतु न कभी हमने उन्हें छोड़ा, न उन्होंने हमें छोड़ा.’

‘छोड़ो कृष्ण और अर्जुन को.’ धृतराष्ट्र पूर्णतः झल्लाया हुआ था, ‘मुझे बताओ, दुर्योधन ने क्या किया.’

(क्रमशः)

(यह उपन्यास वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है.)

फरवरी 2016

 

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