Category: पिछले अंक

मार्च 2013

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते….’ का जाप करने वाला हमारा समाज वस्तुतः नारी को एक भोग्या अथवा वस्तु के रूप में ही देखता है. आज जीवन में हर क्षेत्र में नारियां उपलब्धियों के शिखर छू रही हैं, लगातार स्वयं को प्रमाणित कर…

फरवरी 2013

गंगा, यमुना तथा सरस्वती का संगम मात्र तीन नदियों का संगम नहीं है, यह आस्था श्रद्धा और आदर्शों-मूल्यों का भी संगम है. महाकुम्भ इस संगम को आकार भी देता है और सार्थकता भी. पता नहीं वह कैसा विश्वास है जो…

जनवरी 2013

 भरत मुनि के रस-सिद्धांत अथवा मम्मट द्वारा की गयी रसों की व्यवस्था-व्याख्या को हम जीवन के लिए बोझिल मानकर भले ही नकार दें, पर रस को जीवन से निष्कासित करके जीवन को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता. रस और…

जुलाई 2014

विश्व-युद्ध के शताब्दी वर्ष में युद्ध के बारे में चिंतन का अभिप्राय मनुष्य के भीतर की उस पशुता को पराजित करने के बारे में जागरूक होने का प्रयास करना है, जो युद्धों का कारण बनती है. दुनिया दो विश्व-युद्ध झेल…

जून 2014

हर साल जून के महीने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण दिवस मनाकर मनुष्यता को इस खतरे से सावधान करने की कोशिश होती है. लेकिन इस खतरे को समझने और इससे बचने की कोशिश वर्ष में एक दिन नहीं, वर्ष के…