सुधा अरोड़ा

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सुधा अरोड़ा

जन्म 1946  विभाजन पूर्व लाहौर में. कहानी, आलेख, स्तंभ-लेखन,
रेडियो, दूरदर्शन, टी.वी. धारावाहिक, फ़िल्म पटकथा लेखन  द्वारा अपनी सृजनात्मकता का परिचय देते हुए , वे सदैव अपने सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रहती हैं. महिलाओं से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर वे लिखती हैं और सामाजिक तथा महिला संगठनों  के मंच से उन मुद्दों को अपनी आवाज़ भी देती हैं.

  

 इस कहानी ने भी मेरे लिए संजीवनी का काम किया

“वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान!
उमड़कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान.”

अक्सर हम कविता लेखन को पीड़ा और व्यथा से जोड़ते हैं. मुझे लगता है, किसी भी रचनात्मक विधा के लिए एक कशिश या चोट का होना बहुत ज़रूरी है.

तेरह साल की उम्र से मैंने कविताएं लिखनी शुरू कीं और हर साल अपने स्कूल की वार्षिक पत्रिका में मेरी कविताएं लगातार छपती और प्रशंसित होती रहीं.

1964 का वह दिन मुझे बहुत अच्छी तरह याद है जब ‘चाचा नेहरू’ की मृत्यु हुई थी और सब रेडियो के इर्द- गिर्द सिमट आये थे. बड़े- बच्चे-बूढ़े सब बिलख रहे थे. मैं करीब एक सप्ताह से लगातार बिस्तर पर थी और एक अजीब-सी बीमारी से त्रस्त थी. हर पंद्रह दिन – महीने में मेरी बायीं कुहनी बुरी तरह सूज जाती और मेरा हाथ एक ही पोज़ीशन में रहता. ऐसा लगता, जैसे बांह के उस हिस्से में पानी भर गया है और पूरी बांह सूजकर पारदर्शी हो जाती. न इस बीमारी का कोई नाम था, न इलाज. मेरे अलावा मुझसे छोटे छह भाई- बहन थे. मां के पास इतना समय नहीं था कि वह मेरे सिरहाने बैठी रहतीं, सो मां ने मुझे एक डायरी थमा दी – दाहिना हाथ तो ठीक है, उससे लिखा कर !

बस, लेटे- लेटे उस डायरी में ही प्रेम की एक काल्पनिक स्थिति ने जन्म लिया और एक भावुक-सी कहानी लिख डाली. इस कहानी को लिख चुकने के बाद मैंने बीमारी की उस पीड़ा से भी निजात पा ली जो मुझे बार-बार मौत के मुहाने पर ला खड़ा करती थी. लेखन एक बढ़िया निकास का ज़रिया (आउटलेट) हो सकता है, यह समझ में आ गया था. सम्भवतः मेरे लेखन काल की यह सबसे कमजोर कहानी है. सन् 1964 में ‘ सारिका’ के संपादक चंद्रगुप्त विद्यालंकार ने कहानी की स्वीकृति भेज दी. पर जब तक यह कहानी छपी, तब तक मेरी तीन-चार कहानियां अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी थीं.

इसमें संदेह नहीं कि कोई भी कला व्यक्ति को कुंठा, निराशा, हताशा, अकेलेपन की खाईं से हाथ पकड़कर बाहर निकालने में सहायक होती है. इस कहानी ने भी मेरे लिए संजीवनी का काम किया और काल्पनिक प्रेम-जीवन ही वास्तविकता में बदल गया लेकिन वह एक अलग दास्तान है…

 

 

 

कहानी

मौत से रूबरू और निकास का ज़रिया

31 दिसम्बर’ 64- साल की आखिरी रात.

क्लब में कई -कई जोड़े. खुश. बेहद- बेहद खुश ! ऑर्केस्ट्रा की थिरकती हुई चंचल धुन के साथ थिरकते हुए कदम. गुब्बारे, बल्ब- अनगिनत. आंखें को चौंधियाती रोशनी. झपकती आंखें. खुमारी. बारह बजे का घंटा. ऑर्केस्ट्रा और तेज़… रोशनी गुल… बेशुमार अंधेरा… नये साल की मुबारकबाद का शोर. बत्तियां जल उठीं. खिलखिलाते ओंठ, शरारत से भरी आंखें- आखों
में रोशनी.

क्लब के एक उदास कोने की उदास मेज़ पर बैठी एक उदास लड़की. एक चेहरा, जो पुराने साल की मौत के मातम में नये साल की खुशियां भी नहीं देख रहा था. यह एक दुबली- सी लड़की थी. नाम – सरिता. उम्र-तकरीबन 21 साल. दो उदास हथेलियों के बीच उसका चेहरा. रंग हल्का सांवला, पर हथेलियां खूब गोरी. बेहद पतली, लम्बी और कोमल उंगलियां. दायें हाथ की छोटी उंगली में लपेटा हुआ साड़ी का पल्ला. एक उंगली में अंगूठी- मामूली-सी…

यह डायरी उसी बुझी हुई आंखों, पतली उंगलियों वाली, सांवली, उदास लड़की की है. वह लड़की ‘शायद’ अब नहीं रही (उसके ‘नहीं होने को’ शायद कहना मुझे अच्छा लगता है.) उसकी डायरी मेरे सामने है. और इस डायरी में वह आज भी ज़िंदा है.

एक सांवली लड़की की सांवली डायरी…

एक उदास लड़की की उदास डायरी…

एक सेंटीमेंटल लड़की के सेंटीमेंटल डायरी…

एक लड़की…

एक डायरी….और

दो मौतें….(एक लड़की की मौत, एक डायरी की मौत) यह डायरी अंतिम समय तक उसके साथ रही. उसे मैं देखती तो अक्सर थी पर इस डायरी को अब पढ़ते वक्त लगता है, जैसे पहली बार उसे पहचान रही हूं….

जनवरी 1, 65

कल की सुबह, आज की सुबह, अंतर तो कुछ भी नहीं. फिर भी आज सब बहुत खुश हैं. सबने मिलकर आज एक लम्बा-सा प्रोग्राम बनाया है. खाना ‘ताज’ में, फिर विक्टोरिया, पिक्चर, रात एक कार्निवल में… आदि-आदि.

मैं जाऊं क्या ?

मेरे मन पर उदासी की कितनी-कितनी परतें घिर आयी हैं. ऐसी अच्छी जगहों से मन और भी उदास हो जाता है. सबको खुश देखकर मुझे न जाने क्या हो जाता है. मन तो होता है किसी अनाथालय को देख आऊं… या अस्पताल के जनरल वॉर्ड में चक्कर लगाऊं… या काली मंदिर के पास भिखमंगों का जमघट देखूं… या हावड़ा के प्लेटफॉर्म पर जनता के थर्ड क्लास के डिब्बे में बैठूं… या किसी सस्ते-से हॉल में बीड़ियों के धुएं में बैठकर तिलस्मी फिल्म देखूं…. या किसी चवन्नियल रेस्तरां में बैठकर चाय पी लूं… या भीड़ वाली डबल डेकर बस में या… पर मैं ‘ताज’ नहीं जाऊंगी.

गुब्बारे. फ्लूरीज़ के केक. रंगीन कपड़े. रेशमी इत्र लगे रूमाल. गॉगल्स. बॉक्स की टिकट. जूते पर बेहतरीन पॉलिश. खूबसूरत टाई. डिज़ाइनर शर्ट. सब कुछ…. पागलपन-सा लगता है.

कल सुधा मुझे ज़बरदस्ती खींचकर क्लब ले गयी. वहां की रंगीनियों में मेरी उदासी की परतें और जमती गयीं- तह पर तह.

तुम क्लब में आये ही नहीं. मुझे मालूम था. फिर भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी. आ भी जाते, तो क्या होता. मेरे पास की तीनों कुर्सियां खाली पड़ी रहतीं. न आये. अच्छा ही किया, नहीं आये.

बहुत से कार्ड आये हैं – नये वर्ष की मुबारकबाद देने. इतनी ढेर-सारी औपचारिकताएं. इनमें से पांच औपचारिकताएं मेरे लिए हैं- शीला, मीनू, चाचाजी, भैया और एलिस (पेन-फ्रेंड) की. तुमने हैप्पी न्यू इयर विश नहीं किया. समझदार हो, जानते हो कि यह साल मेरा अच्छा नहीं बीतेगा … फिर झूठी, दिखावटी विशेज़ से क्या होगा. पर अभी भी मेरी नज़र पोस्टमैन पर ही है. शायद भूले-भटके तुम…

मैंने तुम्हें नये साल की ग्रीटिंग्स भेजी हैं… वही पुरानी ‘नयी भाषा’ (कोड-वर्ड्स) में. शायद न समझ पाओ. भूल गये हो क्या ? भूल जाना चाहिए. मेरे न भूल पाने की आदत ही तो मुझे पीड़ा देती है.

भाई ने कोई इंग्लिश ट्यूशन लगा दी है. मेरे कान के पास जल-तरंग बज रही है. अच्छा लगता है. जलतरंग बजती जा रही है… अब बंद हो गयी है, उसकी गूंज अब भी बाकी है. मैं इस गूंज को मिटा देना चाहती हूं. चौंसठ के साल की जलतरंग…गूंज…खत्म हो जाये. मैं उस साल की मौत पर आंसू क्यों बहाऊं. ? उसे जला दूं, उसकी राख मुट्ठी में दबाकर रखूं या बहा दूं…. क्या करूं  पर मुझे लगता है… यह राख मैंने सारे शरीर पर रमा ली है. मेरे पास पानी नहीं, साबुन भी नहीं, हवा भी नहीं, कोई कपड़ा नहीं…अब यह राख धुलेगी कैसे ? कैसे पोंछ दूं मैं इसे?

यह नया साल है. इस बच्चे के जन्म- दिवस की खुशी में उसके बाप की मौत का मातम मिट गया है. मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्यें यह नयी सुबह मुझे उदास करती है ? कोई आ गया है. कॉल- बेल बज रही है. घर में अकेली हूं. नहीं खोलती. बजने दो. अपने आप चला जायेगा.

जनवरी 3, 65

कल मैं खुश थी. इसलिए डायरी लिखी नहीं. आज फिर वही पुरानी उदासी घिर आयी है. मेरी आवाज़ कांपने लगी है. किसी का फ़ोन आ जाये…. वह भी नहीं आता.

मैं अपनी खिड़की से बाहर झांकती हूं…. दूर एक तुम्हारे ही जैसे डील-डौल का लड़का चला जा रहा है. अधजली सिगरेट को उसने जूतों से मसल दिया है.

मैं सोच रही हूं…. मैं भी खुशबुओं वाली सिगरेटों में थी. तुमने मुझे उठा लिया. अपने खूबसूरत सिगरेट लाइटर से जलाया. ओठों से लगाया… आधा पीकर खुरदरी ज़मीन पर फेंक दिया. अपने रबर सोल के जूतों से कुचल कर तुम आगे बढ़ गये. तबसे मैं वहीं पड़ी हूं. हवा से उड़कर एक पतझड़ी पत्ते के नीचे दबी हूं. कोई मुझे देख नहीं सकता. उठाता भी नहीं, जलाता भी नहीं. जलना भी नहीं चाहती. मैं तुम्हारे उन्हीं रबर सोल के परिचित जूतों का इंतज़ार करती हूं… कर रही हूं…

पर… तब…मैं खुशबुओं वाली सिगरेटों में थी… अब मैं आधी जली हुई, मसली हुई सिगरेट रह गयी हूं… एक खूब लम्बी सांस लेने को जी चाहता है.

फ़रवरी 5, 65

कितने दिन शामों में ढल गये… शामें रात बन गयीं. इनमें से कितनी रातें मेरी आंखें में समा गयी हैं. सबकी ज़िंदगी अपने पुराने ढर्रे पर चलती जा रही है. मेरी ज़िंदगी एक रास्ता भूली हुई रेल की तरह पटरी पर से उतर गयी है.

इतने दिनों में क्या कुछ नहीं हो गया. मैंने एम.ए. प्रीवियस की परीक्षा दे दी. सुमन की शादी हो गयी. मेरा एक नया गोल – गोल भानजा हो गया और… तुम शादी करके विदेश चल गये… फिर मैं डायरी किसके लिए लिखूं… पांच सालों से लगातार डायरियां लिखते-लिखते अब मैं बोर हो गयी हूं.

मेरी पहली डायरी एक ऐसी लड़की की डायरी थी, जो बहुत चंचल थी… शोख… नटखट. उसकी डायरी में केवल तुम्हारा नाम रहता… साधारण-सी बातें… फ़िल्मी गाने… पढ़ाई की चर्चा, यात्रा के वर्णन… चुटकुले… सब बातें रोचक, दिलचस्प, सरस, मीठी.

दूसरी डायरी इसी का बृहद्, संशोधित, खूबसूरत संस्करण था.

तीसरी डायरी में वह लड़की बदल गयी. वह सपने लेती. तुम पढ़ने चले गये- रांची. वह तुम्हारे लौटने की राह देखती. उसे पंजाबी गीत अच्छे लगते. उसने एक डायरी में ये गीत पिरो लिये. कभी- कभी उसने खुद भी कई गीत लिखे… फिर कविताएं… फिर कहानियां. वे सब गीत, कविता, कहानी उसने रांची भेज दी, पर वह बिना पढ़े उसी तरह बंद वापस आ गये. उसने लिखना बंद कर दिया. वह सब जला डाला, पर कभी- कभी उसे कुछ होने लगता… उसके दिल में कुछ छटपटाता और उसने फिर कविताएं लिखीं (वे सब चीज़ें आज उसने खोज- खोज कर जला डालीं… अपने मन को उसने यह कहकर सांत्वना दी कि ‘सब बचकानी थीं.’)

चौथी डायरी में उसने न जाने क्या- क्या लिखा. अब वह सब पढ़ा नहीं जाता. क्योंकि लिखते समय उसने अपने बेतरतीब आंसुआंo से उन काले – नीले अक्षरों को धो डाला.

मुझे विश्वास नहीं होता कि वह लड़की मैं हूं….

यह मेरी पांचवीं डायरी है. यह डायरी लिखते समय मुझे कई बार न जाने क्या हो जाता है. जब मैं बेहद उदास होती हूं, तो किसी खाली पेज को देखकर उस पर लकीरें खींचती हूं. एक चेहरा बन जाता है. उसकी आंखों के नीचे मैं एक, दो, तीन बूंदें बना देती हूं. ऐसे रोते हुए चेहरे मुझे अच्छे क्यों लगते हैं भला ?

सुनो, मैंने इतनी डायरियां लिखी हैं. पहली डायरी मुझे रोचक संस्मरणों की किताब लगती है. दूसरी डायरी किसी फिल्म की तरह लगती है. तीसरी डायरी मुझे उपन्यास की तरह लगती है. चौथी डायरी मुझे कविता लगती है. यह डायरी न जाने क्या है ? यह जीवनी भी नहीं, आत्मकथा भी नहीं, पुरानी यादगारों की कड़ियां भी नहीं. इसे मैं खत कहूं ? सच, जब मैं यह डायरी लिखती हूं, मुझे लगता है, मैं तुम्हारे नाम खत लिख रही हूं. पर इन्हें खत भी कैसे कहूं, जिनके लिए कोई लिफ़ाफ़ा नहीं, जिनके लिए कोई पता नहीं , जिन खतों को पढ़ने वाला कोई नहीं….

तुम कहते थे- यह सीधी- सपाट ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है, इससे तो अच्छा है, मुझे कोई बेहतर बीमारी हो जाये. मैं अपने हाथें. से तुम्हारे ओंठ बंद कर देती … यह बेहतर क्या होता है ? अब…अब मुझे एक बेहतर बीमारी हो गयी है…. इस बीमारी का नाम न चाहते हुए भी मेरे कानों तक पहुंच गया है- ल्यूकीमिया ! यह बीमारी मुझे धीरे- धीरे चबा रही है. (मैं इसके दांतें से निकलना नहीं चाहती, पर यह मुझे धीरे – धीरे क्यों चबाती है, एक साथ क्यों नहीं खा जाती ?)

मुझे पंद्रह दिन बाद इस बीमारी का दौरा पड़ जाता है. लगता है, कहीं कोई विषाक्त घाव है, जो फैलता जा रहा है… इसका ज़हर मेरे शरीर के रेशे में समा गया है. मेरे शरीर का रेशा – रेशा किसी घाव की तरह है. ये घाव रिसते हैं. मेरा शरीर हवा-सा हल्का हो जाता है. मेरी आंखें भी उन घावों की तरह रिसती रहती हैं….

मैं न जाने क्या — क्या लिखना चाहती हूं, पर कुछ भी लिख नहीं पाती. सारे विचार एक-दूसरे से उलझते हैं और मैं इनमें से किसी को भी सुलझा नहीं पाती. सब मिलकर मेरे लिए एक वैक्यूम हो जाता है.

फ़रवरी 6, 65

आज एक डॉक्टर आया था. न जाने क्या-  क्या कहा था उसने. मैं ठीक से समझ नहीं पायी. जो उड़ते – उड़ते शब्द कानों में पड़े, उससे यही समझ पायी कि हर सप्ताह अस्पताल आना होगा. मुझे फिर याद आ रहा है, तुम कहते थे- ‘अस्पताल में मरीज़ों के बीच बहुत अच्छा लगता है.’ शायद तुम्हारा यह कहना ही मुझे उस ओर आकर्षित करता है. तुम भी तो डॉक्टर हो. शायद उस अस्पताल का कोई डॉक्टर तुम्हें जानता हो, तुम्हारे बारे में कुछ बता सके….

फ़रवरी 16, 65

सरि…सरि…सरि… कुछ इस अंदाज़ में बहन ने मुझे आज सरि… कहा कि मुझे तुम्हारी भर्रायी हुई आवाज़ बार – बार आकर छेड़ जाती है. उस दिन, जब अपने कमरे में ताला बंद करते वक्त तुमने कुछ अजीब तरीके से मुझे देखा और मैंने लौटते न लौटते तुम्हारी भर्रायी आवाज़ सुनी- ‘सरि’. मुझे जब भी तुम ‘सरि’ पुकारते थे, तो मैं भूल जाती थी कि मेरा नाम सरिता भी है. उस दिन के बाद आज तक न तुमने, न और किसी ने मुझे ‘सरि’ कहा.

…यह सोचकर मेरी आंखें बंद हो जाती हैं और इन बंद आंखों से मैं देखती हूं, तुम अपनी पत्नी को उसी भर्रायी आवाज़ में कहते हो- ‘सरो’…. उसका नाम सरोज है. पर … इस कल्पना के लिए मैंने आंखें बंद नहीं की थीं. मैं आंखें खोल देती हूं. सब कुछ वैसा ही है. मेरी आंखों के सामने कितने दरिया लहराते हैं… मुझे आज वर्तमान क्यों नहीं दीख रहा. सच, मैं अतीत को दुबारा जीना नहीं चाहती, उसे याद करना भी मुझे कष्ट देता है.

मैं कॉफ़ी पीती हूं. जान बूझकर गरम कॉफ़ी ओठों से लगा लेती हूं, जिससे ध्यान जलते हुए ओंठों की तरफ़ चला जाये, पर… पर… मुझे कुछ हो रहा है… मैं मजबूर हो जाती हूं… फिर क्यों न अपने मन को अतीत में जीने की ढील दे दूं… सुनो, अब मेरे हाथा मेरे मन की लगाम छूट गयी है.

घर्र…घर्र…एक जेट जा रहा है…कैसी आवाज़ है…एक खूब लम्बी सड़क बन गयी है. उसमें तीन ही मोड़ हैं. पहले मोड़ पर मेरा मन रुक गया है… स्थिर, निश्चेष्ट….

पहला मोड़-

एक गोरी बीमार हथेली– सड़क पर चिपचिप. बारिश पर बारिश. जगह– जगह घने गड्ढों में पानी का जमाव. छोटे — छोटे तालाब. उनमें बच्चों का नहाना. धीरे– धीरे बारिश तेज़ होती गयी. फिर ओले, ओले पर ओले. ऐसे में तुम भीगते हुए आ पहुंचे…

अरे, तुम ?

चला जाऊं…

नहीं…नहीं, कहां से आ रहे हो ?

जहन्नुम से आ रहा हूं… जन्नत आ
पहुंचा हूं…

हिश्श

तबीयत कैसी है ?

भालो…

भालो कि बेश भालो

पहले भालो थी, तुम्हें देखकर बेश भालो…

चार आंखों की मिश्रित चमक. दो खिलखिलाहटें.

बहुत दुबला गयी हो….

शायद-

बाहर आ जाओ…

दहलीज़ के पास एक ऊंची- सी लकड़ी से बनी दीवार- पानी रोकने के लिए.

मुझसे इतने ऊंचे से नहीं आया जाता….

तुम्हारा बढ़ा हुआ हाथ और मेरी गोरी बीमार हथेली…. और हम बरामदे में थे. मूझे इतना ही याद है. वह क्षण तब भी रुक गया था… आज तक रुका है… खिसकता ही नहीं… और हां, एक ही खिड़की से उस दिन हम दोनों ने बाहर झांका था… बारिश…ओले…ओले…ओले !

दूसरा मोड़ ः

एक स्वस्थ, गोरी हथेली-

जेठ की तपती दुपहरी. मेरा अप्रत्याशित रूप से तुम्हारे घर की ओर बढ़ना. साथ में अम्मा. अम्मा कह रही थीं, तुम्हारे बारे में, कि उसके घर के पास सरोज रहती है. वह भी यू.पी. की है. तुम्हारे साथ उसकी शादी होने वाली है. मैं एक फीकी-सी हंसी हंस दी… सरोज के साथ तुम्हारी शादी- ऐसा भला कैसे हो सकता है.

अम्मा बैठी थीं प्रीत मौसी के पास. मैंने कहा था- अम्मा, दो मिनट में आती हूं…  और सोच रही थी, तुम चौंकोगे…

‘अरी, तुम…’

मैं कहूंगी- ‘चली जाऊं…?’

तुम्हारा दरवाज़ा बंद था. मुझे रसोई से होकर जाने वाला रास्ता मालूम था. मैं उस तरफ से गयी. दो खिड़कियों के बीच से झांका. तुम्हारी पीठ दिखी… मैं धीमे से हंसी. ज़रा और उत्सुकता से देखा… और जो देखा, उसे देखा, उसे कह पाने की, सोच पाने की भी क्षमता नहीं मुझमें…. एक खूबसूरत लड़की…सरोज और तुम… सरोज और तुम. मेरे भीतर एक हूक-सी उठी… सरोज की स्वस्थ गोरी हथेली और तुम्हारा बढ़ा हुआ हाथ… तुम्हारा मुझसे खिंचे- खिंचे रहना, मेरे बी.ए. में प्रथम आने पर भी तुम्हारी अनचाही मुस्कान… सब कुछ जैसे क्षण में ही स्पष्ट हो गया. मुझे बड़ा तीखा- सा दर्द हुआ…एक चोट-सी लगी, जैसे एक रबर के बहुत खिंच जाने पर उसे सहसा छोड़ देने पर लगती है… पर फिर सब कुछ अतिरिक्त शांत हो गया… जैसे उठी हुई लहर पर कोई शरारती बच्चा ज़ोर से पत्थर फेंके… उस लहर में एक साथ हलचल हो, पर फिर सब स्थिर हो जाये… अतिरिक्त स्थिरता… एक जड़ता– सी मुझ पर छा गयी थी.

फिर मैं घर लौटी.

मैंने आंखों में सुरमा डाला और उसकी ठंडक से उस दिन आंखों से कुछ गज्यादा पानी बह निकला. किसी ने यह नहीं सोचा कि मैं रो रही हूं. पर, सुनो, मैं तब भी यही सोचती रही कि सुरमा डालकर और आंसू बहाकर मैं सबको धोखा दे भी दूं, तो खुद से नहीं बच सकती. उन्हीं धुंधली आंखों से मैंने देखी वह रेशम के सतरंगे डोरे से बुनी हमारे रिश्ते की डोर, जिस पर मेरे मना करते-न-करते तुमने गांठ लगा दी थी और मैं बड़ी कोशिश के बावजूद उसे खोल नहीं पायी थी.

आज आंखें बंद कर मैं फिर उस डोर की कल्पना कर रही हूं, जिसे जाने- अनजाने तुमने गांठ लगा दी थी और फिर कितनी सहजता से, कितने भोलेपन से उस गांठ को खोल दिया था. उस पर पड़ी सलवटें भी निहायत ईमानदारी से मिटा डाली थीं. फिर तुम भूल गये थे कि कभी इसमें गांठ भी लगी थी. वह सलवटें- रहित रेशम के सतरंगे डोरों से बुनी डोर ही तुम्हारे जीवन का सत्य बन गयी थी, पर मेरी आंखें आज भी उस गांठ को लगते- खुलते देखती हैं और फिर देखती रह जाती हैं… मैं किसी जड़, मूक, निस्पंद, चेतनाहीन प्रतिमा की तरह यह सब देखती हूं… यह देखने का सिलसिला कभी समाप्त भी होगा क्या ? कौन जाने !

स्थिर… स्थिरता, फिर अतिरिक्त स्थिरता… व्यवस्थित हो गया सब कुछ. शादी भी हो गयी. तुम्हारी उसी सरोज के साथ. अब उसे लेकर तुम विदेश भी चले गये हो. इतनी दूर होकर भी कभी- कभी तुम्हारे बेहद नज़दीक होने का मुझे अहसास होता है….

तीसरा मोड़ ः

मुझे अक्सर न जाने क्या हो जाया करता है. आज कुछ स्वस्थ अनुभव कर रही हूं. कल तक मैं बहुत बीमार महसूस कर रही थी, जैसे किसी अथाह पानी में डूब गयी हूं. हिचकियां, लगातार हिचकियां, रोयें- रोयें पानी- सा झरा जा रहा था. इन दिनों फिर शरीर जैसे हवा में डोलता है. अभी पांच दिन पहले ही ज़ेरों का चक्कर आया था. मैं अब और सह भी नहीं पाती. मुझे बारह अप्रैल को अस्पताल जाना है. फिर वहीं रहना और शायद लौटकर भी नहीं आना है. कितनी सुखद कल्पना है….! मैंने कल कई कसमें खायी हैं.

पहली कसम- उसके बारे में कुछ सोचना नहीं है. वह सरोज के साथ विदेश में है. यह सब जानते हुए भी मैं क्यों  क्लब में उसकी प्रतीक्षा करती हूं ? डायरी लिखकर यह क्यों सोचती हूं कि उसे खत लिख रही हूं ? वह डॉक्टर है, तो मैं इस ‘कारण’ से क्यों दूसरे डॉक्टरों से उसके बारे में कुछ जानने की आशा रखती हूं ? और फिर इतनी… तीन साल पहले की दोस्ती को याद करने से क्या फ़ायदा ! और वह दोस्ती भी छोटे से समय की ! क्या सब बकवास नहीं है ? अब से उनके बारे में नहीं सोचना. उसने मुझे धोखा ही तो दिया. मैं रांची कविताएं भेजती रही और वह सरोज को खत लिखता रहा. उस पहले मोड़ और दूसरे मोड़ में कितना फ़र्क है- पूरे एक साल का. रांची जाने से पहले, फिर लौटने के बाद… यह सब कुछ नहीं. इस डूबते हुए सूरज के साथ इसकी याद भी आज डूब जाये. फिर कभी सबेरा न हो. ऐसे उजालों से तो अंधेरे अच्छे.

दूसरी कसम- अपनी सेहत का खयाल रखना.

तीसरी कसम- खूब पढ़ना और घर का काम करना.

चौथी कसम- डायरी कम लिखना.

सब कल से नियमित रूप से शुरू.

अप्रैल 13, 65

एक बीमार वातावरण. अजीब-सी गंध. डॉक्टर. सफ़ेद कपड़ें में लिपटी नर्सें. स्ट्रेचर. मरीज़ पर मरीज़. दवाइयां. डेटॉल. कराहती हुई आवाज़ें…

ऐसे ही वातावरण में आज मैं आयी थी. आस-पास के मरीज़ें ने एक अजीब सहानुभूति मिश्रित निगाहों से मुझे देखा था. मेरी आंखों में खोयी हुई चमक एक मिनट के लिए आ गयी थी. मेरे बेड का नम्बर है यू. 36 (बी.ए. में मेरा रोल न. भी यही था) डॉक्टर ने मेरा परिचय कराया, आया से. नाम है सरस्वती. मेरे पास रहेगी. देखने में कुछ अजीब-सी है. लगता नहीं है कि हिंदी जानती होगी. पान खाये हुए ओंठ और दांत, रंग काला, कपाल पर चंदन की बिंदी, नाक में दोनों ओर चांदी की कीलें, एक-एक कान में पांच- पांच छल्ले, कसकर गुथी हुई एक चोटी, बहुत छोटी-छोटी आंखें, थुलथुल करता शरीर. यह मेरे पास रहेगी. जाने कैसे बोलेगी… रात को सो नहीं जायेगी… मेरी चोटी भी अपनी तरह कसकर गूंथ देगी. जैसी भी हो, अब इसके साथ एडजस्ट तो करना ही पड़ेगा… !

मैं अपने कमरे के चारें तरफ नज़र घुमाती हूं. एक बहुत लम्बा-सा कमरा है. थोड़ी-थोड़ी दूर पर लकड़ी के पार्टीशन हैं. उस पार्टीशन में एक दरवाज़ा है. खुला हुआ है. उस पर एक परदा लटका हुआ है. मेरे बेड के पास ही एक छोटी-सी मेज़ है. उस पर डेटॉल, रुई, थर्मामीटर, चार्ट… न जाने क्या- क्या रखा है. सब मिलाकर मुझे याद हो आता है कि मैं बीमार हूं….

उस लकड़ी के पार्टीशन पर एक कैलेंडर लगा है. शायद रशिया का है. खिड़की से मुझे बाहर की सुनसान सड़क दीख रही है. एक बरगद का घना पेड़ भी दीखता है. उस पेड़ पर नये-नये चटकीले हरे रंग के पत्ते आने लगे हैं. मैं सोचती हूं, यह हॉस्पिटल किसी चलते हुए रास्ते पर होता, जहां से मैं ट्राम और बस का शोर सुनती, गाड़ियों की आवाज़, ट्रकों का शोर… यह भी जानती हूं कि जब मुझे उस बीमारी का दौरा पड़ता है, तो किसी का बोलना भी अच्छा नहीं लगता. किसी भी तरह की आवाज़ काटने लगती है. फिर यह सुनसान सड़क ही
ठीक है.

वह आया मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखती है – ऊपर से नीचे तक. फिर अपने रंगे ओंठें से पूछती है- “हर सप्ताह आना पड़ता है ?”

यह तो हिंदी बोल लेती है. इसे बताया किसने. डॉक्टर ने कहा होगा.

मैं उसके प्रश्न के उत्तर में सिर हिलातीहूं.

वह फिर बड़ी सहानुभूति से कहती है- “ सब ठीक हो जायेगा. उबला खाना खायेगा, आराम करेगा. हम आपको एक महीना में बिल्कुल ठीक कर देगा …”

मेरी और देखती रहती है. मुझे कहना ही पड़ता है- “हां, कुछ खास बात नहीं, ठीक हो जायेगी.”

अब जैसे मैंने उसे बोलने का मौका दिया- “ना, दीदी, इलाज नहीं करने से बढ़ने सकता है. ये बीमारी पुराना होने से तो बहुत खराब होता है…”

मैं बिना किसी कारण के हंसकर इस वार्तालाप पर फ़ुलस्टॉप लगा देती हूं.

अप्रैल 20, 65

सोचती थी, अस्पताल में ठीक रह पाऊंगी, पर यहां के बंधे मशीनी जीवन से भी ऊब गयी हूं. रोज़ का एक ही कार्यक्रम है – डॉक्टर आता है, देखता है, आश्वासन देता है, चला जाता है. आया बहुत सेवा करती है, खयाल रखती है, अपनी कहानियां सुनाती है, जिन्हें मैं सुन भी नहीं पाती और सुनना भी नहीं चाहती. घर से रोज़ कोई न कोई देखने आता है- कभी भैया, कभी अम्मा, कभी पापा, चाचा आदि. मुझे इन सबका आना अच्छा नहीं लगता. यहां क्या कोई नुमाइश लगी है, बारी- बारी से सब देखने चले आते हैं ! मूझे यहां आये सात दिन हो गये. यहां के बीमार वातावरण में कभी भी अपने को स्वस्थ अनुभव नहीं कर पाती… लगता है, मेरे जीवन की गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया है. उसके पहियों में पंक्चर हो गया है. कोई पुर्ज़ा खराब हो गया है. और यह डॉक्टर, ये नर्सें, यह आया और यह अस्पताल का बीमार वातावरण मुझे धक्के देकर ठेल रहा है, पर अब और चल नहीं पाती… थक
गयी  हूं…

मोसम्बी, अनार, संतरे के रस, बार्ली मिला दूध, उबली हुई सब्ज़ियां, सूखे फुलके और हर पांच मिनट पर दवाई…उफ़ ! मुझे यह सब नहीं चाहिए… मेरी सारी ताकत किसी ब्लॉटिंग पेपर ने अंतिम बूंद तक सोख
ली है…

आज मैं आईने में अपना चेहरा देख रही थी. आया चोटी कर रही थी. मैं वह बीमार चेहरा देख रही थी. सांवले रंग को पीलेपन ने और सांवला बना दिया था. वे आंखें, जिन पर कभी अतिरिक्त चमक रहती थी, अब बुझ-सी गयी है. उनकी सारी चमक उस रशिया के कैलेंडर में समा गयी है ? आंखों के नीचे काले- काले धब्बे. सूखे हुए ओंठ, जिन पर अब सफ़ेद पपड़ी -सी जमने लगी है…मैं उस बीमार चेहरे को और देर तक नहीं देख पाती. मुझे ज़ोर के चक्कर आ जाते हैं. मैं अपनी दोनों हथेलियों से अपना सिर थाम लेती हूं….

अब उस डॉक्टर ने नींद की गोलियां खाने को भी मना कर दिया है. कहता है- “अरे, हमारा सरिता बहुत बहादुर है. ” फिर उपदेश देता है- “दैट अफ़ेक्ट्स योर हार्ट. अब तुमको खूब अच्छा दवाई देता. नहीं ठीक होगा, तो ऑपरेशन कर देगा. बस…बस, फिर तुम परफ़ेक्टली ऑलराइट हो जायेगा….!” वह खिलखिलाता है. मैं भी हंस देती हूं- अपने ठीक होने पर नहीं, इस बात पर कि वह कैसे मुझे बच्चा समझकर बोलता है.

अप्रैल 24, 65

अब मुझे रात को नींद नहीं आती. रात को जाग– जागकर अपनी मौत – के सपने देखती हूं- तुम सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए सरोज को निहारते हो. इतने में प्रीत मौसी आकर कहती हैं- ग़जब हो गया, बिल्लू ! वो सरिता है न, फ़लां अस्पताल में मर गयी, बिचारी ! तुम्हारी कितनी तारीफ़ करती थी! अभी उमर ही क्या थी उसकी ! ईश्वर की लीला भी… हाय रे…! तुम झटके से उठ खड़े होते हो. आधी जली हुई सिगरेट को बुझाकर सरोज की ओर, फिर मौसी की ओर देखते हो. बड़े बेचैन- से होकर बरामदे में चले जाते हो. मौसी लौट जाती है. सरोज तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर पूछती है – ‘सरिता’ तुम उसका हाथ पकड़कर बीच में ही कहते हो-‘ छोड़ो, थी कोई…! चलो, फिल्म देख आयें !’ और तुम एक दूसरी सिगरेट सुलगा लेते हो. जाते- जाते अपने रबर सोल के जूतों से अधजली बुझी सिगरेट को नाली में फेंक देते हो… वह पानी से बहती हुई नीचे चली जाती है… मेरी मौत की तुम्हारे चेहरे पर इतनी-सी प्रतिक्रिया…

नहीं, तब मैं मरना नहीं चाहती. मेरा ऑपरेशन हो जायेगा. मैं ठीक हो जाऊंगी. फिर एक नयी ज़िंदगी शुरू होगी. एम.ए. करूंगी. पी.एच.डी. करूंगी. फिर कविताएं लिखूंगी… खूब काम करूंगी. बच्चों को पढ़ाऊंगी. बच्चे मुझ पर जान छिड़केंगे.

लो, यह दर्द फिर शुरू हो गया है. सच, इतना तीखा दर्द होता है कि मैं…मैं सह नहीं पाती… और जब कोई यह कहता है- ‘बड़े आदमियों की लड़की है न, जरा- सी बीमारी को सह नहीं सकती ! दर्द होता है ज़रा-सा. हाय-हाय करके आसमान सिर को उठायेगी…!’ तुम सोचो, मुझे कैसा
लगता होगा…!

एक बार तुमने भी कुछ ऐसा ही कहा था. बहुत पहले… मैं बीमार थी. तुम्हारा
फ़ोन आया.

‘घर पर आ जाओ….’

‘तबीयत ठीक नहीं… मैंने कांपती हुई आवाज़ में कहा था.

‘बहाने न बनाओ, आ जाओ.’

मैंने आंखें पोंछते हुए कहा था- ‘विश्वास करो, नहीं आ सकती. आने लायक हालत नहीं है…’ ‘झूठी कहीं की…. मरो फिर !’ और लाइन कट चुकी थी. उस दिन काफ़ी देर तक मैं सिसकती रही थी. ‘बहाने न
बनाओ !’ ‘मरो फिर !’ मेरे कानों में तुम्हारी आवाज़ देर तक गूंजती रही थी और मैंने स्लीपिंग पिल्स उठा ली थी. पूरी पंद्रह थीं. मेरे एक हाथ में गिलास भर पानी था. बस, ओंठें से लगने भर की देर थी कि किसी ने कहा- ‘इतनी सेन्सिटिव मत बनो…!

और वह घड़ी जाने कैसे टल गयी थी. उसके बाद न जाने कितनी बार आत्महत्या के विचार आये और न जाने कितनी बार ऐसे ही टल गये. और आज….उफ़ !

अब और लिखा नहीं जाता.

मई 2, 65

मैं आज पूरी तरह ठीक हूं…खुश भी हूं. परसों यानी चार तारीख को ऑपरेशन होगा. फिर मैं ठीक हो जाऊंगी न. चार तारीख के बाद मैं इस डायरी में नहीं लिखूंगी- तुम्हारी दी हुई बरसों पुरानी डायरी में लिखूंगी. उसका शीर्षक दूंगी- नयी ज़िंदगी की डायरी…. मुझे बहुत कुछ लिखना है. यह भी तो सम्भव है न कि आज का लिखना अंतिम लिखना हो. (मान लो, ऑपरेशन ठीक न हुआ और मैं….) नहीं, ऐसी बातें नहीं सोचते, सरि, तू बिल्कुल ठीक हो जायेगी…इन नये उगे पत्तों की तरह…फिर तू जली हुई सिगरेट नहीं रह जायेगी… फिर तू क्लब में उदास नहीं बैठेगी… फिर तू नये साल की खुशियां मनायेगी. तेरी ज़िंदगी का एक नया सफ़र शुरू होगा…. फिर तेरे तकिये बेतरतीब आंसुओं से नहीं भीगेंगे… फिर तेरी डायरी के अक्षर आंसुओं से नहीं धुलेंगे.बस, खुश हो जा.

मैं सोच रही हूं- मैं पी.एच.डी. करूंगी. फिर तुम्हें कोई कहेगा, डॉ. सरिता मल्होत्रा अमेरिका गयी है. तुम्हें कैसा लगेगा ? वही गज्यादा खिचे हुए रबड़ को अचानक छोड़ देने की चोट, या लहरों में पत्थर मारने की हलचल, या गरम कॉफ़ी से ओंठ जल जाने का झटका ? मैं…खुश हूं.

आज मैं कोई गीत गुनगुनाना चाहती हूं. एक वह, जो मुझे और तुम्हें बहुत प्रिय था- ‘मुगले आज़म’ की एक गज़ल. एक वह रुबाई, जो मैंने खुद लिखकर सुनायी थी… कल देखो क्या हुआ था, मुझे वही तीखा-सा दर्द हुआ और मेरा खयाल बुरी तरह भीग गया था. फिर तकिया एक-एक कर चारों कोनों से भीग गया था और तब मुझे वही दिन याद आ रहा था, जब मैं सुरमा लगाने के बहाने रोयी थी…कल डॉक्टर ने अम्मा और पापा से बात कर ऑपरेशन की तारीख निश्चित की थी. अम्मा और पापा उदास घर लौटे थे. कितने बुजदिल हैं न वे… मैं
खुश हूं.

मैं आया की ओर देखती हूं. इन बीस दिनों में इसने मेरी कितनी सेवा की है ! रात- रात भर जागकर मेरे पैर दबाती रही है. मैंने कभी भी खुद जागकर इसे सोते हुए नहीं देखा. पर आज ये भी कुछ सुस्त है. किसी ऑपरेशन के बारे में इनकी बुरी धारणा क्यों है ? किसी भावी आशंका ने, पूर्वनिश्चित धारणा ने सबके मुंह पर स्याही पोत दी है, जबकि मैं खुश हूं….. मुझे लग रहा है, नया साल तो आज शुरू हुआ है. आज मुझे मोसम्बी का रस भी अच्छा लग रहा है.. उबली सब्ज़ी भी स्वादवाली थी… पर देखो, मैं कितनी जल्दी थक जाती हूं ! मेरे पैर कितनी जल्दी सुन्न हो जाते हैं. हाथ चलते ही नहीं. पर आज मैं लिखती जाऊंगी.

मुझे कितने लोगों को पत्र लिखने हैं ! – शीला, मीनू, एलिस, प्रिया, सबको. सबके पत्र जमा होते जा रहे हैं. मेरा ऑपरेशन हो जाये, फिर मैं सब को लिखूंगी… फिर मैं भी रंगीन खत लिखूंगी…रंगीन क्लबों में जाऊंगी… रॉ-सिल्क की साड़ियां पहनूंगी… खूब फ़िल्में देखूंगी… विक्टोरिया में घूमूंगी… ताज भी जाऊंगी…

यह क्या हो रहा है ? देखो, यह क्या होने लगा मुझे ? कहा न तुम्हें, सुबह पेन किलर लिया था- डायरी लिखने के लिए. उसका असर एक घंटे रहता है. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा है. पर मुझे और लिखना था… मेरी डायरी अभी पूरी
कहां हुई…

 और यह लड़की ‘शायद’ अब नहीं है. मैंने कहा था न, उसकी मौत को शायद कहना मुझे अच्छा लगता है.   

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