हाहाकार की हकीकत

♦   प्रभु जोशी   >

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उसके पतन की पटकथा शुरू हो गयी थी और अंतिम दशक तक पहुंचते-पहुंचते तो उसके तमाम शिखर भग्नावेश में बदल गये. क्योंकि, जिन ‘विचारों’ की ऊंचाइयां आकाश नापने लगी थीं, वे ध्वंस के विवर में विसर्जित हो गये. बहरहाल, इक्कीसवीं सदी के उदय की गोद में, मनुष्य का मन अवसादों के अम्बार में दबा हुआ था. वह एक विचित्र बदहवासी में था कि पता नहीं, भविष्य का मानचित्र कौन-सा रूप लेने वाला है. चतुर्दिक एक हलातोल मची हुई थी, क्योंकि सबसे पहले वही मीनार धंसी, जिसके शीर्ष पर चढ़कर विगत सत्तर वर्षों से इस प्रश्न का उत्तर दिया जा रहा था कि एक आदमी अमीर क्यों है और एक आदमी गरीब क्यों है. संसार ने देखा कि इस ‘विचार के पराभव’ के साथ ही सारे ‘इज्म’, लगे हाथ ‘वाज्म’ में बदल गये. तमाम यूटोपिया, डिस-टोपिया में. यह दुनिया के एक-ध्रुवीय हो जाने की सूचना थी. उसने सभी धाराओं-विचारधाराओं को अपने ‘महानिवसर’ में फेंट कर एकमेक कर दिया था. ‘तकनीक’ और ‘मनुष्य’ के बीच के द्वंद्व में, उसने तकनीक को विजयी घोषित करते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि पूंजी का विकल्प सिर्फ पूंजी ही है- और, ‘श्रम’ अब निर्णायक हैसियत में नहीं रह गया है. हम तकनीक से पैदा हुई उस लहर के सामने  हैं, जो तैरने से इनकार करेंगे, वे डूब मरेंगें. नैनो और बायो इंजीनियरिंग ने जेनेटिक्स को निगल लिया है और मानव-मस्तिष्क को अब इंटरनेट से जोड़ कर हम एक नया मनुष्य पैदा करने जा रहे हैं. कुर्जवेल ने कहा ‘जीरो-चिप टेक्नोलॉजी, उस समय अपनी उच्चतम अवस्था में पहुंच जायेगी, जब हम ‘फिजिक्स ऑफ सिलिकान की थियोरेटिकल सम्भावना’ को छू लेंगे. -बाद इसके दूसरी टेक्नोलॉजी शुरू हो जायेगी. मनुष्य ‘साइबोर्ग में बदल जायेगा.’ बहरहाल, तकनीक ने हर ‘विचार’ और ‘दर्शन’ को संकटग्रस्त कर दिया. एक स्पष्ट विभाजन पैदा हो गया. सी. पी. स्नो ने ठीक ही कहा था कि एक संस्कृति, ‘विज्ञान’ की है, और दूसरी ‘परम्परागत मानवशात्र’ की. निश्चय ही विज्ञान की संस्कृति ने ‘परम्परागत’ को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हुए उसकी विदाई की घोषणा पुष्ट कर दी. मूल्य संकटग्रस्त हुए और अंततः छीजने लगे. क्योंकि, ‘तकनीक अपनी शक्ति, सिर्फ पूंजी के सहारे अर्जित करती है. कुल मिलाकर, एक नयी और अधिक चंचला-पूंजी का प्रवाह ऐसा उठा कि पूरी दुनिया उसके वर्चस्व के नीचे चली गयी. वही निर्णायक बनी और उसने ‘वेल्थ आफ नेशन’ के क्लासिकल-केपेटिलिज्म’ की नयी प्रविधि से प्राण-प्रतिष्ठा कर दी. मिल्टन फ्रीडमेन की ‘वैचारिकी’ जिसने कभी थैचर को लौह-महिला बनाया था, उसी के भारतीय- सत्ता में शामिल शिकागोई-शातिरों ने मनमोहना मिक्स’ को अवतरित कर दिया. उन्होंने ‘महालनो बिस-मॉडल’ की अंत्येष्टि करते हुए, 14 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी को 22 जुलाई 1991 को अंतरराष्ट्रीय पूंजी के हवाले कर दिया. बहरहाल, यह तारीख हमारी सांस्कृतिक आर्थिक और राजनीतिक-संप्रभुता के ‘विसर्जन की पुण्यतिथि बन गयी. क्योंकि, जो बेल आउट डील हमने की थी, उसके बाद हमारे ‘राष्ट्र-राज्य’ को अपने दायित्वों से शनैः शनैः मुक्त होना आरम्भ करना था. मसलन, जब ‘गांवों की व्यथा’ का दुःखड़ा रोते हुए किसानों की आत्महत्याओं पर रुदन करते हैं तो एक निर्लज्ज अनसुनी, अनिवार्य है. क्योंकि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जब अंतर-राष्ट्रीय से जोड़ दिया जायेगा तो ‘सत्ता के सरोकार’, ही बदल जाने हैं. क्योंकि, ‘भूमंडलीकरण’ का एजेण्डा है, कृषि को शून्य की ओर घेरते हुए ‘रोजगार-धंधों को मुख्य साधन बनाना है. शहरीकरण अनिवार्य है, तभी तो हमारे वित्तमंत्री चिदम्बरम कहते हैं, सन 2020 तक आधा भारत शहरों में बस जायेगा. आज पैंतीस करोड़ आदमी गांव से बहिष्कृत है और शहरों ने उन्हें स्वीकारा नहीं है. ये उसी आर्थिक नीति के तहत खदेड़े गये हैं. यह ‘रूरल-अर्बन डायकॉटमी’ है. गांव-शहर युद्धस्त हैं. युद्धस्त तो संस्कृतियां भी हैं. भाषा से भूगोल भिड़ा दिया गया है. भूख से भगवान. वे सांस्कृतिक विनिमय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पूंजी के वर्चस्व के नीचे, सांस्कृतिक अपहरण कर रहे हैं. इसलिए, अब एक नयी प्रविधि है. कल्चरल-इकोनॉमी, जिसके तहत पहले ‘पश्चिम की सांस्कृतिकता’ को भारतीय  महानगरीय उच्चवर्ग के लिए प्रतिमान बनाया-बताया गया. मुम्बई न्यूयार्क हो जाये. मेट्रो पोलिटन कल्चरल इलीट’ ‘अनुकरणवाद’ में फंसे. इसलिए, सूचना-प्रोद्योगिकी (तकनीक) ने संचार माध्यमों के जरिये सांस्कृतिक उलटफेर शुरू कर दिया. आपके युवा को बताया गया कि ‘फॅशन और उपभोग’ ही जीवनमूल्य है. इसलिए, घोषणा की गयी, जो निश्चय ही सदी का सबसे बड़ा लेकिन खूबसूरत झूठ था कि हिंदुस्तान तो दरअस्ल ‘यंगिस्तान’ है. वही उपभोग और फैशन की अर्थव्यवस्था का आधार है. अतः देश में बूढ़ा और प्रौढ़ व्यक्ति हो या विचार, मसखरी का विषय बन गया. ‘पुराने का दमन’ और ‘नये के स्वागत’ की हवा बनी. ‘परम्परा और इतिहास’ त्याज्य होने लगे. हिस्ट्री इज बंक. इतिहास बकवास है. यह इतिहास के बोध नहीं, बोझ का समय है- इससे मुक्ति अनिवार्य है. आदर्शों को कूड़ेदान में जगह मिलने लगी. गांधी ‘यू-ट्यूब’ पर बैली-डांस करते दिखायी देने लगे. यानी, जो कुछ आपका और अपना था, वह ‘हास्यास्पद’ की तरह व्याख्यायित होने लगा. ‘विचार’ की जगह ‘वस्तु महत्व पाने लगी. ब्राडिग की बुद्धि ने, ‘चयन के विवेक’ को नष्ट करते हुए बताया कि रिबोक का जूता, अमुक की शर्ट, ढमुक की घड़ी या ब्लैक-बेरी या एप्पल का मोबाइल ही, आपका ‘प्रतिष्ठा मूल्य’ है. जीवन से ‘प्रतिबद्धता मूल्य’ की बिदाई हो गयी. शुचिता का प्रश्न हाशिये पर हुआ ‘देह’ केंद्र में आ गयी. नैतिकता ‘मॉरल-फोबिया’ नामक रोग की तरह चिंतित हुई. क्लासमेट, सेक्समेट के सम्भावित प्रतिरूप में प्रकट होने लगे.

प्लास्टिक-सेक्सुअल्टी ने, भारतीय समाज की परम्परागत वर्जना में लंकाकाण्ड मचाया और एक निर्बाध ‘वर्जहीनता’ ही अभीष्ट बन गयी. मर्यादा, शब्द का उपयोग अश्लील और समाजधाती बना. कुलमिलाकर, ‘विचारहीनता का विचार’ ही पीढ़ी का अनुकरणीय मार्ग बना. इसे वे ‘टाइम फ्रैक्चर्ड’ की तरह व्याख्यायित करने लगे. देअर कल्चर शुड बी किल्ड विद काइण्डनेस की युक्ति से धीरे-धीरे पूरे ‘भारतीय मध्यमवर्गीय बावलेपन’ को उन्होंने राजी कर लिया कि वे स्वयं ही अपने ‘स्वत्व’ को छोड़कर ‘पश्चिम की सांस्कृतिकता और पूंजी को ही निर्णायक मान ले. हम जो यह उथल धड़ा देख रहे हैं भारतीय-समाज में पैदा हुआ, ज्ञानबोध का रेडीमेड संकट है, जिसमें आपके मूल्य, आस्था, परम्परा, यहां तक कि आपका वह ‘जनकल्याणकारी प्रतिज्ञा वाला संविधान ही जिल्द की टूट से पन्ने-पन्ने हो गया. नियामकताएं जर्जर हो गयी. उन्होंने आपको बताया कि ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मार्क्सवाद’, दोनों ही एशिया के आम तौर पर, तथा भारतीय समाज में खासतौर पर, अपने महा-आश्वासनों में विफल हो चुके हैं. यह उत्तर-पूंजीवाद का नया सांस्कृतिक तर्क बना. ‘जनतंत्र’ की मांग ने, अपने चरम में, एक नया और समूह-विरोधी ‘व्यक्तिवाद’ पैदा कर दिया, जिसके चलते हर नागरिक एक उपभोक्ता है. मार्केट-फ्रेंडली इंडिविजुअल है. यह सामाजिक-विश्वासघात की तार्किकता है.

निश्चय ही इसमें मीडिया, ‘सांस्कृतिक-दलाल’ की भूमिका में है. हम आने वाले तीन हजार साल की अखंड गुलामी के नीचे जा रहे हैं, जो जीवन के सभी अनुशासनों पर अपना वर्चस्व कायम कर चुकी है. हां, हा-हाकार कुछेक दायरों तक चलेगा ज़रूर लेकिन अंत में हम अपनी सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक संप्रभुता को खोकर एक अनाथ की तरह, उनकी इच्छाओं के मुताबिक खुद को ढाल ही लेंगे.

यही भारत की अंध-नियति है. हो सकता है, कुछ दिन तक हमारा देश ‘भारत बना रहे, लेकिन बाद इसके भाषा, भूषा और भोजन को छोड़ने के बाद, यह शत-प्रतिशत ‘इण्डिया’ ही जो जाना है. उसी हो जाने में हम अपने मोक्ष के दर्शन करेंगे. यह नाउम्मीदगी नहीं है बल्कि उसकी रणनीतिक विजय का निर्मम सत्य है.   

(फ़रवरी, 2014)

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