हम क्यों त्योहार विमुख हैं 

♦   गोपाल चतुर्वेदी    >

किसी उत्सव प्रिय देश में त्योहार विमुख होना, बिना किसी कानूनी हिफाजत के कट्टर धार्मिक मुल्क में अल्पसंख्यक रहने जैसा है. लोग आपको इंसानी चेहरे-मोहरे के बावजूद कोई अजूबा समझें. हमें आश्चर्य है. कुछ पढ़े-लिखे विद्वान जब गांधी टोपी ही धारण नहीं करते, उस पर ‘हम आम आदमी हैं,’ लिखने का ढोंग भी रचते हैं. भैया जी, जाहिर है कि आम आदमी हो. आम हो या खास, हम से क्या? आम हो तब भी अपने घर के और खास हो तो हमें तो खास बनाने से रहे!

दीवाली के अवसर पर हमें दूसरे घरों की रोशनी देखने में मज़ा आता है. अपने घर में हम बिजली की झालर क्यों लटकायें? ऊर्जा एक राष्ट्रीय संसाधन है. उसकी बर्बादी कहां तक उचित है? रोशनी न देख कर अड़ोस-पड़ोस के जिज्ञासुओं का पेट पिराता है. उनके दर्द की एक ही दवा है. वह हमसे घर आकर नहीं तो राह चलते पूछते हैं, “क्यों भैया जी! कोई त्रासदी हो गयी घर में क्या जो दीवाली नहीं मना रहे हैं?” दूसरों के निजी जीवन में बिना किसी प्रयोजन झांकना कुछ का शौक है तो कइयों की मजबूरी. हम चुप रह जाते हैं. उनसे कैसे कहें कि अपने काम से काम रखिए. शिष्टाचार के शिकार मन की बात मन में रखने को विवश हैं.

 हमारी पत्नी को किसी ने समझा दिया है कि दीवाली की रात को पूरे घर की बत्तियां ‘ऑन’ रहनी चाहिए. उनकी मान्यता है कि इससे लक्ष्मी मैया को पधारने में सुभीता होगा. गनीमत है कि वह घर के दरवाजे खुले रखने को बजिद नहीं हैं वर्ना प्रतीक्षा लक्ष्मी जी की रहती और प्रवेश चोर कर जाते. यों चोरों के लिए कुंडी-ताले का वैसे ही महत्त्व नहीं है जैसे सरकारी कर्मचारियों के लिए नियम-कायदों का. दोनों उनकी काट में माहिर हैं.

लक्ष्मी जो धन-दौलत की ही देवी हैं. धनवालों की ओर आकृष्ट होना धन का स्वभाव है. लक्ष्मी जी अपने धन-कुबेर निष्ठावान चेलों को क्यों न पहचानें? उन की कृपा की सम्भावना उन्हीं तक सीमित है.

यों हम शुरू से त्योहार-विमुख नहीं रहे हैं. अपनी यह प्रवृत्ति सरकारी सेवा से ‘रिटायर’ होकर जागी है. सरकार जो है, वह रोज़ अपना त्योहार मनाती है. इसीलिए, छुट्टी के दिन भी दफ्तर खुलते हैं. अफसर लंच तक कार्यालय की शोभा बढ़ाते हैं, उस के बाद किसी फॉर्म हाउस, नहीं तो पांच-तारा होटल की. छुट्टी में घर बैठे हर कर्मचारी के चेहरे पर उदासी की अबूझ रेखाएं हैं. देखे तो किसी को शक हो कि कोई शादीशुदा होकर भी अपनी प्रेमिका के बिछोह में व्याकुल है.

दुनिया का इतिहास अगर-मगर पर निर्भर है. हिटलर न होता तो? उसे भी ख्याल आ रहा है कि यदि छुट्टी न होती तो! वह कैंटीन में किसी के द्वारा मंगायी गयी चाय पीकर हालते-सरकार पर मुखर गौर फरमा रहा होता. इतने में बैठे-ठाले उत्सव की बेला आ टपकती. हर सरकारी दफ्तर की तरह उस का महकमा भी धन-सम्पर्क का है. कोई न कोई प्रार्थी टपकता ही रहता है. सबसे अच्छी बात है कि फाइल प्रोसेस करने से लेकर आगे बढ़ाने तक की दर तै है. न कोई हुज्जत, न तकरार.

आज़ादी के बाद की प्रगति का ही नतीजा है कि याचक और दाता दोनों विनम्र हैं. कहीं विरोध का स्वर नहीं है न कोई मानसिक ग्लानि की लुकाछिपी. कागज़ आया तो दबा कर रखना बाबू का अधिकार है और उसे कार्यालय की कारा से मुक्ति की करबद्ध प्रार्थना सम्बद्ध व्यक्ति का कर्तव्य. इस नैतिक और धार्मिक देश में हर धर्मभीरू जानता है कि पूजा-प्रार्थना के साथ चढ़ावा एक अनिवार्य प्रक्रिया है. पूजा घरों में चढ़ावे का कुछ अंश तो प्रसाद बनकर लौटता है. सरकारी प्रभु और पुजारी इतने दयालु नहीं हैं. यहां हर चढ़ावा हजम करने का चलन है. उसके बाद भी कोई पहचान या रियायत की डकार नहीं लेता है. हर बार, हर कागज़ के साथ चढ़ावा एक अलिखित नियम है.

हर दफ्तर में उत्सव एक रोज़मर्रा की घटना है. कुछ नामाकूल इसे दुर्घटना भी मानते हैं. धर्म में प्रभु का प्रसाद और समाज में दहेज दोनों के बिना गुजारा है क्या? जाने क्यों, कुछ इस लेन-देन को करप्शन का नाम देकर बदनाम करने पर उतारू हैं. कार्यालय का यह कागज़ी प्रकरण पूरी तरह से स्वैच्छिक है. इससे अधिक ज़ोर-जबरदस्ती तो दहेज की सौदेबाजी में है. पूजाघर में भी आस्थावान अपनी श्रद्धा के अनुरूप चढ़ावा चढ़ाता है. इस पर किसी को एतराज क्यों नहीं है? भगवान भी तो सबको उपलब्ध हैं. उन्होंने तो न प्रसाद की व्यवस्था की है, न ऐसा कुछ धर्म ग्रंथों में लिखा है. प्रसाद-चढ़ावा भी एक मानवीय व्यवस्था है. जब न इसका विरोध है, न आलोचना तो सरकारी प्रभु के साधकों ने क्या गुनाह किया है? सरकारी दफ्तर भी प्रजातंत्र का पूजाघर है और कर्मचारी उस के पुजारी. इस पूजा को दुर्घटना कहना हद दर्जे की नाइंसाफी है. इस प्रकार के कमअक्लों को खुद पर शर्म आनी चाहिए. दिक्कत है, अपने दुष्कर्मों पर शर्मसार न होना हर कायर की एक इंसानी सिफत है.

हम तो सरकार में रहे हैं और जानते हैं कि इस प्रतिदिन के उत्सव के अलावा हर धर्म का त्योहार वहां धूम धड़ाके से मनाया जाता है. अधिकतर को इससे एक ही शिकायत है. ऐसे मुबारक मौकों पर सरकार छुट्टी की घोषणा कर अपनी कार्य की और कर्मचारियों की कमाई की क्षमता व्यर्थ में घटाती है. कोई सोचे. इस विशाल देश में दिन में दो त्योहार सम्भव नहीं हैं क्या? अगर ऐसा हो भी जाता है तो सरकार की जेब से क्या जाता है? उसे तनख्वाह तो हर हाल में देनी ही है. अपने ऐसे कर्तव्य समर्थित कर्मचारी तो केवल उसे और कार्यकुशल बनाने की कृतसंकल्प हैं. यों भी सरकार की औपचारिक छुट्टी देने की दरकार ही क्या है? अनौपचारिक तरीके से तो वह हमेशा छुट्टी पर ही रहती है.

इस संदर्भ में एक अन्य तथ्य भी काबिले-गौर है. समाज हो न हो, सरकार और उसके कर्मचारी पूरी तरह से सैक्युलर हैं. दफ्तर में सब हिलमिल कर अपना नियमित भ्रष्टाचार-त्योहार मनाते हैं. इसमें न कोई जाति का भेद है न सम्प्रदाय का. उल्टे, हम सब में अभूतपूर्व एकता है. कमाऊ ‘सीट’ रहे या उबाऊ, दोनों पर वसूली की निश्चित दर तै है. ऐसा नामुमकिन है कि साख बनाने को इसमें कोई रियायत दे दे. कार्यालय की लंका के ऐसे कुम्भकर्ण सज़ा के पात्र हैं. उन्हें फौरन से पेश्तर वहां से हटाया जाता है. दफ्तर की यूनियन की खासियत है. भले ही उस की सियासी निष्ठा अलग-अलग दलों से है, स्टाफ-हित के, इस प्रकार के, मामलों में सब साथ हैं.

भ्रष्टाचार-त्योहार के अलावा अन्य धर्मों के पर्व उत्सव भी इसी भावना से ओत-प्रोत हैं. दीवाली हो या ईद मिलन, सब भाई-चारे की भावना से सिवैंया-समोसों का हनन करते हैं. हमारे एक बुद्धिजीवी साथी हैं. उन के मतानुसार, यदि सब का लक्ष्य समान है जैसे दफ्तर की हर गतिविधि में खाना, तो इससे देश की एकता-अखंडता पुख्ता होती है. हमने उनकी इस धारणा पर काफी गम्भीरता से विचार किया और इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि धार्मिक उत्सव के मूल में या तो निश्चित अवधि तक खाना त्यागना है, अथवा तला माल खाना है. हर धर्म और दफ्तर में खाने की अच्छी-खासी महत्ता है. दफ्तर ऐसे समान धर्मियों का समूह होने के कारण सामान्य से ज्यादा सेक्युलर है.

जब तक हम सरकार में सेवारत रहे, हमने घर और दफ्तर में हर धर्म के त्योहार में भाग लिया. होली, दीवाली, ईद, गुरुपर्व, क्रिसमस जैसे आम उत्सवों के अलावा वेलेन्टाइन डे तक मनाया है. इनमें अपनी निजी पसंद और प्राथमिकता दीवाली रही है. पहले के भारतीय शासक याने अंग्रेज़ बहादुर बहुत समझदार थे. उन्हें किसी ने बता दिया होगा कि लक्ष्मी धन की देवी हैं. वह चूंकि शासक थे तो उन्हें लगा कि सामान्य लूट तो रिआया से मालिक का हक है पर दीपावली के अवसर पर यदि लक्ष्मी दौलत की देवी हैं तो उन्हें भी धन के देवता बनने का खास मौका है. ‘साहब’ से जो भी मिलता, कुछ न कुछ नजराना लेकर हाजिरी बजाता पर दीवाली के मुबारक दिन तो उपहार की डाली ने एक अनिवार्यता की शक्ल अख्तियार कर ली.

आज़ादी के बाद, शासन की व्यवस्था में सिर्फ रंग का अंतर पड़ा है. गोरे साहब विदा हुए तो उनके स्थान पर काले साहब आ धमके हैं. अंग्रेज़ी के प्रयोग से लेकर कोड, नियम, उपनियम, मैनुअल वगैरह वगैरह सब गोरे साहब की हुकूमत के साक्षी हैं. अतीत की परम्परा को बरकरार रखते हुए उसमें परिवर्तन की यह एक आदर्श बानगी है. बदलाव बस गोरे की जगह काले का आया है. दीवाली की डाली भी अभी तक चालू है. कुछ न खुद को मधुशाला मानकर बच्चन जी की इन पंक्तियों ‘दिन में होली, रात दीवाली, रोज मनाती मधुशाला’ पर अमल भी शुरू कर दिया है. अब वह रोज़ ‘डाली’ का इंतजाम करने में व्यस्त हैं.

अपन यों ही संयत स्वभाव के हैं और सरकार में भी संयत व्यवहार के रहे हैं. अक्सर ऐसा होता कि क्रिसमस पर किसी ने केक लाकर दी तो हमने ‘मैरी क्रिसमस’ कहते हुए स्वीकार कर ली, दीवाली पर डाली से कभी परहेज नहीं किया और होली पर मिठाई या अबीर गुलाल से. किसी ने लंच पर बुलाया या डिनर पर तो हमें व्यक्तिगत सम्पर्कों से कभी ना कहने का साहस नहीं हुआ है. अगर हम ने ‘ना’ किया तो फाइलों पर किया और वहां ‘हां’ लिखने की कीमत भी बखूबी वसूली है. इस प्रकार पूरे सरकारी जीवन में जनता का धन खर्च करते-करते हम अपने पैसों के व्यय में बचत करते रहे हैं. जो आदमी वर्षों करता है, धीरे-धीरे उसकी आदत बनना एक स्वाभाविक परिणति है.

लोग हम पर व्यर्थ का आरोप लगाते हैं कि हम मुक्तखोर हैं. वह यह भूलते हैं कि हमने देश के संसाधनों का कभी अपव्यय नहीं होने दिया है तो हम निजी ज़िंदगी में ऐसा क्यों होने दें? जो हमें मुफ्तखोरी की मानसिकता से ग्रसित बनाते हैं, उन्हें शायद यह नहीं पता है कि हमने हमेशा अपने घर का किराया और गाड़ी के प्रयोग का नियम शुल्क सरकार को दिया है. यह बहस का मसला नहीं है कि सरकारी गाड़ी का खर्चा और उसके अनियंत्रित इस्तेमाल तथा हमसे वसूली की राशि में हाथी और चींटी का अंतर है.

घर में दूसरों को दिखाने को चूल्हा जलना भी ज़रूरी है. अवकाश प्राप्ति के बाद हम गैस और राशन के खर्चे से परेशान हैं. क्लब जाना हमारी और पत्नी की दिनचर्या में शामिल है. उसका बिल भी द्रोपदी के चीर-सा बढ़ता जा रहा है. त्योहार गरीबों के लिए हैं. उनके यही उत्सव के गिने-चुने मौके हैं. वह इन्हें उधार लेकर मनाएं तो मनाएं. हम तो सरकार में इन्हें रोज़ मना चुके हैं. अब वक्त और दौलत की इस राष्ट्रीय बर्बादी में शरीक होना हमें अनुचित लगता है!

(मार्च 2014)

Leave a Reply

Your email address will not be published.