सिंधु-स्मरण

♦  इंदुलाल गांधी       

      किशोरावस्था की कोमल उमंग और उम्र की पहली पचीसी के आविर्भाव का वह पहला परिभ्रमण था. जिसे वेद में ‘समुद्र-नंदिनी’ कहा गया है, उस पुण्यसलिला सिंधु के किनारे-किनारे लगातार बारह महीने तक घूमने का शारीरिक और मानसिक सौभाग्य मुझे मिला था. या यों कह लीजिए कि यह तरुणावस्था के प्रारम्भ काल की एक अत्यंत मुग्धमंगलकारी यात्रा थी. जैसे टूटा हुआ दर्पण अपने अनेक टुकड़ों में हमारे मुखड़ें के भिन्न-भिन्न भागों का खंडित होते हुए भी दर्शन कराता है, उसी तरह अनेक जलखंडों में फैली मुझे बहुरूपिणी सिंधु का अपूर्ण-पूर्ण दर्शन मुझे मिला था.

     कैलाश से उत्पाती तरुणी की तरह सरसराती नीचे उतरती हुई और पार्वती के चरणों की वंदना करके ससुराल जाती हुई गम्भीर-गर्वीली, चतुर कन्या-सी सिंधु पश्चिमोत्तर की ओर शरमाती-शरमाती आगे बढ़ती है. पर ससुराल जा रही कन्या को सखियों का साथ तो चाहिए ही न? इस लिए आगे रुककर वह दूसरी सहेलियों के साथ दक्षिण-पश्चिम की ओर इस तरह चलती है, जैसे कोई अभिसारिका पल्ला पकड़े जा रही हो.

     तपःशोभना सिंधु हजारों वर्षों से अपनी इस ससुराल में है, लेकिन मन यहां होने के बावजूद उसकी आंखें पार्वती के चरणों पर ही स्थिर हो गयी हैं. वेद में ‘कारुण्य बाहु’ कहकर जिसकी प्रशस्ति की गयी है, उस पितृप्रदेश कैलास का वरदहस्त तो सिंधु के मस्तक पर से कभी हटा ही नहीं. और शैलाधिराह-तनया पार्वती आज भी कहती हैं- ‘मैं यहां हूं बहन, तेरे पास हूं. आर्य यहां आये, वेदों की पूजा-अर्चना के फूल तेरे जूड़े में गूंथे, तेरी सहस्त्रमुखों से प्रशस्तियां गायी गयीं, तेरे कारण हमें भी ऋषि-मुनियों का अर्घ्य प्राप्त हुआ.’

     ‘तू बार-बार पीछे मुड़कर क्या देखती है बहन? जिसकी तू है, उसी की मैं. आर्यावर्त का आंगन छोड़कर मैं कहीं जाने वाली नहीं, किसी और की होने वाली नहीं.’

     वर्चस्वी आर्य-संस्कृति का बीज यहीं रोपा गया था. वरुण और अग्नि, इंद्र और हिरण्यगर्भ सविता के प्राणोत्तेजक और प्रेरणाप्रद स्तवनों से सिधु का प्रदेश धर्म-शुद्ध और चारित्र्यशुद्ध बना था. अत्रि, अंगिरा, भारद्वाज, वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे समर्थ तपस्वियों की कल्याणमयी छाया के नीचे यहां की प्रजा निर्भीक और संस्कारवान बनी थी. देवताओं द्वारा निर्मित और रक्षित इस प्रदेश की सात नदियों में सिंधु और सरस्वती आर्यों को अत्यंत प्रिय थीं.

     सिंधु के विषय में तो कहा जाता है कि साक्षात वरुणदेवता ने इसके लिए मार्ग प्रशस्त किया था. यह पृथ्वी का सहारा लेकर-धीरे-धीरे आगे बढ़ती थी, परंतु जब इसमें बाढ़ आती, तो इसके हाथ आकाश को छू लेने के लिए ऊपर उठ जाते. इसका पानी हमेशा श्वेत, स्वच्छ और तेज से झिलमिलाता रहता था. अन्य नदियों का पानी जब इसमें मिलता, तो इसका प्रयाण शान के साथ आगे बढ़ती हुई समर-सेना जैसा लगता. पृथ्वी के सरिता-समूह में सिंधु सर्वाधिक वेगवती है. इसका प्रवाह स्वस्थ युवती के सौष्ठवपूर्ण शरीर जैसा सप्रमाण रहता. इसके तट पर उत्तम अश्व उत्पन्न होते और बढ़िया अनाज उगता.

     उन दिनों मुझे सिंधु से अजीब-सा लगाव हो गया था. सारे-सारे दिन सिंधु के किनारे-किनारे फिरता, और चांदनी रातों में कभी-कभी आधी रात तक किसी ऊंची शिला पर बैठकर उसके अस्खलित प्रवाह को देखा करता. मेरी कल्पना में ऋषि-मुनियों के आश्रम घूमते रहते. मुझे ऐसा लगता, जैसे मैं उनकी पर्णकुटियों के द्वार पर खड़ा उनकी याज्ञिक क्रियाओं को देख रहा हूं, और उनके हवन में आहुतियां डाल रहा हूं. मेरा मन होता कि मिट्टी के कलश लिये रूपवती तेजस्वी ऋषि कन्याएं सिंधु में जल भरने आयें और मैं उनकी आंखों में आंखें डालकर देखूं, बातें करूं.

     किशोरावस्था के बाद की पहली पचीसी का यह मेरा अद्भुत रमणीय स्वप्न था.

     सिंधु को मैंने जहां भी देखा है. मुझे लगता है, जिस प्रकार प्रकृति प्रभात, मध्यान्ह, संध्या और मध्य रात्रि को नये और अनोखे रूप धारण करती है, उसी प्रकार सिंधु के एक-एक प्रवाह का रूप उसके दूसरे रूपों से एकदम भिन्न होता जाता है. सक्खर के निकट ‘साधुवेला’ के मंदिरों के समूह के पास बहती सिंधु मुझे खेल में खोयी हुई छोटी-सी लड़की लगी थी.

     मंद-मंद मुस्कराता गर्वीला चेहरा, उठती-गिरती पलकों जैसीं तरंगें और प्रवाह ऐसा, जैसे उठते कदमों के साथ उछलती हुई साड़ी की चुन्नटें. पानी की सतह इसतरह थरथराती जैसे खेतों में खड़ी कोई कृषक-कन्या धीरे-धीरे अनाज की ओसाई कर रही हो. पूर्व दिशा में सूर्य कुछ ऊपर चढ़ आया था इसलिए एकदम छोर तक पहुंचते उसके प्रवाह-पथ स्वर्णरज-सी बिखरी हुई थी और वह हिरण्यवर्णा सिंधु ऐसी लगती थी, जैसे कोई ऋषि-कन्या कोई गीत गाती हुई सोने के पांसों के खेल रही हो. सम्पूर्ण जल-विस्तार अभिनव सौंदर्य से भरा-भरा लगता था- आंखों को भला लगने वाला, स्वच्छ, तेजस्वी और शांत.

     ‘देवलबंदर’ के पास ताड़ के झुंडों के बीच से निकलती रूपगर्विता सिंधु के यौवन को देखकर तो मैं तट पर स्तंभित खड़ा रह गया था. पानी में पैर डालते ही पूरे शरीर को खींच लेने वाला वेगवान प्रवाह और ऐसा समृद्ध जल-सौंदर्य मैंने और कहीं नहीं देखा. उस समय मुझे लगा कि यदि इस जल-सुंदरी को रास्ते में ही रोक लिया जाये, तो…? मैंने जरा आगे पग बढ़ाकर अतृप्त जिज्ञासा से उसके प्रवाह का स्पर्श किया, तो ऐसा लगा, मानो उसका उत्तरीय मेरे हाथ में आ गया हो- जैसे पुरूरवा के साथ में उर्वशी का उत्तरीय. लेकिन तभी पानी के प्रवाह ने मेरा पैर अपनी ओर खींचा और मैं अलग हट गया. मेरी इस पराजय पर किनारे खड़े वृक्ष खिल-खिलाकर हंस पड़े.

     सिंधु की ऐसी उग्र, मनोरम विलक्षणता देखकर मुझे लगा, शायद ऐसे ही प्रचंड प्रवाह में महिवाल के प्रेम में पागल सोहनी किसी अंधेरी रात में कूद पड़ी होगी. एक जलोन्मत्त जलसुंदरी और दूसरी प्रणयोन्मत्त प्रेमिका. दोनों की अधीरता एक जैसी.

     सोहनी? हां, शाह अब्दुल लतीफ की यह तेजस्विनी नारी सृष्टि भी उस समय मेरी कल्पना में थी. रोज रात सिंधु की धारा में तैरकर वह अपने प्रियतम महिवाल से मिलने जाती थी. उसके प्रेम-प्रवाह के सामने सिंधु के जल-प्रवाह की क्या बिसात! सिंधु सोहनी के मनोवेग को पहचानती और सोहनी को सिंधु के अथाह पानी में तैरना अच्छा लगता. कहते हैं, सोहनी सिंधु के ममतालु वक्ष पर तैरती नहीं थी, पैरों से चलती हुई पार हो जाती थी. चलने की अपेक्षा तैरना उसके लिए अधिक आसान था.

     सोहनी तो सिंधु-तट की राधा है. यमुना-तट विहारिणी राधा के जीवन में प्रिय-मिलन की मधुर तृप्ति का सात्विक उल्लास है, लेकिन सिंधु की सुहागन सोहनी सनातन अतृप्ति की वेदनामयी, किंतु साहसी प्रतिमा है. गिरिधर की बावरी मीरा की तरह उसने भी पार्थिव बंधनों को तोड़ दिया है. अपनी अनेक व्यवहार कुशल और घरेलू सहेलियों की तरह वह गृहिणी नहीं बन सकी.

     वह तो आदर्श के ध्रुवतारे पर नजरे गड़ाये सत्य की सीमा लांघने निकल पड़ी है. किधर? जहां जल-चक्र विनाश का तांडव नृत्य करते हैं, जहां कभी सैकड़ों गृहिणियों की देहलताएं इस तरह लुप्त हो गयीं कि उनका नाम-निशान भी नहीं रहा, उस मृत्यु के मंझधार में जीवन-ज्योति की आस लगाये, प्यार की पुकार पर दौड़ती सोहनी अपने प्रियतम के पदचिन्ह खोजती आगे बढ़ती जाती है. उन्मत्त सिंधु भी यहां से उसी प्रकार आगे बढ़ती  जा रही थी.

     ‘ब्राह्मनाबाद’ के पश्चिम में बहती सिंधु में मुझे मां के वात्सल्य के दर्शन हुए. अथाह पानी जैसे स्वयं को समेटे हुए शांत बैठा हो. तट पर फैली वनश्री ने भी अद्भुत मौन धारण कर रखा था. यहां की सिंधु मुझे ऐसी लगी, जैसे कौरवों से युद्धरत पांडवों की चिंताकातर माता कुंती उस संकट काल में क्रंदन कर रही हो और उसकी आंखों से झरने वाली अश्रुधारा ही मानो सिंधु के रूप में बह रही हो. सिंधु तो एकदम ही सूखा प्रदेश है. वर्षा न हो, तो सिंधु रूपी इस मां के अलावा इस रेतीले प्रदेश को बारहों महीने हरा-भरा और उपजाऊ कौन बनाये रखेगा?

     इतिहास ने सिंधु तट पर कई बार करवट बदली है. कौन जाने इच्छा से या अनिच्छा से, पर लक्ष्मी-लोलुप विदेशियों को सिंधु ने ही अपने सीने पर से गुजारकर भारत की धरती पर उतारा था. आखिर जननी तो जननी है. उसमें अपने-पराये का भेद नहीं. उसके द्वार पर जो भी आये, उसे आश्रय देना उसका धर्म है. भारत पर अधिकांश आक्रमण इसी मार्ग से हुए हैं. शक और हूण, सिंकदर और बाबर इसी मार्ग से भारत की धरती पर आये थे.

     महीनों तक मैं वहां घूमा हूं, पर यहां की सिंधु को मैंने उछलते हुए नहीं देखा. अत्यंत शांत प्रवाह- मां की गोद जैसा. अथाह जल होते हुए भी ब्राह्मनाबाद की इस सिंधु में इतना आकर्षण था कि मुझे उसमें स्नान करने की इच्छा हो आयी थी.

     एक बार आधी रात के समय मैंने एक अविस्मरणीय कौतुक देखा. रोहणी के उत्तर में पंद्रह मील दूर सिंधु का पानी सुलगता हुआ-सा दिखायी दिया. पानी में भयंकर कम्पन और धारा मानो उलटी बहती हुई. आकाश एकदम शून्य. एक भी तारा नहीं. चंद्रमा भी नहीं. रात्रि की गोद में पृथ्वी अचेत पड़ी हुई थी धुंधली दिशाएं धुंए के वस्त्र पहने चुपचाप बैठी हुई थीं.

     दूर-दूर तक सिंधु के पानी को चीरकर छेड़े हुए भुजंग के फूत्कारों जैसी आग बाहर निकली. ऐसी लपटें उठीं. जैसे शेषनाग के फन लपलपा उठ हो. बहुरंगी आग का वह फव्वारा ऊंचा, और ऊंचा उठता गया. युगों-युगों से भूखा वडवानल सिंधु के पानी को पी नहीं रहा था, घास की तरह चबा रहा था. चरड़-चरड़ की आवाज- जैसे पानी जल रहा हो. उस आवाज से वातावरण में भय व्याप्त हो गया. सिंधु के जल-अश्वों की लगाम हाथों में पकड़े विकराल अग्नि तट की ओर बढ़ती आ रही थी.

     सिंधु का यह अत्यंत भयावह और रोमांचक दर्शन था. वडवानल से लिपटी, जलती हुई सिंधु को तभी मैंने पहली बार देखा और पार्वती के असंख्य नूपुरों जैसी चपल-चंचल, किंतु दुर्धर्ष व्यक्तित्व वाली उस सिंधु का बहुविध दर्शन मेरे मन में कविता की मालाएं गूंथ रहा था.

(अप्रैल 1971)

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