सम्पादकों का गीत

महान लेखक से लेख न प्राप्त होने पर ऐसा नहीं है कि सिर्फ सम्पादक ही लेखकों को तरसाते रहते हैं. सम्पादक भी बड़े बेचारे होते हैं. तरसते रहते हैं अच्छी रचनाओं के लिए. चिरौरी भी करते हैं लेखकों की. फिर भी जब प्रतिसाद नहीं मिलता तो खीझकर कविता लिखने बैठ जाते हैं. ऐसी ही एक कविता अज्ञेयजी ने भी लिखी थी. यह पता नहीं किस लेखक को लक्ष्य करके लिखी गयी थी, पर आशय ‘महान लेखक’ रहा होगा. यही विशेषण काम में लिया है अज्ञेय ने. आप भी उस खीझ का मज़ा लीजिए- हमें यह रचनाए ‘अज्ञेय रचनावली’ के सम्पादक कृष्णदत्त पालीवाल के सौजन्य से मिली है.

आज तुम लेख उसे न दो, न दो
कल भी वह कहेगा.
तुम लेखक हो,
अभ्रभेदी लेखकों के अरिष्ठ पुंज
चांपे इस एडीटर को रहो, रहो
तुम्हारे पत्र-पत्र में
तुम्हीं को रस देता हुआ
फूटकर वह दहेगा.
तुम्हीं ने लिखे हैं लेख
चढ़कर चिमनियों में बांधा है कला का केतु
यह वह अनुक्षण जानता है.
ख्याति जहां सबकुछ है, तुममें है परमपिता
हिंदी के महज़ चंद
तुम्हें पहचानता है
मांगो तुम चाहे जो, मांगोगे देगा
तुम जब दोगे, लहेगा.
आज नहीं
कल सही
कल नहीं
युग युग बाद हो
उसका तो नहीं है कुछ
केवल तो अपनी अपनी असमर्थता में बंधा है
उसका त्रैमासिक पत्र
एक मचिया है सूखी घास-फूस की
उसमें छपेगा नहीं औघड़ तुम्हारा लेख?
छाप्य नहीं उससे किसी से चाहे छपां हों?
आज नहीं,
कल सही
अंत तक शरणागत,
खीसों को निपोरे वह रहेगा
आज तुम लेख न दो, न दो\
कल भी वह कहेगा!

(मार्च 2014)

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