सम्पादकीय (जनवरी 2016)

चिट्ठी आयी है…

 

प्रिय पाठक,

आज मैं आपके साथ अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूं. लगभग बीस साल पुरानी बात है. मेरे पिताजी अक्सर मुझसे शिकायत किया करते थे कि मैं उन्हें चिट्ठी नहीं लिखता, और मेरा जवाब हुआ करता था- ‘मैं फोन पर तो बात कर लेता हूं आपसे हर हफ्ते!’ मुझे यह समझ ही नहीं आता था कि वे चिट्ठी की बात अक्सर क्यों करते हैं. एक बार पिताजी मेरे साथ रह रहे थे. एक सुबह बड़े भाई की चिट्ठी आयी थी. जब मैं घर से दफ़्तर के लिए निकल रहा था, मैंने देखा पिताजी भैया की चिट्ठी पढ़ रहे थे. शाम को जब मैं घर लौटा तो मैंने देखा, भैया की वह चिट्ठी पिताजी के हाथ में थी. यह समझना मुश्किल नहीं था कि दिनभर में पिताजी ने वह चिट्ठी कई बार पढ़ी होगी. और तब मेरी समझ में आया था कि वे मेरे चिट्ठी न लिखने की शिकायत क्यों किया करते थे. उस दिन मैंने समझा था कि चिट्ठी स़िर्फ चिट्ठी नहीं होती, चिट्ठी भावनाओं और संवेदनाओं का एक जीता-जागता पुलिंदा होती है. बेटे की आवाज़ का कानों में पड़ना ज़रूर सुख की बात है, पर चिट्ठी के रूप में तो बेटा स्वयं हाथों में होता है. हाथ में चिट्ठी लेकर मेरे पिता उन भावनाओं को जीते थे जो पिता-पुत्र के रिश्तों को आकार देती हैं, उन्हें अर्थवान बनाती हैं…

और आज मैं सोच रहा हूं, भावनाओं के साकार होने, उन्हें जीने, हाथ में लेकर महसूसने का यह माध्यम कहीं खोता तो नहीं जा रहा!

चिट्ठी नाम की ‘चीज़’ हमारे हाथों से फिसलती जा रही है- ठीक वैसे ही जैसे रेत हाथों की उंगलियों से फिसल जाती है. पता ही नहीं चलता कब मुट्ठी खाली हो जाती है. संचार-क्रांति के इस युग में चिट्ठियां बीते ज़माने की चीज़ बनती जा रही हैं. आज एक-दूसरे से जुड़ने के नये-नये उपकरण हमारे पास हैं. था कोई ज़माना जब कालिदास ने मेघदूत के माध्यम से यक्ष का संदेश उसकी प्रियतमा तक पहुंचाया था, अब ज़माना एसएमएस का है, ट्विटर का है. पलक झपकते ही संदेश दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाता है. मुट्ठी में है दुनिया अब. अमेरिका में बैठा कोई बेटा अब भारत के किसी गांव में रह रहे पिता से ऐसे बात कर सकता है, जैसे सामने बैठा हो. विज्ञान का यह खेल किसी करिश्मे से कम नहीं है. सदियों की कल्पनाओं को साकार होते देख रहे हैं हम. पर इस ‘मिलन’ में वह ऊष्मा है क्या, जो पांच पैसे के पोस्टकार्ड को हाथ में लेकर महसूस की जाती थी? हो सकता है, संवेदनाओं की इस मीठी छुअन के अहसास का हाथों से फिसलना मेरी पीढ़ी को ही हो. अगली पीढ़ी ने उस ‘छुअन’ को कभी महसूसा ही नहीं है, तो उसे इसका अभाव खलेगा भी कैसे? खले भले ही नहीं, पर वंचित तो वह रहेगी इस अनुभव से.

घर के बाहर डाकिये की साइकिल की घंटी का बजना या फिर ‘चिट्ठी आयी है’ वाले तीन शब्दों का गूंजना जाने कितनी-कितनी और कैसी-कैसी तरंगें मन में उठा जाता था. कभी घर की मुंडेर पर बैठकर किसी कौवे का कांव-कांव करके कोई संदेश दे जाना, कभी किसी कबूतर को संदेश देकर ‘उस पार’ पहुंचाने का आग्रह करना, कभी किसी मेघ को दूत बनाकर भेजना… ये कल्पनाएं ही भीतर कहीं भावनाओं का ज्वार उठा जाती हैं. यादों के अंबार लगा देती हैं. आने वाले कल में यह सब कुछ नहीं होगा. हो सकता है एसएमएस या ट्विटर जैसी तरकीबों के साथ भी नये ज़माने की भावनाओं का कोई संदर्भ जुड़ जाये, पर पिता के हाथ में बेटे की चिट्ठी का होना, उसके साथ जुड़े अहसासों को महसूसना, कुल मिलाकर, एक इतिहास बनकर रह जायेगा. चिट्ठियां बीते कल की चीज़ बनती जा रही हैं. परम्परा की एक नदी जैसे सूख रही है, संवेदना की एक लहर जैसे मिटती-सी लग रही है. इसी सबको रेखांकित करने की कोशिश है ‘नवनीत’ का यह नववर्षांक. इसमें ढेर सारी चिट्ठियां हैं, चिट्ठियों के साथ जुड़े जीते-जागते संदर्भ हैं, मानव-इतिहास के धुंधलाते पन्नों की झलक है, मानवीय संवेदनाओं की मीठी छांह है… यह सब आप सहेजकर रखना चाहेंगे. संभालिए नये साल की इस सौगात को. नववर्ष हम सबके लिए शुभ हो! थोड़ा लिखा बहुत समझना.

 

 

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