शम्भू दाज्यू ने मुझे नैचुरल पोएट कहा था —  रमेशचंद्र शाह

संस्मरण

शम्भू दाज्यू हमारी दिवंगता बुआ के बेटे हैं, उनके पिता ख्यातनामा डॉक्टर हैं. आगरा के एल.एम.पी. जो अब सेवा-निवृत्ति के उपरांत ज्योलीकोट में बस गये हैं. इतनी जानकारी तो मुझे भी थी; किंतु ज्यों-ज्यों उनके अपने ननिहाल यानी अल्मोड़ा, हमारे घर पर साक्षात् अवतरित होने की घड़ी समीप आती गयी, त्यों त्यों यह शिव-पुराण सुरसा के मुंह की तरह फैलता गया. राजे-महाराजे भी जहां दाखला पाने को तरसते हैं, ऐसे टॉप स्कूल में भरती कराया था अपने इकलौते को डॉक्टर साहब ने. अपने ही जैसा डॉक्टर बनाना चाहते थे उस को. लखनऊ मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा होता इस वक्त ठाठ से. मगर …नहीं साहब, नहीं! मैट्रिक के बाद तुरंत भाग निकले घर से, और जाने कहां-कहां भटकते रहे. …बमुश्किल बरामद हुए, तो स़ाफ इकतऱफा घोषणा कर दी कि… ‘हमें नहीं जाना अब इस्कूल-फिस्कूल. घर पर ही पढ़ेंगे अपनी मर्जी, अपनी पसंद से… और कहानियां लिखेंगे. …देखिए, छप भी चुकी हैं दो तीन आलरेडी. जरा देखिए तो सही.’ डॉक्टर साहब ने देखा ‘माया’, ‘मनोहर कहानियां’, ‘सजनी’. ‘अच्छा तो, ये है आपकी पढ़ाई? …मगर यह तो बताइए, स्कूल-कॉलेज गये बिना और बगैर कोई इम्तहान दिये ऐसी कौन-सी डिग्रियां हासिल हो जाने वाली हैं आपको?’ …‘विशारद, बाबूजी’. भाई साहब बोले. ‘आपको कुछ पता भी है? सुना है कभी हिंदी साहित्य सम्मेलन का नाम? प्राइवेट इम्तहान देंगे और घर बैठे डिग्री मिलेगी. आपका बी.ए. क्या चीज़ है, ‘विशारद’ के सामने? उसके बाद हम ‘साहित्य रत्न’ करेंगे. जो एम.ए. के बराबर होता है. समझे? और इम्तहान भी किसका? सिऱफ कविता और कहानी का? इसके अलावा हमें और कुछ भी पसंद नहीं.’

इकलौते पुत्र के ये लच्छन देख के डॉक्टर साहब अपना माथा पकड़ के बैठ गये. इतनी मुश्किलों से पकड़ में आया हिरना कहीं फिर से नदारद हो गया तो? उन्होंने घुटने टेक दिये. ‘चलिए, भर दीजिए विशारद का फार्म.’ ‘अभी नहीं बाबूजी. अभी हम अंडरएज हैं.’ …साल भर भाई साहब ने खूब मस्ती छानी. ज्योलीकोट घुमक्कड़ों को खूब रास आता है. वहां से तीन मील की खड़ी चढ़ाई पार की, कि पहुंच गये नैनीताल. जहां एक भरा-पूरा घर ताऊजी का आपके स्वागत हेतु सदा प्रस्तुत. सच में, जब कभी मैं गर्मी की छुट्टियों में नैनीताल जाता अपने ननिहाल, तो उस प्रवास का सबसे सनसनीखेज़ चैप्टर शम्भू भाई साब के साथ नैनीताल के शिखरों-सरोवरों और ज्योलीकोट की तलहटियों का चप्पा-चप्पा छानने का होता.

भाई साहब जब ‘विशारद’ की परीक्षा देने पहली बार अपनी ननिहाल यानी हमारे घर पधारे, मैं छठी या सातवीं में पढ़ रहा हूंगा. नशा-सा चढ़ गया था मुझ पर उन किताबों का, जो पाठ्यक्रम में लगी होने के कारण उनके साथ आयीं और मेरी जागीर बन गयीं. वे दिन भर घर से बाहर रहते और उनकी गैरहाजिरी में ‘भारत-भारती’ और ‘कर्मभूमि’ और ‘झांसी की रानी’ …और जाने क्या-क्या जादुई चीज़ें मेरे कब्ज़े में होतीं. इससे पहले अपनी पहुंच स़िर्फ रघुनाथ मंदिर की एकमात्र अलमारी में ठुंसी सम्पदा तक यानी रामायण-महाभारत, पुराण, योगवाशिष्ठ और हद से हद हितोपदेश और ‘बैताल पच्चीसी’ तक सीमित थी. अब एक निराली नयी दुनिया आंखों के सामने उजागर हुई. कविता का जादू तो पहले ही सिर चढ़ा हुआ था ः परंतु उपन्यास क्या होता है, यह किसको पता था! कौन ज़्यादा स्वादिष्ट है. उपन्यास? कि कविता? कहना कठिन था. फर्क इतना ही कि सुभद्राकुमारी चौहान तो पूरी की पूरी एक ही दिन में कंठस्थ हो गयी, जबकि उपन्यास वाली ‘झांसी की रानी’ का लेखक तो, पता चला, जाने कितने राजा-रानियों के कारनामों की खदान है. भाई साब तब मेरे लिए अगाध श्रद्धा के ही नहीं, भय के भी आलम्बन थे. उनके रहने की व्यवस्था हमारे घर में नहीं, अलग से ‘हुक्का क्लब’ में की गयी थी. क्योंकि हमारा घर उनके लिए न केवल छोटा पड़ रहा था, बल्कि ‘विशारद’ जैसी ऊंची परीक्षा देने आए वी.आइ.पी. भानजे को अपेक्षित एकांत भी सुलभ नहीं करा सकता था. खाना भी उनका वहीं पहुंचाना होता था और वह जिम्मेदारी मेरी थी. एक दिन मैं उनकी किताब चुपचाप उनके कमरे में वापस पहुंचाना भूल गया और रंगे हाथों पकड़ा गया. मगर जहां डांट ही नहीं, मार खाने की भी आशंका थी, वहां क्या देखता हूं कि शम्भू भाई साहब बड़े प्यार से मुस्कराते हुए मुझे एकटक ताके जा रहे हैं और कह रहे हैं. ‘अरे! तुमको इतना शौक है? बताओ तुमने क्या पढ़ा?’ अंधा क्या चाहे दो आंखें! मैंने पाया कि मैं सचमुच बता रहा हूं उन्हें …मेरी वाचा खुल गयी है. ‘अरे वाह! चलो, यह किताब कल से तुम्हारी. अरे बेवक़ूफ, मुझे कल इसी का इम्तहान देना है. तुम दोनों उठा ले गये. तुम्हें कविता ज़्यादा पसंद है कि उपन्यास? ‘दोनों’. मेरे मुंह से निकला. ‘मगर कविता पढ़ के तुरंत याद हो जाती है. कहानी बहुत लम्बी होती है.’ ‘…कहानी नहीं रे, उपन्यास. कहानी अलग चीज़ है, उपन्यास अलग चीज़ है. सुनाओ जितनी याद है तुम्हें कविता.’ मैंने आव देखा न ताव, पूरी की पूरी ‘झांसी की रानी’ उनके काने में उंड़ेल दी. भाई साहब अवाक आंखें फाड़े मुझे घूरते रहे, फिर बोले. ‘चलो, ये भी तुम्हीं रख लो. इसका पेपर हो गया है.’ मेरा हौसला बढ़ा, तो अगले दिन मुझसे रहा नहीं गया. कहा. ‘दाज्यू, मैंने भी कविता लिखी है. सुनाऊं? देवदारु पर है.’ ‘सुनाओ’. उन्होंने कहा. मैंने सुना दी-

सब वृक्षों के मध्य वृक्ष यह परम निराला

सब ऋतुओं में हरित-भरित ही रहने वाला.

दीर्घ दंड सम तना, सुदृढ़ व महत्ताशाली

डाले सूच्याकार सघन शुभ पत्रों वाली.

भाई साहब ने खुश होकर खूब पीठ ठोंकी. ‘अरे यार रमेश, तुम तो सचमुच कवि हो. नैचुरल पोएट.’… ‘आपने भी तो लिखी होंगी कविताएं.’. मैंने कहा ‘सुनाइए न.’ ‘छोड़ो’. भाई साहब बोले. ‘मैं कहानियां लिखता हूं. छपी हैं. तुम खुद पढ़ लेना.’ उन्होंने ‘सजनी’ का ताज़ा-ताज़ा अंक मुझे थमा दिया.

सचमुच शंभू भाई साहब कहानीकार थे. जब वे ‘विशारद’ पास करके ‘साहित्य रत्न’ का इम्तहान देने आये तो मैंने उनके पास ‘मनोहर कहानियां’ और ‘माया’ के चार-पांच अंक देखे जिनमें उनकी कहानियां भी ब़ाकायदा छपी हुई थीं. जब मेरी नैनीताल-ज्योलीकोट की सालाना यात्राएं शुरू हुईं तो यह सिलसिला और आगे बढ़ा. उनकी देखा-देखी मैंने भी दो कहानियां लिख के उन्हें दिखायीं. मगर उन्होंने स़ाफ-दो-टूक मुझे जता दिया कि कहानी लिखना मेरे बस का नहीं है. ‘कहानी लिखने के लिए जो अनुभव चाहिए, जो ऑब्ज़र्वेशन चाहिए, वह अभी तुम्हारे पास नहीं है. अभी तो तुम सिर्फ कविता में ही मन लगाओ. तुम्हारी म्युनिसिपैलिटी के वाचनालय में ‘विशाल भारत’ और कई सारी पत्रिकाएं आती हैं. उनमें छपने वाली कविताएं पढ़ो. तुम्हें नये मुहावरे की कविताएं पढ़ने को मिलेंगी. नये-नये भावों को, नयी-नयी बातों को भी कविता में ढालना आयेगा. तुम्हें इसमें कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि तुम नैचुरल पोएट हो.’

आज इतने बरसों बाद भी. पीछे मुड़कर देखता हूं तो शम्भू दाज्यू का वह वाक्य, मुझे लगता है, मेरे लिए किसी संजीवनी बूटी से कम साबित नहीं हुआ. मेरे भयग्रस्त और हर तरह से कुंठाकारी बचपन के आर-पार मुझे अक्षरश हर भय, हर कुंठा से उबार लेता हुआ गुरुमंत्र! … ‘क्योंकि तुम नैचुरल पोएट हो.’

उन्हीं दिनों भाई साहब को उनके घर के पास ही के मिडिल स्कूल में मास्टरी मिल गयी थी और अब वे ब़ाकायदा टीचर-कैंडिडेट की हैसियत से प्राइवेट एम.ए. (अंग्रेज़ी) की तैयारी कर रहे थे. मेरे लिए यह भारी अचरज की बात थी. अंग्रेज़ी से भी शम्भू दाज्यू का कुछ लेना-देना हो सकता है, मैंने कभी सोचा नहीं था. मगर देखते-देखते उन्होंने एम.ए. प्रीवियस पास कर लिया. और फाइनल एक रेग्युलर परीक्षार्थी की तरह करने के लिए सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा ज्वाइन करने की ठान ली. अगले वर्ष मेरे वहां रहते ही उनका परीक्षाफल भी निकल आया. वे उत्तीर्ण हुए और तत्काल उन्हें एक दूसरी सफलता भी मिली. पार्लियामेंट सेक्रेटरिएट में अनुवादक का नियुक्ति-पत्र. उसी वर्ष मैंने इण्टर साइंस पास किया और बी.एस.सी. करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय जाने का मंसूबा पालने लगा. भाई साहब के कारण ही वह मंसूबा पूरा हुआ. वे हर माह मुझे अपने वेतन का एक हिस्सा पोस्टल आर्डर से भिजवाते रहे दो बरस तक. उसके बिना मेरा मंसूबा धरा रह जाता क्योंकि मेरे घर की आर्थिक-अवस्था में इसकी कत्तई कोई गुंजाइश नहीं थी. यूं इंटर की परीक्षा में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आने के कारण मुझे वजीफा मिलता था, परंतु वह पर्याप्त नहीं था. भाई साहब के पोस्टल ऑर्डरों ने ही उस कमी की भरपाई की. बाद में जब मैं भी उनकी तरह स्कूल के अध्यापक की हैसियत से अंग्रेज़ी में एम.ए. का इम्तहान निजी तौर पर देने को विवश हुआ तो उन्होंने अपनी सारी किताबें मुझे भेंट कर दीं.

अब हमारा पत्राचार अंग्रेज़ी में ही होता था. वे मेरी प्रगति पर बराबर नज़र रखते थे और उससे संतुष्ट थे. पर मेरा इतनी सारी विधाओं में सक्रिय होना उन्हें आशांकित भी करता था. मेरी कविताएं उन्हें अब भी उतनी ही अच्छी लगती थीं जितनी सुदूर बचपन के दिनों में और वे अक्सर कहा करते. ‘सुनो, सबसे पहले अपना कविता-संग्रह छपवाना, बाकी चीज़ें बाद में. नहीं तो तुम्हारी पहचान गड्डमड्ड हो जायगी.’ …मुझे बड़ा खेद है इस बात का कि मैं उनकी सलाह पर अमल नहीं कर सका. हालांकि अपने बचाव में इतना तो कह सकता हूं कि यह मेरे बस की बात नहीं थी. कविता-संग्रह छपवाना तब भी कहां इतना आसान था! जबकि बाकी चीज़ें. जैसे निबंध-संग्रह या उपन्यास छापने की पहल खुद प्रकाशकों की ओर से होती रही. मुझे कभी प्रकाशक ढूंढ़ना नहीं पड़ा. यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश को अपनी पहल पर पछताना पड़ा. एक बहुत नामी-गिरामी प्रकाशक ने तो स़ाफ जड़ ही दिया मेरे मुंह पर ही कि ‘आपकी किताबों की चर्चा तो तुरंत हो जाती है मगर बिक्री के लिहाज़ से उनकी कोई पूछ नहीं.’

शम्भू भाई साहब अंतर्मुखी उस तरह नहीं थे. मुझसे सर्वथा विपरीत वे बहुत-बहुत व्यवहार कुशल और सामाजिक थे. उनमें वह खूबी थी. ज़बर्दस्त आत्मविश्वास. जिसका मुझमें सर्वथा अभाव था. मुझे याद है. अल्मोड़े के प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘शक्ति’ से अपनी कविताएं छपवाने की प्रेरणा उन्हीं ने मुझे दी थी. प्रेरणा ही नहीं, सीधा ऐक्शन. हां, वे ही तो मुझे पहले-पहले ‘शक्ति’ के कार्यालय में साथ ले के गये थे. मैं तो माने बैठा था कि सम्पादक से जान-पहचान होगी उनकी, इसीलिए ले जा रहे हैं. मगर मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी, जब दरवाज़े पर पड़ी चिक उठाकर उन्होंने मुझे अकेले भीतर धकेल दिया. ‘जाओ और खुद सम्पादक जी को कविता दे के आओ. दुनिया को सीधे फेस करना सीखो.’ मैं तो थर्रा गया. सम्पादक जी ने अचरज से मुझे देखा. एक दसवीं में पढ़ने वाले छोकरे को, और पूछा- ‘क्या बात है?’ मेरे मुंह से बोल नहीं फूटा. चुपचाप कांपते हाथों से वह कागज़ उन्हें थमा दिया. सम्पादक जी ने कुतूहल से उसे देखा और कहा- ‘पढ़ के सुनाओ’. तो जान में जान आयी. लगा उन्हें पसंद आ गयी. नहीं तो पढ़ने को क्यों कहते? बस, फिर क्या था. मैंने कागज़ पर निगाह डाले बिना ताबड़तोड़ कविता सुना दी.

छिना सभी कुछ अपना.

बिसर गया वह पृथ्वी को ही स्वर्ग बनाने का पुरखों ने

देखा था जो सपना.

बिखरा दी निज शक्ति,

परस्पर बीज फूट का बोया

ओ भारत की आत्मा!

कब तक पड़ी रहेगी सोयी?

गौरव खो, पदलुंठित होकर भारतमाता रोयी.

कविता पूरी हुई. सम्पादकजी ने कागज़ मेरे हाथ से ले लिया और कहा- अच्छी है. छापेंगे. किस क्लास में पढ़ते हो? मैंने कहा- ‘दसवीं में.’ बोले- ‘किसी से सुधरवाई है क्या? तुम्हारे घर में कोई और भी लिखता है? मैंने कहा- ‘नहीं, कोई नहीं लिखता. एक…..’ शम्भू दाज्यू का नामोच्चार मेरे ओठों तक आते आते रुक गया. खामखा क्यों ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत चरितार्थ की जाय?

सम्पादक के कक्ष से बाहर निकला तो शम्भू भाई साहब मेरा चेहरा देखते ही समझ गये कि मैंने बाजी मार ली. ‘मैंने कहा था ना! … खुद अपने ऊपर भरोसा होना चाहिए. दुनिया बड़ी बेरहम है रमेश! वह कमज़ोर पर रहम नहीं खाती.’

बात मुझे तीर की तरह आ लगी और भीतर बहुत भीतर जा धंसी. ‘अपने ऊपर भरोसा रखने’ वाली वह बात तो ‘मुझे लगता है’, मेरे खून में ही कहीं नहीं थी. वह सौ फीसदी शम्भू दाज्यू की देन थी. वे जितने कोमल थे, उतने ही कठोर भी. मुझे याद है वो दिन, जब वे मुझे पहली बार ‘रामधारा’ ले गये थे. रुला दिया था उन्होंने मुझे. ‘नहाने तक की तमीज़ नहीं तुम्हें. यही सिखाया है तुम्हारे मां-बाप ने तुमको?’ नहाने में ही क्यों, मेरी हर आदत, हर हरकत में छेद निकालते हुए उन्होंने मेरा कायाकल्प ही कर डाला. उन्हीं के कारण मैं बिन बुलाए हर कवि-गोष्ठी में जाने लगा. हालांकि मुझे कभी कोई सांत्वना पुरस्कार तक नहीं मिला, न ही नगर के संभ्रान्त साहित्यिक वर्ग में मेरी रत्ती भर भी पैठ हुई. किंतु ‘किमाश्चर्यमत परं?’ …इस लगातार उपेक्षा-अवहेलना ने भी मुझे कभी कुंठित नहीं किया. शम्भू दाज्यू का दिया महामंत्र एक अभेद्य कवच की तरह मुझसे लिपटा रहा. ‘तुम साले क्या जानो’. मैं मन ही मन कहता. ‘तुम क्या जानो, ‘नैचुरल पोएट’ किसे कहते हैं!’

दरअसल मैं बाहर लोगों के बीच एक बेहद झेंपू और डरपोक किस्म का लड़का था. पर लोगों से दूर, अपनी कोठरी के एकांत में पता नहीं क्यों और कैसे निश्चिंत और निरापद ही नहीं, एकदम भरा-पूरा और सहज संतुष्ट अनुभव करता था, जैसे दुनिया से मेरा कुछ लेना-देना ही न हो. शम्भू दाज्यू ने ही मुझे उस कोठरी से बाहर निकाल कर दुनिया जैसी है, उससे वैसे ही निपटने की ज़रूरत का अहसास कराया. खुद मेरे नगर और आस-पास का चप्पा-चप्पा छान मारा मैंने उन्हीं के कारण. यह ‘वांडरलस्ट’ भी मुझमें उन्हीं ने जगायी. साहित्यिक महत्वाकांक्षा की ही तरह. यह उन्हीं की दूसरी बड़ी भारी देन थी.

रोज़ सुबह वे मुझे हमारे बाज़ार-घर से कोई छह किलोमीटर दूर कासारदेवी की चोटी तक साथ घूमने ले जाते. एक दिन अचानक वहां से लौटते हुए उन्होंने ऊंचाई पर बने एक बंगले की ओर इशारा किया और कहा- ‘चलो, आज तुम्हें एक बहुत बड़े आर्टिस्ट से मिलवाते हैं. मैं भी नहीं मिला हूं अभी तक उनसे.’

उस वीरान से बंगले में कोई ब्रूस्टर नाम के चित्रकार निवास करते हैं इसकी तो मुझे कभी गंध तक नहीं मिली थी. पर भाई साहब को उनके बारे में सब कुछ पता था. वे सीधे उस पहाड़ी पर जा चढ़े. दरवाज़े पर दस्तक दी तो एक भव्य गौरांग पुरुष प्रगट हुए. मुस्कराते हुए उन्होंने हमें भीतर आने का इशारा किया और खुद इस तरह एक कोने में जाकर हमारी ओर पीठ फेरकर पालथी मार बैठ गये जैसे हम वहां हों ही नहीं. जाहिर था वे उस समय ध्यान कर रहे थे. ऐसा अवांछनीय विघ्न-विक्षेप, वह भी ध्यानावस्था में, उनकी जगह कोई और होता तो दरवाज़ा ही नहीं खोलता. मगर वे थे, कि जैसे कुछ हुआ ही न हो! ऐसा शांत और निर्विकार मुखमंडल, जिस पर कैसी दिव्य मुस्कान खिली हुई थी. मैंने पहली बार देखा होगा.

कक्ष में कई पूरे और एक अधूरा चित्र भी रखे हुए थे. अद्भुत लैंडस्केप, जो मेरे बाल-चित्त को वास्तविक दृश्यों से भी कहीं अधिक वास्तविक और मनोहारी लग रहे थे. चित्रकला से वह मेरा पहला-पहला साक्षात्कार था. मैं तो उन्हीं में रमा हुआ था. मगर भाई साहब कैसे चुपचाप बैठते! वे उठे और आलमारी में सजी पुस्तकों का जायजा लेने लगे. अचानक उन्होंने हौले से एक किताब निकाल ली और उसे खोलकर देखने लगे. तभी उन्होंने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और पहले ही पृष्ठ पर अंकित इबारत मुझे दिखाई…

‘टु ब्रूस्टर, दि आर्टिस्ट… नॉट टु दि योगी’ -डी.एच. लॉरेंस.

पुस्तक को यथास्थान रखके भाई साहब वापस अपनी कुर्सी पर आ बैठे. उनकी वह मस्त-मगन मुखमुद्रा मुझे आज भी भुलाये नहीं भूलती. किस कदर उत्सुक-अधीर थे वे बात करने को, मैं भांप रहा था. उधर योगी की निश्चल ध्यान-मुद्रा बदलने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे. कोई आधा घंटा हम लोग चुपचाप बैठे रहे होंगे. अंतत भाई साहब उठे, …हाथ जोड़कर प्रणाम किया उस निश्चल पीठ को …और ओठों पर उंगली रखे चुपचाप उठकर दरवाज़ा खोलकर उसे ज्यों का त्यों उढ़काकर बाहर निकल आये. बाहर आकर उस ढलान पर उतरते ही उन्होंने मुझे बताया कितना दुर्लभ दस्तावेज अकस्मात आज के दिन उनके हाथ लगा था, जो उन्होंने देखा और दिखाया भी मुझको. यह भी, कि यह चित्रकार ब्रूस्टर विश्वविख्यात उपन्यासकार डी.एच. लॉरेंस के बालसखा थे और वह किताब लॉरेंस की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक कृति थी. ‘सन्स एण्ड लवर्स’, जिसकी प्रति लॉरेंस ने अपने हाथ से निम्न इबारत लिखकर अपने बालसखा को समर्पित की थी.

‘उस ब्रूस्टर को, जो कलाकार था और है. उसे नहीं, जो योगी है’.

तब मुझे क्या पता था कि योगी और कलाकार का यह द्वैत मात्र एक प्यार भरा परिहास भर नहीं, एक ज़िंदा और जानलेवा परमार्थ, यानी हकीकत है, जिसे जो भुगतता है, वही जान सकता है और जिसे जानकर भी उससे छुटकारा नहीं.

भाई साहब ने हर आड़े-तिरछे मौकों पर मेरा साथ दिया. वे जहां भी मेरी कोई रचना छपती, ढूंढ़-खोजकर ज़रूर पढ़ते और अपनी प्रतिक्रिया भी अवश्य देते. चिट्ठी लिखने का व्यसन उन्हीं के कारण मुझे पड़ा. उनका सामाजिक-व्यावहारिक पक्ष तो अधिकाधिक मज़बूत होता गया पर लिखना एकबारगी छूट गया. ‘मेरा बाप मेरा दुश्मन’ नाम से उनका एक कहानी-संग्रह छपा था. बस वहीं उनका स़फर रुक गया. मुझे इस पर बेहद अचरज होता था. इतनी ज़ल्दी जिनकी कहानियां नामी-गिरामी पत्रिकाओं में छपने लगी थीं, मुझे जिन्होंने लगातार प्रोत्साहन देकर आगे बढ़ाया, वे खुद क्यों इतनी जल्दी अपने असली लगाव से विरक्त हो गये? यही मान लेना पड़ता है कि कुछ लोगों की प्रतिभा स़िर्फ दूसरों को जगाने में, उन्हें उनकी सही पहचान कराने में ही फलती-फूलती है. अपनी परवाह उन्हें होती ही नहीं उस तरह.

पता नहीं क्यों उनके पिताजी के मुख से ही सुना एक जुमला उन्हीं के बारे में मेरे जेहन में आज तक अटका रह गया है. जुमला ही नहीं, उनकी टोन और मुखमुद्रा भी. प्रसंग या संदर्भ यह, कि मेरे नाना की मृत्यु हो गयी थी और पिताजी मुझे साथ लेकर अल्मोड़ा से हलद्वानी पैदल गये थे. मैं उस वक्त ज्योलीकोट में था और वे एक दिन ज्योलीकोट रुककर, वहां से मुझे साथ लेकर गये थे. पिताजी के यह पूछने पर ही, कि ‘शम्भू क्या कर रहा है आजकल’? डॉक्टर साहब के मुंह से निकला था वह जुमला…

‘मुझसे क्या पूछते हो इसल्लाल! अपने भानजे से ही पूछो ना.’

नहीं! यह नहीं. इसके आगे जो उन्होंने बोला, वह था वह जुमला.

‘इसल्लाल! चंचल चित्त का आदमी क्या कभी भी कुछ कर सकता है? तुम तो खुद ज्ञानी-सतसंगी हो. तुम्हीं बताओ.’

इसल्लाल यानी, ईश्वरीलाल, मेरे पिता, मुझे याद है, इस पर चुप्पी साधे रहे.

तब तो नहीं, मगर आज पीछे मुड़कर युगों पहले की उस घटना को याद कर रहा हूं तो न केवल डाक्टर साहब की वह मुखमुद्रा, बल्कि पिताजी की वह मौन मुद्रा भी मेरे सामने प्रत्यक्ष हो उठी है. क्या जवाब देते पिताजी अपने बहनोई के उस सवाल का? प्रकट में न सही, मन ही मन उन्होंने क्या सोचा होगा? कुछ सोचा भी होगा कि नहीं? क्या मैं उनकी जगह उनके बदले यह जवाब दे रहा हूं या देने की सोच रहा हूं, कि …

‘मैं तो चंचलचित्त नहीं हूं ना? आपकी ही नहीं, सभी की निगाहों में मैं ज्ञानी-सतसंगी हूं ना? मैंने ही क्या कर लिया? दुनिया की निगाहों में मुझसे ज़्यादा नाकारा, मुझसे ज़्यादा असफल कोई नहीं. तो फिर?’

क्या सचमुच शम्भू दाज्यू, मेरे हीरो, चंचलचित्त आदमी थे? और, इसीलिए, इसी कारण इतनी जल्दी, इतनी तेज़ी से कहानी-कला सीख डालने और उसमें पारंगत होके दिखा चुकने के बावजूद, वे अपनी ही चुनी हुई उस डगर पर ज़्यादा दिन नहीं चल पाये और वह छूट ही गयी उनसे अंतत?

हो सकता है. पर उस चंचल चित्त आदमी में कैसी अद्भुत स्वतस्फूर्ति और अथक जीवन-ऊर्जा थी, जिसका संक्रमण इस कदर अचूक ढंग से दूसरों को अपनी लपेट में ले लेता था?

कैसे, कब उसी ने मुझमें यह आत्म-विश्वास जगाया कि मैं, जो कुछ भी नहीं था, दूसरों की निगाह में, मैं भी कुछ हूं और वह ‘कुछ’ बहुत कुछ कर सकता है. बहुत कुछ.

‘यार रमेश, तुम तो सचमुच इन्टैलिजेंट हो’.

कब कहा था उन्होंने मुझसे? किस संदर्भ या प्रसंग में? मुझे याद नहीं वह प्रसंग. पर कहा था. ‘यह ध्रुव सत्य है ः मेरी स्मृति पर शिलालेख की तरह खुदा हुआ. यही क्यों, वह दूसरा वाक्य भी, जो एकाधिक बार उनके मुंह से दोहराया जाकर मेरे लिए मेरा पहचान-पत्र, मेरे जीवन का दिशा-निर्देशक सूत्र बन गया?

‘यार रमेश, तुम तो नैचुरल पोएट हो.’

किसने मुझमें सोये हुए प्रकृति-प्रेम को जगाया? किसने मुझमें अपनी ही जैसी ‘वाण्डरलस्ट’ उकसायी? कितने लोग होंगे मेरी लेखक-बिरादरी में, जिन्होंने इतनी पृथ्वी पैदल नापी होगी जितनी मैंने?

किसको है इसका श्रेय? उसी चंचलचित्त को ही ना?

ऐसा नहीं, कि शम्भू दाज्यू को धर्म-अध्यात्म से कोई एलर्जी रही हो. अल्मोड़ा में सर्वप्रथम मुझे आर्य समाज के जलसों में वही तो ले गये थे. स्वामी शिवानंद उनके लिए संतों के भी संत थे. कोई मंदिर ऐसा नहीं था जहां वे मुझे न ले गये हों. सर्वप्रथम नीमकरौरी बाबा के दर्शन किसने मुझे कराये? उन्हीं ने न? किस कदर कुपित हुए थे वे मुझ पर, जब उनके बार-बार इशारा करने पर भी मैंने बाबा के पांव नहीं छुए. उस दिन तो लगा था वे रास्ते में ही मार-मार के मेरा भुरता बना देंगे. तो, योग-अध्यात्म से उन्हें एलर्जी होने का सवाल ही कहां पैदा होता था! परंतु उसके लिए सांसारिक कर्तव्य-निर्वाह की कीमत चुकाना उन्हें बिल्कुल गवारा नहीं था. पिताजी के प्रति उनकी उदासीनता के मूल में यही बात रही होगी. ‘यार मामू’ उनके जीवनादर्श के निकट पड़ते थे; बड़े मामू नहीं. आज मुझे लगता है, उन्होंने बड़ी जल्दी इस सचाई को भांप लिया था कि मेरे ‘हीरो’ पिताजी हैं; चाचाजी बिल्कुल नहीं. और …इसीलिए उन्हींने मुझे मेरे पिता के प्रभाव-वृत्त से बाहर खींचने का अतिरिक्त प्रयत्न किया और अंतत इसमें सफल भी हुए.

प्रेम-विवाह में उन्हें बिल्कुल भरोसा नहीं था. बेहद नाराज़ हुए थे वे मेरे निर्णय पर. पर जब अंतत मैंने ज़िद ठान ही ली, तो ‘यार मामू’ को उन्होंने पटाया और पूरी बारात में वही सबसे आगे रहे. भोपाल वे सिर्फ एक बार आये जब मैं निराला सृजनपीठ का निदेशक था. तब पहली बार उन्हें मेरी पत्नी की पाक-कला का ही नहीं, लेखन-कला का भी परिचय मिला और दोनों की उन्होंने भरपूर सराहना की. संयोगवश उन्हीं दिनों ज्योत्स्ना का कहानी-संग्रह छपके आया था. वह उन्होंने पूरा पढ़ा और स़ाफ-स़ाफ हमारे मुंह पर ही अपनी प्रतिक्रिया जता दी. ‘यार रमेश, तुम बुरा मत मानना. कहानी पर तो ज्योत्स्ना की ही पकड़ तुमसे कहीं बेहतर है.’ …बुरा तो मैं भला क्यों मानता. मन ही मन तो मैं फूला नहीं समा रहा था; पर प्रकट में थोड़ा अभिनय ज़रूर किया, निराशा का. ‘यह तो सरासर पक्षपात है आपका भाई साहब.’ मैंने कहा- ‘बिल्कुल नहीं. ज़रा भी नहीं.’ भाई साहब बोले. ‘अरे, इसमें दुखी होने की क्या बात है! जैसे तुम नेचुरल पोएट हो, नैचुरल थिंकर भी, वैसे ही ज्योत्स्ना ‘नैचुरल स्टोरी राइटर है’. समझे?’

मैंने जोरों से सिर हिलाया. भाई साहब की ताऱीफ का नशा वह भी डबल ताऱीफ का नशा, आज इतने जुगों बाद भी उसी तरह मेरे सिर चढ़ सकता है मुझे खुद पता नहीं था.

फरवरी 2016

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