विचरण करते पशु-पक्षी (भाग-1)

आनंद गहलोत

विश्व की अधिकांश भाषाओं में पशुवाची शब्दों का रक्त सम्बंध रहा है- गो (गाय) और अंग्रेज़ी की ‘काउ’ की तरह. संस्कृत का उक्षन् (बैल) यूरोप में ‘ऑक्सेन’ हो गया. संस्कृत का ‘उष्ट्र’ फ़ारसी में ‘उश्तुर’ हो गया. अरब देश का नाम भी संस्कृत की देन है.

पक्षी तो उड़कर कहीं भी चले जाते हैं; लेकिन शब्द उड़कर नहीं जाते. वे धीरे-धीरे चल कर जाते हैं. उनकी गति प्राचीन काल में मनुष्यों के आवागमन, एक-दूसरे के साहचर्य, नज़दीक आने या टकराव की गति से तेज़ नहीं थी. आज शब्दों की यात्रा की गति-संचार-साधनों की गति के बराबर है.

मानव जाति के आदि पूर्वजों की पशुओं में सबसे गगज्यादा आत्मीयता, लगाव ‘गो’ (गाय), ‘उक्षन’ (बैल), अश्व (घोड़ा) और उष्ट्र (ऊंट) के साथ थी. कुछ देशों में हाथी के साथ भी. भेड़-बकरियां भी उसके लिए उपयोगी थीं.

विश्व की गगज्यादातर भाषाओं में पशुवाची अधिकांश शब्दों का स्रोत भी समान है.

विश्व की ज्ञात आदि भाषा में ‘गाय’ के लिए ‘गो’ शब्द था. भारत में ही नहीं, एशिया, यूरोप, देश-देशांतरों की विभिन्न भाषाओं में इस शब्द में मामूली रूप-ध्वनि परिवर्तन हुआ. ईरान में ‘गो’ का ‘गाव’ हो गया. भारत में प्राचीनतम भाषा के बाद की संस्कृत भाषा में ‘गो’ शब्द अपने मूल रूप में बना रहा लेकिन उसके बाद की पालि और प्राकृत भाषा में ‘गावी’ हो गया. आज हिंदी, मराठी, गुजराती आदि में ‘गाय’ है.

यूरोप की प्राचीन भाषाओं में इस शब्द में काफ़ी ध्वनि परिवर्तन हुआ था; लेकिन आज की अंग्रेज़ी में ‘गाय’ के लिए ‘काउ’ शब्द है. ‘ग’ और ‘क’ का आपसी बदलाव ‘काक’ (कौआ) और ‘काग’ (कौआ) में देखा जा सकता है.

भारतीय ‘गाय’ को सीधा-सादा पशु मानते हैं; लेकिन यूरोपीय भीरू डरपोक मानते हैं. उन्होंने डरपोक के लिए ‘काउ’ से ‘काउअर्ड’ शब्द गढ़ा.

‘बैल’ के लिए भारतीय यूरोपीय आदि भाषा का ‘उक्षन्’ शब्द अब भारत में लोकप्रिय नहीं रहा. उसकी जगह संस्कृत शब्द ‘बलीवर्द’ के अपभ्रंश ‘बैल’ ने ले ली है. अलीगढ़ जिले में ‘बलीवर्द’ का लघु रूप ‘बद्द’ और मारवाड़ी में ‘वलद’ ‘बैल’ के सजातीय शब्द हैं. ईरानी भाषाओं ने बैल के लिए गाय- वाची शब्द ‘गाव’ से ही काम चला लिया. गाव के आगे सिर्फ़ ‘नर’ (पुरुष) जोड़कर ‘नरगाव’ बना दिया. यूरोपीय भाषाओं ने इस प्राचीनतम शब्द की शुद्धता को बरकरार रखा और ‘उक्षन्’ (बैल) को ‘ऑक्सेन’ रूप में.

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