वसंत आया – रघुवीर सहाय

कविता

 

जैसे बहन ‘दा’ कहती है

ऐसे किसी बंगले के किसी तरु (अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी

चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पांव तले

ऊंचे तरुवर से गिरे

बड़े-बड़े पियराये पत्ते

कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो-

खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी.

ऐसे, फ़ुटपाथ पर चलते-चलते-चलते

कल मैंने जाना कि वसंत आया.

और यह कैलेण्डर से मालूम था

अमुक दिन वार मदनमहीने के होवेगी पंचमी

दफ़्तर में छुट्टी थी- यह था प्रमाण

और कविताएं पढ़ते रहने से यह पता था

कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

आम बौर आवेंगे

रंग-रस-गंध से लदे-फदे दूर के विदेश के

वे नंदनवन होंगे यशस्वी

मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व

अभ्यास करके दिखावेंगे

यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूंगा

जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया.

फरवरी 2016

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