मेरे साहित्य की आदि-प्रेरणा

♦  गोपाल प्रसाद व्यास   >

संसार के अन्य शुभ कार्यों में चाहे प्रेरणा की ज़रूरत न महसूस होती हो, मगर यह जो कविता लिखने का महाकार्य है उसमें तो प्रेरणा का दौरा पड़ना वैसे ही आवश्यक है, जैसे मलेरिया-बुखार के प्रारम्भ में जाड़े का चढ़ना. इसीलिए कविता की समझ आने से पहले ही मैंने प्रेरणा के महत्त्व को समझ लिया था. उस्तादों ने मुझे पहले ही सुझा दिया था कि ए नामुराद, कविता लिखने के लिए कागज़, कलम, एकांत और छंद की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी कि प्रेरणा के एक असाधारण ‘किट’ की. ज़िंदगी में कुछ बन सकने की सम्भावना अपने में न पाकर, मैं कवि बनना तय कर चुका था, इसलिए मैंने प्रेरणा का ज़ोरों से पीछा करना आरम्भ कर दिया.

चांदनी रात में मैं यमुना के किनारे-किनारे मीलों चला जाता और आंखें फाड़-फाड़कर चंद्रमा को घूरता रहता कि कुछ सूझे, कुछ फुरे. तट की रजत बालू को खोद-खोद डालता कि देखूं प्रेरणा देवी कहां धंसी बैठी है. घंटों कालिंदी की लहरों को गिनता रहता कि कृष्णप्रिया यमुना कुछ कहे, कुछ बोले. कान लगाये रहता कि न जाने कब लहरों से कान्हा की मुरली कुहुक उठे और मेरा कवि फूट पड़े. लेकिन अफसोस, आकाश का चंद्रमा धरती के इस अभिनव चकोर पर कभी नहीं पिघला. घंटों ताकने पर भी मुझे उसमें से कोई रमणी-मुख झांकता दिखाई नहीं दिया. मुझे ऊर्ध्वमुख देखकर झाड़ियों से खरगोश तो अवश्य भाग निकलते, मगर चंद्रमा ने कभी अपने में से मुझे भाव झराकर नहीं दिये. यमुना की बालू में भी मुझे लाख कुरेदने पर कविता-रत्न नहीं मिला. हां, चाहता तो सीप और घोंघों की वहां कमी नहीं थी. मथुरा की यमुना में से कृष्ण की वंशी तो क्या, जिसका साहित्य में बड़ा शोर था, वह कल-कल ध्वनि भी सुनाई नहीं दी. हां, बहुत रात होने पर सियार अवश्य अपनी सुमधुर ध्वनि में मेरा स्वागत कर दिया करते थे.

चौदह वर्ष की अवस्था में ही मैंने दो बार ‘बिहारी सतसई’ पढ़ डाली. मतिराम, पदमाकर, देव, दूलह, रहीम, रसखान आदि के सैकड़ों चुहचुहाते छंद घोटकर पी गया.  घर के अलंकार बेचकर साहित्य के अलंकार बिसाह लिये. रास्ते चलती सुंदरियों में नायिका-भेद के लक्षण ढूंढ़ने लगा. मगर फिर भी प्रेरणा कमबख्त, मुझे पास आती दिखाई नहीं दी.

लोगों ने कहा- तुम निगुरे हो, कविता में जब तक किसी को गुरु नहीं बनाओगे, वह सिद्ध नहीं होगी. मैंने तत्काल एक रुपये के पेड़े लिये, पिताजी का एक कीमती दुपट्टा चुराया और एक दिन चुपके से कविरत्न नवनीतजी चतुर्वेदी के पास शिष्य बनने जा पहुंचा. लेकिन चेला गुरु को भारी पड़ा. वह मुझे गणेश-वंदना के बाद पिंगल के नष्ट, उद्दिष्ट, मरकटी, मेरू और पताका ही बता पाये थे कि उनके लिए स्वर्ग से आमंत्रण आ पहुंचा.

फिर भी मैं निराश नहीं हुआ. सोचा, जब तक अंतःप्रेरणा नहीं जागती, तब तक बाहरी तैयारी तो पूरी कर ही लेनी चाहिए. यद्यपि मैंने लम्बे-लम्बे बाल नहीं बढ़ाये और  न अपने पुराने नाम को उतारकर कोई नया नाम ही धारण किया, लेकिन बावजूद बाल और नाम न रखने के मैंने अपने-आपको उस हद तक ‘कार्टून’ अवश्य बना लिया था कि मेरी लटपटी चाल और अटपटी बातों को देखकर कोई भी दूर से बता सकता था कि हां, सचमुच हिंदी का कलाकार आ रहा है.

अंग्रेज़ी के सातवें दर्जे का इम्तिहान देनेवाला था, मगर सोचा कि जब कवि ही बनना है तो पढ़-लिखकर क्या होगा? स्कूल को तिलांजलि दे दी. अब रात को दो-दो बजे तक ताश-चौपड़ खेलता और सुबह दस-दस बजे सोकर उठता. दोनों कानों में इत्र के महकते हुए फोए लगाता और शाम को सुरमा सारकर गले में सुगंधित फूलों के गजरे डाल बाज़ार में इस तरह गबरू की तरह झूमता हुआ चलता कि लोग इस नये छैले को देखते रह जाते.

यमुना में स्नान करती हुई ब्रज-सुंदरियों को, मंदिरों में झांकी लेती और देती हुई अभिनव मीराओं को और मथुरा की सुरम्य वीथियों में अभिसार को निकली हुई प्रमदाओं को खोई-खोई आंखों से देखते रहना अब मेरा नित्य का कार्यक्रम बन गया था.

रीतिकालीन कवियों के आधार पर मैंने नायिकाओं के नख-शिख का गहन अध्ययन किया. सोलहवें साल में प्रवेश होते-न-होते, वात्स्यायन का कामसूत्र भी पढ़ डाला. परंतु मेरे ऊसर मन में कविता के सरस अंकुर नहीं जमे. नवरस पढ़ लेने पर भी काव्यरस की कल्लोलिनी नहीं बही. तब मैंने हिमालय से शुद्ध ब्राह्मी बूटी मंगवायी. मथुरा के सुप्रसिद्ध पेय विजया को भी कुछ दिनों गले लगाया. सरस्वती मंत्र का भी विधिवत् जाप किया. मगर लाख प्रयत्न करने पर भी प्रेरणा की फुरफुरी मुझे नहीं चढ़ी.

पर होनी की बात देखिए कि जो प्रेरणा यमुना के कुसुमित कछारों और ब्रज की मनोरम वीथियों में साहित्य के अनवरत पठन-पाठन से प्रस्फुटित नहीं हुई, वह आगरे के पागलखाने से कुछ ही दूर अनायास ही खुली चरने-बिचरने लगी. स्वर्गीय नवनीतजी का शिष्यत्व और रत्नाकरजी की संगत जिसे सुलभ नहीं बना सकी, उसे साहित्य में सर्वथा उपेक्षित एक चतुष्पद पशु ने सहज सम्भव कर दिखाया. स्वयं कामदेव को भी मोहित करनेवाली साक्षात रतिरूपा चंद्रबदनी ब्रजललनाएं जिस कार्य के करने में नितांत असमर्थ सिद्ध हुईं, उसे बाबू गुलाबराय की महा ‘महिषी’ भैंस ने चुटकी में कर डाला.

एक दिन जैसे सृष्टि के आदिकवि वाल्मीकि के मुंह से क्रौंच पक्षी के वध पर ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं अगमः’ निःसृत हो उठा था, उसी प्रकार ईसा की बीसवीं शताब्दी के चौथे चरण में इस कलियुगी व्यास के मुंह से, रस्सा तुड़ाकर गुसलखाने में घुसी हुई भैंस ने स्वयमेव कहलवा डाला-

“ओ, बाबूजी की डबल भैंस!”

यह हास्यरस की मेरी प्रथम रचना है. इससे पहले यद्यपि मैंने अनेक छंद ब्रजभाषा में लिख डाले थे. उनकी वाहवाह भी हुई थी. कहीं-कहीं उन पर मैडिल-वैडिल भी मिले थे. तब मैंने उन पर अहंकार भी कम नहीं किया था. परंतु धरम लगती बात तो यह है कि ब्रजभाषा के महा रससागर में जहां असंख्य मणि-माणिक्य भरे पड़े हैं, मेरे उन चंद कवित्त-सवैयों का मूल्य इमीटेशन-जैसा भी नहीं है. इसका कारण यह है कि वे सब-के-सब अनुभूति के अभाव में बिना प्रेरणा के ठीक उसी प्रकार लिखे गये हैं, जिस प्रकार आजकल के डॉक्टर बिना रोग को समझे महीनों नुस्खे लिखे चले जाते हैं.

यदि जीवन और साहित्य की कंटीली डगर पर भटकते हुए मुझ असहाय को सद्गुरु सत्येंद्रजी का सहारा न मिला होता तो शायद मैं एक ओर निरा कम्पोजीटर रह जाता और दूसरी ओर विभूतिमती फिर भी अस्तंगत ब्रजभाषा के शब्दजाल में आजन्म उलझा रहता. सत्येंद्रजी के सम्पर्क में आते ही मेरी दिशाएं आलोकित हो उठीं. उन्होंने मेरे मंद पड़े हुए साहस को प्रदीप्त किया और सदैव मेरा हौसला बढ़ाते रहे. एक घटना याद आती है कि जब मैं कुछ भी नहीं था, तब उन्होंने मुझे एक लेटरपैड छपाकर दिया, जिस पर एक कोने में मेरे नाम के नीचे, आकर्षक अक्षरों में छपा था- कवि, लेखक और पत्रकार. नये साहित्य और उसकी प्रवृत्तियों से मेरा परिचय सत्येंद्रजी के द्वारा ही हुआ. दिन-रात में भेद न देखते हुए वह मेरे निर्माण में वत्सल पिता की तरह जुट गये. दिनभर मुझे अपनी कम्पोजीटरी से और उन्हें अपनी अध्यापकी से फुर्सत न मिलती. रात को 12-12 और 1-1 बजे तक वह मुझे ‘विशारद’ और ‘साहित्यरत्न’ की परीक्षाओं के लिए पढ़ाते रहते. अंत में उन्होंने ही मुझे आगरा तक पहुंचा दिया और अपने अनन्य मित्र महेंद्रजी के पत्र ‘साहित्य-संदेश’ में सहायक सम्पादक बना दिया.

तो हां, बात मैं भैंस की कर रहा था. बात यह थी कि आलोचकप्रवर बाबू गुलाबराय हमारे ‘साहित्य-संदेश’ के प्रधान सम्पादक थे. ‘साहित्य-संदेश’ की सेवा का पुरस्कार तो उन्हें वार्षिक ही मिलता था, मगर वह नियमित रूप से एक बार ऑफिस में अवश्य आया करते थे. क्योंकि पुरस्कार की मात्रा कुछ स्वल्प होती थी, इसलिए बाबूजी का ऑफिस में ठहराव भी कुछ ही मिनटों का होता था. उन दिनों बाबू गुलाबरायजी ने एक भैंस बांध रखी थी. भैंस तो और भी कुछ लोग बांध लेते हैं और उसका दूध भी आराम से पीते हैं. मगर आलोचक बाबू गुलाबराय उससे दूध के अतिरिक्त एक और काम भी ले रहे थे. वह शायद बारीकी से इस कहावत का अध्ययन कर रहे थे कि ‘अकल बड़ी या भैंस?’ इसीलिए जब कभी हम लोगों से मिलते तो साहित्य की चर्चा तो ज़रा कम होती, मगर भैंस विषयक व्याख्यान काफी लम्बा रहता. दार्शनिक बाबूजी की भैंस भी कोई साधारण नहीं थी. वह बाबूजी के बगीचे के केले छोड़ देती और पत्ते खा जाती. क्यारियों में गुलाब खिले रहते, मगर दूब न जम पाती. वह गोभी के पत्तों को चबा जाती, मगर फल को बाबूजी की रसोई के लिए सम्हाल रखती. भैंस के यही गुण बाबूजी की नज़रों में अकल से बढ़ चले थे. मैं ‘साहित्य-संदेश’ का काम तो मुस्तैदी से करता ही था, मगर बाबूजी के भैंस-पुराण को भी बड़ी श्रद्धा के साथ सुना करता था. इसलिए मैं उनके स्नेह का, दूध देनेवाली भैंस के बराबर तो नहीं, फिर भी पर्याप्त पात्र हो उठा था. वह अक्सर भैंस का मट्ठा पीने के लिए मुझे अपनी कोठी पर आमंत्रित किया करते थे.

एक दिन उस भैंस ने महापराक्रम कर दिखाया. बाबूजी ने भैंस के लिए सब प्रकार के सर्वोत्तम प्रबंध कर छोड़े थे. मगर उसके स्नान की समुचित व्यवस्था नहीं थी. बाबूजी स्वयं गुसलखाने के टब में डूबकर ‘कठौती में गंगा का’ आवाहन करते, मगर भैंस बेचारी को नल के जल से बाल्टियों से नहलाया जाता. एक दिन बाबूजी की पत्नी गुसलखाने में स्नान कर रही थीं तो भैंस भी अपना प्रथम अधिकार समझकर उसमें घुस पड़ी. संकरा दरवाज़ा, छोटी जगह. भैंस घुस तो गयी, मगर अब निकले कैसे? कुहराम मच गया. कॉलेज से दौड़े-दौड़े बाबूजी घर आये. हम लोगों ने सुना तो हम भी कौतुक-वश जा पहुंचे. अजीब उलझन थी. प्रगतिशील भैंस के बढ़े हुए कदम प्रतिक्रियावादी होने को कतई तैयार न थे. उसे पुचकारा गया, मगर वह नहीं पिघली. ललकारा गया, मगर वह नहीं लौटी. सरसों की हरी-हरी डालियां तोड़कर उसे ललचाया गया, मगर उसने भी सच्चे क्रांतिकारियों की तरह उनकी ओर झांका तक नहीं.

आखिर लम्बे-लम्बे रस्से मंगाये गये. कुछ को पैरों में बांधा गया, कुछ को कमर में. एक बड़ी बर्त (मोटा रस्सा) गले में अटकायी गयी. तब कही दस-बारह आदमियों ने अक्ल से नहीं, पशुबल से ही भैंस को गुसलखाने से राम-राम कहकर बाहर निकाला.

बाहर निकलने पर बड़ी विजयगर्व से भैंस ने पूंछ उठाकर हमें देखा. मुझे लगा कि मानो वह चुनौती दे रही हो कि बोलो, आदमी की अक्ल के कितने टके उठते हैं?

मेरे अंतर के तार एकदम जैसे झनझना उठे. मेरे गुप्त भावों के सरोवर में जैसे किसी ने ईंट फेंक दी. मानो गहरी नींद में सोते हुए मुझको किसी ने ज़ोरों से चिकोटी काट ली. मेरा मन हर्षातिरेक से भर गया. अनायास ही व्यंग्य और विनोद दोनों मेरी बांहों में आ गये और बोले- कवि, लो आज से हम तुम्हारे हुए. मैंने मन-ही-मन कृष्णस्वरूपा पयस्विनी अपनी इस आदिप्रेरणा को नमस्कार किया और उसी दिन से बिना झिझक के मैं हास्यरस लिखने लगा.

आज भी जब कभी मैं अपने पिछले हास्य-काव्य पर दृष्टि डालता हूं, या नया कुछ लिखने बैठता हूं, तो न मुझे नेहरूजी का ‘जयहिंद!’ याद आता है, अंतर्मन के साथ-साथ मेरे शरीर का रोम-रोम बस एक ही नारे को बुलंद करता है- जय भैंस!   

(मार्च 2014)  

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