महाराष्ट्र का राज्यवृक्ष – आम

♦  डॉ. परशुराम शुक्ल   > 

आम को फलों का राजा कहा गया है. इसके वृक्ष उत्तर भारत में तराई वाले स्थानों से लेकर दक्षिण भारत में कन्याकुमारी तक और पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में असम तक पाये जाते हैं. भारत में फल की खेती वाले कुल क्षेत्र के 70 प्रतिशत भाग में केवल आम के वृक्ष हैं. यहां पर लगभग 1460000 एकड़ ज़मीन पर इसके वृक्ष उगाये जा रहे हैं.

भारत में आम को एक पवित्र वृक्ष माना जाता है. इसके पत्तों को सुख और समृद्धि का प्रतीक मानते हुए अनेक प्रकार के धार्मिक कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है.

आम के मूल स्थान, इसकी खेती, महत्त्व आदि के सम्बंध में विश्व के अनेक विद्वानों ने लिखा है. कन्दोल के अनुसार आम  को दक्षिण एशिया अथवा मलाया का मूलवृक्ष माना गया है. कन्दोल ने लिखा है- “यह दक्षिण एशिया या मलाया में पहले पहल उत्पन्न हुआ और इसका नाम भी शायद मलाया की भाषा से ही आया है.” पपनोई ने भी कन्दोल के विचारों का समर्थन किया है. पपनोई के अनुसार “आम का मूल स्थान सम्भवतः पूर्वी भारत, असम, म्यामार (बर्मा) अथवा सुदूर मलाया क्षेत्र हो सकता है.” कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि आम म्यामार, स्याम (थाईलैंड) अथवा मलाया का मूलवृक्ष हो सकता है. इन सभी के विपरीत ‘मेमिलकने’ का विचार है कि आम का मूल स्थान भारत है. इसका जन्म, भारत के उस भाग में हुआ जो बर्मा के निकट है. इस भाग में आज भी आमों के विशाल जंगल हैं.

आम के सम्बंध में यह कहा जाता है कि यह ईसा से चार अथवा पांच शताब्दी पूर्व भारतीयों द्वारा मलाया एवं अन्य पूर्व एशियाई देशों में ले जाया गया. यहां से इसे पर्सियावासियों द्वारा पूर्वी अफ्रीका के तटवर्ती भागों में पहुंचाया गया. पूर्वी अफ्रीका से यह पुर्तगालियों द्वारा पश्चिम अफ्रीका और उत्तर अमेरिका ले जाया गया. अठारहवीं सदी के आरम्भ में यह दक्षिण अमेरिका पहुंचा. सन् 1742 तक यह ब्राजील पहुंच चुका था.

भारत में आम प्राचीन काल से ही लोकप्रिय रहा है. बौद्धग्रंथों के अनुसार-गौतम बुद्ध जब वैशाली पहुंचे थे तो उन्होंने आम के एक बाग में ही डेरा डाला था. महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान-शाकुंतलम्’ में लिखा है कि शकुंतला ने महर्षि कण्व के आश्रम में आम के पौधे लगाये थे. वह स्वयं इनमें पानी देती थी और इनकी देखभाल करती थी. फाहयान, सुंगयुन, ह्वेनसांग, इब्नबतूता जैसे विदेशी यात्रियों ने भी आम की प्रशंसा की है. और इसे विश्व का सर्वाधिक शानदार फल बताया है. शतपथ ब्राह्मण, शिवपुराण, रामायण, महाभारत, चरक संहिता, ऋतुसंहार आदि ग्रंथों में आम का किसी न किसी रूप में वर्णन किया गया है. साहित्यकार अपने साहित्य में प्रायः घटनाओं के अवलोकन के साथ ही अपनी कल्पनाशक्ति का भी उपयोग करता है. अतः भूल कर बैठता है. कालिदास ने भी ऐसी भूल की है. रमेश बेदी के अनुसार- “कालिदास ने कई श्लोकों में आम के बौरों पर भौंरों की पांत के मंडराने की बात लिखी है. निरंतर कई वर्ष मैं कालिदास की इस कल्पना को आम के बौरों पर मूर्तरूप में देखने का प्रयास करता रहा. संस्कृत काव्यों के अनेक रसिकों के साथ मैं वसंत में आम की भिन्न-भिन्न किस्मों के ऊपर खिले बौरों पर मंडराते भौरों की खोज करने गया, किंतु मुझे कहीं भी रसलोलुप दिखाई नहीं दिये. इन भौरों की बात तो दूर रही, मधु-मक्खियां भी आम्र मंजरियों पर अपना भोजन, मकरंद या पराग लेने नहीं आतीं. इसी प्रकार आम्र की बौरों से कोयल का सम्बंध स्थापित करने वाले साहित्यकारों की कल्पनाएं भी भ्रामक हैं. आम्र के बौरों  से कोयल क्या, कोई भी पक्षी रस नहीं लेता. उस पर यह भी विचारणीय है कि वसंत ऋतु में उत्तर भारत में कोयल प्रकट होती ही नहीं. बौरों पर छोटी-छोटी अंबिया आ जाती हैं और ग्रीष्म ऋतु आ जाती है, तभी कोयल का आगमन होता है तथा उसकी कूक सुनाई देती है.’

आम प्राचीन काल से भारत का लोकप्रिय वृक्ष रहा है. अनेक राजाओं महाराजाओं ने इसके बाग-बगीचे लगवाये तथा इसे संरक्षण दिया. कहते हैं सम्राट अशोक ने सड़कों के किनारे लाखों वृक्ष लगवाये. इनमें सर्वाधिक वृक्ष आम के थे. मुगल बादशाह अकबर को भी आम बहुत प्रिय थे. उनकी पत्नी जोधाबाई को आम की विभिन्न किस्में एकत्रित करने का शौक था. अकबर ने जोधाबाई की इच्छा पूरी करने के लिए दरभंगा के निकट सौ बीघे ज़मीन पर आमों का बाग लगवाया. इस बाग में एक लाख वृक्ष थे. आगे चलकर यह बाग लाखा बाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ. अकबर ने दरभंगा जिले में ही समस्तीपुरी के निकट एक अन्य बाग लगवाया था. इसमें कतिका आम के बाग थे. यह आम सर्दियों के आरम्भ में पककर तैयार होता है. आमों के उत्पादन में दगभंगा का विशेष स्थान है. यहां का लंगड़ा आम विश्व प्रसिद्ध है.

आम एनाकार्डिएसी परिवार का वृक्ष है. इसका वैज्ञानिक नाम मैंजीफेरा इंडिया है. अंग्रेज़ी में इसे मैंगो ट्री कहते हैं. इसे अरबी में अंबज और फारसी में अंबः कहा जाता है. भारत में अलग-अलग स्थानों पर एवं अलग-अलग भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. आम को हिंदी और बंगाली में आम, मराठी में आम्बा, गुजराती में आम्बी, सिंधी और पंजाबी में अम्ब, कन्नड़ में अम्भ और तमिल में मंगा नाम से जाना जाता है. इसके संस्कृत में सर्वाधिक नाम हैं. वनस्पति निघण्डुओं में आम के 46 नामों का उल्लेख किया गया है- अतिसौरभ, अम्लफल, आम्र, कामवल्लभ, कामांङ्गा कामशर, कीरेष्ट, कोकिलबंधु, कोकिलावास, कोकिलोत्सव, चैत्रवृक्ष, नृपप्रिय, परपुष्ट, पिकराग, पिकबंधु, पिक महोत्सव, पिकवल्लभ, मदोद्भव, मधूली, मद्यसह, मध्यावास, मनोरथ, मन्मभ, मन्मथालय, माकन्द, रसाल, माधवद्रुम, वनपुष्पोत्सव, शिलीष्ट, शिष्ट, शौण्डिकप्रिय, श्यामतैलक, समन्वितकारी, सहकार, सीधुरस, सुपथामोद, सुमदन. ये सभी नाम आम से सम्बंधित किंवदंतियों, इसके गुणों तथा इसकी विशेषताओं पर आधारित हैं.

आम का वृक्ष सदाबहार और छायादार होता है. इसके आकार में अवश्य भिन्नता होती है. अलग-अलग जातियों के आम के वृक्षों की ऊंचाई 10 मीटर से लेकर 45 मीटर तक हो सकती है. यह लगभग 10 वर्ष बाद फल देना आरम्भ कर देता है और फिर लम्बे समय तक फल देता है. इसके सौ वर्षों से भी अधिक आयु के वृक्ष देखने को मिल जाते हैं. फिलीपीन्स में आम का एक विशाल वृक्ष है, जो प्रतिवर्ष लगभग 35000 फल देता है. विश्व में आम का सबसे बड़ा वृक्ष अम्बाला जिले के बैडल गांव में है. लगभग 27 मीटर ऊंचा और 9.75 मीटर परिधि वाला यह वृक्ष प्रतिवर्ष 8 टन से अधिक फल देता है. बडैल गांव के लोग इस वृक्ष को छप्पर कहते हैं.

भारत में आम के फलों का उत्पादन व्यावसायिक रूप से किया जाता है. इसके लिए दो प्रकार के वृक्ष लगाये जा सकते हैं- बीज द्वारा और कलम द्वारा. बीज द्वारा आम का वृक्ष लगाने के लिए इसकी गुठली का उपयोग किया जाता है. इसके लिए पके हुए आम की गुठली लेकर जून अथवा जुलाई के महीने में अथवा मानसून आते ही उसे बो दिया जाता है. वृक्ष को बड़ा होने तथा फल देने योग्य बनाने में 8 से 10 वर्षों का समय लग जाता है. इस प्रकार के वृक्षों से प्राप्त होने वाले आमों को ‘बीजू’ आम कहते हैं.’

आम की गुठलियों की अंकुरण क्षमता बहुत कम होती है. इनका उपयोग 15 दिन से एक माह के भीतर ही किया जा सकता है. इसके साथ ही व्यावसायिक स्तर पर आम की मनपसंद फसल प्राप्त करने के लिए गुठलियों का प्रयोग अधिक सफल नहीं सिद्ध हुआ है. अतः अधिकांश लोग कलम द्वारा आम के पेड़ लगाते हैं.

सामान्यतया आम का वृक्ष वर्ष में एक बार फल देता है. किंतु इसकी कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं जो वर्ष में दो बार फल देती हैं. इस प्रकार के आम के वृक्षों को सदाबहार आम के वृक्ष कहा जाता है. भारत में एक ऐसा आम भी पाया जाता है, जिसकी लताएं होती हैं. इस आम को लतिया आम कहते हैं.

आम का वृक्ष 8-10 मीटर से लेकर 40-45 मीटर तक ऊंचा हो सकता है. नये वृक्ष का तना गोल चिकना और सीधा होता है इसमें लम्बाई में दरारें दिखाई देती हैं. लगभग  3-4 मीटर ऊपर उठने के बाद इसमें शाखाएं और उपशाखाएं निकलने लगती हैं. इसकी छाल का बाहरी भाग गहरे भूरे रंग का होता है तथा भीतरी भाग पीलापन लिये हल्के सफेद रंग का अथवा हल्की लाली लिये हुए होता है. आम की छाल का स्वाद कसैला होता है. किंतु इसे कुचलने पर एक विशेष प्रकार की मोहक गंध आती है.

इसके वृक्ष पुराने वृक्षों के तनों और शाखाओं से बबूल के समान गोंद निकलता है. इसका गोंद वृक्ष से बाहर निकल कर सूखने के बाद कठोर हो जाता है. आम का गोंद लाली लिये हुए हल्के पीले रंग का अथवा लाली लिये हुए धूसर रंग का होता है. इससे एक विशेष प्रकार की हल्की-हल्की गंध आती है.

आम के वृक्ष की पतली-पतली डालियों पर महुए के पत्तों के समान डंठल के चारों ओर पत्ते निकलते हैं. इसके पत्ते लम्बे होते हैं एवं इनका सिरा पतला और नुकीला होता है. इसके पत्तों के किनारे लहरदार होते हैं तथा मध्यभाग में इनकी चौड़ाई सर्वाधिक होती है. जैसे-जैसे डंठल की ओर अथवा सिरे की ओर बढ़ते हैं, चौड़ाई कम होती जाती है. अलग-अलग प्रजातियों के आम के पत्तों की लम्बाई अलग-अलग होती है. इसकी लम्बाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 30 सेंटीमीटर तक और चौड़ाई 2 सेंटीमीटर से 9 सेंटीमीटर तक हो सकती है. आम के पत्तों के डंठल लम्बे और मज़बूत होते हैं तथा आधार की ओर इनकी मोटाई अधिक होती है. आम के नये पत्ते बड़े कोमल और गुलाबी रंग के होते हैं. कुछ समय बाद इनका रंग हरा हो जाता है एवं इनमें, मध्य शिरा और मुख्य शिरा से दोनों ओर निकलने वाली उपशिराएं साफ़ दिखाई देने लगती हैं. इनका रंग हल्का पीला होता है.

वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही आम के वृक्षों पर फूल आना आरम्भ हो जाते हैं और आधे मार्च से लेकर आधे अप्रैल के मध्य वृक्ष फूलों के गुच्छों से भर जाते हैं. आम के फूलों को बौर कहते हैं. आम के फूल बहुत छोटे होते हैं. इनका रंग लाली लिये हुए सफेद अथवा पीलापन लिये हुए हरा होता है तथा इनसे मधुर सुगंध आती है. आम के एक ही वृक्ष पर नर फूल तथा  मादा फूल दोनों ही देखे जा सकते हैं. आम के वृक्ष पर जब फूल आना आरम्भ होता है तो इसके कोमल पत्तों और फूलों से एक चिपचिपा पदार्थ निकलता है. इस पदार्थ से भी भीनी-भीनी सुगंध आती है. आधे अप्रैल के बाद आम के फूल झरने लगते हैं और प्रायः अप्रैल के अंत तक आम के वृक्षों से फूल समाप्त हो जाते हैं.

आम के वृक्षों पर, फूलों के झरते ही सरसों के बराबर के छोटे-छोटे फल आने लगते हैं. आम के बड़े और कच्चे फलों को अमिया कहते हैं. कहीं-कहीं पर अमिया को केरी भी कहा जाता है. आम के फल को डाल से तोड़ने पर एक चिपचिपा पदार्थ निकलता है. इसे चोपी अथवा चेपी कहते हैं. चोपी मानव शरीर में कहीं भी लग जाये तो जलन-सी होने लगती है. यही कारण है कि आम को हमेशा धोकर खाते हैं तथा चूसने वाले आम को चूसने के पहले इसका कुछ रस निकाल कर फेंक देते हैं.

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सामान्यतया आम गर्मी के मौसम में फलता और पकता है. किंतु दक्षिण भारत और मुंबई के आसपास के क्षेत्रों में, जहां सर्दी नहीं पड़ती आम सर्दी के मौसम में भी फलता है.

विश्व में लगभग 1500 प्रकार के आम के वृक्ष पाये जाते हैं. इन्हें तीन भागों में बांटा जा सकता है- 1) वास्तविक आम (मैंजीफेरा इंडिका) 2)जंगली आम (मैंजीफेरा सिल्वैटिका) और 3) संकर आम (क्रॉसब्रीड). वास्तविक आम के वृक्षों पर फल लगते हैं. भारत में लगभग 1200 प्रकार के आम के वृक्ष पाये जाते हैं. वास्तविक आमों की सहायता से आम की अनेक संकर प्रजातियां भी तैयार की गयी हैं. इस प्रकार की अधिकांश प्रजातियों के आम व्यावसायिक महत्त्व के हैं. व्यावसायिक आधार पर लगभग 25 प्रजातियों के आम सफल हैं. इनमें दशहरी, लंगड़ा, तोतापुरी, चौसा, सफेदा, कलमी, अल्फान्सो, बम्बइया, नीलम, बंगलौरा, गुलाबखस, मुलगोवा, बंगनपल्ली, पैंरी, ओलूर, स्वर्णरेखा आदि प्रमुख हैं.

आम फलों का राजा है और सभी आमों का राजा है- दशहरी. कहते हैं कि लखनऊ के नवाब को लखनऊ और मलीहाबाद के मध्य किसी गांव में इसका वृक्ष मिला था. लखनऊ के नवाब ने इसे मलीहाबाद के नवाब को भेंट किया. मलीहाबाद के नवाब को दशहरी बहुत पसंद आया. उन्होंने इसके अनेक बगीचे लगवाये. वर्तमान में दशहरी आम मलीहाबादी आम का पर्याय बन चुका है. उत्तर भारत के साथ ही यह दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में भी बहुत अच्छी तरह फल-फूल रहा है.

मलीहाबाद के दशहरी के समान भारत में पाये जाने वाले अधिकांश आम स्थान विशेष के नाम से जुड़कर प्रसिद्ध हो गये हैं. बम्बई और इसके आसपास से आया हुआ आम बम्बइया और बंगाल के मालदह जिले और आसपास के क्षेत्रों में फैला हुआ आम मालदह इसी प्रकार के हैं. कुछ आमों के नाम उनके स्वरूप के आधार पर रखे गये हैं. तोते जैसी नाक वाला आम तोतापुरी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है. भारत में पाये जाने वाले आमों में बनारस का लंगड़ा, बम्बई का अल्फोन्सो, लखनऊ का सफेदा, मुर्शिदाबाद का शाहपसंद और जरदालू, हाजीपुर का सुकुल, दरभंगा का सुंदरिया, बड़ौदा का वंशराज, रत्नागिरि का राजभोग, हैदराबाद का सुंदरशा, मालवा का ओलर, पूना का रूत, तमिलनाडु का रुमानी, आंध्रप्रदेश का रेड्डीपसंद, बंगाल का हिमसागर, उड़ीसा का दोफूल आदि प्रमुख हैं. दक्षिण भारत के मलगोआ और महमूदा तथा उत्तर भारत के चौसा और ज़ाफरान की गणना भारत के विख्यात आमों में की जाती है.

मुख्य रूप से आम के फल दो प्रकार के होते हैं- गूदेवाले और रस वाले. गूदे वाले आमों में दशहरी, चौसा, लंगड़ा आदि आम आते हैं. चूसने वाले आमों में बिहार का सुकुल प्रमुख है. मुजफ्फरपुर जिले के हाजीपुर क्षेत्र में पैदा होने वाला यह आम काफी बड़ा होता है, किंतु इसमें गूदा नहीं होता. इसमें केवल रस होता है. यह आम बिहार के बाहर पूरे भारत में अन्य किसी क्षेत्र में नहीं मिलता. आम के रेशों के आधार पर भी आमों को दो भागों में बांटा जा सकता है. रेशे वाले और रेशे विहीन. लंगड़ा, चौसा आदि आमों के गूदे में रेशे होते हैं. इसीलिए ये रेशेवाले आम कहलाते हैं. इसके विपरीत कुछ आम ऐसे होते हैं, जिनके गूदे में रेशे नहीं होते. मलीहाबाद का दशहरी आम इसका सर्वोत्तम उदाहरण है.

आम के वृक्षों पर पके हुए फल केवल इनके निकट रहने वाले व्यक्तियों को ही मिल पाते हैं. इस प्रकार के फल व्यावसायिक उपयोग के नहीं होते, क्योंकि आमों को अधिक समय तक ताज़ा नहीं बनाये रखा जा सकता. अतः यदि आमों को पकने के बाद वृक्षों से तोड़ा जाये तो ये बाज़ार तक पहुंचते-पहुंचते नष्ट हो जायेंगे. व्यावसायिक उपयोग हेतु आमों को प्रायः वृक्षों से तोड़ कर बंद कमरों में पुआल के भीतर रख कर पकाते हैं. इस प्रकार एक सप्ताह के भीतर आम पक जाते हैं. कहीं-कहीं पर आमों को पकाने के लिए रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है. इस प्रकार पकाये गये आम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं तथा अनेक प्रकार की बीमारियां फैलाते हैं.

दशहरी जैसे कुछ आमों के छोड़ कर प्रायः सभी आमों की गुठलियां रेशेदार होती हैं. गुठली का स्वरूप विविधतापूर्ण होता है. सामान्यतया यह गुर्दे जैसी होती है.

रमेश बेदी ने भारत में आम की गुठली के एक विशिष्ट उपयोग की चर्चा की है. उनका मत है कि- आम की सूखी गिरी में छह से बारह प्रतिशत स्नेह होता है. क्रीम रंग का यह स्नेह कमरे के तापमान पर मक्खन के समान ठोस रहता है. और 34.5 अंश शतांश पर पिघल जाता है. मक्खन सदृश होने के कारण इसे आम की गुठली का मक्खन कह सकते हैं. स्नेह के इस ठोस प्रभाग को अलग करने के लिए विलायक निस्सारण और शुरुता प्रभाजन द्वारा गिरी से मक्खन प्राप्त किया जाता है. यह उपज भौतिक और रासायनिक गुणों में कोको बटर फैट से बहुत मिलती है. इसकी बेकरी और मिठाई उद्योगों में बहुत खपत है. कोको बटर भारत में पैदा नहीं किया जा रहा और आयात किया जाता है, जिसमें बहुत विदेशी मुद्रा खर्च होती है. राष्ट्रीय बचत को बढ़ावा देने के लिए आम की गिरी के मक्खन का उत्पादन करना अभीष्ट है. भारत में हर साल तीस हजार टन आम की गिरी का मक्खन पैदा करने की क्षमता है.

(मार्च 2014)

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