मनिआर्डर

 किरण अग्रवाल

 

भैयादूज के बाद आता था मनिआर्डर भैया का
इंतज़ार करती थी मैं बेसबरी से डाकिये की घंटी का
और डाकिया करता था इंतज़ार
कि कब मैं रखूंगी उसकी हथेली पर
मनिआर्डर से आये रुपयों का एक छोटा-सा भाग

 

उन दस-बीस रुपयों के एवज में
डाकिये के चेहरे पर खिल उठी खुशी
महका देती थी मेरे मन की बगिया को
फाड़ कर देता था जब डाकिया मनिआर्डर के नीचेवाला हिस्सा
जिसपर लिखे होते थे शब्द-
प्यारी छुटकी,
भैयादूज के 500/- भेज रहा हूं
इन्हें खर्च कर देना, जुगाके मत रखना कंजूस…
तेरा भाई पी.के.

 

इस बार भैयादूज के दिन मेरे भेजे रोली-चावल से टीका करने के बाद
भैयादूज की बधाई देने भैया का फोन आया जब
पूछा उन्होंने- ‘तेरा एकाउंट किसी बैंक में है न?’
मैंने कहा- ‘हां स्टेट बैंक में है न’

बोले – ‘सोचता हूं मनिआर्डर भेजने की बजाये

एकाउंट टु एकाउंट ही ट्रांसफर कर दिया करूं अबसे भैयादूज के पैसे
ऐसा कर, अपना नाम, एकाउंट नम्बर, बैंक की शाखा और

आई एफ एस सी कोड भेज दे,
और मैंने कर दिया एस एम एस उसी दिन

 

इस बार नहीं आयेगा मनिआर्डर
इस बार नहीं आयेगा डाकिया
मेरे मन की बगिया में कोई फूल नहीं खिलेगा
नहीं बिखरेगी कोई खुशबू
शब्द अनकहे गुम हो जायेंगे भाई के बाहर के शोर में
जो पा जाते अपनी इच्छित जगह मनिआर्डर के निचले हिस्से पर

 

तीन-चार दिनों बाद आज भैया का फोन आया-
‘छुटकी!’ मैंने कर दिये हैं 1000/- ट्रांसफर तेरे एकाउंट में
चेक कर लेना ज़रा’
सोचती हूं कैसे इन हज़ार रुपयों को रखूं
डाइनिंग टेबुल पर दबाकर किसी किताब से
भैया के अनबोले शब्दों के साथ
ताकि घर भर देख ले मेरे भैया ने भेजे हैं भैयादूज के हज़ार रुपए इस बार
ताकि घर में घुसते ही पतिदेव चहकें-
‘ओ! साले साहब का मनिआर्डर!

डाकिये को कुछ दिया भी या नहीं तुमने!!’

और मैं हुलसकर कहूं-
‘दस-बीस नहीं, पचास रुपए दिये मैंने इस बार…’

                                           (जनवरी 2016)

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