बारह फकीरों का कम्बल  –   काका कालेलकर

चिंतन

कौन जाने किस तरह, किंतु दुनिया के सभी धर्म हमारे देश में आ पहुंचे हैं और वे किसी को सुख से रहने नहीं देते. अब इन धर्मों का हम करेंगे क्या? यह प्रश्न अनेक लोगों के मन में समय-समय पर उठता रहता है. कुछ लोग कहते हैं कि जिस प्रकार अरबस्तान में सिर्फ इस्लाम के अनुयायी ही रह सकते हैं, अमेरिका में अंग्रेज़ी भाषा ही चल सकती है, उसी प्रकार यदि भारत में धर्म के बारे में हो सका होता तो कितना अच्छा होता? भारत में एकमात्र हिंदू धर्म ही होता और दूसरे सब धर्मों को यहां रहने की मनाही कर दी गयी होती, तो कितना अच्छा होता? दूसरे कुछ लोग पूछते हैं कि धर्म की बला ही क्यों रहनी चाहिए? सभी धर्म समान रूप से फेंक देने जैसे हैं इनमें से एक को रखने और बाकी सबको निकाल देने का क्या अर्थ है?

यह भी पूछा जा सकता है कि भिन्न धर्मी लोगों के बाहर से आने पर आप शायद रोक लगा सकें; किंतु सनातन काल से इसी देश में रहने वाले लोगों में से कुछ यदि अपनी धार्मिक मान्यता को बदल डालें या बाहर के किसी धर्म को स्वीकार करें, तो आप उन्हें कैसे
रोक सकेंगे?

इस प्रकार हमारे देश में धर्म-विषयक चर्चा चलती रहती है. कुछ ऊंघते रहने वाले धर्मों के कानों तक अभी यह चर्चा पहुंची ही नहीं है. कुछ भाग्यवादी धर्म ‘जो होना होगा, वह होगा, हमारे हाथ में क्या है? हम तो पड़े रहेंगे और जो होगा उसे सहन करेंगे’ ऐसा कहकर जमुहाई लेते रहते हैं. कुछ धर्म हक्के-बक्के होकर अपनी योग्यता और अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए प्रमाण और दलीलें एकत्र करते हैं; और कुछ धर्में को लगता है कि ‘राज्यसत्ता के बिना धर्म टिक ही नहीं सकता, इसलिए राज्यसत्ता की शरण हमें लेनी ही पड़ेगी.’

एक ज़माना ऐसा था, जब धर्म सर्वोच्च सत्ता भोगते थे. राजा को गद्दी से उतार देने की सत्ता भी धर्माचार्यों के हाथ में रहती थी. राज्याभिषेक के समय धर्मगुरु ही राजा को राजत्त्व प्रदान करता था. इंग्लैंड के एक राजा को अपना मुकुट पोप के चरणों में रखकर उसे साष्टांग प्रणाम करना पड़ा था. और रोम का पोप अपने शिष्य-राजाओं के बीच सारी दुनिया का बंटवारा तक कर सकता था.

परंतु आगे चलकर धर्म संस्था की यह प्रतिष्ठा नहीं रही. राजा सर्वोपरि बन गया और धर्म अंत में राजा का आश्रित हो गया. व्यक्तियों के जीवन में भी धर्म की सर्वोपरिता घट गयी और सत्ता तथा संपत्ति की प्रतिष्ठा बढ़ी.

धर्म का यह अधःपतन किसलिए हुआ? कारण स्पष्ट है. धर्मों ने राज्य व्यवस्था का अनुसरण और अनुकरण किया, राज्यसंस्था को आदर्श मानकर धर्म संस्था का तंत्र रचा और सत्ता तथा अधिकार की परम्परा खड़ी की. यूरोप में पोप की जो सत्ता थी, इस्लामी दुनिया में खलीफा की जो सत्ता थी, वैसी सत्ता हमारे देश में धर्माचार्यों, शंकराचार्यों तथा राज-पुरोहितों की कभी नहीं रही. फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हमारे यहां धर्मसंस्था ने राज्यसंस्था का अनुकरण नहीं किया. जातियों का संगठन, गुरु-शिष्य सम्बंध विषयक नियम, मंदिरों की व्यवस्था- इन सबके पीछे राज्यतंत्र जैसी ही योजना रही है. नतीजा यह हुआ कि धर्म की जड़ में ही सड़न पैठ गयी. लेकिन जिस समय राज्यसत्ता का अनुकरण शुरू हुआ उस समय तो लोगों को यही लगता था कि अब धर्म की विजय हुई है; अब धर्म की सच्ची स्थापना हुई है.

परंतु धर्माचार्यों की सत्ता बढ़ी उसी समय से सच्चा धर्म क्षीण होने लगा और फिर सच्ची धार्मिक प्रेरणा आचार्यों के हाथ से निकल गयी. अब वह संतों के पास चली गयी. भारत के संत अधिकतर तंत्र-विमुख ही रहे; और जहां उन्होंने तंत्र खड़ा किया वहां राज्यतंत्र के नमूने पर नहीं, परंतु लोक-जीवन के अनुकूल ही तंत्र रचा. यूरोप में क्या और हमारे देश में क्या, तंत्र-विमुख संतों की वजह से जितना धर्म टिक सका, उतना ही टिका है.

एक पुरानी कहावत है- ‘एक कम्बल पर बारह फकीर सो सकते हैं, लेकिन एक बड़े साम्राज्य में दो बादशाहों का निर्वाह नहीं हो सकता.’ जहां राज्यतंत्र का अनुकरण किया जायेगा, वहां एक स्थान पर एक ही धर्म निभ सकता है. भारत में सारी दुनिया के धर्म इकट्ठे हो गये हैं, क्योंकि भारत वास्तव में बारह फकीरों का कम्बल है- आज ऐसा न हो तो भी वह फकीरों का कम्बल बनने के लिए ही पैदा किया गया है.

जो मनुष्य बाहर से भारत को देखने आता है, उसका पहला ही उद्गार यह होता है- ‘भारत एक विशाल धर्म-परिवार है.’ यह बात सच है, परंतु यह परिवार मिल-जुलकर रहने वाला नहीं है. अधिकतर हिंदू परिवारों में जिस तरह भाई-भाई अलग भी नहीं रहते और मिल-जुलकर भी नहीं रह पाते, हमेशा परस्पर झगड़ते रहते हैं; उसी तरह भारत के धर्म हैं. शायद ऐसा हो कि हिंदू परिवार को जब हम सुधार सकेंगे और आपस में प्रेम तथा आदर की भावना रख कर मेल-जोल से रहना सीखेंगे तभी धर्मों का प्रश्न भी हल होगा; और आज जहां धर्म के क्षेत्र में केवल कोलाहल ही सुनाई पड़ता है वहां समन्वय का विश्व-समृद्ध संगीत गगन-मंडल को भर देगा.

बात यह है कि राजा और उनकी सरकारें मनुष्य के बाहरी जीवन पर ही अधिकार भोग सकते हैं, और इसीलिए वे दुनियावी तंत्र खड़ा करके उसके द्वारा अपना ध्येय सिद्ध कर सकते हैं. लेकिन धर्म का प्रभाव मूलतः आंतरिक होता है. धर्म जानता है कि भीतर का प्रभाव अपने आप बाहर आये, यही शुभ और वांछनीय है. राज्यसत्ता के वातावरण में धर्मों ने जीवन की अपेक्षा मान्यता पर अधिक भार दिया. मनुष्य का धार्मिक जीवन कैसा भी हो, यदि वह धार्मिक मान्यता से सहमत हो तो इतना काफी है- ऐसा वातावरण खड़ा करके हमने धार्मिकता का गला घोंट दिया है. धर्म का रहस्य उसके पालन में, उसके आचार में और धर्म-परायण चित्तवृत्ति में है. इसके विपरीत, धार्मिक मान्यता धर्माभिमान और भिन्न मत के प्रति असहिष्णुता को जन्म देती है. धार्मिक जीवन से धर्म-परायणता उत्पन्न होती है और धर्म-परायणता से ही सर्व-धर्म समभाव का विकास होता है.

धार्मिक मान्यताओं में सर्व-समानता बनाये रखने के लिए यूरोप में जी-तोड़ प्रयत्न किये गये और भारी झगड़े खड़े किये गये. हमारे देश में मान्यताओं के विषय में सारे समाज को यांत्रिक शिकंजे में पकड़ कर रखा जाता था. इसके फलस्वरूप यहां बौद्धिक स्वतंत्रता का तो विकास हुआ, किंतु बुद्धि के अनुसार कर्म करने की छूट न होने से- विचारों के अनुसार आचरण का विकास न होने से- बुद्धि का तेज क्षीण हो गया और धर्माधर्म तथा द्वैताद्वैत की चर्चा केवल ‘डिबेटिंग क्लब’ जैसी हो गयी. धर्म हमेशा पारमार्थिक वस्तु होना चाहिए. जैसी मान्यता हो, वैसा जीवन बन जाये तभी मनुष्य की बुद्धि शुद्ध और शुभ रहती है और उसका आचार मानवतापूर्ण, अविकृत और संस्कार-सम्पन्न बनता है- बड़े से बड़ा धर्मसूत्र और जीवन-सूत्र है- जैसा विश्वास हो, वैसा ही आचरण रखो.

परंतु धार्मिक आदर्श सर्वोच्च कोटि तक पहुंचा हुआ होने के कारण उसके आचरण में ढीले और दृढ़ लोगों के वर्ग तो पड़ेंगे ही- श्रावक और साधु, संन्यासी और गृहस्थ, श्रमण और श्रमणेतर के भेद उत्पन्न होने के बाद ‘मान्यताओं से पूरी तरह चिपटे रहो और आचरण की शिथिलता की उपेक्षा करो’ का वातावरण पैदा हुए बिना रह ही नहीं सकता. परंतु इंग्लैंड में प्रोटेस्टेन्ट व्यापारियों ने एक दूसरा सूत्र खोज निकाला. धर्म जीवन का केवल एक अंग है. धर्म के स्थान पर ही धर्म शोभा देता है. व्यवहार में हर जगह हम धर्म को ले आयेंगे, तो व्यवहार भी बिगड़ेगा और धर्म भी बिगड़ेगा! ऐसा कहकर इन लोगों ने धर्म को जीवन की सामान्य चीज़ बना डाला है.

अब लोग इतने गम्भीर भी नहीं रह गये हैं और धर्म की कल्पना भी इतनी छिछली नहीं रही है. ‘धर्म का अर्थ है जीवन का परिष्करण, जीवन का परिवर्तन’- इतनी बात लोगों ने समझ ली है. अब यदि धार्मिकता की रक्षा करनी हो तो धर्मों के बीच के झगड़ों को भूल जाना चाहिए और सारे धर्मों में जो लोग सच्चे धर्मनिष्ठ हैं उन्हें निरे सैद्धांतिक भेदों को भूलकर तथा धर्मों में रही हार्दिक एकता को पहचान कर आपस में संगठित होना चाहिए. हर धर्म में धर्म परायण लोग भी होते हैं और धर्माभिमानी लोग भी होते हैं. धर्म-परायण लोग धार्मिक जीवन में गहरे उतरते हैं, अपने आपको सुधारने का सतत प्रयत्न करते हैं और इस प्रकार अपनी धार्मिकता की सुगंध चारों तरफ फैलाते हैं. लेकिन आज के ज़माने में समाज का नेतृत्व करते हैं धर्माभिमानी लोग ही. उन्हें धार्मिक आचरण की बिल्कुल परवाह नहीं होती. उन्हें तो धर्म के नाम पर एक दुनियावी संगठन ही खड़ा करना होता है. ऐसे लोग ही अपने धर्म के अनुयायियों को उत्तेजित करके धार्मिक झगड़े शुरू करते हैं अथवा उन्हें चलाते हैं.

और जब धर्म-धर्म के बीच ऐसे झगड़े चलते हैं उस समय धर्म-शुद्धि का काम शिथिल पड़ ही जाता है. धर्म-सुधारक यदि आत्मशुद्धि के लिए अपने समाज के दोषों को प्रकट करते हैं, तो ‘शत्रुओं के सामने हमारी पोल खुल जायेगी’ इस भय से ऐसे सुधारकों की आवाज़ को दबा दिया जाता है. लोगों को यह बात समझानी चाहिए कि भिन्न-भिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं; सच्चे शत्रु तो अधर्मी अर्थात धर्म विरोधी लोग ही हैं.

एक बात हमें स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि आज के सामाजिक जीवन के लिए प्रत्येक मनुष्य को सब धर्मों का ज्ञान-समभावपूर्वक प्राप्त किया हुआ थोड़ा-बहुत ज्ञान- अवश्य होना चाहिए. प्रत्येक मानव को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि हरेक धर्म की मान्यताएं क्या हैं, उसका समाजशास्त्र क्या है तथा उसे कितनी जीवन-सिद्धि मिली है और किस ढंग से मिली है.

मैं अपना सब कुछ संभाल कर बैठा रहूंगा, दूसरों से मेरा क्या सम्बंध- ऐसा कहने से अब काम नहीं चलेगा. मैं सबकी बात को समझूंगा, सबको अपनी बात समझाऊंगा, सबकी बात सहन करूंगा, सबको सहन करूंगा और सबके साथ ओत-प्रोत हो जाऊंगा- यही अब धर्म का युगधर्म है. अब आगे सब मनुष्यों को एक-दूसरे का रंग लगेगा और फिर भी प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करेगा.

अब हमें एक अत्यंत महत्त्व की बात प्रचलित करनी होगी. आज तक हम यह मानते और कहते आये हैं कि प्रत्येक मनुष्य के लिए उसका अपना धर्म अच्छा है. सभी धर्म अच्छे हैं, इसलिए न तो कोई अपने धर्म का त्याग करे और न दूसरों के धर्म की निंदा करे. यहां तक तो सब ठीक ही है. लेकिन इतने से ही अब हमारा काम नहीं चलेगा. स्वधर्म का सूत्र अब एकांगी लगता है. ‘सब धर्मों के साथ परिचय बढ़ाकर, उन्हें पहचान कर, उस व्यवस्था में दिखाई पड़ने वाले अपने स्वधर्म का मैं पालन करूंगा’- यही आज का पूर्ण धर्म है. सब धर्मों का अध्ययन करने के बाद ही स्वधर्म का रहस्य पूर्णतया हमारी समझ में आयेगा और ऐसा करके ही हम सबके साथ शांति और मेलजोल से रह सकेंगे.

श्री शंकराचार्य ने इस तत्त्व को समझ लिया था. उन्होंने देखा कि भारत में असंख्य देवी-देवताओं की पूजा होती है. भारत के लोगों की शायद गिनती हो सकती है, लेकिन भारत के देवी-देवताओं की नहीं हो सकती. इसलिए उन्होंने पांच देवों को मुख्य मानकर बाकी सबको इन पांच देवों का ही अवतार बना दिया. महादेव, विष्णु, गणपति, देवी और सूर्य इन पांच देवों को उन्होंने हिंदू धर्म के मुख्य देवों के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि इनमें से जो देव तुम्हारा इष्ट हो उसी की पूजा करो; परंतु उसके आसपास बाकी चार देवों को अनिवार्य रूप से रखना चाहिए, क्योंकि इनके साथ ही इष्ट देव की पूजा हो सकती है. पूजा जब भी की जाये तब पंचायतन की ही करनी चाहिए. ऐसा करके श्री शंकराचार्य ने सब देवी-देवताओं के सम्बंध में भक्तों के बीच चलने वाले झगड़ों को खत्म कर दिया.

सभी धर्म अच्छे हैं, सब धर्मों के प्रति हमारा सद्भाव होना चाहिए, सब धर्मों की उपासना हमें समझ लेनी चाहिए- उसमें किसी हद तक हम भाग भी ले सकते हैं, परंतु दृढ़ तो हमें अपने धर्म पर ही रहना चाहिए. जब सभी धर्म सच्चे हैं तो धर्म-परिवर्तन के लिए गुंजाइश ही नहीं रह जाती. सभी धर्म सच्चे हैं और सभी धर्म किसी हद तक एकांगी और अपूर्ण हैं, यह बात स्याद्वाद और सप्तभंगी न्याय को समझने वाले जैनों की समझ में तुरंत आ जानी चाहिए. सब धर्मों का ज्ञान होने पर ही स्वधर्म का रहस्य समझ में आता है. वास्तव में जितने धर्म हैं, उतनी ही जीवन-पद्धतियां हैं. इन सब पद्धतियों द्वारा मनुष्य को जीवन का दर्शन होना चाहिए. इसीलिए इन सब धर्मों की आवश्यकता है. कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस ने अलग-अलग समय पर इन सब धर्मों की साधना करके देख लिया और उसके बाद वे इसी निर्णय पर पहुंचे कि ये सब मार्ग एक ही प्राप्तव्य-लक्ष्य की ओर ले जाते हैं.

ऐसे साक्षात्कार, प्रत्यक्ष अनुभव के लिए बौद्धिक अहिंसा यानी स्याद्वाद और तप की आवश्यकता है.

प्रत्येक धर्म का आधार है आत्मा पर विश्वास. जिन लोगों का आत्मा में विश्वास नहीं है, उन्हें गीता ने आसुरी सम्पत्ति वाले कहा है. इसलिए सच पूछा जाये तो मनुष्य-जाति के दो ही विभाग किये जा सकते हैं- (1) दैवी सम्पत्ति वाले; और (2) आसुरी सम्पत्ति वाले. और इन दोनों के बीच कोई समझौता हो ही नहीं सकता. प्रत्येक मनुष्य के हृदय में कम या अधिक मात्रा में दैवी और आसुरी वृत्तियां होती हैं, इसलिए इन दोनों के बीच सनातन संघर्ष चलता ही रहता है. इस युद्ध में यदि हमारी जीत हुई, तो समाज में धर्मों के बीच चलने वाला झगड़ा अपने आप शांत हो जायेगा.

प्रत्येक हृदय में जब दैवी और आसुरी सम्पत्ति के बीच झगड़ा चलता है तब अनेक बार परवश बनी हुई दैवी वृत्ति बाहर से मदद की आशा रखती है. इसी में से ईश्वर-शरण की वृत्ति उत्पन्न हुई है. ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकंशरणं व्रज’ ऐसा जब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा तब उनकी नज़र में सामने आर्य-धर्म, इस्लाम, बौद्ध अथवा जैन धर्म, सिक्ख या ईसाई धर्म जैसे धर्म नहीं थे; ज्ञान, भक्ति, कर्म और उपासना जैसे मार्ग भेदों का भी उन्होंने कोई संकेत नहीं किया था; किंतु देश धर्म और कुलधर्म, जातिधर्म और वयोधर्म, गुणधर्म और शरीर-धर्म, कलाधर्म और आपद्-धर्म- ऐसे-ऐसे उस समय के चर्चित संकुचित और एकांगी धर्मों का विचार करके ही भगवान ने अर्जुन से कहा था कि इन सब धर्मों को तू छोड़ दे, पूरी तरह छोड़ दे और एकमात्र आत्मतत्त्व की ही शरण में जा! उसके बाद ही स्वधर्म और स्वधर्म का रहस्य खुलेगा और उसका मार्ग मिलेगा.     

अप्रैल 2016

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