बायीं ओर की खिड़की

♦  रवींद्रनाथ ठाकुर    

    जिन दिनों मैं इंग्लैंड में था, लंदन से थोड़ी दूर के एक स्थान से मुझे निमंत्रण मिला. सर्दी के दिन थे, बर्फ पड़ रही थी और कोहरे में कुछ सूझता नहीं था. लंदन से ट्रेन में बैठा. लंदन के बाद के स्टेशन बायीं ओर आने लगे. लेकिन मुझे जहां उतरना था, वह स्टेशन था दाहिनी ओर. मैंने वहां भी बायीं ओर की खिड़की से ही बाहर झांका- न कोई रोशनी, न प्लेटफार्म. मैं निश्ंिचत बैठा रहा और थोड़ी देर बाद गाड़ी वापस लंदन की ओर लौटने लगी. तब मुझे होश आया और अगले स्टेशन पर उतरकर मैंने पूछा कि अगली गाड़ी कब मिलेगी. उत्तर मिला- आधी रात को. जीवन में प्रायः ऐसा ही होता है. अवसर है प्रभु के पास जाने का और हम बायीं ओर खिड़की से सांसारिक स्टेशनों को ही देखते रहते हैं. फिर वैसा ही अवसर कब मिलता है? किस आधी रात को?

(मई  2071)

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