पूरा मनुष्य बनाने के लिए  –  एच. एन. दस्तूर

शिक्षा

(भारतीय विद्या भवन द्वारा संचालित 92 स्कूलों में इस समय 1,85,000 छात्र 6100 अध्यापकों के निर्देशन में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. सन 2014-15 में इन स्कूलों में दसवीं की परीक्षा (सीबीएसई) में उत्तीर्ण होने का प्रतिशत 99.84 था! इन स्कूलों के प्राचार्यों की वार्षिक बैठक में ‘भवन’ के कार्यकारी सचिव श्री एच.एन. दस्तूर के अभिभाषण के सम्पादित अंश जो शिक्षा के उद्देश्य और उसकी महत्ता को रेखांकित करते हैं.)

भवन के शैक्षणिक अभियान का एक बुनियादी उद्देश्य छात्रों को उनके अध्ययन के विषय में दक्ष बनने में सहायता करना है. लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण है उन्हें स्वतंत्र सोचवाला; ईमानदार और भय रहित इंसान बनाना जिसमें ज़िम्मेदारी का एहसास हो और जो केवल अपने बारे में न सोचता हो बल्कि आसपास के कम भाग्यशाली लोगों का भी विचार करता हो. वे सम्पूर्ण विश्व की एकता में विश्वास करनेवाले नागरिकों के रूप में विकसित हों- जैसा कि हमारे संस्थापक मुनशीजी ने कहा था- ‘सब में एक और एक में सब’. इसका अर्थ है जाति, प्रांत, धर्म, रंगभेद और यहां तक कि राष्ट्रीयता की दीवार भी न खड़ी करने वाले ऐसे युवा जिनके मस्तिष्क में हिंसा, घृणा जैसे विचार जन्म ही ना लें और जो आसपास के जीव-जगत में उसी ईश्वर का दर्शन करें.

कितना विलक्षण और दैवीय कार्य है यह! भवन के विद्यालयों में 1 लाख 75 हजार से 2 लाख तक विद्यार्थी पढ़ते हैं. यह आंकड़ा प्रतिवर्ष घटता-बढ़ता रहता है. हज़ारों निकल जाते हैं तो कुछ हजार नये आ जाते हैं. कल्पना कीजिए कि यदि अपने विद्यार्थियों को प्रबुद्ध और एकीकृत मानव बनाने का हमारा सफलता का अनुपात मात्र 20 प्रतिशत भी हो तो भी हम इस मानव-समाज में कितना ज़बर्दस्त रचनात्मक योगदान दे सकेंगे.

मैं जानता हूं आप में से कई हमारी इस मूलभूत जिम्मेदारी के प्रति जागरूक हैं. मैं यह भी जानता हूं कि भवन के विद्यालयों में बच्चों में नैतिक मूल्यों की समझ बढ़ाने के लिए विभिन्न शानदार तरीकों का उपयोग किया जा रहा है. यही कारण है हमारे विद्यालयों की ख्याति का. लेकिन हमारी सफलता का अनुपात क्या है? मैं नहीं जानता क्योंकि इसका उत्तर पाना बहुत कठिन है. मैं केवल यह जानता हूं कि हम उन्हें बेहतर शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें अच्छे अंक मिल रहे हैं और वे उच्च शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश भी पा रहे हैं और मुझे विश्वास है कि वे विभिन्न पेशों में काम करके या उच्च वेतन वाली नौकरियां प्राप्त करके या उद्योगपति बनकर भौतिक सफलता भी प्राप्त कर रहे हैं.

इस बात को लेकर मैं आश्वस्त हूं कि अपने शिक्षकों और अभिभावकों की सहायता से जो प्रबुद्ध नागरिक बने हैं वे अब अपने आसपास प्रेम, समानता और खुशियां फैला रहे होंगे.

वे उनमें से हैं जिन्होंने अलग रास्ता अपनाने का साहस दिखाया है, जो गैर परम्परावादी और साहसी हैं और जिन्होंने सफलता समझी जानेवाली सुरक्षा और भौतिक समृद्धि को अतिरिक्त महत्ता नहीं दी है.

वे उनमें से हैं जो नये विचारों के लिए संघर्ष करते हैं और साहस के साथ लीक से हटकर सोचने का माद्दा रखते हैं.

शिक्षकों को अभिभावकों के साथ मिलकर इसमें निर्णायक भूमिका अदा करनी है. इसलिए यह भी ज़रूरी है कि शिक्षक और अभिभावकों के बीच समय-समय पर बातचीत होती रहे. प्रधानाध्यापकों को  इस बातचीत में उप्रेरक की भूमिका अदा करनी है. यह विचारों का अदान-प्रदान समूह में नहीं होना चाहिए. समूहों में एक ‘सामूहिक मानसिकता’ पनपने लगती है, इसलिए यह व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए.

प्राचार्यों का मुख्य काम है सिखाना. वे पहले शिक्षक हैं उसके बाद और कुछ. वे एक परिष्कृत और कल्पनाशील नेतृत्व प्रदान करने के लिए हैं जो आज्ञा कम दे और समन्वय अधिक करे; जो बेहतर ढंग से प्रेरित और प्रोत्साहित करे और जो शिक्षकों के भीतर के मौलिक स्वतंत्र सोच और नये विचारों को बाहर लाने में सहायक हो. जी हजूरी की मानसिकता वाले अध्यापकों का मतलब ही विनाश को आमंत्रण देना है.

मुख्य मुद्दा यह है कि प्राचार्य के पास पर्याप्त समय हो कि वह सोचे और सोचे और सोचे; स्व से संवाद स्थापित करे; और विश्व के महान सूफी संतों और अध्यात्मिक महापुरुषों जैसे भगवान रामकृष्ण और मौलिक चिंतकों जैसे कृष्णमूर्ति, विनोबा जी, गांधीजी और अन्य महान लोगों की बातों में गहरे उतरे यह समझने के लिए कि क्या सही है और क्या गलत. यह सोचे की किस प्रकार विद्यार्थी के अंतर में आध्यात्मिक उप्रेरणा और मानवता और शक्ति का पोषण हो. विद्यार्थियों को पाठ्य-पुस्तक पढ़ाना ज़रूरी है, पर सिर्फ यही शिक्षा नहीं है.

शिक्षकों को बच्चों पर न केवल कक्षा में बल्कि खेलते, खाते, सहपाठियों से मिलते-जुलते समय भी निगाह रखनी चाहिए. कभी-कभी विद्यार्थियों से एक-एक कर मिलना चाहिए. उनसे उनकी पसंद-नापसंद, उनकी इच्छा, घर की परिस्थितियों और वे घर पर किस तरह समय व्यतीत करते हैं, आदि के बारे में बात करनी चाहिए. कभी-कभी अभिभावकों से एक-एक कर मिलना चाहिए. उनके बारे में सभी जानकारियां प्राप्त करनी चाहिए.

मैं जानता हूं यह बहुत समय-साध्य है लेकिन आप एक मिशन पर हैं और आपको यह समय देना ही चाहिए. यदि आप अपने अभियान के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो आप समय निकाल लेंगे.

यदि आप व्यक्तिगत देखरेख ही नहीं कर सकते तो बच्चों में संस्कार कैसे पैदा कर पायेंगे? इतिहास और भूगोल जैसे विषय पूरी कक्षा में पढ़ाये जा सकते हैं लेकिन चरित्र को बनाने का काम व्यक्तिगत स्तर पर ही करना होगा, क्योंकि दो बच्चे समान नहीं होते.

मेरे प्रिय सहकर्मियों, क्या आपके पास इसके लिए समय है? मैंने कुछ प्राचार्यों की शिकायतें सुनी हैं कि आधिकारिक जम्मेदारियां उनका समय खा जाती हैं. उपाय यह है कि इसे जितना हो सके उतना कम किया जाये. अपने उप-प्राचार्य पर दैनिक ज़िम्मेदारियां डाल दी जाएं या फिर कोई अधिकारी नियुक्त कर लिया जाये. लाल फीताशाही को कम किया जाये. सरल बनाया जाये. लेकिन कभी यह न भूलें कि आपकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी केवल बोर्ड परीक्षाओं में बेहतर परिणाम लाना ही नहीं है बल्कि अपने बच्चों के चरित्र का निर्माण करना भी है.

कांची के परमाचार्य ने कहा है कि बिना चरित्र के शिक्षा और ज्ञान खतरनाक होता है. उपनिषद कहते हैं कि शुभ एक चीज़ होती है और प्रसन्नता दूसरी. समझदार आदमी दोनों के भेद को समझता है और वह शुभ को पकड़े रखता है जबकि मूर्ख केवल खुशी के पीछे भागता है और अंततः बरबाद हो जाता है.

प्रश्न यह है कि क्या हम अपने विद्यार्थियों को ज्ञान और विद्वत्ता प्राप्त करने के लिए इसलिए शिक्षित कर रहे हैं कि वे आगे चलकर उन भौतिक सुखों के उत्पादन और विनाश की क्षमता प्राप्त करें जिसे विश्व में सफलता माना जाता है?

मेरे प्रिय प्राचार्यो, आप में शक्ति है. क्या आप अपने विद्यालय में सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति नहीं हैं? इस स्थिति ने आप पर भारी बोझ लाद दिया है. लेकिन इस बोझ को आप बहुत आसानी से वहन कर सकते हैं यदि आप समझ लें कि शक्ति रूपी सिक्के के दो पहलू होते हैं. एक ओर ाf़जम्मेदारी और दूसरी ओर प्रेम और विनम्रता. शक्ति को कभी भी अहंकार, घमंड का रूप नहीं लेने देना चाहिए. और खुद को ही सही मानने और श्रेष्ठता की भावना को अपने करीब नहीं आने देना चाहिए. अन्यथा आप अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की भलाई और सृजन के लिए नहीं कर पायेंगे.

मैंने ऐसा क्यों कहा कि श्रेष्ठता की भावना आपके लिए हानिकर है. क्योंकि तब आप सोचने लगते हैं कि आप ही सब जानते हैं अर्थात आपका सीखना रुक जाता है- किसी भी मनुष्य के लिए और शिक्षक के लिए तो और अधिक, ऐसी भावना का जगना विध्वंसकारी बात है. गांधीजी ने कहा था- ‘इस विचार के साथ जियो की तुम कल मरने वाले हो और ऐसे सीखो जैसे तुम हमेशा ज़िंदा रहोगे’. उनके कहने का अर्थ था कि सीखने की सीमा आपकी मृत्यु के साथ समाप्त होती है.

शिक्षा के क्षेत्र में, शिक्षक भी सीखता रहता है और यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए. विनोबाजी ने कहा था कि मैं पढ़ा रहा हूं, यह भावना ही गलत है. तेजस्विना वधितमस्तु ः हमारा परस्पर अध्ययन तेजस्वी बने. विनोबाजी के शब्दों में- ‘मैं शिष्य को सिखा रहा हूं यह भाव ही गलत है. तेजस्विना वधितमस्तु ः हम दोनों का अध्ययन तेजस्वी हो. शिक्षक भी शिष्य के साथ अध्ययन करता है.’

विद्यालयों के अध्यापकों के पास एक बेहतरीन अवसर और सम्भावना है कि वे प्रतिभा, सृजनात्मकता, कल्पनाशीलता और स्वतंत्र विचार को विकसित करें जो कि हर बच्चे के हृदय और मस्तिष्क में होती है. इससे बच्चे में वास्तविक अच्छाई और अल्पकालिक प्रसन्नता के बीच भेद करने की समझ पैदा होती है. बच्चा मौलिक और रचनात्मक ढंग से सोचना सीखेगा.

महाविद्यालय के स्तर पर यह अवसर शून्य के बराबर हो जाता है. क्योंकि पंद्रह और सोलह वर्ष के बाद युवा का मस्तिष्क एक पूर्व निर्धारित ढांचे में ढल चुका होता है. एक बहुत ही प्रबुद्ध आचार्य ही इसमें परिवर्तन ला सकता है जबकि स्कूलों के अध्यापक पौधों को सींचकर विभिन्न रूपों और आकारों में बदल सकते हैं. फूल खिलेंगे, कुछ छोटे और कुछ बड़े, लेकिन वे सुंदर अवश्य होंगे, क्योंकि शिक्षकों और अभिभावकों ने उनका पोषण किया है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो बेचारा प्राध्यापक अपने विद्यार्थियों को इंजीनियर, अधिकारी, चिकित्सक, वकील जैसे पेशों के लिए ही प्रशिक्षित करता है, उन्हें अच्छा इन्सान बनने की दिशा में बहुत कुछ नहीं कर पाता. यही कारण है कि ‘भवन’ महाविद्यालय के बजाय स्कूलों पर अधिक ज़ोर देता है.

तकनीकी ने शिक्षा को आसान बना दिया है. लेकिन हर उपयोगी वस्तु का दुरुपयोग भी हो सकता है. यहां आपको बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत है. आपको ध्यान रखना होगा कि बच्चा तकनीकी का इस्तेमाल करे, तकनीकी बच्चे का इस्तेमाल न करने लगे. अति उपयोग घातक होता है. मोबाइल और लैपटॉप से जुड़ी स्वास्थ्य-समस्याओं के विषय में सभी को पता है, लेकिन मानसिक और भावनात्मक तनाव अधिक घातक होता है.

तकनीकी सुविधा तो देती है, पर रचनात्मकता को जन्म नहीं देती. वेद व्यास, भर्तृहरि, आदि अन्य ऋषियों के समय में  तकनीकी नहीं थी, फाउन्टेन पेन तक नहीं था. फिर भी वे रचनात्मकता के चरम तक पहुंचे, विद्वत्ता और आध्यात्मिक शक्तियां अर्जित कीं. शेक्सपियर के समय में टाइपरायटर भी नहीं था फिर भी आज तक कोई दूसरा शेक्यपियर अंग्रेज़ी साहित्य में पैदा नहीं हुआ. कोई दूसरा माइकेल एंजेलो अब तक नहीं जन्मा.

अपने बच्चों को प्रशिक्षित कभी न करें. मेरे मित्र बृज बक्षी कहते हैं- जीवन का पोषण होता है और गुलामों का प्रशिक्षण. कितना सत्य है! सैनिक प्रशिक्षित होते हैं. जानवरों को प्रशिक्षण दिया जाता है. लेकिन होता क्या है? वे अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं. क्यों मानव जीवन के इतिहास में हर तानाशाह अपने नागरिकों को प्रशिक्षित करता है? ताकि स्वतंत्र सोच और मौलिक विचार हमेशा के लिए समाप्त हो जाये. जर्मनी के हिटलर का उदाहरण ले लीजिए. उसने महान इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक और सेना नायक पैदा किये. लेकिन हुआ क्या? उन सब ने हिमलरों और गोबेल्सों के साथ मिलकर यमदूत का काम किया. वे केवल विचारहीन और योजनाबद्ध रोबोट की तरह काम करते रहे. फलस्वरूप लालच और संत्रास की हिमालयी लहरों जैसी भयावह त्रासदी मानवजाति को झेलनी पड़ी.

आयएसआयएस जैसे आंतकवादी संघटन क्या करते हैं? प्रशिक्षण द्वारा बुद्धि भ्रम पैदा करते हैं. फलस्वरूप युवा न केवल मासूम लोगों की जान लेते हैं, बल्कि खुद को भी मिटा देते हैं. ऐसी भयावह मशीन बन गये हैं वे.

कृष्णमूर्ति ने कहा था- सरकार सक्षम अभियंता चाहती है न कि मनुष्य, क्योंकि मनुष्य सरकार के लिए घातक और खतरनाक होते हैं- धार्मिक संघटन भी. इसीलिए सरकार और धार्मिक संघटन शिक्षा पर अधिकार चाहते हैं. धार्मिक संघटनों में वे सब भी शामिल हैं जो धर्म की रक्षा के नाम पर अत्याचार कर असहनशीलता, घृणा और हिंसा को जन्म देते हैं. अरे, तुम हो कौन धर्म की रक्षा-सुरक्षा करने वाले? धर्म स्वयं तुम्हारी और तुम्हारी आत्मा की रक्षा करता है.

यह केवल तानाशाही में हो सकता है. जर्मनी के हिटलर से रूस के स्टालिन तक और हैती के पापा डॉक्स तक, लेकिन सच्चे लोकतंत्र में यह असम्भव है. यही लोकतंत्र की सुंदरता, महानता और मूल्यवत्ता है. लोकतंत्र विभिन्न मतों के लिए, स्वतंत्र विचार के लिए, विरोध के लिए, अवकाश देता है. उन्हें अवसर देता है जो स्थापित मान्यता और परम्पराओं के विरुद्ध खड़े होते हैं.

गांधीजी, विनोबाजी, नेहरू, सरदार, मौलाना साहेब, आम्बेडकर, जयप्रकाश, वाजपेयी जैसों द्वारा पोषित हमारा लोकतंत्र दृढ़ और ऊर्जावान है. आज़ादी के बाद जनतंत्र लाने और जनतांत्रिक संस्थाओं के गठन के लिए एक कारगर संविधान की ज़रूरत थी. यह बहुत बड़ा काम था, जिसे हमारे नेताओं ने पूरा किया- मानव-इतिहास की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है यह.

यही कारण है कि वर्तमान समय में विरोध के स्वर पूरी शक्ति और क्षमता के साथ निर्भयतापूर्वक उठ रहे हैं, जिसमें हमारे राष्ट्रपति के विद्वत्तापूर्ण विचार भी शामिल हैं. हमारे राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने छह बार इस मुद्दे पर बोला है. अंतिम बार अपने गांव बंगाल में जहां एक मंदिर है विभिन्न देवी-देवताओं का. उन्होंने इंगित किया कि किस प्रकार देवताओं के वाहन प्राकृतिक रूप से एक-दूसरे का भोजन होने के बावजूद साथ में रहते हैं. चूहा, सांप, मोर, बैल, शेर आदि.

हम भवन के लोगों का राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है. वर्तमान प्रवाहों प्रचलनों से असम्बद्ध हैं हम. अपनी मातृभूमि की संस्कृति के महान मूल्यों और प्रतिबद्धताओं के लिए हमारा प्रेम ही हमारा सांस्कृतिक अभियान है. हम लगातार भवन की तीन मूलभूत मान्यताओं के साथ चलते रहेंगे- आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतः और वसुधैव कुटुम्बकम तथा सर्वधर्म समभाव.

भारत एक वरदान प्राप्त देश है. इसके पास एक शानदार आध्यात्मिक दर्शन की अक्षुण्ण परम्परा है. एक महान संस्कृति है जिसमें सब समाहित हैं. समुद्रतट के छोटे पत्थरों से लेकर रेगिस्तान की बालू, नदियां, समुद्र, पहाड़, पेड़ और फूल, मछली, पक्षी, जानवर और मानव जन तक. दैवीय तत्त्व इन्हें जोड़े रहते हैं क्योंकि इन सबमें दैवत्त्व और दैवत्त्व इन सबसे है.

हमारे महान ऋषियों, सूफी संतों और विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक महापुरुषों, कबीर, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, समद, बुल्लाशाह, बसवेश्वर, त्यागराजा से लेकर भगवान रामकृष्ण, रमण महर्षि, शिरडी साईबाबा, महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, दलाई लामा तक, हमारे पास एक अनवरत शृंखला है ईश्वर के संदेशवाहकों की जिन्होंने हमें सभी धर्में के प्रति विश्वास, प्रेम, सत्य, विनम्रता, निर्भयता, स्नेह, और सम्मान करना सिखाया और त्यागभावना सेवाभावना के प्रति विश्वास पैदा किया. हमारे शिक्षकों को इन बुनियादी मूल्यों को ग्रहण करना चाहिए और बच्चों तक विभिन्न तरीकों से इन्हें पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए.

घृणा, बदले की भावना, हिंसा, ब्लैकमेल करना, विश्वासघात, समझाने की बजाय शक्तिबल का प्रयोग करने के विषय में हम सोच भी कैसे सकते हैं? हम इस पुण्यभूमि की संतान हैं. मेरे पास हज़ारों कारण और उदाहरण हैं इस बात को सिद्ध करने के लिए की हमारी यह मातृभूमि पुण्यभूमि है. मैं आपको केवल एक उदाहरण देता हूं-

मातृभूमि ईरान पर आक्रमण और अपने राजा के मारे जाने के पश्चात कुछ पारसी ईरान छोड़कर छोटी-छोटी नावों में बैठ आसरे की तलाश में दूसरे देशों को गये. यह चौदह सौ साल  पहले की घटना है. पारसी जिनकी नावें विभिन्न देशों के तटों पर पहुंचीं जल्द ही एक कुल और एक धार्मिक समूह के रूप में अदृश्य हो गये. लेकिन वे जो भारत आये, न केवल अपनी स्वतंत्र पहचान कायम रख सके बल्कि मानव-विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक महापुरुष भी उन्होंने दिये. ऐसा क्यों? क्योंकि यह पुण्यभूमि है. वे दक्षिण गुजरात के संजान क्षेत्र में उतरे जहां के राजा जादी राणा से उन्होंने प्रार्थना कि वे उन्हें शरण दें. राजा ने उन्हें दूध से भरा हुआ एक प्याला भेजा. जिसका अर्थ था इस राज्य में उनके लिए कोई जगह नहीं है. पारसियों के नेता, मोबेद नेरोसांग धवल ने उस दूध में थोड़ी शक्कर मिलायी और प्याला वापस भेज दिया राजा के पास. यह देखकर राजा प्रसन्न हो गया और पारसियों को अपने राज्य में रहने के लिए स्थान दे दिया.

लेकिन उसने कुछ शर्तें रखीं. राजा द्वारा लगायी गयी सारी शर्तें राजा के लिए ही नहीं, बल्कि पारसियों के लिए भी लाभदायक थीं. मैं उनमें से केवल एक दो शर्तों के बारे में बताऊंगा. राजा ने कहा था कि तुम्हारी पहली प्राथमिकता होगी कि तुम गुजराती भाषा सीखोगे और उसे अपनी मातृभाषा बनाओगे. एक ही बार में उन्होंने पारसियों को मुख्यधारा में आने का रास्ता दिखा दिया. दूसरी शर्त थी कि विवाह के दिन पारसी औरतें गुजराती तौर-तरीके की सफेद साड़ियां पहनेंगी और एक आशीर्वचन संस्कृत में होगा. पारसी आज भी उन शर्तों का पालन करते हैं. चौदह सौ वर्षों के अंतराल के बाद भी पारसी ‘संजान दिवस’ मनाते हैं और राजा जादी राणा की स्मृति में संजान शहर में एकत्र होकर वर्ष में एक बार धन्यवाद व्यक्त करते हैं.

उसके बाद से यही हमारी महान मातृभूमि और महान संस्कृति है. अनेकता में एकता हमारे रक्त में है. सहनशीलता शब्द को मैं अधिक पसंद नहीं करता क्योंकि यह नापसंद को ढोना व्यक्त करता है. यह वास्तव में अपने से अलग विचारों, विश्वासों, मतों के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव है. पिछले दो वर्षों में हमने तीन स्वतंत्र विचारों वाले निर्मीक लेखकों की हत्या देखी है. जाने-माने दार्शनिकों इतिहासकारों, कवियों, लेखकों, महान साहित्यकारों, वैज्ञानिकों आदि ने इन हत्याओं के विरुद्ध आवाज़ उठायी और कुछ ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति भी. उन्होंने यह नहीं कहा कि हमारा देश असहिष्णु है. उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल बन रहा है. उनका विरोध माहौल के खिल़ाफ था. मैं यहां यह प्रश्न नहीं उठा रहा हूं कि वे सही थे या गलत, लेकिन मैं ऐसा करने के उनके अधिकार की रक्षा करूंगा. इस विरोध को अनावश्यक बताने वालों को भी वैसा कहने का पूरा अधिकार है.

हमारे धर्म-ग्रंथों को पढ़ो, उनसे सीख लो, उनकी प्रार्थनाओं का पाठ करो. जैसे- ‘सब प्रसन्न हों, सब रोगों से सुरक्षित हों, सभी मंगल के दर्शन करें, किसी को कोई दुख न हो.’

ऋग्वेद कहता है- ‘कोई किसी से श्रेष्ठ या निम्न नहीं है, सभी भाई बहन हैं. सबको सबके मंगल के लिए और विकास के लिए सामूहिक प्रयास करना चाहिए.’ ऋग्वेद यह भी कहता है कि ‘हम सबके साथ सहयोगपूर्वक मिलकर अपना विकास करें.’

हमारी संगच्छ्वं प्रार्थना हमें सिखाती है कि, ‘आपसी सहयोग के साथ मिल-जुलकर रहें.’ दूसरी एक प्रार्थना कहती है- ‘अपनी एकजुटता को अलगाव की भावना से निर्मूल रखें.’

आइए, देखें कि अथर्ववेद क्या कहता है- ‘सबका समान अधिकार है अन्न और जल पर. जीवनरूपी रथ को चलाने का भार समान रूप से सबके कंधों पर है. सब एक-दूसरे का सहयोग करते हुए साथ जियें, जैसे कि रथ के पहिये की तीलियां परिधि को केंद्र से जोड़ती हैं?’

धर्मकोष, सहनशीलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचते हुए कहता है- ‘राजा को वेदों पर विश्वास रखने वाले और वेदों पर विश्वास न रखने वाले दोनों का समान रूप से संरक्षण करना चाहिए.’

कितना भव्य उदार हृदय और दयालुता पूर्ण निरीक्षण है! मैंने इन उद्धरणों को न्यायाधीश रामा जॉइस की आनेवाली पुस्तक ‘मानवाधिकार और भारतीय मूल्य’ से लिया है. यह भारतीय विद्या भवन का प्रकाशन है जो बेंगलुरू केंद्र द्वारा छप रहा है.

हमारे विविधतापूर्ण जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं, पर शानदार विविधता में हमारी एकता बरकरार रहेगी. भोजन, कपड़ा, सामाजिक परम्पराएं, भाषाएं, धर्म, प्रांत, कला, और अभिनय कला जैसे नृत्य, संगीत, लोकसंगीत, नाटक, फिल्म जैसी हमारी विविधता कितनी सुंदर और अनोखी है. हमें इस विविधता का उत्सव मनाना चाहिए. हिमालय की फूलों की घाटी की तरह करोड़ों पुष्पों को फूलने दो और आनंद और सौंदर्य प्रदान करने दो. अपने विद्यार्थियों को इन बातों से परिचित कराएं.

सर्वशक्तिमान ईश्वर, देवी मां स्वयं प्रेम, और विविधता का पालन-पोषण करती हैं. रचनात्मकता का परम स्रोत ईश्वर सबसे बड़ा कलाकार है. हमारे चेहरे का आकार क्या है? एक फुट गुणा आधा फुट? कितना छोटा दायरा है! लेकिन अरबों-खरबों चेहरों में कोई दो चेहरे एक जैसे नहीं! क्यों? क्योंकि ईश्वर को विविधता पसंद है और वह चाहता है कि प्रत्येक मनुष्य अद्वितीय हो.

कल्पना कीजिए एक मानव जाति जहां कोई लिंग भेद न हो, केवल पुरुष और स्त्राr एक जैसे चेहरे, आकार, लम्बाई, वज़न, रंग आदि के हों तो कितना नीरस, अरुचिकर और भयावह होगा वह! और हमारे अंगूठे को देखिए, केनवास केवल एक या दो इंच का और फिर भी हर अंगूठे का निशान अलग! सबका डीएनए अलग. विभिन्नता और बहुलता ईश्वर के साम्राज्य और मानव की उपस्थिति का सार है.

कृष्णमूर्ति के शब्दों में हमें अपने बच्चों को ‘जीवन की समन्वित समझ के लिए तैयार करना चाहिए.’ कोई अकेला नहीं जी सकता. उसे मानव जीवन का धड़कता हिस्सा बनकर  ही जीना होगा. व्यक्तिगत लालच और आकांक्षाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. भौतिक सुख-सुविधाओं को अधिक से अधिक प्राप्त कर लेने की अंधी दौड़ हमें जानवर से भी बदतर बना देगी. जब भूमंडलीकरण आया तो मन में विचार आया होगा कि यह हमें वैश्विक बनायेगा- एक विश्व मानव. लेकिन हुआ क्या? बिल्कुल उल्टा. मुक्त बाज़ार और उपभोक्तावादने भौतिकतावाद की आग को हवा दी और व्यक्ति के सोच का दायरा सिकुड़ता चला गया और वह केवल व्यक्तिगत सुख और परिवार तक ही सीमित रह गया.

प्रतियोगिता ने मनुष्य में निष्पक्ष खेल और न्याय के बजाय पाशविक वृत्ति को जन्म दिया. कमज़ोर और लंगड़े को प्रबल और मज़बूर प्रतिद्वंद्वी के खिल़ाफ बिना बैसाखी के ही दौड़ा दिया गया. आइए इन सत्यों को बताकर हम अपने विद्यार्थियों को प्रबुद्ध बनायें.

यदि आधुनिक मनुष्य दूसरों के विषय में नहीं सोचता जिनके विषय में टैगोर ने ‘निम्न से निम्नतर होना और खो जाना’ और गांधीजी ने ‘कतार में खड़ा हुआ अंतिम व्यक्ति’ कहा था. तब वह इंसान बनने से बहुत दूर रह जायेगा. इंसानियत ही नहीं है तो इंसान कैसे रहेगा? तो अपने बच्चों को सादा जीवन जीने के लिए प्रेरित करें. सभी को अपनी जीवन शैली के लिए एक लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी. अधिक से अधिक की चाह, ऑल्टो से बीएमडब्ल्यू और माथेरान से स्विटज़रलैंड की छुट्टियां मनाने की चाह कभी शांति और आनंद नहीं देगी. वह कभी संतुष्ट नहीं होगा. और बिना संतुष्टि के वह खुश भी कैसे रह पायेगा?

जीवन में वास्तविक आनंद प्राप्त करना कठिन नहीं है. अच्छी किताबें पढ़ना, आध्यात्मिक महापुरुषों, जैसे भगवान रामकृष्ण की दुनिया में जीना, अच्छा संगीत सुनना, मित्रों के साथ विद्वत्तापूर्ण चर्चा करना, प्रकृति की विविधता का आनंद उठाना. ज़रूरतमंदों की सहायता करना, उन्हें खुशी देना, पार्टी और डिस्को में जाने से कहीं अधिक खुशी देगा.

हमारे ज़्यादातर स्कूल उच्च माध्यमिक स्तर और माध्यमिक स्तर के हैं. ये बच्चे वे हैं जिनकी हर इच्छा पूरी होती है. इनको जीवन-सत्य से परिचित कराना चाहिए. मैं आपको एक उदाहरण देता हूं- भवन का एस.पी. जैन इन्स्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेण्ट अॅण्ड रिसर्च हमारा प्रतिष्ठित संस्थान है. यह भारत के दस सर्वश्रेष्ठ व्यावसायिक संस्थानों में से एक है. संस्था के माननीय डीन डॉ. श्रीकांत, जिनका पिछले अक्टूबर में देहांत हो गया, ने विद्यार्थियों के लिए ‘अभ्युदय’ नामक अनिवार्य प्रकल्प शुरू किया था. हर विद्यार्थी को झोपड़पट्टियों से एक गरीब बच्चे को गोद लेना होता है और उसकी शिक्षा सुनिश्चित करनी होती है. वे बच्चों के घर गंदी गलियों से होते हुए पहुंचते थे और यह जानकारी लेते थे कि उसका विकास ठीक ढंग से हो रहा है. इसके बेहतरीन परिणाम सामने आये. झोपड़पट्टियों में रहने वाले सैकड़ों बच्चे लाभान्वित हुए अपने सपनों को साकार करने में.

लेकिन उतना ही महत्त्वपूर्ण परिणाम इन उच्चवर्गीय विद्यार्थियों में भी देखने को मिला. उन्होंने समझा कि जीवन क्या है. उनमें से अधिकतर सम्बंधित बच्चे के साथ पढ़ाई खत्म होने बाद भी जुड़े रहे. उन्होंने ज़रूरतमंद बच्चों के जीवन में खुशी लाकर जीवन के वास्तविक आनंद को जाना. उन्हें यह पता चला कि कुल मिलाकर मनुष्य क्या है. इससे वे विनम्र, कम लालची, दयालु और जिम्मेदार बने. कैसे? क्योंकि उन्होंने व्यापक मानवीय मुद्दों से बचकर खुद को धोखा नहीं दिया.

क्या हम अपने विद्यालयों में ऐसा कुछ नहीं कर सकते? क्या हमारे पास कल्पना, क्षमता और प्रतिबद्धता है कि ऐसे प्रकल्प को लागू करने के विषय में हम सोचें? केंद्रीय ‘भवन’ आपके लिए संतोषजनक आर्थिक अनुदान को बढ़ाकर खुशी का अनुभव करेगा. यदि आप किसी सार्थक प्रकल्प की योजना बनायें तो हम उसका खर्च वहन करेंगे. कृपया इस विषय में सोचें. कम से कम विद्यार्थियों को जीवन की सचाई से अवगत करायें, भयावह परिस्थितियों में जीने वाले  करोड़ों अभागे बच्चों के विपदाग्रस्त और संकट से जूझते बच्चों, जीवन की सचाइयों आदि से उन्हें परिचित कराएं. जीवन को सम्पूर्णता में अनुभव कैसे किया जा सकता है यह उन्हें सिखाएं. उन्हें पिछड़े गांवों में ले जायें. हमारे वंचित बंधुओं के जीवन-संघर्ष का उन्हें अनुभव करने दें. कृष्णमूर्ति कहते हैं, ‘कब वैज्ञानिक, वकील, चिकित्सक जैसे विशेषज्ञ जीवन को सम्पूर्णता में अनुभव करेंगे? जब वे विशेषज्ञ बनना छोड़ देंगे.’

इसके अतिरिक्त जो एक बुनियादी कमी मैंने बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा में देखी है, वह है उन्हें दुनिया में होने वाली अच्छी और सुंदर बातों से अवगत न कराना. हालांकि सबसे पहले शिक्षकों और प्राचार्यों पर यह जिम्मेदारी आती है कि वे स्वयं दुनिया में जो अच्छी बातें हो रही हैं उनसे सम्पर्क का सजग प्रयास करें. विश्वास करें, ऐसे बहुत से स्त्राr-पुरुष हैं जो दुनिया को बेहतर बनाने के लिए गम्भीरता से कार्य कर रहे हैं.

कौन जानता था सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार पाने से पहले? मैं भी नहीं. कौन जानता था उन दोनों मैग्सेसे पुरस्कार विजेताओं को? मैं तो उनका नाम भी भूल गया. क्योंकि वे एक दिन ही सुर्खियों में रहे हैं. स्वाभाविक है इसके लिए मीडिया ज़िम्मेदार है. मैंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दोस्तों से बात की. उन्होंने बताया कि लोगों को इसमें दिलचस्पी नहीं है. वे केवल डरावनी खबरों, बलात्कार, हिंसा, आपदा, राजनीतिक करतबों की ही खोज में रहते हैं. यह कितना भयावह वक्तव्य था! यह हमारे नैतिक स्तर पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है. लेकिन ऐसा नहीं है. मनुष्य त्याग, बलिदान, सेवा और प्रेम से जुड़ी सत्यकथाओं से ही प्यार करते हैं. जब कोई अच्छी बात होती है तब रचनात्मक उदारभावना उभरकर सामने आती है- मनुष्य को बेहतर बनाती है.

‘द हिंदू’ और कुछ अन्य अखबार कभी-कभी अंदर के पन्नों में हृदय को द्रवित कर देने वाली घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हैं. इसके प्रति जागरूक रहना चाहिए. लेकिन इससे अधिक महत्त्वपूर्ण हमारे आसपास, हमारी मित्रमंडळी के बीच घटित होनेवाली घटनाएं हैं जो जीवन को प्रेरित और आत्मोन्नत करती हैं. अपने बच्चों को इन सबसे परिचित कराना चाहिए. ये उन्हें प्रेरित करेंगी. उन्हें नरमदिल बनाएंगी. यह कैसे करना है यह आपको स्वयं खोजना होगा.

संकीर्ण विचारों के लोग वर्तमान और अतीत दोनों को तोड़-मरोड़कर अपने सोच और स्वार्थ के अनुकूल बना लेते हैं और उसे दबा देते हैं जो घृणा फैलाने वाली उनकी विचारधारा को झकझोरता है. लेकिन मानव समाज लगातार हमें तोड़ने वालों के बजाय जोड़ने वालों का इतिहास बताता है. मैं केवल एक उदाहरण देना चाहूंगा-

भारतीय शास्त्राrय संगीत हमारी संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण अभिनेय कला है. जब आप उस महान योगदान को जानेंगे जो हमारे मुस्लिम भाइयों-बहनों ने इस कला को जीवित और विकसित करने के लिए किया है तो आप आश्चर्यचकित रह जायेंगे. यह सोचना असम्भव है कि उनके बिना हमारी संगीत कला का क्या होता.

द्रुपद का ही उदाहरण लें, जो कि शास्त्राrय संगीत का उच्चतम रूप है. एक मुस्लिम परिवार है जिसने इसे जीवित रखा. डागर परिवार. पीढ़ी दर पीढ़ी उन्होंने द्रुपद को पोषित करने के लिए संघर्ष किया और अन्य देशों तक भी पहुंचाया.

उनकी प्रत्येक रचना भगवान शिव या कृष्ण या देवी मां की अर्चना और प्रशंसा पर केंद्रित होती है. हिंदू संगीतज्ञ ने अल्लाह की शान में गाया है और मुस्लिम ने भगवान की प्रशंसा में. बिस्मिल्ला खान दशकों से बनारस के विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते रहे. हिंदू गीतकारों ने अजमेर दरगाह में अपना कार्यक्रम किया. बड़े गुलाम अली खान गाते हैं- हरि ओम तत्सत् और फ़ैय्याज़ खान साहब गाते हैं- मन मोहन ब्रज को रसिया और अमीर खान गाते हैं- जिनके मन में राम बिराजे और सवाई गंधर्व गाते हैं- अल्ला जाने मौला जाने. ये गीत रसिकों की आंखों में आंसू ला देते हैं.

फ़ैय्याज़ खान, विलायत हुसैन खान और अन्य मुस्लिम उस्तादों ने सुंदर रचनाएं कृष्ण की प्रशंसा में रची हैं. अली अकबर खान के पिता एवं निखिल बनर्जी तथा रविशंकर के गुरू बाबा अलाउद्दीन खान मां काली के भक्त थे. उन्होंने अपनी बेटी का नाम अन्नपूर्णा देवी रखा जो बाद में एक महान सितारवादक बनी.

आज के किसी भी गैर मुस्लिम कलाकार को ले लीजिए. वह या उसके गुरु या गुरु के गुरु या उससे भी आगे कोई ना कोई मुस्लिम संगीतकार होगा. उदाहरण के लिए- जयपुर की अश्विनी भिडे, अतरोली घराना. उनके गुरु थे माणिक भिडे जो किशोरी आमोणकर के शिष्य थे जो कि अपनी मां मोघेरबाई कुरदींकर की शिष्या थीं जिनके गुरु का नाम था उस्ताद अलदीया खान. प्रभा अत्रे की गुरु थी हिराबाई बारोडकर, जिन्होंने सुरेशबाबू माने से सीखा, जिनके गुरु थे अब्दुल करीम खान साहेब.

ऐसा है हमारे शास्त्राrय संगीत में मुस्लिम संगीतकारों का योगदान. मैंने केवल सैकड़ों में से एक का उदाहरण दिया है. बिल्कुल इसी तरह ईसाइयों का गरीबों की सेवा में, सिख गुरुओं का भक्ति में, बौद्धों का शांति में, जैन धर्म का अहिंसा में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. हमें यह एकता का पाठ बच्चों को पढ़ाना चाहिए.

दुर्भाग्यवश जो लोग शोर मचाते हैं उनकी प्राथमिकता कुछ और होती है. चलिए एक बार सही प्राथमिकता को लेकर काम करें. मुम्बई की झुग्गियों के 1700 झोपड़े उजाड़ दिये गये. अखबार में इस त्रासदी को चार-पांच पैराग्राफ में समेट दिया गया. जबकि एक उच्चवर्गीय महिला की हत्या का समाचार महीनों तक पूरा पेज घेरे रहा. महीना भर पहले की गुजरात की घटना है जहां एक हिंदू युवक एक मुस्लिम पड़ोसी के जलते हुए घर में बच्चे को बचाने के लिए कूद पड़ा. उसने बच्चे को बचा लिया लेकिन खुद मर गया. मीडिया में इसकी कोई खबर नहीं बनी.

हमें अपने बच्चों में जो कुछ भी मानवीय है, सुंदर है और प्रेरक है, उसके प्रति रुचि पैदा करनी चाहिए.

मेरे प्यारे प्राचार्यो, आपने ‘भवन’ को गौरवान्वित किया है. आपने अपनी ज़िम्मेदारियों को प्रतिबद्धता और समर्पण के साथ निभाया है. जब ‘भवन’ ने खाड़ी देशों में अपना कदम रखा तब वहां के भारतीय हमारे स्कूलों में प्रवेश पाने के लिए दौड़ पड़े क्योंकि आपने ‘भवन’ के स्कूलों का एक सम्मानित स्तर बनाया है. यहां आप लोगों का साथ पाकर मैं बहुत खुश हूं. मुझे प्रसन्नता और गर्व है आप में से अधिकांश महिलाएं हैं. ईश्वर ने महिलाओं के दिलों में कुछ अधिक प्रेम और संवेदना दी है.

हर मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई होती है. हमें बच्चों के भीतर खोजना है कि कहां उनकी कमियां हैं और उन्हें दूर करने के लिए धीरे-धीरे प्रयास करना है. यदि विद्यालय के स्तर पर यह क्रम शुरू हो जाय तो आगे भी चलता रहेगा. यदि इसका उल्टा हो तो आगे चलकर बच्चे के स्वार्थी, आत्म-केंद्रित, छिद्रान्वेषी, असंतुष्ट और क्रोधी-मशीन बनने के लिए आलोचना होगी. और मशीन में आत्मा नहीं होती.

तो इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी हमारे शिक्षकों के कंधों पर है और यह शानदार है. यह त्रस्त करनेवाली है और साथ ही यह सुंदर और स्फूर्तिदायक भी है. या तो आप पाठ्यपुस्तक को पढ़ाकर और अच्छे अंक देकर संतुष्ट हो जाएं या फिर इस चुनौती और ज़िम्मेदारी को स्वीकार करें और बच्चों को तैयार करें कि वे जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझें और आगे चलकर पूरे मनुष्य बनें. चुनाव आपको करना है.

अप्रैल 2016 

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