पुरोगामिनी (उपन्यास) भाग – 3

आवास परिसर से बाहर होते ही सावित्री ने सत्यवान का हाथ पकड़ लिया, तब सत्यवान ने उसके कोमल हाथ को अपनी सुरक्षा में लेते हुए स्नेहिल स्वर में पूछा- ‘भयभीत हो रही हो?’

‘हां.’

‘मेरे रहते तुम्हें किस बात का भय है? मैं तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने दूंगा.’

सावित्री ने सत्यवान के मुख पर अपनी बोलती हुई आंखें टिका दीं.

‘सवि, यहां के बाघ-सिंह भी मुझे पहचान गये हैं, देखते ही उल्टे पांव भाग खड़े होते हैं.’

 ‘मुझे जंगली जानवरों का भय नहीं है, आर्य.’

‘दैत्यों से भयभीत हो? वे तो अब इधर झांकने का भी साहस नहीं करते; उन्हें मेरे शब्दवेधी बाणों का कड़वा अनुभव हो चुका है. यदि वे कहीं आसपास हों, तो बिना देखे ही मैं भांप जाता हूं.’

‘जानती हूं.’

‘तब क्यों भयभीत होती हो, रानी? उधर देखो. उन पीले फूलों को देखो. किस तरह उनपर झुंड-के-झुंड भौंरे मंडरा रहे हैं. उनका गुंजन से? लगता है वे फूलों को रिझाने के   लिए गुनगुना रहे हैं. इनके बीच का प्रेम देखते ही बनता है.’

सत्यवान ने सावित्री के हाथ को अपने होंठो से लगा लिया.

बीतता हुआ हर पल सावित्री के कलेजे पर चोट कर रहा था. वन की रमणीयता की ओर इंगित कर सत्यवान उसे जो कुछ दिखाता जा रहा था वह सब सावित्री को एक उजाड़ वीरान की तरह दीख रहा था. पक्षियों के कलकूजन में उसे रुदन की ध्वनि सुनाई दे रही थी. मृगों की आनंद भरी उछल-कूद देखकर उसे ऐसा लग रहा था मानों ये निरीह प्राणी प्राणों के भय से तड़प रहे हों. उसे अपने चारों ओर खिन्नता-ही-खिन्नता दिखाई दे रही थी. पर सत्यवान आज बहुत प्रसन्न था; यह चिरपरिचित वन उसे सावित्री की उपस्थिति से और भी प्रिय लग रहा था. बार-बार अपनी प्रिया को अपने समीप समेट लेता था. उसका यह मोहक हाव-भाव सावित्री को और भी व्यथित बना रहा था.

‘फूलों से लदे इस वृक्ष को देखो. लगता है इसने तुम्हारे स्वागत में आज विशेष शृंगार किया है. और, यह पुण्य सलिला नदी. आज किस तरह तरंगित हो रही है. सच कहता हूं, मुझे यह वनप्रांत आज की तरह पहले कभी इतना सुंदर नहीं लगा था.’सावित्री के कंधे पर हाथ रखकर उसने फिर कहा- ‘अब तो तुम्हें मैं प्रतिदिन अपने साथ लाया करूंगा.’

सावित्री के लिए इस प्रिय आलाप को सह पाना कठिन हो रहा था. क्या सत्यवान उसे विदा दे रहा है? वह अपने को समेटने लगी. उसकी आंतरिक शून्यता बढ़ती जा रही थी. वह चुपचाप सत्यवान को फल एकत्र करने में सहयोग देती रही. झोला लगभग भर चुका था.

‘तुम यहीं बैठो. मैं अब लकड़ियां एकत्र करने जाता हूं.’

‘नहीं-नहीं. तुम कहां जा रहे हो?’

‘कहीं नहीं, इसी पेड़ से सूखी हुई टहनी काट लूंगा.’

‘मेरी दृष्टि से ओझल मत होना.’

‘और हो गया तो?’ सत्यवान ने परिहासभरे स्वर में कहा.

‘नहीं, ऐसा मत कहो, आर्य.’

‘मैं नहीं जानता था कि देश की राजकुमारी इतनी भीति से भरी है.’ सत्यवान ने उसे हृदय से लगाते हुए कहा- ‘मैं सदा तुम्हारी दृष्टि की परिधि में रहूंगा, सवि. अब तो प्रसन्न हो? मुस्करा दो. हां, ऐसे ही. मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकता.’

नदी के तट पर सावित्री जिस वृक्ष के नीचे बैठी थी, सत्यवान अपनी कुल्हाड़ी लेकर उसी वृक्ष पर चढ़ा. परंतु दो पल बाद ही पसीने से लथपथ नीचे उतर आया. उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी.

और, वह स्वयं वहीं धराशायी हो गया.

सावित्री दौड़कर उसके पास पहुंची और उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया. अब तक सावित्री शून्य के कगार पर पहुंची चुकी थी. सत्यवान बड़ी कठिनाई से बोला- ‘मुझे भारी शिरोवेदना हो रही है. तुम मेरा सिर सहलाती रहो. सवि. मुझसे अलग मत होना. आह. बहुत पीड़ा हो रही है.’ सत्यवान जोर-जोर से सांस ले रहा था, उसने टूटे-फूटे शब्दों में बताया कि उसका सारा शरीर दग्ध हो रहा है, ऐसा लगता है जैसे छाती में बर्छियां चुभ रही हों. अचानक इतनी अधिक दुर्बलता हो गयी है कि करवट बदलने तक की शक्ति नहीं बची है. उसे लगता है जैसे वह किसी अंधेरी गुफा में प्रवेश कर रहा हो.

अंत में उसने कहा- ‘सवि, मैं सोना चाहता हूं; मुझे नींद आ रही है.’

सावित्री ने सत्यवान का पसीना पोंछा, उसका सिर सहलाती रही, उसके वक्षस्थल पर हाथ फिराया और अगले निर्णायक क्षण के लिए तैयार हो गयी. वह अपलक सत्यवान के मुख को निहार रही थी. उसे ऐसा लग रहा था कि अगर उसकी पलक झपक गयी तो वह सत्यवान को खो देगी. परंतु वह देखती ही रह गयी और सत्यवान का स्पंदन रुक गया. यह सावित्री के लिए कोई अचानक लगने वाला आघात नहीं था, बल्कि साल भर से निरंतर चल रहे युद्ध का एक तीव्र मोर्चा था जिसके लिए वह भग्नमन कटिबद्ध थी.

सत्यवान की प्राणहीन देह जितनी निश्चल थी, उससे भी अधिक अविचल एकाग्रता सावित्री में आ गयी. वह जान गयी कि नारद मुनि की सूचना के अनुसार जिस वज्रपात की आशंका थी, वह हो चुका है.

वहां भयंकर नीरवता व्याप गयी. पत्ते भी नहीं हिल रहे थे. पशु-पक्षी न जाने कहां दुबक गये. सहमी-सहमी हवा नहीं चाहती थी कि वह इस अशुभ पल की साक्षी बने. सामने बहती हुई नदी का जल उन अश्रुओं जैसा हो गया था जो ऐसी ही हानियों के बाद संसार की आंखों से निरंतर बहते रहते हैं. अभी सूर्यास्त नहीं हुआ था, परंतु दिगदिगंत में एक मटमैला रंग भर गया था. क्षितिज पर कुछ स्याह बादल लटके थे; लगता था जैसे पृथ्वी पर बरसने की उनकी इच्छा समाप्त हो गयी हो. अचला धरती सिहरने को तैयार हो रही थी.

अरण्य का वह भाग बेहद डरावना लगने लगा था. उस विजड़ित वन में जीवित सावित्री और मृत सत्यवान के अतिरिक्त तीसरी सत्ता उपस्थित हो गयी. सावित्री ने एक जलदवर्णी व्यक्ति को प्रकट होते देखा. उस प्रभावशाली पुरुष के शरीर पर पीत वस्त्र था और सिर पर पगड़ी थी. उसकी बांहों का बाजू-बंद, कानों का कुंडल और गले का हार उसे सूर्य की दीप्ति प्रदान कर रहा था. उसके श्याम नेत्रों में लालिमा थी जिससे वह देखता हुआ भी मानों कुछ नहीं देख रहा था. उसके हाथ में एक पाश था. सत्यवान के पार्श्व में पहुंचकर उसने उस पर मर्मांतक दृष्टि डाली. उसे निकट पाकर सावित्री ने सत्यवान का सिर सावधानी से भूमि पर रख दिया और उठ खड़ी हुई.

स्वभाव की नमनीयता के बावजूद सावित्री का मेरुदण्ड तना था; वह उन्नत सिर थी. उसकी देह से हवन सामग्रियों की सुगंध उठ रही थी. उपवास से परिष्कृत उसके मुख पर एक सुनहली आभा तैर रही थी. उसके कोमल पाव धरती पर होते हुए भी आकाशगामी थे. आगंतुक को महान आश्चर्य में डालते हुए, उसने हाथ जोड़कर, स्वर के कम्पन को यथासाध्य नियंत्रित करते हुए कहा- ‘मेरा प्रणाम निवेदन स्वीकार करें. यह मेरा सहज अनुमान है कि आप मनुष्य नहीं, वंदनीय देवता हैं. परंतु, हे देव. कृपया मुझे बतायें कि आप कौन हैं और क्या चाहते हैं.’

‘है पतिव्रते. तुमने तपस्या से अलौकिक शक्ति उपलब्ध कर ली है, तभी मुझे देख पा रही हो; अन्यथा मैं सामान्य मनुष्य को दृष्टिगोचर नहीं होता हूं. हे मनस्विनी, तुम अवश्य मेरे नाम से परिचित होओगी; मैं यम हूं. इस क्षण सत्यवान का पार्थिव जीवन पूरा हो गया; उसी के जीवपुरुष को पाशबद्ध कर ले जाऊंगा; मैं इसी कार्य से आया हूं, यही कार्य कर रहा हूं.’

‘भगवन्. मैंने सुन रखा था कि दिवंगत मनुष्य के जीव को आपके दूत ले जाते हैं. लेकिन अभी स्वयं आप आये हैं, ऐसा क्यों, प्रभो.’

‘तुमने ठीक ही सुना है. प्रत्येक जीव के लिए मैं स्वयं नहीं आता; मेरे दूत ही भेजे जाते हैं. आज मैं आया हूं इसके कई कारण हैं; पहला कारण तो यह है कि विशिष्ट लोगों के लिए मैं स्वयं आया करता हूं. सत्यवान उन लोगों में एक है जिसने अपने जीवन काल में कभी भी किसी लौकिक अथवा पारलौकिक नियम का उल्लंघन नहीं किया. सदा ही और निष्ठापूर्वक स्वधर्म का पालन करने वाली ऐसी जीवात्माओं का स्पर्श हमारे दूत नहीं कर सकते. दूसरी बात यह है कि हमें सूचना दी गयी थी कि सत्यवान की जीवात्मा को एक ऐसी सुरक्षा उपलब्ध है जिसे पार करने की क्षमता हमारे किसी दूत में नहीं है; हो सकता है, उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता, इसीलिए हे कल्याणी. सत्यवान को स्वर्ग ले जाने मैं स्वयं आया हूं. अब यह मेरे साथ स्वर्गारोहण करेगा.’ 

भावहीन यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगुष्ठाकार जीवपुरुष को खींच निकाला, पाशबद्ध किया और शीघ्रता से दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े. उन्हें पीछे घूमकर देखने की आवश्यकता नहीं थी. यमराज के आगे बढ़ते ही, दुख से भरी महिमामयी सावित्री अपने तप और नियम के द्वारा उपलब्ध सिद्धि का संबल पाकर उनका अनुगमन करने लगी.

वह यमराज को सम्बोधित किये बिना ही, कम्पित स्वर में बोलने लगी- ‘यह जीवात्मा माता की भक्ति से इहलोक को, पिता की भक्ति से मध्यलोक को और गुरु की भक्ति से ब्रह्मलोक प्राप्त किया करती है.’ वह सविस्तार मानव के कर्तव्य-पालन की महिमा का वर्णन करते हुए बताने लगी कि माता-पिता तथा गुरु के प्रति व्यक्ति के क्या कर्तव्य होते हैं और उन कर्तव्यों के पालन का उस पर क्या प्रभाव पड़ता है. वह लगातार बोलती ही चली जा रही थी- ‘एक व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण को भी प्रभावित करता है; एक के सुकर्म से अनेक अनुप्राणित होते हैं.’ यमराज धैर्य के साथ सावित्री का एकालाप सुनते रहे. परंतु वे रुके नहीं, चलते-चलते ही, बिना पीछे देखे, सम्मान और प्रशंसा भरे शब्दों में कहा- ‘मैं देख रहा हूं कि आप केवल पतिव्रता ही नहीं, विशद धर्मज्ञा भी हैं. आपको गुरुवर्ग का गहन ज्ञान है. इस ज्ञान को लेकर आप संसार में बहुत सफल होंगी. परंतु अभी आप न केवल मुझे, बल्कि अपने दिवंगत पति सत्यवान को भी उसकी अंतिम यात्रा में बाधा पहुंचा रही हैं. अत आप मेरे पीछे-पीछे न आयें, लौट जायें.’

सावित्री इस निषेध पर बिना रुक्ष हुए बोली- ‘हे देव. मैं आपके पीछे-पीछे नहीं बल्कि अपने पति के पीछे चल रही हूं, क्योंकि मुझे ऐसी ही शिक्षा मिली है. जहां मेरे स्वामी को ले जाया जा रहा है, मैं यथाशक्ति वहीं जाऊंगी. यदि वहां तक नहीं पहुंच पायी, तब अपने प्राण त्याग दूंगी; सत्यवान के बिना मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं है. पिता, भाई और सुत स्त्राr को सीमित सुरक्षा देते हैं; पर उसे अपरिमित सुरक्षा देने वाला उसका पति ही होता है. मैं इहलोक में बिना अपने पति के नहीं रह सकती.’

‘हे कल्याणी. तुम्हारी निष्ठा सराहनीय है. मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूं, तुम सत्यवान के सिवा कोई दूसरी इच्छित वस्तु मांग लो.’

 ‘हे सुरेश्वर. मेरा जीवन मेरे पति के साथ प्रतिबद्ध है, अत मुझे अपने लिए अलग से कुछ नहीं चाहिए. परंतु, मैं अपने पति के धर्मात्मा पिता के लिए याचना कर रही हूं; उनके साथ ऐसी दुखद घटनायें घटी हैं, जिनके लिए वे उत्तरदायी नहीं हैं. उनकी आंखों के साथ उनका राज्य उन्हें वापस मिल जाये तो यह न केवल उनके लिए बल्कि उनकी प्रजा के लिए भी बहुत कल्याणकारी होगा.’

 ‘हे भद्रे. ऐसा ही होगा. तुमने अभी जो मांगा वह सब पूरा होने में देर न लगेगी. तुम अब लौट जाओ. मैं जिस मार्ग से जा रहा हूं, वह मेरे और सत्यवान के लिए कठिन नहीं है, परंतु तुम मानवी हो, तुम्हें चलने में श्रम होगा और यह पथ तुम्हारे लिए कष्टकर भी है.’

‘सत्पुरुषों का सत्संग प्राप्त करने में यदि श्रम भी हो तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए. और, आप जैसे संत के साथ किसे कष्ट होगा? साधु-असाधु सभी जनों का उद्धार संत ही किया करते हैं. संसार के असंत ठीक इसके विपरीत होते हैं; विष-अग्नि-सर्प से जितना भय नहीं होता उतना भय जगत के अकारण वैरियों से होता है. संत पुरुष तो अपने प्राणों की भी चिंता न कर दूसरों का कल्याण करते हैं. और, असंत? वे दूसरों का अहित करने में जी-जान से लगे रहते हैं. ऐसे लोगों को इहलोक में तो सम्मान नहीं ही मिलता, परलोक में भी उनकी दुर्गति होती है. इसीलिए तो इस जगत के गुरु ब्रह्माजी ने असंतों की उपधा के लिए राजा को परिज्ञात कर कहा है कि वह सभी नरों की परीक्षा करने के बाद, साधु पुरुषों का सम्मान और असाधुओं का निग्रह करे. सत्पुरुषों का परिपालन करने पर ही वह वस्तुत राजा कहलाने योग्य तथा स्वर्ग का अधिकारी होता है. राजाओं के द्वारा भी जो पापिष्ठ अपराधी शासित नहीं हो पाते, उन्हें आप समय पर शासित करते हैं; आपकी दृष्टि से कोई बच नहीं सकता. इसलिए आप तो मुझे देवों के देव प्रतीत होते हैं. हे देव. आपके सत्संग में मुझे कष्ट अनुभव नहीं हो रहा है.’

जैसे कोई ज्ञानी शिक्षक अपने किसी प्रतिभावान शिष्य की उपलब्धियां देखकर हर्षित होता है, यमराज को लगभग वैसे ही आनंद का अनुभव हुआ. उन्होंने कहा- ‘तुम्हारे धर्मसम्मत विचार मुझे बहुत अच्छे लगे. तुमने इस अल्प अवस्था में ही बहुत ज्ञान अर्जन कर लिया है. पुत्री. सत्यवान के सिवा तू मुझसे कुछ और मांग ले. तुम्हारे जैसे संस्कार-सम्पन्न पात्र को कुछ देने में आनंद होता है.’

‘हे देव. मैं अपने माता-पिता की एकमात्र संतान हूं. मैं अब दूसरे कुल में चली आयी हूं; मेरे पिता को ऐसे सुयोग्य उत्तराधिकारी की आवश्यकता है जो उनकी परम्परा को आगे बढ़ा सके. मैं चाहती हूं कि मेरे माता-पिता को कुलीन पुत्र प्राप्त हों.’ ‘बेटी. तुमने दुहिता शब्द को सार्थक कर दिया; तुम्हारे माता-पिता अवश्य पुत्र प्राप्त करेंगे.’

‘देव. आपने मुझे कृतार्थ कर दिया. मुझमें ऐसी योग्यता और सामर्थ्य नहीं है कि मैं इसके लिए आपको धन्यवाद दूं ’

‘यदि तुम मेरे लिए कुछ करना ही चाहती हो, तो अब लौट जाओ. जिस मार्ग से आयी हो उसी से चली जाओ. जाकर अपने स्वामी का और्ध्व दैहिक कर्म पूरा कराओ. यह तो अब दूसरे लोक का निवासी बन चुका है. तुम इसका साथ नहीं दे सकतीं. अपनी तपस्या के बल पर तुम इसके साथ इतनी दूर आ पायी हो, परंतु अब मैं तुम्हारा अवरोध करूंगा. सत्यवान ने गुरुओं की सेवा से जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण यह मेरे साथ आराम से जा रहा है. तुम भी समय आने पर इसी तरह स्वर्ग की अधिकारिणी बनोगी. संसार में जाकर तुम लोगों को बताओ कि जिस तरह सत्यवान ने माता-पिता-गुरु के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया, जिस तरह वह सभी लोगों के प्रति सदाशयी बना रहा, उसी तरह लोग अपना आचरण बनायें. तुम लोगों को यह भी बताना कि तपश्चर्या, ब्रह्मचर्य तथा गुरुवर्ग की सेवा से मनुष्य स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं. आचार्य, माता-पिता और बंधु का, विशेषकर जब वे आर्त अवस्था में हों, निरादर नहीं करना चाहिए. आचार्य साक्षात ब्रह्मा की मूर्ति होते हैं, माता पृथ्वी स्वरूपा हैं, पिता प्रजापति स्वरूप हैं और भाई-बहन तो अपनी ही आत्मा के प्रतिरूप होते हैं. आचार्य और माता-पिता के तुष्ट होने पर ही मनुष्य के सभी तप पूर्ण हुआ करते हैं. ये तीनों उनके तीन लोक हैं, तीन वेद हैं, तीन आश्रम हैं. इन्हीं में तीन अग्नियां भी निहित हैं; पिता गार्हपत्य अग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आह्वनीय अग्नि हैं. इन तीनों के विषय में कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए. इस कर्तव्य का पालन करने वाला गृही तीनों लोकों को जीत लेता है. वह अपने शरीर की कांति से ही उद्भासित होता हुआ दिव्य आनंद का अनुभव करता है. हे भद्रे. तुम अब जाओ. तुम्हारा जो कर्तव्य है, उसे पूरा करो. मेरे द्वारा बार-बार उपरोध किये जाने से तुम्हारे मन में पीड़ा होगी. इसलिए कहता हूँ, हे बुद्धिमती. स्थिति को समझो और वापस जाकर सांसारिक कार्यों में लग जाओ.’

‘हे सुरश्रेष्ठ. धर्म अर्जन करने में यदि अपमान भी सहना पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए. आपको मैंने अपना गुरु मान लिया है. आपके चरणों की सेवा में ही मेरे जीवन का कल्याण निहित है. विशेष ज्ञान वाले महान लोगों से विपरीत परिस्थिति में भी धर्म-ज्ञान अर्जित करना चाहिए. धर्म और ज्ञान का लाभ सभी प्रकार के लाभों से श्रेष्ठ हुआ करता है. मानव  जन्म में धर्म-अर्थ-काम का त्रिवर्ग सुलभ करने के अवसर मिलते रहते हैं; जिसने धर्म को अपना लिया उसके जीवन में अर्थ और काम सेवक की तरह हाथ जोड़कर खड़ा रहता है. जिसने धर्म को त्याग कर अर्थ-काम की पूर्ति चाही, उसका जीवन अर्थ और काम की तावेदारी में ही विनष्ट हो जाता है. जिसने धर्म का अनुसरण किया है, वही प्रवृत्त हो पाता है तप, दान, क्षमा, ब्रह्मचर्य, सत्य, स्वाध्याय, साधु-सत्संग, तीर्थानुगमन, माता-पिता-गुरु की सेवा और सुर-अर्चन आदि की ओर. वही अपनी इद्रियों पर नियंत्रण कर पाता है और वही मात्सर्य से बचा रहता है. ज्ञानवान जन सदा ही धर्माचरण में लगे रहते हैं यह जीवन अनित्य है. कोई नहीं जानता कि कब मृत्यु आ जायेगी; भय का कारण भी यही है कि किसी को आसन्न मृत्यु का आभास नहीं हो पाता है. अनिवार्य मृत्यु की तिथि ज्ञात हो तब उससे भय कैसा?’

‘हे भद्रे. निश्चय ही, सारे संसार में तुम्हारा यश व्याप्त होगा. तुम सत्यवान को छोड़कर कुछ भी मुझ से मांग लो और यह तीसरा वरदान लेकर लौट जाओ. तुम्हारा अभी मेरे साथ यमलोक जाना असम्भव है. मैं तुम्हें तुम्हारी ही भलाई के लिए वापस भेज रहा हूं. तुमने यहां तक आने का एक आश्चर्यजनक कार्य तो कर लिया है और अपने दोनों कुलों के लिए कल्याणकारी वरदान भी प्राप्त कर लिये हैं. मैं चाहता हूं कि अब तुम अपने लिए कुछ मांगो; ऐसी वस्तु जो तुम्हें पूर्णता दे और जिसे तुम अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धि मानो.’

‘आप मेरे पिता के समान हैं और उन्हीं की तरह मेरा हित भी चाहते हैं. मेरे मनोरथ को आप आसानी से अनुभव कर सकते हैं. मैं जानती हूं, आप मेरा दुख दूर करने का यत्न कर रहे हैं. हे देव. यदि आप उचित समझते हैं, और यह सम्भव हो तो मुझे औरस संतानों का वरदान दें; ऐसे संतान जो सत्यवान के ही समान सौम्य, सुयोग्य और सुरूपवान हों.’

यमराज सावित्री से प्रभावित तो थे, पर उससे अविलम्ब छुटकारा भी पाना चाहते थे. उन्हें लगा कि अब तक यह मानवी थक चुकी होगी और अपना इच्छित वरदान पाकर उनका पीछा छोड़ देगी; उन्होंने शीघ्रता से ‘तथास्तु’ कह कर इस तीसरे वरदान को मुद्रांकित कर दिया.

‘हे भद्रे. तुम जो चाहती हो, वही होगा. तुम अवश्य यशस्वी तथा प्रियदर्शी संतानों की माता बनोगी. परंतु, हे कल्याणी. तुम मुझे अब और बाधा मत दो. मैं तुम्हें आगे बढ़ने से रोक दूंगा और इससे तुम दुखी हो जाओगी, अत अच्छा होगा कि स्वयं चली जाओ.’

यमराज शीघ्रता से आगे बढ़ रहे थे, उनसे थोड़ी दूरी बनाये सावित्री अभी भी चलती ही जा रही थी. आगे आने वाली थी निर्णायिका नदी वैतरणी. यमराज ने मन-ही-मन सोचा कि यह हठी ये कहने से तो नहीं रुकी, परंतु वैतरणी के कारण स्वत रुक जायेगी; कोई जीवित मनुष्य इसे पार नहीं कर सकता. उसे तो इस बात का ज्ञान भी न होगा, लेकिन रुकना पड़ेगा ही. इसलिए, अब उन्होंने उसे लौटने के लिए कहना छोड़ दिया.

परंतु यह क्या? सावित्री तो उनके पीछे चलती हुई बिना किसी बाधा के वैतरणी पार कर गयी. वह अब भी अपना पक्ष प्रस्तुत कर रही थी- ‘हे सुरेश्वर. क्या संसार में लौटकर मैं दुख से मुक्त हो सकूंगी?’

यमराज ठगे से रह गये. वे यह समझ चुके थे कि इस महिमामयी ने कितनी विप्लवकारी क्षमता उपलब्ध कर ली है. यह किस सीमा तक उनके पीछे जा सकती है, इसका अनुमान कर उन्हें चिंता हो गयी. उन्होंने तनिक रुक्षता से उसके इस प्रश्न का उत्तर दिया.

(क्रमशः)

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