पिता चाहते थे मैं कलेक्टर बनूं

बड़ों का बचपन

♦  ए.पी.जे. अब्दुल कलाम  >  

kalam1मेरा जन्म मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) के रामेश्वरम कस्बे में एक मध्यम वर्गीय तमिल परिवार में हुआ था. मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे. वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी. मेरी मां, आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं. मुझे याद नहीं है कि वे रोजाना कितने लोगों को खाना खिलाती थी; लेकिन मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि हमारे सामूहिक परिवार में जितने लोग थे, उससे कहीं गगज्यादा लोग हमारे यहां भोजन करते थे.

मैं कई बच्चों में से एक था, लम्बे-चौड़े व सुंदर माता-पिता का छोटी कद-काठी का साधारण-सा दिखनेवाला बच्चा. हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे. रामेश्वरम की मस्जिदवाली गली में बना यह घर चूने-पत्थर व ईंट से बना पक्का और बड़ा था. मेरे पिता आडम्बरहीन व्यक्ति थे और सभी अनावश्यक एवं ऐशो-आरामवाली चीज़ों से दूर रहते थे. पर घर में सभी आवश्यक चीज़ें थीं. वास्तव में, मैं कहूंगा कि मेरा बचपन बहुत ही निश्चिंतता और सादेपन में बीता- भौतिक एवं भावनात्मक दोनों ही तरह से.

मैं प्रायः अपनी मां के साथ ही रसोई  में नीचे बैठकर खाना खाया करता था. वे मेरे सामने केले का पत्ता बिछातीं और फिर उसपर चावल एवं सुगंधित, स्वादिष्ट सांभर देतीं; साथ में घर का बना अचार और नारियल की ताज़ा चटनी भी.

प्रतिष्ठित शिव मंदिर, जिसके कारण रामेश्वर प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, का हमारे घर से दस मिनट का पैदल रास्ता था. जिस इलाके में हम रहते थे, वह मुस्लिम बहुल था. लेकिन वहां कुछ हिंदू परिवार भी थे, जो अपने मुसलमान पड़ोसियों के साथ मिल-जुलकर रहते थे. हमारे इलाके में एक बहुत ही पुरानी मस्जिद थी, जहां शाम को नमाज़ के लिए मेरे पिताजी मुझे अपने साथ ले जाते थे. अरबी में जो नमाज़ अता की जाती थी, उसके बारे में मुझे कुछ पता तो नहीं था, लेकिन तब यह पक्का विश्वास था कि ये बातें ईश्वर तक ज़रूर पहुंच जाती हैं. नमाज के बाद जब मेरे पिता मस्जिद से बाहर आते तो विभिन्न धर्मों के लोग मस्जिद के बाहर बैठे उनकी प्रतीक्षा कर रहे होते. उनमें कई लोग पानी के कटोरे मेरे पिताजी के सामने रखते; पिताजी अपनी अंगुलियां उस पानी में डुबोते जाते और कुछ पढ़ते जाते. इसके बाद वह पानी बीमार  लोगों के लिए घरों में ले जाया जाता. मुझे भी याद है कि लोग ठीक होने के बाद शुक्रिया अदा करने हमारे घर आते.

रामेश्वरम मंदिर के सबसे बड़े पुजारी तक्षी लक्ष्मण शात्री मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे. अपने शुरूआती बचपन की यादों में इन दो लोगों के बारे में मुझे सबसे अच्छी तरह याद है, दोनों अपनी पारम्परिक वेशभूषा में होते और आध्यात्मिक मामलों पर चर्चाएं किया करते. जब मैं प्रश्न पूछने लायक बड़ा हुआ तो मैंने पिताजी से नमाज़ की प्रासंगिकता के बारे में पूछा था. पिताजी ने बताया कि नमाज़ में रहस्यमय कुछ भी नहीं है. नमाज़ से लोगों के बीच भाईचारे की भावना सम्भव हो पाती है. वे कहते- ‘जब तुम नमाज़ पढ़ते हो तुम अपने शरीर से इतर ब्रह्मांड का एक हिस्सा बन जाते हो; जिसमें दौलत, आयु, जाति या धर्म-पंथ का कोई भेदभाव नहीं होता.’

मेरे पिताजी अध्यात्म की जटिल अवधारणाओं को भी तमिल में बहुत ही सरल ढंग से समझा देते थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा, ‘खुद उनके वक्त में, खुद उनके स्थान पर, जो वे वास्तव में हैं और जिस अवस्था में पहुंचे हैं- अच्छी या बुरी, हर इनसान भी उसी तरह दैवी शक्ति रूपी ब्रह्मांड में उसके एक विशेष हिस्से के रूप में होता है तो हम संकटों, दुःखों समस्याओं से क्यों घबराएं? जब संकट या दुःख आयें तो उनका कारण जानने की कोशिश करो. विपत्ति हमेशा आत्मविश्लेषण के अवसर प्रदान करता है.’

‘आप उन लोगों को यह बात क्यों नहीं बताते जो आपके पास मदद और सलाह मांगने के लिए आते हैं?’ मैंने पिताती से पूछा. उन्होंने अपने हाथ मेरे कंधों पर रखे और मेरी आंखों में देखा. कुछ क्षण वे चुप रहे, जैसे वे मेरी समझ की क्षमता जांच रहे हों. फिर धीमे और गहरे स्वर में उन्होंने उत्तर दिया. पिताजी के इस जवाब ने मेरे भीतर नयी ऊर्जा और अपरिमित उत्साह भर दिया-

‘जब कभी इनसान अपने को अकेला पाता है तो उसे एक साथी की तलाश होती है, जो स्वाभाविक ही है. जब इनसान संकट में होता है तो उसे किसी की मदद की ज़रूरत होती है. जब वह अपने को किसी गतिरोध में फंसा पाता है तो उसे चाहिए होता है ऐसा साथी जो बाहर निकलने का रास्ता दिखा सके. बार-बार तड़पानेवाली हर तीव्र इच्छा एक प्यास की तरह होती है. मगर हर प्यास को बुझानेवाला कोई-न-कोई मिल ही जाता है. जो लोग अपने संकट की घड़ियों में मेरे पास आते हैं, मैं उनके लिए अपनी प्रार्थनाओं के ज़रिये ईश्वरीय शक्तियों से सम्बंध स्थापित करने का माध्यम बन जाता हूं. हालांकि हर जगह, हर बार यह सही नहीं होता और न ही कभी ऐसा होना चाहिए.’

मैंने अपनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सारी ज़िंदगी में पिताजी की बातों का अनुसरण करने की कोशिश की है. मैंने उन बुनियादी सत्यों को समझने का भरसक प्रयास किया है, जिन्हें पिताजी ने मेरे सामने रखा और मुझे इस संतुष्टि का आभास हुआ कि ऐसी कोई दैवी शक्ति ज़रूर है जो हमें भ्रम, दुःखों, विषाद और असफलता से छुटकारा दिलाती है तथा सही रास्ता दिखाती है.

जब पिताजी ने लकड़ी की नौकाएं बनाने का काम शुरू किया, उस समय मैं छह साल का था. ये नौकाएं तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम से धनुषकोडि (सेथुक्काराई भी कहा जाता है) तक लाने-ले जाने के काम आती थीं. एक स्थानीय ठेकेदार अहमद जलालुद्दीन के साथ पिताजी समुद्र तट के पास नौकाएं बनाने लगे. बाद में अहमद जलालुद्दीन की मेरी बड़ी बहन जोहरा के साथ शादी हो गयी थी. नौकाओं को आकार लेते देखते वक्त मैं काफी अच्छे तरीके से गौर करता था. पिताजी का कारोबार काफी अच्छा चल रहा था. एक दिन सौ मील प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चली और समुद्र में तूफान आ गया. तूफान में सेथुक्काराई के कुछ लोग और हमारी नावें बह गयीं. उसीमें पामबान पुल भी टूट गया और यात्रियों से भरी ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गयी. तब तक मैंने सिर्फ समुद्र की खूबसूरती को ही देखा था. उसकी अपार एवं अनियंत्रित ऊर्जा ने मुझे हतप्रभ कर दिया.

जब तक नाव की यह कहानी बेवक्त डूबी, उम्र में काफी फ़र्क होने के बावजूद अहमद जलालुद्दीन मेरे अंतरंग मित्र बन गये. वह मुझसे करीब पंद्रह साल बड़े थे और मुझे ‘आज़ाद’ कहकर पुकारा करते थे. हम दोनों रोज़ाना शाम को दूर तक साथ घूमने जाया करते. हम मस्जिददवाली गली से निकलते और समुद्र की बातें करते. रास्ते में हमारा पहला पड़ाव शिव मंदिर हुआ करता था. इस मंदिर की हम उतनी ही श्रद्धा से परिक्रमा करते जितनी श्रद्धा से देश के किसी हिस्से से आया कोई भी तीर्थयात्री करता. और इस परिक्रमा के बाद हम अपने शरीर को बहुत ही ऊर्जावान महसूस करते.

जलालुद्दीन ईश्वर के बारे में ऐसी बातें किया करते जैसे ईश्वर के साथ उनकी कामकाजी भागीदारी हो. वह ईश्वर के समक्ष अपने सारे संदेह इस प्रकार रखते जैसे वह उनका निराकरण पूरी तरह कर देगा. मैं जलालुद्दीन की ओर एकटक देखता रहता और फिर देखता मंदिर के चारों ओर जमा श्रद्धालुओं-तीर्थयात्रियों की उस भीड़ को भी, जो समुद्र में डुबकियां लगा रही होती और फिर पूरी धार्मिक रीतियों से पूजा-पाठ करती तथा उसी अज्ञात के प्रति अपने आदर भाव से प्रार्थना करती जिसे हम निराकार सर्वशक्तिमान मानते थे. मुझे इसमें कभी संदेह नहीं रहा कि मंदिर में की गयी प्रार्थना जहां, जिस तरह पहुंचती है ठीक उसी तरह हमारी मस्जिद में पढ़ी गयी नमाज भी वहीं जाकर पहुंचती है. मुझे आश्चर्य सिर्फ तब होता जब जलालुद्दीन ईश्वर से विशेष तरह का जुड़ाव कायम कर लेने की बात कहते. पारिवारिक परिस्थितियों के कारण जलालुद्दीन की स्कूली शिक्षा कोई बहुत गगज्यादा नहीं हुई थी. यही एक कारण रहा, इसकी वजह से जलालुद्दीन मुझे पढ़ाई के प्रति हमेशा उत्साहीत करते रहते थे. और मेरी सफलताओं से प्रसन्न होते थे.

प्रसंगवश मुझे यहां यह भी उल्लेख करना चाहिए कि पूरे इलाके में सिर्फ जलालुद्दीन ही थे, जो अंग्रेज़ी में लिख सकते थे. मेरे परिचितों में, चाहे मेरे परिवार में हो या आस-पड़ोस में, जलालुद्दीन के बराबर शिक्षा का स्तर किसी का भी नहीं था-और न ही किसी को उनके बराबर बाहरी दुनिया के बारे में पता था. वही थे जिन्होंने मुझे सीमित दायरे से बाहर निकालकर नयी दुनिया का बोध कराया.

मेरे बाल्यकाल में पुस्तकें एक दुर्लभ वस्तु की तरह हुआ करती थीं. हमारे यहां स्थानीय स्तर पर एक पूर्व क्रांतिकारी या कहिए, उग्र राष्ट्रवादी एस.टी.आर. मानिकम का निजी पुस्तकालय था. उन्होंने मुझे हमेशा पढ़ने के लिए उत्साहित किया. मैं अक्सर उनके घर से पढ़ने के लिए किताबें ले आया करता था.

दूसरे जिस व्यक्ति का मेरे बाल जीवन पर गहरा असर पड़ा, वह मेरे चचेरे भाई शम्सुद्दीन थे. वह रामेश्वरम् में अखबारों के एकमात्र वितरक थे. अखबार रामेश्वरम स्टेशन पर सुबह की ट्रेन से पहुंचते थे, जो पामबन से आती थी. इस अखबार एजेंसी को अकेले शम्सुद्दीन ही चलाते थे. रामेश्वरम् में अखबारों की जुमला एक हजार प्रतियां बिकती थीं. इन अखबारों में स्वतंत्रता आंदोलन से सम्बंधित ताज़ा खबरें, ज्योतिष से जुड़े संदर्भ और मद्रास (अब चेन्नई) के सर्राफा बाज़ार के भाव प्रमुखता से होते थे. महानगरीय दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ थोड़े-से पाठक हिटलर, महात्मा गांधी और जिन्ना के बारे में चर्चाएं करते; जबकि गगज्यादातर पाठकों में चर्चा का विषय सवर्ण हिंदुओं के रूढ़िवाद के खिलाफ़ पेरियार ई.वी. रामास्वामी द्वारा चलाया जा रहा आंदोलन होता. ‘दिनमणि’ अखबार की मांग सबसे गगज्यादा होती थी. चूंकि अखबार में जो कुछ भी छपा होता, वह मेरी समझ से परे होता, इसलिए शम्सुद्दीन द्वारा ग्राहकों को अखबार बांटने से पहले मैं सिर्फ अखबार में छपी तस्वीरों पर नज़र डालकर ही संतोष कर लेता था.

सन् 1939 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा तब मैं आठ वर्ष का था. तभी बाज़ार में इमली के बीजों की अचानक तेज़ मांग उठी, जिसका कारण मुझे कभी समझ नहीं आया. मैं इन बीजों को इकट्ठा करता और मस्जिदवाली गली में एक परचून की दुकान पर बेच देता. इससे मुझे एक आना यानी यह छह नये पैसे रोज़ मिल जाते. विश्वयुद्ध की खबरें जलालुद्दीन मुझे बताते रहते थे, जिन्हें बाद में मैं ‘दिनमणि’ अखबार के शीर्षकों में ढूंढ़ने की कोशिश करता. विश्वयुद्ध का हमारे यहां ज़रा भी असर नहीं था. लेकिन जल्दी ही भारत पर भी मित्र देशों की सेनाओं में शामिल होने का दबाव डाला गया और देश में एक तरह का आपातकाल घोषित कर दिया गया. उसका पहला नतीजा इस रूप में सामने आया कि रामेश्वरम स्टेशन पर गाड़ी का ठहरना बंद कर दिया गया. ऐसी स्थिति में अखबारों के बंडल रामेश्वरम और धनुषकोडि के बीच रामेश्वरम् रोड पर चलती ट्रेन से गिरा दिये जाते थे. तब शम्सुद्दीन को ऐसे मददगार की तलाश हुई जो अखबारों के बंडल झेलने और गिरे हुए बंडलों को उठाने में उनका हाथ बंटा सके. स्वाभाविक है, मैं ही मददगार बना. इस तरह शम्सुद्दीन से मुझे अपनी पहली तनख्वाह मिली. आधी शताब्दी गुज़र जाने के बाद आज भी मैं अपने द्वारा कमाई पहली तनख्वाह पर गर्व करता हूं.

हर बच्चा एक विशेष आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक परिवेश में कुछ वंशगत गुणों के साथ जन्म लेता है, फिर संस्कारों के अनुरूप उसे ढाला जाता है. मुझे अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन मिला तथा मां से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव. यही गुण मेरे तीनों भाई-बहनों को भी विरासत में मिले. लेकिन मैंने जलालुद्दीन और शम्सुद्दीन के साथ अपना जो समय गुजारा, उसका मेरे बचपन में एक अद्वितीय योगदान रहा और इसी के रहते मेरे जीवन में सारे बदलाव आये.

बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे- रामानंद शात्री, अरविंद और शिवप्रकाशन. ये तीनों ही ब्राह्मण परिवारों से थे. रामानंद शात्री तो रामेश्वरम् मंदिर के सबसे बड़े पुजारी तक्षी लक्ष्मण शात्री का बेटा था. अलग-अलग धर्म, पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई को लेकर हममें से किसी भी बच्चे ने कभी भी आपस में कोई भेदभाव महसूस नहीं किया. आगे चलकर रामानंद शात्री तो अपने पिता के स्थान पर रामेश्वरम् मंदिर का पुजारी बना, अरविंदन ने तीर्थयात्रियों को घुमाने के लिए टेंपो चलाने का कारोबार कर लिया और शिवप्रकाशन दक्षिण रेलवे में खान-पान का ठेकेदार हो गया.

प्रतिवर्ष होनेवाले श्री सीता-राम विवाह समारोह के दौरान हमारा परिवार विवाहस्थल तक भगवान श्रीराम की मूर्तियां ले जाने के लिए विशेष प्रकार की नावों का बंदोबस्त किया करता था. यह विवाहस्थल तालाब के बीचोबीच स्थित था और इसे ‘रामतीर्थ’ कहते थे. यह हमारे घर के पास ही था. मेरी मां और दादी घर के बच्चों को सोते समय ‘रामायण’ के किस्से और पैगम्बर मुहम्मद से जुड़ी घटनाएं सुनाती थीं.

जब मैं रामेश्वरम के प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में था तब एक दिन एक नये शिक्षक हमारी कक्षा में आये. मैं टोपी पहना करता था, मेरे मुसलमान होने का प्रतीक था. कक्षा में मैं हमेशा आगे की पंक्ति में जनेऊ पहने रामानंद शात्री के साथ बैठा करता था. नये शिक्षक को एक हिंदू लड़के का मुसलमान लड़के के साथ बैठना अच्छा नहीं लगा. उन्होंने मुझे उठाकर पीछे वाली बेंच पर चले जाने को कहा. मुझे बहुत बुरा लगा. रामानंद शात्री को भी यह बहुत खला. मुझे पीछे की पंक्ति में बैठाये जाते देख वह काफी उदास नज़र आ रहा था. उसके चेहरे पर जो रुआंसी के भाव थे, उनकी मुझपर गहरी छाप पड़ी.

स्कूल की छुट्टी होने पर हम घर गये और सारी घटना अपने घरवालों को बतायी. यह सुनकर लक्ष्मण शात्री ने उस शिक्षक को बुलाया और कहा कि उसे निर्दोष बच्चों के दिमाग में इस तरह सामाजिक असमानता एवं साम्प्रदायिकता का विष नहीं घोलना चाहिए. हम सब भी उस वक्त वहां मौजूद थे. लक्ष्मण शात्री ने उस शिक्षक से साफ़-साफ़ कह दिया कि या तो वह क्षमा मांगे या फिर स्कूल छोड़कर यहां से चला जाए. उस शिक्षक ने अपने किये व्यवहार पर न सिर्फ दुःख व्यक्त किया बल्कि लक्ष्मण शात्री के कड़े रुख एवं धर्मनिरपेक्षता में उनके विश्वास से उस नौजवान शिक्षक में अंततः बदलाव आ गया.

पूरे रामेश्वरम में विभिन्न जातियों का जो छोटा-सा समाज था, वह कई स्तरों में था. इस पृथक्करण के मामले में ये जातियां बहुत ही कठोर थी. मेरे विज्ञान के शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर सनातनी ब्रह्मण थे और उनकी पत्नी घोर रूढ़िवादी थीं. लेकिन वे कुछ-कुछ रूढ़िवाद के खिलाफ हो चले थे. उन्होंने इन सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए अपनी तरफ से काफी कोशिशें कीं, ताकि विभिन्न वर्गों के लोग आपस में एक-दूसरे के साथ मिल सकें और जातीय असमानता खत्म हो. वे मेरे साथ काफी समय बिताते थे और कहा करते- ‘कलाम, मैं तुम्हें ऐसा बनाना चाहता हूं कि तुम बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओगे.’

एक दिन उन्होंने मुझे खाने पर अपने घर बुलाया. उनकी पत्नी इस बात से बहुत ही परेशान एवं भयभीत थीं कि उनकी पवित्र और धर्मनिष्ठ रसोई में एक मुसलमान लड़के को भोजन पर आमंत्रित किया गया है. उन्होंने अपनी रसोई के भीतर मुझे खाना खिलाने से साफ़ इनकार कर दिया. शिव सुब्रह्मण्य अय्यर अपनी पत्नी के इस रुख से ज़रा भी विचलित नहीं हुए न ही उन्हें क्रोध आया. बल्कि उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे खाना परोसा और फिर बाहर आकर मेरे पास ही अपना खाना लेकर बैठ गये. उनकी पत्नी यह सब रसोई के दरवाजे के पीछे खड़ी देखती रहीं. मुझे आश्चर्य हो रहा था कि क्या वे मेरे चावल खाने के तरीके, पानी पीने के ढंग और खाना खा चुकने के बाद उस स्थान को साफ़ करने के तरीके में कोई फर्क देख रही थीं. जब मैं उनके घर से खाना खाने के बाद लौटने लगा तो अय्यर महोदय ने मुझे फिर अगले हफ्ते रात के खाने पर आने को कहा. मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए वे बोले, ‘इसमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएं सामने आती ही हैं.’

अगले हफ्ते जब मैं शिव सुब्रह्मण्य अय्यर के घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी ही मुझे रसोई में ले गयीं और खुद अपने हाथों से मुझे खाना परोसा.

द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और भारत की आज़ादी भी बहुत दूर नहीं थी. गांधीजी ने ऐलान किया-‘भारतीय स्वयं अपने भारत का निर्माण करेंगे.’ पूरे देश में अप्रत्याशित उम्मीदें थीं. मैंने अपने पिताजी से रामेश्वरम छोड़कर जिला मुख्यालय रामनाथपुरम जाकर पढ़ाई करने की अनुमति मांगी. उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘अबुल! तुम्हें आगे बढ़ने के लिए जाना होगा. तुम्हें अपनी लालसाएं पूरी करने और आगे बढ़ने के लिए उस जगह चले जाना चाहिए जहां तुम्हारी ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं. हमारा प्यार तुम्हें बांधेगा नहीं और न ही हमारी ज़रूरतें तुम्हें रोकेंगी.’ मेरी हिचकिचाती हुई मां को उन्होंने खलील जिब्रान का हवाला देते हुए कहा, ‘तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं हैं. वे तो खुद के लिए जीवन की लालसाओं  के बेटे-बेटियां हैं. वे तुम्हारे ज़रिये आते हैं, लेकिन तुमसे नहीं आते. तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो, लेकिन अपने विचार नहीं. उनके खुद के अपने विचार होते हैं.’

पिताजी हम चारों भाइयों को मस्जिद ले गये और पवित्र ‘कुरान’ से ‘अल फातिहा’ पढ़कर प्रार्थना की. फिर पिताजी मुझे रामेश्वरम स्टेशन पर छोड़ने आये और कहा, ‘इस जगह तुम्हारा शरीर तो रह सकता है, लेकिन तुम्हारा मन नहीं. तुम्हारे मन को तो कल के उस घर में रहने जाना है जहां हममें से कोई भी रामेश्वरम से वहां नहीं जा सकता और न ही सपनों में देख सकता है. मेरे बच्चे, ईश्वर तुम्हें खुश रखे.’

शम्सुद्दीन और अहमद जलालुद्दीन मुझे रामनाथपुरम के श्वार्ट्स हाई स्कूल में दाखिल कराने और वहां मेरे रहने का बंदोबस्त करने के लिए मेरे साथ आये थे. किसी भी तरह मुझे यहां अच्छा नहीं लग रहा था.

रामनाथपुरम कस्बा समृद्ध होते हुए भी बनावटीपन में जीता समाज था. इसकी आबादी करीब पचास हजार थी. लेकिन रामेश्वरम जैसी सुसंगति और सद्भाव यहां नहीं था. मुझे घर की बड़ी याद आती और मैं रामेश्वर जाने का हर मौका तलाशता रहता.

घर की बहुत याद आने के बावजूद मैं नये माहौल में रहकर पिताजी के सपने को साकार करने के प्रति कटिबद्ध था; क्योंकि मेरी सफलता से पिताजी की बहुत बड़ी उम्मीदें जुड़ी थीं. पिताजी मुझे कलेक्टर बना देखना चाहते थे और मुझे लगता था कि पिताजी के सपने को साकार करना मेरा फर्ज है.

जलालुद्दीन मुझसे हमेशा सकारात्मक सोच की शक्ति की बात किया करते थे और जब भी मुझे घर की याद आती या मैं उदास होता तो मैं प्रायः उनकी कही बातों को मन में याद कर लेता. उनके कहे अनुसार मैंने अपने मन के विचारों एवं मस्तिष्क को स्थिर रखने तथा लक्ष्य को पाने के लिए कठोर परिश्रम किया. मैं रामेश्वरम नहीं लौटा बल्कि अपने घर से और दूर चलता चला गया.

(जनवरी 2014)

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