पल्सर

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पिछले तीन वर्षों में खगोलज्ञों की दृष्टि से कई नाटकीय बातें हुई हैं. सबसे प्रमुख है, आदमी का चांद पर पहुंचना और वहां से पत्थरों के नमूने लाना.

    लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इससे भी अधिक महत्त्व की बात है, तीव्र गति से परिवर्तमान विलक्षण रेडियो-स्रोतों की खोज, जिन्हें पल्सर कहा जाता है.

    पल्सरों की कथा 1967 में आरंभ हुई. कुमारी ओसेलीन बेल (अब श्रीमती ब्रूनेट) कैंब्रिज विश्वविद्यालय में डॉ. ह्यूइश के शोध-दल में काम कर रही थीं. उन्होंने देखा कि रेकार्ड किसी ऐसे पिंड का पता दे रहे हैं, जो रेडियो-विकिरण छोड़ रहा है, मगर उसके स्पंदन (पल्स) आश्चर्यजनक रूप से नियमित और द्रुत गति वाले हैं. यह था पहला पल्सर. अब तो 57 पल्सर खोजे जा चुके हैं.

    पल्सरों के अंत अब तक देखे गये समस्त संकेतों से नितांत भिन्न प्रकार के हैं. यहां तक कि कुछ समय तक तो यह भी समझा गया कि वे किसी कृत्रिम स्रोत से आ रहे हों, यह भी असंभव नहीं. मगर सावधानी से खोजबीन करने पर धारणा गलत सिद्ध हुई.

    फिर यह सुझाया गया कि पल्सर शायद अत्यंत तेजी से कांपते हुए ‘सफेद बौने नक्षत्र’ हैं. ‘सफेद बौने नक्षत्र’ ऐसा नक्षत्र होता है, जो अपने सक्रिय जीवन की समाप्ति पर पहुंच चुका होता है. वह अपनी समस्त नाभिकीय शक्ति उपयोग कर चुका होता है. उसका आकार छोटा और घनत्व बहुत ज्यादा होता है.

    यह बहुत ही जरूरी था कि पल्सरों की दूरी का पता लगाया जाये. और यह बड़ी जटिल समस्या थी. आज भी केवल एक ही पल्सर को दृश्य वस्तु के रूप में पहचाना जा सका है. और वह है, सुप्रसिद्ध क्रैब नीहारिका में स्थित पल्सर.

    क्रैब नीहारिका गैस का एक धब्बा है, जो हमसे कम-से-कम 4,000 प्रकाश-वर्ष दूर है. माना जाता है कि यह उस ताराविस्फोट (सुपर नोवा) का अवशेष है, जिसे सन 1054 में चीनी खगोलज्ञों ने देखा था.

    पल्सरों की खोज होते ही अनेक देशों में उनके बारे में शोध-कार्य आरंभ हो गया. हम यह भी कह सकते हैं कि क्वासरों के बजाय पल्सर खगोलशास्त्राrय बातचीत का विषय बन गये.

    एक विलक्षण चीज यह भी पता लगी कि यद्यपि पल्सरों की गति अत्यंत तीव्र है, मगर वह घटती जा रही है- भले ही साल में एक सेकेंड की रफ्तार से. पहले यह खयाल था कि प्रत्येक पल्सर की स्पंदन-अवधि निश्चित परिवर्तन होते पाये गये.

    कई पल्सरों की स्पंदन-अवधि एक सेकेंड से कम है. मगर ‘सफेद बौना नक्षत्र’ काफी बड़ा पिंड होता है. उदाहरणार्थ, सबसे प्रसिद्ध सफेद बौना नक्षत्र, जिसे ‘सिरियस का साथी’ (कंपैनियन आफ सिरियस) कहा जाता है, 24,000 मील व्यास का है, अर्थात पृथ्वी से काफी बड़ा है. (उसका द्रव्यमान उतना ही है, जितना सूर्य का.) यह बात असंभव-सी लगती है कि इतना विशाल पिंड इतनी तेजी से कांप रहा हो. इसीलिए अब इस मान्यता को लगभग तिलांजलि दे दी गयी है कि पल्सर सफेद बौने नक्षत्र हैं.

    बल्कि अब यह माना जाने लगा है कि पल्सर और कुछ नहीं, बल्कि न्यूट्रान नक्षत्र हैं, जिनका व्यास केवल चंद मील है और घनत्व इतना ज्यादा है कि आप कल्पना नहीं कर सकते. दर्जियों द्वारा उंगली में पहने जानेवाले अंगुश्ताने में समा सके, इतने न्यूट्रान नक्षत्रीय द्रव्य का वजन कई लाख टन होगा.

    न्यूट्रान नक्षत्रों के अस्तित्व की संभावना सैद्धांतिक रूप से बहुत वर्षों पहले ही स्वीकार की जा चुकी है. उनके भौतिक गुण-धर्मों का वर्णन करना आसान नहीं है, क्योंकि वे हमारे सामान्य अनुभव से बहुत भिन्न प्रकार के हैं. स्थूल रूप से कहें, तो उनका द्रव्य इतना घना है कि नाभिकीय कण आपस में घुस गये हैं.

    क्रैब नीहारिका में स्थित पल्सर से कुछ ऐसा सूचित होता है कि न्यूट्रान नक्षत्रतारा-विस्फोट का अवशेष होता है और इस कारण शायद वह तारों के विकास की आखिरी अवस्था है.

    रूसी विज्ञानी वी.एल.गिंजबर्ग के मत में न्यूट्रान नक्षत्र की संरचना अत्यंत जटिल है. संभव है, उसकी एक ठोस ऊपरी पपड़ी हो, जो न्यूट्रान पदार्थ से बनी हुई नहीं है, और इस पपड़ी में ‘नक्षत्रकंप’ (भूकंप की भांति) आते हों. कुछ पल्सरों की स्पंदन-अवधि में जो आकस्मिक परिवर्तन देखे गये हैं, शायद वे इन्हीं ‘नक्षत्रकंपों’ के कारण होते हैं. अब यह भी माना जाता है कि कंपन ही संकेतों का कारण हैं.

    न्यूट्रान नक्षत्र अपने अक्ष पर घूम रहे हैं और यह अक्षगति नियमित स्पंदन (पल्स) को जन्म देती है. इसमें चुंबकीय प्रभावों का भी हाथ है. यह भी कहा गया है कि जैसे समुद्री प्रकाश-स्तंभ की प्रकाश-धारा निश्चित समय के अंतर से दर्शक को दिखाई देती रहती है, वैसी ही स्थिति पल्सर के संकेत की है.

    यहां पर यह भी कह देना जरूरी है कि क्वासरों और पल्सरों में कोई निकट संबंध नहीं है. पल्सरों की संरचना आदि चाहे कैसी भी हो, वे हमारे ही तारा-मंडल (आकाश-गंगा) की चीजें है और हमसे चंद हजार प्रकाश-वर्षों की दूरी पर हैं. (एक प्रकाश-वर्ष 60 खरब मील से कुछ कम होता है.) दरअसल पल्सर बड़ी आम चीज है. बहुत से ‘मृत पल्सर’ भी अंतरिक्ष में होंगे, जिनका इस कारण पता नहीं लगाया जा सकता कि वे न प्रकाश की तरंगें छोड़ते हैं, न रेडियों-तरंगें.

    इसके विपरीत क्वासर अत्यंत दूरवर्ती और अत्यंत प्रकाशमान पदार्थ हैं, जो हमारे तारा-मंडल से परे हैं.

( फरवरी 1971 )

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