‘पत्रकथा’ के आगाज़ की कहानी

 – धनंजय वर्मा

बीसवीं सदी का वह शायद अंतिम वर्ष था. मुम्बई से श्रीमती पुष्पा भारती का एक खत मुझे मिला. वे धर्मवीर भारती के पत्रों का संकलन कर रहीं थी. उनका आग्रह था कि मैं भारती जी के पत्रों की फोटोकॉपियां या इबारत उन्हें भिजवा दूं. मैंने अपने गुरु आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के दिनांक 29 मई 1957 को लिखे गये पत्र से लेकर अब तक मिले साहित्यकारों के पत्र सहेजकर रखे हैं. पत्रों की फाइलों से भारती जी के पत्रों को एकत्र किया और उनकी फोटोकॉपियां पुष्पा जी को भिजवा दीं. फिर उन्हें क्रम से सजाकर पढ़ने लगा. सम्बंधों का एक अध्याय खत-दर-खत खुलता चला गया. उन खुतूत का पसमंज़र, उनसे जुड़ी यादें सैरेबीन की मानिन्द मानस पटल पर गुज़रती चली गयीं. मुझे लगा कि इन्हें लफ़्ज़ों में पिरोना चाहिए. मैंने ‘खुतूत से नुमायां भारती’ लिखा और उसे बंधुवर प्रणवकुमार बंद्योपाध्याय को भिजवा दिया. उन्होंने उसे अप्रैल-जून 2000 की ‘पश्यंती’ में प्रकाशित किया था.

27 अप्रैल 2000 को दिल्ली से अपने पत्र में श्रीमती चित्रा मुद्गल ने लिखा- ‘पश्यंती में अभी पढ़ा है- ‘डॉ. साहब से सम्बंधित लेख- ‘खुतूत से नुमायां भारती’. आंखें नम हैं, और सब कुछ ठहर गया है जैसे उनकी स्मृति में. पत्र तो बहुतों के बहुत बार छपे और उन्हें पढ़ा भी है- दो विचारकों के बीच संवाद की तरह, लेकिन आपने जिस तरह पत्रों के माध्यम से व्यक्ति के प्रचलित व्यक्तित्व और शब्द व्यक्तित्व का तुलनात्मक रूप अन्वेषित किया है- दुर्भाव की फींच निचोड़कर- वह छू गया; बल्कि कहूं- सर्जना की एक अनूठी विधा निकलकर सामने आयी है. आप कई महत्त्वपूर्ण सर्जकों से हुए पत्र संवाद को इसी रूप में लिखकर एक रोचक पुस्तक तैयार कर सकते हैं- खुतूत से नुमायां सर्जक.’

और पुष्पा जी ने मुम्बई से अपने 25 जुलाई 2000 के पत्र में लिखा- ‘भारती जी के पत्र तो बहुतों ने सहेज कर रखे हैं किंतु आपने एक-एक पत्र से सम्बंधित स्मृतियों को जिस तरह मन में सहेजा और फिर उसे सिलसिलेवार अभिव्यक्ति दी वह तो सचमुच एक अनूठी और निराली सृजनशीलता का प्रमाण है. संस्मरण और डायरी शैली का मिलाजुला अनोखा रूप- एकदम मौलिक और अद्भुत है. इस सूझबूझ के लिए बधाई. हिंदी साहित्य और साहित्यकारों से आत्मीयता से प्रेम करने वाले पाठकों को इस तरह की चीज़ें निश्चित रूप से पसंद आयेंगी. आपने एक नया ही रास्ता दिखाया है.’

आप अनुभव करेंगे कि पत्र स्वयं बोलते हैं. व्यक्तिगत पत्रों में चूंकि व्यक्ति की सचेत और जागरूक चेष्टा नहीं होती, इनमें लेखकों का स्वाभाविक और अंतर्तम रूप उभरकर आ जाता है. इन्हें यदि आत्मकथात्मक कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इनके नेपथ्य पर पड़ती रौशनी और एक सिलसिला बनाती इबारत जीवन चरितात्मक हो जाती है. संस्मरण की प्रचुरता तो इनमें है ही. अ़फसाना-ए-हमदम के साथ खुतूत उस दौर के ऐसे दस्ताव़ेज भी हो जाते हैं जिनमें गमे-जानां के साथ गमे-दौरां भी पिन्हां होता है.

पुष्पा जी ने ‘खुतूत से नुमायां भारती’ में एक अनूठी और एक निराली सृजनशीलता देखी तो चित्रा जी को उसमें एक अनूठी विधा मिली. यदि यह कोई नयी विधा है तो इसे क्या नाम-रूप दिया जाये? मुझे तो एक नाम सूझा- पत्रकथा और बंधुवर प्रभात कुमार भट्टाचार्य ने उसका उत्साहपूर्वक अनुमोदन किया, और यूं शुरू हो गयी पत्रकथा.

‘खुतूत से नुमायां भारती’ के बाद ‘पश्यंती’ में ही ‘खुतूत से नुमायां दुष्यंत कुमार’ भी प्रकाशित हुआ. इस बीच कथा आलोचना की अपनी पुस्तक-त्रयी की योजना बनी- ‘हिंदी कहानी का रचनाशास्त्र’, ‘हिंदी कहानी का स़फरनामा’ और ‘हिंदी उपन्यास का पुनरावतरण’ की पाण्डुलिपियां क्रमशः तैयार हुईं; लेकिन हरिशंकर परसाई पर लिखे गये मेरे लेख इनमें से किसी भी  पुस्तक में अंट नहीं पा रहे थे, सो उन्हें एक स्वतंत्र पुस्तक- ‘पारिभाषित परसाई’ में संकलित करने का विचार आया. इसमें परसाई पर एक संक्षिप्त अंतरंग आलेख तो था (है) लेकिन उनके व्यक्तित्व पर नये सिरे से लिखने का विचार आया तो मैंने उनके सारे ‘खुतूत’ एकत्र किये. उन्हें पढ़ते हुए लगा कि इनके प्रसंगों को उभारकर पेश कर दिया जाये तो इनमें से परसाई का व्यक्तित्व स्वयं बोलने लगता है. और यों ‘खुतूत से नुमायां हरिशंकर परसाई’ का आलेख तैयार हो गया. वह आकार में काफी बड़ा था, मैंने उसे ‘देशबंधु’ पत्र-समूह के प्रधान-सम्पादक और ‘अक्षर पर्व’ (मासिक) के सम्पादक श्री ललित सुरजन को इस निवेदन के साथ भेज दिया कि वे चाहें तो उसे ‘अक्षर पर्व’ के एकाधिक अंकों में प्रकाशित कर सकते हैं. श्री ललित सुरजन ने उसे एक ही अंक में प्रकाशित करना तय किया और वह ‘अक्षर पर्व’ के विशेषांक में प्रकाशित हुआ. उस पर अनुकूल एवं प्रतिकूल बहुत-सी प्रतिक्रियाएं आयीं- कुछ ने मुझ पर इलज़ाम लगाया कि मैंने परसाई को बदनाम करने के लिए उनकी ये चिट्ठियां छपवायी हैं, तो कुछ लोगों ने इनमें परसाई का सहज एवं आत्मीय रूप देखा. बहरहाल उसका अच्छा प्रतिसाद मिला. ललित सुरजन ने यह इच्छा भी व्यक्त की कि यदि मैं इसी तरह अन्य लेखकों के पत्रों पर आधारित आलेख भी दे सकूं तो वे ‘अक्षर पर्व’ में उसे ज़रूर प्रकाशित करना चाहेंगे.

मैं अपनी अन्य किताबों के संयोजन एवं प्रकाशन में व्यस्त हो गया और बात आयी गयी हो गयी. फिर इधर बढ़ती उम्र और अपने तथा पत्नी के गिरते स्वास्थ्य के कारण हम लोग अक्सर उज्जैन रहने लगे. उज्जैन में बंधुवर प्रभात कुमार भट्टाचार्य ने ‘समावर्तन’ का सम्पादन-प्रकाशन शुरू कर दिया था. उनके मित्रवत आग्रह पर मैंने आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के शताब्दी स्मरण के अंतर्गत छायावादी कवियों का पुनर्मूल्यांकन लेखमाला लिखी और फिर उर्दू शायरी पर साझी विरासत की लेखमाला. 2013 में उनका फिर अनुरोध हुआ कि मैं कोई नयी लेखमाला शुरू करूं. मैंने ‘पश्यंती’ और ‘अक्षर पर्व’ से शुरू हुई पत्रकथा को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा. मार्च 2013 से ये पत्रकथाएं ‘समावर्तन’ में धारावाहिक रूप से लगातार प्रकाशित हो रही हैं.

इन पत्रकथाओं में शामिल साहित्यकार हैं- आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, यशपाल, उपेंद्रनाथ ‘अश्क’, अमृतराय, हरिनारायण व्यास, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, मायाराम सुरजन, प्रभात कुमार भट्टाचार्य, दुष्यंत कुमार, वीरेंद्र कुमार जैन, विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, रवींद्रनाथ त्यागी, रमेश बक्षी, राजी सेठ, प्रणव कुमार बंद्योपाध्याय और सत्येन कुमार. ‘पश्यंती’, ‘अक्षर पर्व’, ‘अभिनव इमरोज़’, ‘नया ज्ञानोदय’ तथा मुख्य रूप से ‘समावर्तन’ में लगातार प्रकाशित इन पत्रकथाओं को पढ़कर बहुत से लेखकों और पाठकों ने पत्र लिखकर या फोन पर मेरी हौसला अ़फज़ाई की, उन सबके प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं. मुझे इस बात का भी संतोष है कि खुतूत से नुमायां साहित्यकार मित्रों के याद करने का, उन्हें समझाने का एक और मौका मुझे मिला. मेरा मानना है कि खतों के माध्यम से सर्जकों से जुड़ना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है. और मैं यह भी सोच रहा हूं कि कल जब खत लिखने की परम्परा सूख जायेगी, तो कितने विपन्न हो जायेंगे हम!  

(जनवरी 2016)

 

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