नोबेल पुरस्कार का प्रथम विजेता

         ♦   मोहन रामचंदाणी       

सन 1895 की बात है. अंधेरे कमरे में बैठा एक वैज्ञानिक एक प्रयोग कर रहा था. प्रयोग साधारण किस्म का था और उस वैज्ञानिक को खयाल भी नहीं हो सकता था कि इस प्रयोग से ऐसी कोई जानकारी हाथ लगेगी, जो विज्ञान में क्रांति ला देगी और उसे आधुनिक विज्ञान के प्रवर्तकों की महिमाशाली पंक्ति में बैठायेगी.

     वैज्ञानिक थे विलियम कोनराड रोंटजेन और उनके उस प्रयोग ने जन्म दिया क्ष-किरणों को.

     कम दबाव पर भरी गयी गैस की नली में विद्युत को प्रवाहित करने पर कई रोचक घटनाएं घटती हैं. रोंटजेन इन्हीं रोचक घटनाओं का अध्ययन कर रहे थे कि क्ष-किरणों का आविष्कार हो गया.

     प्रयोग के लिए आधा मीटर लम्बी व दो अंगुल चौड़ी शीशे की खोखली नली ली गयी थी. नली के दोनों छोरों पर पीतल की टोपियां थीं. इन टोपियों को तार द्वारा इंडक्शन काइल से जोड़ दिया गया था. नली में भरी हवा (अथवा अन्य गैस) का दबाव कम करने के लिए एक छिद्र था, जिससे निष्कासन पम्प जोड़ दिया गया था.

     साधारण दबाव पर हवा में विद्युत प्रवाहित नहीं हो सकती. लेकिन अगर विभवांतर बहुत अधिक हो और हवा का दबाव कम हो, तो विद्युत प्रवाहित हो सकती है और चिनगारियां दिखाई देने लगती हैं.

     दबाव को कम करने पर चिनगारियां ज्यादा निकलने लगती हैं. दबाव को और कम करने पर चिनगारियों का पुंज लहरदार पतली धाराओं का रूप धारण कर लेता है. दबाव को और भी कम करने पर सम्पूर्ण नली मोहक गुलाबी रंग की दीप्ति से भर उठती है. ऋणात्मक इलेक्ट्रोड नीली दीप्ति से चमकने लगता है.

     ध्यान से देखने पर यह जान पड़ता है कि गुलाबी और नीली दीप्तियों के संधिस्थल पर थोड़ा-सा स्थान दीप्ति-रहित रह जाता और काला दिखाई पड़ता है. इस काले भाग को सर्वप्रथम फैराडे ने देखा था. नली के अंदर का दबाव 1 मिलिमीटर पारे की ऊंचाई के तुल्य होने पर ऐसी अवस्था आती है.

     दबाव को और भी कम करने पर गुलाबी भाग धनात्मक इलेक्ट्रोड की ओर बढ़ने लगता है और ऐसा जान पड़ता है कि वह धनोद में विलीन होता जा रहा है. नीली दीप्ति भी ऋणोद  से आगे की ओर बढ़ती है, और इसके तथा ऋणोद के बीच एक और दीप्तिहीन भाग को सर्वप्रथम सर विलियम क्रुक्स ने देखा था. दबाव को और भी कम किया जाये, तो सम्पूर्ण नली दीप्तिहीन हो जाती है और आगे बढ़ने पर पुनः सम्पूर्ण नली हल्की संदीप्त से चमकने लगती है.

     नली के पूर्णरूपेण दीप्तिहीन हो जाने की स्थिति में कैथोड किरणें निकलने लग जाती हैं. ये ऋण आवेश वाली होती हैं और वायु में कुछ ही सेंटीमीटर चलकर विलीन हो जाती हैं. अर्थात वायु की मोटी परत को ये नहीं भेद पातीं. इन किरणों का पता सर्वप्रथम जे.जे. थाम्सन को हुआ था. क्योंकि ये किरणें कैथोड अर्तात ऋण इलेक्ट्रोड से निकलती हुई जान पड़ती हैं, इसलिए थाम्सन ने इनका नाम ‘कैथोड किरणें’ रखा. बाद में परीक्षा करने पर ज्ञात हुआ कि कैथोड किरणे इलेक्ट्रोनों का समूह होती हैं.

     उस रोज रोंटजेन यही प्रयोग कर रहे थे. उन्होंने नली को कागज से ढंक रखा था, ताकि उसमें से प्रकाश बाहर न आ जाये. नली में विद्युत को प्रवाहित करते ही उन्हें एक आश्चर्यजनक घटना देखने को मिली.

     उन्होंने देखा कि मेज़ पर रखे एक रद्दी कागज के टुकड़े से प्रकाश निकल रहा है. विद्युतधारा बंद करने पर प्रकाश निकलना भी बंद हो गया. कागज को नली से दूर ले जाने पर यह प्रभाव लुप्त हो जाता था.

           इस टुकड़े को बहुत ध्यानपूर्वक देखने पर रोंटजेन को पता चला कि उस पर एक खनिज का घोल गिरकर सूख गया है. इस खनिज का यह गुण था कि इस पर (या इसके घोल पर) एक प्रकार की प्रकाश-किरणें निकलने लगती थीं. जैसे, यदि एक ओर से उस पर बैंगनी रंग की किरणें पड़तीं, तो दूसरी ओर से नीले या हरे रंग की किरणें निकलतीं. ऐसे पदार्थ को विज्ञान में उत्तर-संदीपक (फ्लुओरेसेंट) कहते हैं और उसके इस गुण को ‘उत्तर-संदीपन’ या ‘उत्तरसंदीप्ति’ (फ्लुओरेसेन्स).

     उत्तर-संदीप्ति रोंटजेन के लिए कोई नयी चीज नहीं थी. किंतु इस उत्तर-संदीप्ति में कौन-सी किरणें निकल रही हैं, यह बात उनकी जिज्ञासा का विषय थी.

     अंधेरे कमरे में यह प्रयोग किया जा रहा था. वह नली, जिससे प्रकाश-किरणें निकलने की सम्भावना थी, काले कागजों की परतों में ढंकी हुई थी. तो क्या यह कैथोड किरणों का प्रभाव था? नहीं, इतनी दूर तक वायु में चलकर आना कैथोड किरणों के बस की बात नहीं थी.

     तो क्या अन्य अदृश्य किरणें अपना प्रभाव दिखा रही थीं? हो न हो, कैथोड किरणों से भी अधिक भेदन-शक्ति वाली कोई किरणें नली में से निकलकर काले कागज की परतों को भेदकर खनिज से सने कागज के टुकड़े को प्रकाशित कर रही थीं. रोंटजेन ने सोचा- अवश्य ही इन किरणों की भेदन-शक्ति बहुत प्रबल होनी चाहिए.

     सामने ही सहस्र पृष्ठों वाली एक पुस्तक पड़ी थी. उन्होंने उस भीमकाय ग्रंथ के तले, जहां कैथोड किरणों की सांस भी नहीं पहुंच सकती थी, उस कागज के टुकड़े को रखा और सीने पर सलीब का निशान बनाते हुए धड़कते दिल से विद्युतधारा प्रवाहित करनी प्रारम्भ की. डरते हुए उन्होंने पुस्तक के तले झांका और एकाएक उछल पड़े. वे अदृश्य किरणें अब भी अपना प्रभाव दिखा रही थीं. वह कागज का टुकड़ा चमक रहा था. खुशी में वे कभी नली को चूमते, कभी पुस्तक को.

     थोड़ा शांत होने पर रोंटजेन ने किरणों की भेदन-शक्ति का प्रयोग अन्य वस्तुओं पर भी किया- ताश की गड्डी पर, मोटे पट्टे पर, अल्युमिनियम की चादर पर. अल्युमिनियम के पार जाने पर कागज पर प्रभाव कुछ कम हो गया था. अज्ञात होने के कारण उन्हें ‘एक्स-किरण’ नाम दिया गया.

     रोंटजेन ने अपनी पत्नी के हाथ को किरणों के मार्ग में रखा और हथेली की हड्डियों का चित्र पाया. किरणें मांस को भेदने में समर्थ थी, पर कड़ी हड्डियां उन्हें रोक लेती थीं.

     क्ष-किरणों की खोज करने वाले इस वैज्ञानिक रोंटजेन का जन्म 27 मार्च 1845 को जर्मनी के लेनेप नामक स्थान पर हुआ था. हालैंड में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करके उन्होंने स्विट्जरलैंड से 1869 में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और फिर कई स्थानों पर भौतिकी का अध्यापन किया. क्ष-किरणों की खोज के समय वे वुर्जबर्ग में भौतिकी के प्रोफेसर के पद पर थे.

     रोंटजेन ने भौतिक की कई शाखाओं में कार्य किया है. उनका पहला कार्य गैस की आपेक्षिक ऊष्मा के अनुपात के सम्बंध में था. हवा में अवरक्त (इफ्रारेड) किरणों के अवशोषण तथा द्रव के भिन्न गुणधर्मों पर भी रोंटजेन ने कार्य किया. परंतु क्ष-किरण सम्बंधी कार्य ने ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करायी.

          सन 1901 में उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया. और यह याद रखने की बात है कि नोबेल पुरस्कार उसी साल शुरू हुआ था. यही नहीं, क्ष-किरणों का महत्ता इस बात से आंकी जा सकती है कि उन पर आधारित खोज-कार्य के लिए अब तक लगभग आठ नोबेल पुरस्कार दिये जा चुके हैं.

     क्ष-किरणों की खोज के तीन महीने के भीतर ही चिकित्सालयों में उनका व्यापक उपयोग आरम्भ हो गया. उनसे आजकल धातुओं में दरार आदि का पता लगाने, शरीर में छिपे सोने आदि की टोह लेने का काम भी लिया जाता है.

     क्ष-किरणें   प्रकाश की तरह विद्युत-चुम्बकीय तरंगें हैं. अंतर है तरंगदैर्घ्य का. क्ष-किरणों का तरंगदैर्घ्य कुछ एंग्सट्रस (एक मिलिमीटर का करोड़वां भाग) होता है, जबकि साधारण प्रकाश का तरंगदैर्घ्य पांच से आठ हजार एंग्सट्रस होता है. क्ष-किरणों के कम तरंगदैर्घ्य का उपयोग सर्वप्रथम वान लवे नामक एक जर्मन वैज्ञानिक ने मणिभ (क्रिस्टल) द्वारा क्ष-किरणों के नमन के अध्ययन में किया और मणिभ में दो परमाणुओं की दूरी नापी. इसके लिए 1914 में उन्हें नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया.

     क्ष-किरणों द्वारा मणिभ-रचना को समझाने के लिए विलियम हैनरी ब्रैग व विलियम लारेन्स ब्रैग ने 1915 में नोबेल पुरस्कार पाया. विज्ञान की नोबेल पुरस्कार सूची में पिता पुत्र की यही एक जोड़ी है. माता और पुत्री की जोड़ी है मादाम क्यूरी और आइरीन जोलियो-क्यूरी की.

     1917 में विभिन्न तत्त्वों की विशिष्ट क्ष-किरणों के अध्ययन के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिक बरकला को और 1929 में स्वीडन के सिगबान नामक वैज्ञानिक को क्ष-किरणों की उत्पत्ति के विषय में महत्त्वपूर्ण अध्ययन के लिए नोबेल पुरस्कार मिला.

     क्ष-किरणों की सहायता से पेनिसिलीन व विटामिन बी-12 की संरचना की गुत्थी आक्सफोर्ड की डॉ. डोरोथी हॉजकिन ने सुलझायी और उसके लिए उन्हें 1964 में रसायन का नोबेल पुरस्कार मिला. प्रोटिन की संरचना के रहस्य कैम्ब्रिज के केंड्य्रू एवं पेरुज नामक वैज्ञानिकों ने क्ष-किरणों की मदद से उद्घाटित किये और 1962 में नोबेल पुरस्कार पाया. डी.एन.ए. की संरचना को समझाने के लिए वाटसन व क्रिक को नोबेल पुरस्कार दिया गया, उन्होंने भी क्ष-किरणों का उपयोग किया था.

     रोंटजेन बहुत ही निःस्पृह व्यक्ति थे. क्ष-किरणों को पैदा करने के उपकरण का रोंटजेन ने पटेंट नहीं लिया, यद्यपि ऐसा करके वे बहुत धन कमा सकते थे. वे अकेले ही काम करना पसंद करते थे. जिस यंत्र द्वारा उन्होंने क्ष-किरणों का आविष्कार किया था, उसे उन्होंने स्वयं बनाया था.

     क्ष-किरणों की खुराक को नापने की इकाई की संज्ञा ‘रोंटजेन’ रखी गयी है. महान विज्ञानियों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का विज्ञान का यह अपना तरीका है.

(अप्रैल 1971)

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