नयी दिशाएं नये आयाम

♦  केजिता    

     लोग बच्चों से बचने लगे हैं, बचना चाहते हैं. बड़ी गहराई से निरोध के नये-नये तरीकों पर खोज-कार्य जारी है. ‘पिल्स’ की चर्चा हम इस स्तंभ में पहले कर चुके हैं. अब एक सर्वथा नये नजरिये से विचार किया गया है, प्रयोग-परीक्षण हुए हैं और कामयाबी नजदीक नजर आने लगी है.

    प्रसिद्ध प्रसूति विज्ञानी एलेन गटमैकर ने हाल ही में न्यूयार्क में बताया है कि प्रास्टेग्लोंडिन्स नामक रसायनों पर जो अध्ययन हुए हैं, उनके कारण इनमें वैज्ञानिकों की दिलचस्पी निरंतर बढ़ती जा रही है. ये रसायन दीर्घ शृंखला वाले कार्बनिक यौगिक है. गटमैकर के अनुसार ये हारमोनों की तरह ही काम करते हैं, परंतु इनकी विशेषता यह है कि ये अपेक्षाकृत और अधिक विशिष्ट घटनाओं को जन्म देते हैं. इनमें से कुछ का उपयोग रक्तदाब को घटाने में किया जा सकता है. कुछ ऐसे हैं, जो पेट में पेपप्सन के उत्पादन को नियमित करते हैं.

    इन्हीं में से एक है- एफ-2 एल्फा. इसका प्रभाव भी अपने वर्ग के अन्य यौगिकों की भांति विशिष्ट है. यह ‘कारपस ल्युशियम’ पर आक्रमण करता है और उसे तत्काल विगलित कर देता है. आप पूछेंगे कि ‘कारपस ल्युशियम’ क्या चीज है? सुनिये, नारी के गर्भाशय में अंडाणु के निषेचित हो जाने के तत्काल बाद वहां एक पिंड का निर्माण होता है, यही ‘कारपस ल्युशीयम’ है. यह पिंड भ्रूण के विकास के लिए आवश्यक पोषक पदार्थ मुहैया करता है.

    एफ-2 एल्फा नामक प्रास्टेग्लेंडिंग गर्भाशय स्थित इस पिंड को विगलित करके उस स्रोत को ही नष्ट कर देता है, जो भ्रूण को विकिसत करने के लिए उत्तरदायी है. इस पिंड के नष्ट हो जाने पर भ्रूण का विकास रुक जाता है और पोषक पदार्थों के अभाव में वह स्वयं नष्ट हो जाता है.

    बताया गया है कि यदि एफ-2 एल्फा से तैयार की गयी एक गोली महिला को महीने में एक बार ऋतुस्राव चक्र से पूर्व दे दी जाये, तो उसे नियमित रजोधर्म होता रहेगा और उसे यह भी पता नहीं चल सकेगा कि यह प्रक्रिया स्वाभाविक ढंग से हुई है अथवा रसायन के प्रभाव से.

    अंडाणु के निषेचित हो जाने के बाद परोक्ष रूप से उसे प्रभावहीन बना देने का यह प्रयास अपेक्षाकृत नया है. अब तक ज्ञात अधिकांश निरोध रसायन शुक्रणुनाशी के रूप में काम करते हैं. यानी शुक्रणु अंडाणु को निषोचत कर सके, इससे पूर्व ही या तो नष्ट कर दिया जाता है अथवा उसे अंडाणु तक क्या गर्भाशय के द्वार तक भी पहुंचने नहीं दिया जाता.

     इस रसायन को स्वीडिन में आजमाया गया है और इससे मिले नतीजों से काफी उम्मीद बनती है.

रक्षा अनजाये बच्चे की

    बात ज़रूरत की है. कभी ज़रूरत होती है कि अंडाणु निषेचित ही न होने पाये, और यदि हो जाये तो वह बढ़ने न पाये. मगर, कभी निहायत ज़रूरी समझा जाता है कि गर्भ सब बलाओं से दूर रहे, सही-सलामत बढ़ता रहे और एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सके. इसके लिए भी काफी एहतियातें रखनी होती हैं.

    आज जब दवाएं, हमारे जीवन में रोज-मर्रा की चर्चा बन गयी हैं, यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि किस दवा का गर्भस्थ शिशु के विकास पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इस का स्पष्ट अध्ययन किया जाये. हाल ही में एक प्रसिद्ध ‘ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ में छपी एक शोध-रिपोर्ट में रोजमर्रा बेरोकटोक इस्तेमाल की जाने वाली कुछ दवाओं से गर्भिणियों को आगाह किया गया है.

    एडिनबरा विश्वविद्यालय के बालरोग-विशेषज्ञ प्रो. जॉन फोरफर तथा डाक्टर एम. नेल्सन विकलांग बच्चों को जन्म देने वाली 458 स्काटिश महिलाओं का अध्ययन करने के बाद इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि एस्पिरिन तथा बदहजमी के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कुछ गोलियों से स्त्रियों को गर्भ की प्रारंभिक अवस्था में यथासम्भव बचना चाहिए. कुछ नींद की गोलियां तथा तन्वंगी बनने के लिए ली जाने वाली, भूख कम करने वाली कुछ गोलियां भी इस दृष्टि से खतरनाक सिद्ध हो सकती हैं.

मंथनः उर्वरकों का

    होम्योपैथिक दवाओं की ‘पोर्ट्रेंसी’ बढ़ाने के लिए उन्हें तीव्र गति से मथने की प्रक्रिया प्रचलित है. मगर यह सिद्धांत साधारण उर्वरकों की शक्ति बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, यह किसी वैज्ञानिक को कभी नहीं सूझा. और सूझा भी तो एक सरकारी कर्मचारी को, जसका शोधकार्यो से दूर का भी सम्बंध नहीं.

    श्री वाई. रामचंद्रन आकाशवाणी के कर्मचारी हैं और होम्योपैथी की प्रैक्टिस भी करते हैं. उन्हें अचानक यह बात सूझी कि उर्वरक का मंथन करके उन्हें पौधे के लिए इस्तेमाल करके देखा जाये. वे और उनके कई मित्र अपनी शाक-बाड़ियों में यह प्रयोग करते रहे. मंथे हुए उर्वरकों का इस्तेमाल एक वर्ष तक करते रहने के बाद वे इस निर्णय पर पहुंचे कि वास्तव में उर्वरकों को मथकर मिट्टी में डाला जाये, तो वे कम मात्रा में ही अधिक उपज दे सकते हैं.

    श्री रामचंद्रन ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा अनेक संस्थाओं के वैज्ञानिकों से प्रार्थना की कि उनकी तकनीक पर अधिक वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाये. प्रारंभ में कोई उत्साहवर्धक उत्तर कहीं से नहीं मिला. मगर वे भी लगे रहे और अंततः भारतीय कृषि शोध-संस्थान इस बात के लिए तैयार हो गया कि वहां इस विषय पर प्रयोग किये जायें.

    हाल में संस्थान ने श्री रामचंद्रन को एक पत्र द्वारा सूचित किया है कि प्रयोगों के परिणाम बड़े ही उत्साहवर्धक हैं और संस्थान ने अब इस विषय पर विस्तृत परीक्षण करने का फैसला किया है.

    उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ रही है. देश के कारखाने पर्याप्त उर्वरक नहीं तैयार कर पाते. करोड़ों रुपये के उर्वरक प्रतिवर्ष विदेशों से मंगवाने पड़ते हैं. यदि मंथन विधि द्वारा कम उर्वरक से ही अधिक देश का लाभ होगा, प्रत्येक किसान का भी काफी पैसा बच जायेगा.

चांद पर भी बादल

    ज़मीन से बहुत दूर, ऊपर से आंखमिचौली करते रहने वाला चांद अब आदमी की जकड़ में आ गया है. ऐसा क्या बचा है उसका, जिसकी छानबीन न की जा रही हो अथवा आगे न की जाने वाली हो. वहां से धूलि आयी, शिलाएं आयीं. वहां यंत्र गये, खुद इंसान भी पहुंच गया.

    जो यंत्र वहां हैं, वे उसकी खासी खबर ले रहे हैं. हाल ही में हाउस्टन (अमरीका) के स्पेस सेंटर के वैज्ञानिकों ने बताया है कि चांद के आस-पास भी गैसीय बादल उपस्थित हैं. कालेंबिया विश्वविद्यालय के डॉ. गैरी लैथेम तथा राइस विश्वविद्यालय के डॉ. जान फ्रीमैन के अनुसार, 21 और 25 फरवरी 71 के बीच चांद पर बादल देखे गये. यह सूचना अपोलो-12 और अपोलो-14 द्वारा चांद पर रखे गये यंत्रों से मिली है.

    डॉ. फ्रीमैन ने कहा कि अभी तक इस बात का निर्णय नहीं हो सका है कि यह गैस चांद से ही उत्पन्न हुई है, अथवा जो ल्यूनर मॉड्यूल जमीन से ऊपर जाते रहे हैं, वे वहां यह गैस छोड़कर आये हैं.

    अपोलो-14 से पहले भी ऐसी सूचना दी गयी थी कि जिस समय चांद अपनी कक्षा में पृथ्वी के सबसे नजदीक था, उस समय भी उसके पास गैसीय बादल दिखाई दिये थे.

    एक निश्चित समय पर ही इन बादलों का दिखाई देना वैज्ञानिकों को कुछ रहस्यमय प्रतीत हो रहा है.

 लेजर टेलिफोनः

    बिना तार और केबल के टेलिफोन चलाने की कामना तो कई देशों के वैज्ञानिकों ने की थी. चलाये भी जा सकते हैं. रूसी वैज्ञानिकों ने इस पर प्रयोग-परीक्षण शुरू किये. उन्होंने तार के स्थान पर अदृश्य लेजर किरणपुंज का इस्तेमाल किया. पिछले दिनों मास्को में हुई एक विकास-प्रदर्शनी में अर्धचालक लेजरों पर आधारित इस नये टेलिफोन को रखा गया था.

    लेबेदेव फिजीकल इंस्टिट्यूट द्वारा विकसित यह लेजर टेलिफोन देखने में सिने-कैमरा जैसा लगता है. इसके रिसीविंग तंत्र में अर्धचालक लेजरों को काम में लाया गया है और रिसीवर के रूप में फोटो ट्रांजिस्टरों को. इसे नाम दिया गया है- टी यू-2. फिलहाल यह पांच मील के दायरे में ही काम कर सकता है, परंतु उम्मीद है कि इस कमी को शीघ्र ही दूर किया जा सकेगा. ऐसा हो जाने पर टेलिफोन तारों के जाल तो खत्म हो ही जायेंगे, इससे एक नये युग की शुरूआत भी हो जायेगी.

एक ही बल्ब, बस

    हम अपने घरों में जैसी ज़रूरत हो, वैसे ही पावर के बिजली के बल्ब लगा लेते हैं. बाथरूम में पच्चीस वाट के बल्ब से काम चल जाता है, मगर रसोईघर में कम-से-कम साठ वाट का बलब तो चाहिए ही. बैठक या ड्राइंग रूम बड़ा हो तो उसके लिए सौ वाट के बल्ब की भी ज़रूरत पड़ सकती है. इस तरह जीरो से लेकर हजार-दो हजार वाट तक के बल्ब अलग-अलग स्थानों पर काम में लाये जाते हैं.

    बिजली के पंखों के रेग्युलेटर आपने देखे हैं, जिनसे पंखे की रफ्तार मन-मुताबिक हल्की अथवा तेज की जा सकती है. क्या बिजली के बलबों के लिए भी ऐसी ही कोई व्यवस्था सम्भव नहीं? यह सवाल सबसे पहले उठा श्री एस. के. श्रीवास्तव के दिमाग में और उन्होंने ही उसका जबाव खोजना शुरू कर दिया और, जिन खोजा तिन पाइयां. श्री श्रीवास्तव भरतपुर (राजस्थान) के निवासी हैं और आजकल अलीगढ़ के एक बिजली घर में सहायक इंजीनियर पद के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं.

    उन्होंने एक ऐसे बल्ब डिजाइन तैयार की है, जिससे आवश्यकतानुसार 25,40,60 अथवा 100 वाट के बल्ब के बराबर रोशनी प्राप्त की जा सकती है. इसी सिद्धांत पर इस सीमा को कितना भी बढ़ाया जा सकता है. इस बल्ब के बीच में एक फिलामेंट और इसके चारों  तरफ चार ‘लीडवार’ लगाये गये हैं, जो बल्ब की टोपी में झाल दिये जाते हैं. एक विशिष्ट स्विच से इस फिलामेंट का कनेक्शन इनमें से किसी भी लीड वायर से किया जा सकता है.

    श्री श्रीवास्तव का कहना है कि इस बल्ब से विद्युत-शक्ति के अपव्यय को रोका जा सकेगा और साथ ही इच्छित तीव्रता का प्रकाश भी प्राप्त किया जा सकेगा.

विरंजक मृदाएं

    अपरिष्कृत अथवा प्रयुक्त वनस्पति तेल, वसा, अम्ल, स्नेह तेल, पेट्रोलियम, मोम आदि को विरंजित करने तथा मिट्टी के तेल आदि को गंधहीन बनाने के लिए अनेक रसायन पदार्थों की ज़रूरत होती है. ये हमारे यहां नहीं मिलते. मगर इनके बिना काम तो चल नहीं सकता, इसलिए इन्हें विदेशों से मंगाना पड़ता  है. रसायन की भाषा में इन्हें मृदाएं (अर्दस) कहते हैं. हैदराबाद स्थित रीजनल रिसर्च लेबोरेटरी ने इन मृदाओं का काम करने वाले देशी पदार्थ खोज निकाले हैं, जो हमारे देश के लिए विशेष महत्त्व के हैं.

    भारत में विकसित इन मृदाओं का मुख्य उपादान अल्युमिनियम सिलिकेट है. ये नये पदार्थ इतने उपयोगी सिद्ध हुए हैं कि बिनौले और सोयाबीन जैसे गहरे रंग वाले तेलों को भी इनकी सहायता से विरंजित किया जा सकता है.

    इनके उत्पादन की जानकारी आंध्र प्रदेश की एक फर्म को व्यावसायिक उपयोग के लिए दी गयी है और शीघ्र ही दन शुरू होने की सम्भावना है.

दर्पण क्रीन

    बंबई स्थिति इंडियन इंस्टिट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के गणित प्राध्यापक डा. सी. आर. मराठे ने हाल ही में एक नवीन सिनेप्रोजेक्शन तकनीक का विकास किया है, जिसे विश्व की अपने किस्म की अकेली तकनीक बताया गया है. नाम दिया गया- दर्पण क्रीन (मिरर क्रीन)

    इस नयी तकनीक में दो क्रीन होते हैं. एक तो सामान्य और दूसरा दर्पण-परावर्तक, जो कि धात्वीकृत पॉलिस्टर फिल्म से बनाया जाता है. अच्छा और साफ दृश्य, आराम और हाल में अतिरिक्त सीटों की व्यवस्था, इस तकनीक के सम्भावित परिणाम हैं. हाल ही में एक सिनेगृह में इस तकनीक को अपनाया भी जा चुका है. शायद दुनिया के दूसरे देशों को भी भारत की इस तकनीक को अंगीकृत करना पड़े.

(मई  2071)

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