नयी दिशाएं, नये आयाम

♦    केजिता        

 ब्रह्मांड-स्थित पृथ्वीतर पिंडों पर जीव के अस्तित्व का प्रश्न कुछ उलझ-सा गया है. असीम-अपार ब्रह्मांड, उसमें बिंदुमात्र-सी पृथ्वी. उसके बाहर जीव का कहीं भी अस्तित्व ही न हो, बहुत अधिक तर्कसम्मत नहीं लगता. परंतु विज्ञान के आधार हैं- प्रयोग, प्रमाण. मात्र तर्क से कुछ बनता नहीं. अंतरिक्ष में जीव के अस्तित्व की संभावना के पक्ष-विपक्ष में जब-तब कुछ पढ़ने सुनने को मिलता रहता है.

     इधर 29 सितम्बर 1969 को विक्टोरिया (आस्ट्रेलिया) में एक उल्कापात हुआ. उल्काश्म का विस्तृत विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया नासा द्वारा. बताया गया है कि उल्काश्म उतना ही पुराना है, जितना की पृथ्वी. यानी इसका निर्माण भी पृथ्वी तथा सौर मंडल के अन्य ग्रहों के साथ ही अंतरतारकीय (इंटरस्टेलर) गैस-मेघ से हुआ. विश्लेषण से जो तथ्य सामने आये, वे कुछ अधिक निर्णायात्मक लगे. उल्काश्म में अमीनो अम्लों की उपस्थिति का पता लगा है. सभी जैव-कोशिकाओं के मुख्य रचक अमीनो अम्ल ही है. इसका मतलब यह हुआ कि पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य अंतरिक्ष-पिंडों पर जीव के अतिरिक्त अन्य अंतरिक्ष-पिंडों पर जीव के अस्तित्व की संभावना है, इस बात को अब पहले की अपेक्षा कहीं अधिक विश्वास के साथ कहा जा सकता है. यह पहला मौका है, जब किसी अंतरिक्ष-पिड पर जटिल जैव-पदार्थों के अस्तित्व की प्रामाणिकता सिद्ध हुई है. देखें, यह नयी जानकारी हमें कहां ले जाती है.

     जीवन चांद पर?

     जीव की खोज का केंद्र-बिंदु पिछले दिनों चांद रहा है. नील आर्मस्ट्रांग, कोलिन्स तथा एलड्रिन जब चंद्रशिलाएं पृथ्वी पर ले आये, तब इन पदार्थों के माध्यम से जीवन के अस्तित्व की खोज पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में की जाने लगी. शिला-विश्लेषण किये गये इस पहलू को नजर में रखते हुए.

     ब्रिटिश भू-गर्भशास्त्रियों को विश्लेषण के दौरान कार्बन और पानी की अल्प मात्राओं की उपस्थिति का पता लगा. इटालियन वैज्ञानिकों ने आक्सिजन की मैजूदगी की सम्भावना जाहिर की है. कुछ अन्य विश्लेषकों ने विश्वास प्रकट किया कि चांद की सतह के नीचे बर्फ की शक्ल में पानी का होना नामुमकिन नहीं है। अन्य महत्त्वपूर्ण जैव-घटक तत्त्वों जैसे- हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, गंधक और फास्फोरस की तलाश अभी जारी है.

     कहा जाने लगा है कि चांद पर विद्यमान अपसामान्य तापस्थितियों (120सें. तथा 172 सें.) को यदि नियंत्रित किया जा सका, तो वहां पौधे उगाये जा सकेंगे.

     इन परिणामों तथा भावी सम्भावनाओं का नतीजा यह हुआ है कि हाउस्टन स्थित नासा चंद्र अनुसंधान प्रयोगशाला में इंडियाना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक चंद्र-मृदा पर आलू, टमाटर, तंबाकू तथा ज्वार आदि की फसलें पैदा करने के प्रत्यन में जोरों के साथ लग गये हैं.

     चांद से जो वैज्ञानिक छानबीनें शुरू हुई थीं, वे लगातार आगे बढ़ती जा रही हैं. चांद पीछे छूटता जा रहा है. कई मौलिक सवालों के जवाबों की प्रतिक्षा है- क्या ‘चांद-पौधे’ भी प्रोटीन आदि पदार्थों का संश्लेषण पार्थिव पौधों की भांति करेंगे? और क्या न्यूक्लिक अम्ल आदि आवश्यक घटक (आर.एन.ए.तथा डी.एन.ए.) पार्थिव पौधों जैसे ही होंगे?

     भावी विज्ञान का स्वरूप काफी दूर तक इन सवालों के उत्तर पर निर्भर है.

     जेबी अंधकक्ष

     फोटो खींचना-खिंचाना अनन-फानन का काम है. बटन दबाया नहीं कि काम हो गया. मगर ‘पाजिटिव’ की तैयारी के लिए समय चाहिए. फिर अंधकक्ष (डार्क रूम) भी चाहिए, इसके लिए.

     अब एक अमरीकी फर्म ने एक जेबी अंधकक्ष तैयार किया है. यह कैमरे से जुड़ा रहेगा. जहां फोटो ली जाए, वहीं पर इस अंधकक्ष में निगेटिव को ‘प्रोसेस’ किया जा सकेगा. वक्त लगेगा कुछ तीन मिनिट.

     हां, इस कक्ष में केवल 35 मि. मि. की फिल्म को ही ‘डिवेलप’ किया जा सकेगा. कीमत? मात्र डेढ़ सौ डालर. इस नये उपकरण का नाम-प्रोरपैक.

     डैट?

     सम्पूर्ण सृष्टि के रचनात्मक घटक दो हैं- पदार्थ और ऊर्जा. ये दोनों भी परस्पर एक दूसरे में बदले जा सकते हैं. विज्ञान की भाषा में नश्वर कुछ भी नहीं. विनाश-विकास तो रूप, आकार के परिवर्तन मात्र हैं. कई दर्शनों का मूल स्वर भी कुछ ऐसा ही तो है.

     कहा जाता है कि कितनी ही जीव-जातियां, जो किसी समय हमारी चेतन सृष्टि का अंश थीं, अब लुप्त हो चुकी हैं. कभी-कभी इसके प्रमाण भी मिल जाया करते हैं. एक ताजी मिसाल है. पिछले दिनों रूसी और मंगोली वैज्ञानिकों के एक दल को गोबी रेगिस्तान में कुछ जीवाश्मित अंडों के ढेर मिले.

     बताया गया है कि ये अंडे डायनोसार नामक एक विशालकाय जानवर के हैं, जिसका अस्तित्व जाति के रूप में लगभग छःकरोड़ वर्ष पूर्व समाप्त हो चुका है. यह जानवर तीस मीटर तक लम्बा होता था, परंतु जीवाश्मी अंडों की लंबाई बीस सेंटिमीटर से ज्यादा नहीं है. तास में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार गोबी स्थित एक प्रागैतिहासिक नदी के पाट में ऐसे सोलह अंडे मिले हैं.

     दूसरी तरफ नयी-नयी जीव-जातियों का विकास हो रहा है. पिछले दिनों इसी स्तंभ में आप ‘डोबरा’ के बाबत जान चुके हैं. गधे और जेबरा के संकरण के फलस्वरूप इस नये जीव का विकास किया गया है. पता चला है, मैसटन (इंग्लैंड) के एक पशु-विक्रेता रॉय टट ने तो असंभव को संभव बना डाला है. कुत्ते और बिल्ली का संकरण कराने में उन्हें कामयाबी मिल गयी है.

     इन सज्जन ने एक  काली बिल्ली (पैच) तथा एक छोटे शिकारी कुत्ते (बोन्स) में धीरे-धीरे दोस्ती करानी शूरू की. आहिस्ता-आहिस्ता यह दोस्ती प्यार में परिवर्तित होने लगी. फिर लगाव  बढ़ने लगा. वे यहां तक भूल गये कि वे अलग-अलग हैं. दूरी कम होती गयी, होती गयी और एक दिन टट ने देखा कि वे एक हो गये हैं. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा. पैच मां बनने वाली थी.

     वह मां बन गयी दो बच्चों की. बच्चे भी क्या! शक्ल बाप की, यानी कुत्ते की. धड़ और पांव वगैरह मां के से. आवाज का क्या कहा जाये! बिल्ली की म्याऊं और कुत्ते की भौंक के बीच की कुछ चीज. खाने की आदत भी अनोखी. गोश्त भी खा जायें और मछली भी. इसी नयी जाति के आदि प्रतिनिधि को नाम दिया गया- डैट (डॉन+कैट). इन्हें ‘कम्पीज’ (कैट+पप्पीज) तथा ‘पीटन्स’(पप्पीज+किटन्स) भी कहा जाने लगा है.

     मगर यह जीवजाति क्या आगे चलेगी? अभी दोनों बच्चे मादा हैं. टट को फिर एक बार कोशिश करनी होगी, शायद इस बार नर डैट की प्राप्ति हो जाये. यों उन्हें सफलता की पूरी आशा है.

     अगली बात का सम्बंध जितना जीवनशास्त्र से है, उतना ही फैशन से भी है, मिनि-का फैशन था. सब कुछ ‘मिनि’- मिनि स्कर्ट, मिनि कार, मिनि रेडियो. फिर कुत्तों ने  हि क्या बिगाड़ा था कि वे मिनि न हों! एक ऐसे कुत्ते की ज़रूरत महसूस की जाने लगी जो इतना छोटा हो कि शॉपिंग बैग में उसे आसानी से रखा जा सके. ब्रिस्बेन (आस्ट्रेलिया) का एक पशु-उत्पादक तोइस कभी को पूरा करने के लिए पिछले आठ वर्षों से प्रयत्नशील था. आखिर ‘आस्ट्रेलियन सिली टेरियर’ का एक मिनि संस्करण विकसीत करने में वह कामयाब हो ही गया. यह कुत्ता कुल 25 सेंटीमिटर लम्बा, 7।। सेंटिमीटर ऊंचा और लगभग सवा किलो वजनी है. खुशी से उस कुत्ते को थैले में डालिये और शॉपिंग के लिए चाहे जब निकल पड़िये.

     शकरकंदी प्रोटीन

     आजकल शकरकंद का मौसम है. बालू में भुने मीठे शकरकंद की चाट सर्दियों में खूब चलती है. मगर शरीर के लिए आवश्यक प्रोटिन और विटामिनों का इस खाद्य में सख्त अभाव है. लिहाजा कार्बोहाइड्रेट से भरपूर इस कंद को नियमित भोजन का अंश नहीं बनाया जा सकता. जहां ऐसा किया गया है, वहां देखा गया कि बच्चों का विकास अवरुद्ध हुआ है और प्रोटीनों के अभाव के कारण अनेक विकृतियां पनपी है. विश्व के कुछ हिस्सों में शकरकंद की फसल बहुतायत से होती है. वहां यह ज़रूरी समझा गया कि इसे इस  खामी से मुक्त कराया जाये.

     1970 के आरम्भ में आस्ट्रेलिया के न्यू-साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एच. कोपर तथा प्रो.एफ.जे. कोज ने एक परियोजना शुरू की. उद्देश्य यह था कि कैसे शकरकंद में प्रोटीन, विटामिन और स्टार्च का संतुलित मात्रा में विकास किया जा सके. जो रास्ता इस शोध-दल ने अपनाया, उसके अनुसार एक विशेष प्रकार की फफूंदी शकरकंद के ऊपर लागायी जाती है. यह फपूंदी प्रोटीनों और विटामिनों से भरपूर होती है.

@   स्टार्च-संपन्न शकरकंद इस फफूंदी के लिए माध्यम का काम करती है और इसके जरिये विटामिनों और प्रोटीनों से संपन्न हो जाती है. शोधकर्ताओं के अनुसार यह नया परीक्षण प्रयोगशाला में पूरी तरह सफल हो चुका है. अनुमान है कि शीघ्र ही खेतों में भी इसकी पैदावार शूरू हो जायेगी.

     खूबसूरत बीवी

     खूबसूरत बीवी नियामत है या आफत? यह भी कोई सवाल है? भला कौन न चाहेगा कि उसकी बीवी हद दरजे की खूबसूरत  न हो. मगर भारत के मशहूर हृदय-रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. दाते ने हाल ही में नयी दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कालेज में एक भाषण के दौरान युवकों को जो सलाह दी, वह भी पढ़ लीजिए. भाषण का विषय था- हृदय-रोग, रोकथाम और व्यवस्था.

     एक चीनी कहावत उद्धृत करते हुए डॉ. दाते ने कहा कि यह ठीक ही है कि खूबसूरत बीवी पुरुष के लिए हमेशा एक तनाव का सबब बन सकती है. और तनाव हृदय-रोग का सबसे बड़ा स्रोत है. जिन्हें पहले से है, उनके लिए हरदम का खतरा.

     अच्छा रसोइया भी इसी श्रेणी में आता है. वह अच्छा खाना बनायेगा और आप जिह्वा की चपलता के मारे खा जायेंगे भूख से बहुत ज्यादा. और रोज-रोज की पेट-भराई का नतीजा होगा मुटापा, जो दिल के रोगों के लिए दावत का सामान है.

     हां, उन्होंने कहा कि चाय से ऐसा कोई खतरा नहीं. उसका दिल से कोई रिश्ता नहीं, दूर का भी नहीं.

( फरवरी  1971 )

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